Book Title: Anusandhan 2008 09 SrNo 45
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 30
________________ सप्टेम्बर २००८ येषां मन्दोऽपि लब्ध्वा जयति समदहद्वादिवृन्दान् प्रसाद, ध्वस्ताऽशेषधुसद्मक्षितिरुहसुमनोरत्नजाग्रत्प्रभावम् ॥८५।। [स्रग्धरा] जम्बूद्वीपसरोरुहे सुरगिरिः सत्कर्णिकाभां दधद्, हंसादीन् भ्रमयत्यभीक्ष्णमभितो यावत् श्रिया लोभयन् । तावत् शिष्टजनैः प्रसन्नहृदयैर्वावाच्यमाना क्रियात्, . श्रीचिन्तामणिपार्श्वनाथभुवनोद्भूता प्रशस्तिः शुभम् ॥८६॥ [शार्दूल०] ॥ इति श्रीवृद्धशाखीय उकेशज्ञातीय सा० (श्रावक) श्रीवर्धमान सा० (श्रावक) श्रीशान्तिदासकारित...... || सम्पर्क : C/o. हार्दिक ड्रेसिस ५५/चकला स्ट्रीट रूम नं. १०, बीजे माळे, मुम्बई-३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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