Book Title: Anusandhan 2008 09 SrNo 45
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 13
________________ अनुसन्धान ४५ (डुंगरशी धरमशी संपट), राजनगरनां रत्नो (वल्लभजी सुंदरजी) गुजरात वर्नाक्युलर सोसायटीनो इतिहास (गुज. वर्ना. सोसायटी) वगेरे. अहीं तेथी ज शेठ शान्तिदासना जीवननी कशी पण वात जणावी नथी मात्र केटलीक विशेष नोंध अने एमनां करेल कार्योनी नोंध मूकी छे. श्लो. ३९ सं. १६६८ - कनडदेशमां (कर्णाटकमां?) श्रीहीरविजयसूरिना पादुका सहित स्तूपनी प्रतिष्ठा श्लो. ४० सं. १६६९ - शत्रुजयतीर्थ उपर महोत्सवपूर्वक आदेश्वरभगवानना परिकरनी प्रतिष्ठा श्लो. ४१ १६७५ - शत्रुजयतीर्थनी संघपति बनी विधिपूर्वकनी यात्रा श्लो. ४५ १६७८ - प्रासादनिर्माण (प्रारंभ?) श्लो. ६० १६८२ - महोत्सवपूर्वक वाचक मुक्तिसागरगणिना हाथे श्रेयांसनाथ प्रमुख शताधिक बिम्बोनी प्रतिष्ठा श्लो. ६३ १६८६ - महो. मुक्तिसागर गणिने गणाधिपपदे बिराजमान करवा. (सागरगच्छ स्थापना ?) श्लो. ६५ १६८७ - महादुष्काळमां गरीब लोकोने अनादिनुं दान श्लो. ६६ १६९० - शत्रुजयतीर्थनी संघपति बनीने यात्रा. श्लो. ६७ १६९३ - पादविहार-विहार प्रमुख छ'री- पालन करवा पूर्वकनी शत्रुजय यात्रा. आ सिवाय अनु. १८ मां प्रगट थयेल सिद्धाचलतीर्थचैत्यपरिपाटीना मुद्दा नं. ९मां तेमणे तीर्थाधिराज तरफ जवाना रस्ता पर बनावेल 'वाव'नी नोंध छे. तेओ जे मोगल बादशाहना सम्पर्कमां आव्या तेमांना शाहजहां, जहांगीर, मुरादबक्ष, औरंगझेब पासेथी शत्रुजय-गिरनार-आबु-तारंगा-केसरियाजी-अने श्रीचिन्तामणिजी जेवा तीर्थनी रक्षाने लगतां फरमानो मेळव्यां हता. [जैन परं. इति.] सं. १६८६ मां मुक्तिसागरगणिनी आचार्यपदवी थई. सागरगच्छ स्थपायो त्यार बाद सागरगच्छनी वृद्धि माटे शेठे ११ लाख रू. खरच्या. सागरगच्छना Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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