Book Title: Anusandhan 2008 09 SrNo 45
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
View full book text
________________
सप्टेम्बर २००८
।। ६०॥ श्री गुरुभ्यौ(भ्यो) नमः ॥ (दु)दूहा - समकितदायक वीरना, पद पंकज प्रणमेवि,
समकितसार संखेपथी, कहेंसु तवन करेवि स्वामि तुझ दरिसन विना, भमिओ काल अनंत, मोहादिक री वसें, चहुं-गति दुःख दुरंत ... २
ढाल१, राग - तेह पुरुष हवें वीनवेंजी । कोइक जीव तिहां लहेंजी, कर्म तणो स्थितिघात, यथाप्रवृत्तिकरणें करीजी, पल्योपल (नद्योपल?) दृष्टांत,
उपगारी अरिहा, वंदो वीर जिणंद.... १ (ए आंकणी०) तिहां पण गांठ अभेदतोजी, रागर्ने द्वेष प्रणांम, समकित जीव नवी(वि) लहेंजी, तुझ दरी(रि)सण सुखधाम, उपगारी.... २ पंथी पिवीली न्यायथीजी, कोइक सन्नि पजत्त, पुद्गलअर्द्धपरावर्तेजी, पहेलुं करण संपत्त,
उपगारी.... ३ आयु वजित सातनीजी, कर्मस्थिति अवसेस, न्यूंन कोडाकोडी(डि) रहेंजी, निर्जरा योग विशेस उपगारी.... ४ करण अपूरव मोगरेंजी, करतो गंठी(ठि) नो भेद, अंतरमुहुर्त विशुद्धतोजी, अनिवृत्तिकरण सुवेद, उपगारी.... ५ अनिवृत्तिकरण रह्योजी, स्थिति होइं बिहुं तांम, अंतरमुहुर्तनी भोगवेंजी, पहेंली आतमराम,
उपगारी.... ६ अनुदित बीजी तें रहेंजी, अंतरकरण संत, पहिलें समयें तव होइंजी, उपशमसमकितवंत, उपगारी.... ७
ओषध सम ते समकितेंजी, रही स्थितिना त्रण्य भाग, कोद्रव सम पहेंलो करेंजी, शुद्ध ते समकित भाग, उपगारी.... ८ शुद्धाशुद्ध बीजें रहेंजी, एहवें काल पहुत्त, शुद्ध पुंज उदय होइंजी, खयोपशमें संयुत्त,
उपगारी.... ९ शुद्ध कर्या जिम कोद्रवाजी, न करें तें मोहविकार, जातिस्वभाव नवी तजेंजी, समकित तिम अतिचार, उपगारी.... १० अशुद्धपुंजे मिथ्यामतीजी, शुद्धाशुद्ध ते मीस, इम भाखे जगनो गुरुजी, वीर विभू जगदीस, उपगारी.... ११
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org

Page Navigation
1 ... 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114