Book Title: Shrutsagar 2014 10 Volume 01 05
Author(s): Kanubhai L Shah
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org • श्रुतसागर | श्रुतसागर SHRUTSAGAR (MONTHLY) October 2014 Volume : 01, Issue : 05 Annual Subscription Rs. 150/- Price Per copy Rs. 15/Editor: Kanubhai Lallubhai Shah बनवीत तय कमेडिय वि. सं. १६७६ मां लखायेली जगद्गुरु आचार्य श्री विजयहीरसूरीश्वरजी महाराजना नामोल्लेखवाळी हस्तप्रतनुं अंतिम पत्र मिनिदा नमुनम हत्या ra ० Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir तिन जुगणिचरण यात|| श्री केटी चा नापति श्रमरवैश्य आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर For Private and Personal Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Synop Gulamhusen N. Shariff. Merchants & F. Sīganee. PALGHAR. BRANOJI-KELTA ROAD. (D. B. & c. 1. R.) पू. आचार्य श्री विजयेंद्रसूरिजी उपर लखायेलो पत्र airy from PAKHAR (Din THANA ) 5-4 Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir देशमा परमा जिल्यै खुरिbeta महाराज ना. श्री शायरी जापनी प्रेम n. ma . २.१.३२ दिने भा Haji या विष्णु रायत भूपाला मध्येका ६३ लाखक 19.32 दयाना येश खुदनाइये अपल्या दुम गया कार्यबारे साना सरकार तवाय महागार दयासाच्या खाडी समाजमनी-दिनेश भगत एहियो बुदो अनेोचार त्यांन चालुमान ध्यापनी सूचना भवाग्राम यादी घमेरी लवासाया कणा त्यांच्या भागात योकि त्यो स मनी दशाइन वर माटो मुर्ति के अन्य को स्थापनाला मी बांहो- (लेक मारीलाल पथि दावी त्यांना व्यवस्थापन महावादन माना त्य रामप 9:49 211 एक अ९३५ यदि लगा रशी मारो पारी सुरत- बाहिरी गादश मारो उत्तरी बाकी रतनई .... रोचियो मुसाहरी करीश (धार) पारे साथमा बिधातु धरकाहि कोन For Private and Personal Use Only देसी मारा गया ३. पारको अपरिगएको at the best way, in a 419. (2 गृहमा आहे आपनारायनोई आदित "Baman का शुभ नांगरा को ध्या nician.simm y ३३५ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का मुखपत्र) श्रृतसागर श्रुतसागर SHRUTSAGAR (Monthly) वर्ष-१, अंक-५, कुल अंक-५, अक्तूबर-२०१४ - Year-1, Issue-5, Total Issue-5, October-2014 वार्षिक सदस्यता शुल्क-रू. १५०/- * Yearly Subscription - Rs.150/ अंक शुल्क - रू. १५/- * Issue per Copy Rs. 15/ आशीर्वाद राष्ट्रसंत प.पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म.सा. * संपादक सह संपादक : कनुभाई लल्लुभाई शाह हिरेन के. दोशी ___ एवं ज्ञानमंदिर परिवार १५ अक्तूबर, २०१४, वि. सं. २०७०, आसो वद-७ निभाना काका ॐ . সুকাহাকে आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर-३८२००७ फोन नं. (०७९) २३२७६२०४, २०५, २५२ फेक्स : (०७१) २३२७६२४९ Website : www.kobatirth.org Email : [email protected] For Private and Personal Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अनुक्रम हिरेन के. दोशी आचार्यश्री पद्मसागरसूरि Acharya Shri Padmasagarsuri मुनिश्री सुयशचंद्रविजय १. संपादकीय २. गुरुवाणी 3. Beyond Doubt ४. एक विशेष पत्र ५. विजय हीरसूरिजीना नामोल्लेखवाळी केटलीक प्रतिलेखन पुष्पिकाओ ६. हस्तप्रत लेखन परंपरा से सम्बद्ध विद्वान परिचय हिरेन के. दोशी संजयकुमार झा डॉ. हेमन्त कुमार ७. पुस्तक समीक्षा प्राप्तिस्थान: आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर तीन बंगला, टोलकनगर परिवार डाईनिंग हॉल की गली में पालडी, अहमदाबाद - ३८०००७ फोन नं. (०७९) २६५८२३५५ For Private and Personal Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir संपादकीय हिरेन के. दोशी श्रुतसागरनो पांचमो अंक आपश्रीना हाथमां छे. आम तो आ अंक विशेषांक रूपे अर्थात् ऐंशी पेजनो आपवा भावना हती, पण आवता मासे केटलांक विशेष प्रसंगोथी अने केटलीक विशेष बाबतोने समावेश करवानी धारणा होवाथी आ अंकने सामान्य अंक रूपे ज आपश्रीनी समक्ष प्रकाशित कर्यो छे. सद्गुणोनी आवरदा सद्वांचनथी लंबाय छे. सद्वांचन रूपी श्वासथी सद्गुणरूपी जीवन निराबाध रीते व्यतीत थाय छे. सद्वांचन एटले जीवनने फूलनी जेम विकसतुं