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सप्तम परिच्छेद
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हुआ हो || ६ || उसकी प्रेमाही नाम की भार्या से मनोहर चार पुत्र उत्पन्न हुए ||७|| चन्द्र सम निर्मल यश और चारित्रधारी, इन्द्रिय-जयी, दूसरों
अशुभ ( दुःख) को दूर करने वाला, पर-स्त्रियों और विद्वानों द्वारा जो असत्य कहा गया है उससे विरक्त, चारों में सौम्य और ज्येष्ठ देवराज महल में नौनाही पत्नी के साथ भली प्रकार से रमण करता है || ८ - १० ॥ उसकी कुक्षि रूपी सीप से मुक्ताफल रूपी शत्रुओं को शल्य स्वरूप दो पुत्र उत्पन्न हुए ||११|| हरिवंश नाम का पहला ( पुत्र ) अपने कुल का और गुणी जनों का दीपक हुआ || १२ ||
घत्ता - गुणों से मनोज्ञ उसकी भार्या मेल्हाही कही गयो है । उसकी किससे उपमा करें। वह ऐसी प्रतीत होतो है मानो गौरी, गंगा और यमुना ही हो ।।७-१२ ।।
[ ७-१३ ]
[ देवराज के द्वितीय पुत्र एवं अन्य भाइयों का परिचय ]
प्राणियों को अभयदान देनेवाले उस हरिवंश के साक्षी स्वरूप पहले अभयचन्द और दूसरा गुणरूपी रत्नों से रत्नाकर स्वरूप, देवराज के सभी पुत्रों में सूर्य-स्वरूप रतनपाल नाम का पुत्र कहा गया है, उसकी पत्नी भूराही गायी गयी है || १ ३ ॥ देवराज का जगत्-विख्यात झाझू नाम का दूसरा भाई ( हुआ ) ||४|| चोचाही उसकी भार्या कही गयी है, जो उसके स्नेह से सुशोभित रहती है ||५|| नागराज ( इसका ) पहला ( पुत्र ) और उसकी वही नाम की स्त्री सन्तति जनने से आल्हादकारिणी थी || ६ || दूसरा गेल्हू और झाझू का तीसरा पुत्र चाऊ नाम से लोगों में विख्यात हुआ । चुगना महणा का ( तीसरा ) प्रिय पुत्र कहा गया है || ८ || उसकी डूंगरही श्रेष्ठ पत्नी और दोनों के खेतसिंह, श्रीपाल, राजमल, कुँवरपाल और जटिल नामक पुत्र कहे हैं ॥ ९-१० ॥ महणा का चौथा पुत्र जो धर्म का रथ ( कहा गया ) छुटमल्लु ( था ) । मनोहारी फेराही स्त्री से उत्साही श्रेष्ठ दरगहमल्लु पुत्र ( हुआ ) ।।११-१२ ||
घत्ता - इसके पश्चात् करमचन्द का दूसरा पुत्र जोजू कहा गया है । ऊपर कहे गये जोजू की गुरु के पदों में अनुरक्ता साहाही प्रिया जानी गयी है ॥७-१३॥
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