Book Title: Agam Sudha Sindhu Part 03 of 01
Author(s): Jinendravijay Gani
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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________________ 41] [ श्रीमदागमसुधासिन्धुः :: प्रथमो विमागः भण कुण व तिमं व तं वत्ति // 3 // ततिता करणंमि कया णीतं च कतं व तेण व मते वा / हंदि णमो साहाते हवति चउत्थी पदाणंमि // 4 // श्रवणे गिराहसु तत्तो इत्तोत्ति व पंचमी अवादणे / छट्टी तस्स इमस्स व गतस्स वा सामिसंबंधे // 5 // हवइ पुण सत्तमी तमिमंमि अाहारकालभावे त श्रामंतणी भवे पट्ठमी उ जह हे जुगाणत्ती // 6 // सू. 601 // अट्ठ ठाणाई छउमत्थेणं सब्वभावेणं ण याणति न पामति, तंजहा-धम्मस्थिगातं जाव गंधं वातं, एताणि चेव उप्पननाणदंसणधरे अरहा जिणे केवली जाणइ पासइ जाव गंधं वातं // सू० 610 ॥ट्ठविधे श्राउवेदे पन्नत्ते, तंजहा-कुमारभिच्चे कायतिगिच्छा सालाती सल्लहत्ता जंगोली भूतवेजा खारतंते रसातणे // सू० 611 // सकस्स णं देविंदस्स देवरन्नो अट्ठग्गमहिसीनो पन्नत्तायो, तंजहा-पउमा सिवा सती (सूती) अंजू अमला अच्छरा णवमिया रोहिणी 1 / ईसाणस्स णं देविंदस्म देवरन्नो अट्ठग्गमहिसीयो पन्नत्तायो, तंजहा-कराहा कराहराती रामा रामरक्खिता वसू वसुगुत्ता वसुमित्ता वसुंधरा 2 / सकस्म णं देविंदस्स देवरंनो सोमस्स महारन्नो अट्टग्गमहिसीयो पनत्तायो 3 / ईमाणस्स णं देविंदस्त देवरन्नो वेसमणस्स महारनो अट्ठग्गमहिसीयो पनत्तायो, 4 / अट्ठ महग्गहा पन्नत्ता, तंजहाचंदे सूरे सुक्के बुहे बहम्सती अंगारे सणिचरे केऊ 5 // सू० 612 // अट्ठविधा तणवणस्सतिकातिया पन्नत्ता, तंजहा-मूले कदे खंधे त्या साले पवाले पत्ते पुप्फे // सू० 613 // चरिंदिया णं जीवा असमारभमाणस्स अट्ठविधे संजमे कजति, तंजहा-चक्खुमातो सोक्खातो अववरोवित्ता भवति, चक्खुमतेणं दुक्खेणं असंजोएत्ता भवति, एवं जाव फासामातो सोक्खातो श्रववरोवेत्ता भवति फासामएणं दुक्खेणं असंजोगेत्ता भवति / चउरिंदिया णं जीवा समारभमाणस अविधे यसंजमे कजति, तंजहा-चवखुमातो सोक्खायो ववरोवेत्ता भवति, चम्खुमतेणं दुक्खेणं संजोमेत्ता भवति, एवं

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