Book Title: Epigraphia Indica Vol 08
Author(s): E Hultzsch
Publisher: Archaeological Survey of India

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Page 290
________________ No. 25.] TWO PRAKRIT POEMS AT DHAR. 251 [38] जड़ जम्मो चिप लभइ ता लभउ कमढजम्मसारिच्छो । पफलेणं अवेणं लद्देण व होउ न ह कज्नं ॥४८॥ रे कमढ तुफ गोत्ते के न हुआ के न अस्थि होहिंति । सच्चेण पुण भणामो तुज्क सरिच्छो तुमं चैत्र ॥६॥ श्री कमढी चित्र जामो जारहिम्वि किं जणेहिं अबेहिं । जम्मम किं पि [39] सरिसं जीवंतेहिं न जेहिं कयं ॥१०॥ जडू जम्मो चित्र लभइ ता लभउ कमढजम्मसारिच्छो । लडेण व अवेणं न हु कज्जं तेण न हु कजं ॥१०१॥ पसवच्छलेण गम्भा सवित्रा सयलाण एस्य महिलाण । सच्चिममो पुण पसवी जामो कमढस्म जणणीए ॥१२॥ इझराण पसवित्रा[40]ण वि गभा सवित्रा हु सयलमहिलाण । सच्चेण पसविधा पुण एक चित्र कमढ तुह जणणी ॥१०॥ अवामो पसविामी वि नेत्र पसूआउ ताण गमचुई । जाया सच्चप्पसवा एक चित्र कमढिणी भुणे ॥१०४॥ भुषणे वि जा न जायी सरिसो ता किं करेउ सो परमी । एको चिप वहर भर [41] कुम्मो वो पपावन्तो ॥१५॥ एक्कलधुरिमी सो श्चिम भारेण समं पि एस्थ जो वीचं । उब्बहइ उपह भारं अबो उण भणिअमेत्तेण ॥१०॥ कुम्मस्स वि वीसामो दिनो एक्कण भोपराएण । हरिऊण वैरिभासं कुम्मसयं विरह तेण ॥१०॥ गाहासयं न एवं गाहाण सरहिं केवले[42]हिं कयं । सयवारं एकेक पटर जणो जेण तेण सयं ॥१०॥ एघार सयाई तए गाहाण सरहिं ने राई । सयवारं आवत्ती जेणं एमाण तेण सए ॥१०॥ ॥ ॥ ॥ इति महाराजाधिराजपरमेश्वरश्रीभोजदेवविरचितं भवनिकूर्मथतम् ।। ॥ मङ्गलं महाधीः ॥ ॥ १८. Read लभ and लभत. . Read wteft fa fa pft, aud in the second verse for afe. १०१. Read खभर And समत. १०२. Read गम्भा. १०३. Read गभा. १०४. Read पन्नात 'चाउ and गर्भ'. १०५. वरची वराक:, Gr.880. Read बीर्ष १६. For एकल 100 note on A. 17. Read बौ. १०८. Read सरहिं लेhि, or twice fr. 8. Read एचारं सयार and सरhि, or the same without Anusvirs. सर must be taken in the sense of सवाई. Compare SYU, A. 47 (with note), and TET, B. 34. T=aul is rather singular here, since Bhoja has not be addressed in this ode. 22

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