जोवु... सद्वांचन एटले निरांते जीवनना रसने माणवो... चित्तप्रदेशमां विचारो के कल्पनाना लागेला दवने जे ठारी आपे ए सद्वांचन... वमळमाथी ज्यारे एम लागे के हवे बहार नीकळी शकाय एम नथी त्यारे खरेखर सारा पुस्तको आपणने बहार काढी आपता होय छे. एवं पश्चिमी लेखक- आ वाक्य खरेखर वाचननी महत्तानो उद्घोष करे छे. वीतेला समयनी स्मृतिना भारथी अने आगामी दिवसोनी कल्पनाथी थाकी गया होईए त्यारे सद्वांचननो महिमा समजाया वगर नहीं रहे... अस्तु... आ अंकनी वात : गया अंकमां प्रकाशित वाक्संयम अंगे पूज्य गुरुभगवंतश्रीए आपेल प्रवचन आ अंकमां एज प्रवचननो आगळनो भाग प्रकाशित कर्यो छे. तो साथे साथे वाचकोनी मांगणीने अनुसार पूज्य गुरुभगवंतश्रीए आपेल प्रवचनोने गुजराती अने अंग्रेजी भाषामां पण प्रकाशित करवानुं प्रारंभ कर्यु छे. ए साथे ज तारीख ५-४-१९३२ एटले ८५ वर्ष जूनो गौरवप्रद एक पत्र आ अंकमां प्रकाशित कर्यो छे. पत्रना लेखक जैनेतर होवा छतां, एमना हृदयमां स्थिर थयेली तत्त्वज्ञान प्रत्येनी श्रद्धा अने एक अप्रतिम निष्ठा अनुभवाया वगर नहि रहे. प्रस्तुत अंकना टाईटल पेज नंबर २ अने पेज नंबर ३ उपर मुखीसाहेबना हस्ताक्षरोमां लखायेलो पत्र प्रकाशित कर्यो छे. जे वाचको जोई शकशे. For Private and Personal Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR OCTOBER-2014 - छेल्लां केटलांक समय पहेलां प्रकाशित कराती प्रतिलेखन पुष्पिकाओनी श्रेणिमां आ वखते जगद्गुरु आचार्य श्री विजयहीरसूरीश्वरजी म. सा. ना नामोल्लेखवाळी केटलीक हस्तलिखित प्रतोनी पुष्पिकाओ प्रकाशित करी छे. हजु पण एमना नामोल्लेख के एमना धर्मराज्यमां लखायेली श्रुतप्रभावनानी नोंध आपती केटलीक प्रतिलेखन पुष्पिकाओ छे जे आगामी अंकोमा प्रकाशित करवा धारणा छे. . __ आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबामा हस्तलिखित प्रतो, प्रिन्टेड प्रतोपुस्तको तथा सामयिकोनो विशाळ संग्रह करवामां आव्यो छे. आ संग्रहनो उपयोग प.पू.साधु-साध्वीजी भगवंतो तथा विद्वानोकरी शके ते हेतुथी समस्त माहितीओने स्वविकसित लायब्रेरी मेनेजमेन्ट सॉफ्टवेअर हेठळ सुव्यवस्थित संग्रहित करवामां आवे छे. आ प्रोग्राममां कृति, कृति परिवार, विद्वान, विद्वाननी परंपरा, पेटांक, ओनलाईन डीझीटाईझ फोर्ममां ग्रंथो जोवा, प्रतिलेखन पुष्पिका, रचना प्रशस्ति, प्रकाशन परिवार आदि जेवी अनेक माहितीओने संग्रहवामां आवे छे. जेना उपयोगथी झीणामां झीणी माहितीना आधारे जोईती विगतो क्षणवारमांज मेळवी शकाय छे. ज्ञानमंदिर खाते वाचक सेवा हेठळ ई-मेल, पीडीएफ फोर्मेट, झेरोक्ष, कुरियर, आदि प्रक्रिया द्वारा वाचकने जोईती माहितीओ त्वराथी आपवामां आवे छे. श्रुतसेवाना कार्यमां ज्ञानमंदिर खाते केवा-केवा प्रकारनी खास विगतो उतारवामां आवे छे, एनो परिचय करावती लेखश्रेणीमा एक लेख हस्तप्रत लेखन परंपरा से सम्बद्ध विद्वान परिचय'अले प्रकाशित कर्यो छे. आ लेखना वांचनथी आपने ख्याल आवशे के विद्वानोने उपयोगी थवा माटे ज्ञानमंदिर द्वारा हस्तप्रतोमा रहेल विद्वानोनी झीणीमांझीणी माहितीओने तेओनी उपयोगितानी दृष्टिए केवी रीते संग्रहवामां आवे छे. आ माहितीनो उपयोग विद्वानो केवी-केवी रीते करे छे अने करी शके छे ते बाबतनी जाणकारी पण आपने प्राप्त थई शकशे. आवा प्रकारना प्रोग्राम अने साधननी मददथी श्रीसंघमां थता कार्योने योग्य सहयोग मळी शके ए आशयथी ज आ प्रकारना लेखननुं अने प्रकाशन- कार्य प्रारंभ्यु वाचको अने संशोधकोने एक जुदा प्रकारनी द्रष्टिथी जोवा प्रेरित करती आ लेखश्रेणी एमने पोताना कार्यमां अने स्वाध्यायमा उपयोगी थशेज, ए आशा अस्थाने नथी... दर अंकमां प्रकाशित थती पुस्तक समीक्षामां आ वखते जैन शिल्पविधानना बे भागनो संक्षिप्त परिचय अने अनुमोदन प्रकाशित करवामां आव्यु छे. For Private and Personal Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org गुरुवाणी Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir आचार्य पद्मसागरसूरि वाक्-संयम 'सारस श्रुतौ द्रोहिणी' आँख से कभी अच्छा देखा नहीं, कान से कभी धर्म कथा सुनी नहीं। सियार विचार में पड गया। कहा कि भगवान फिर क्या करूँ । इसके हाथ खा लूँ। आपने मना कर दिया तो मुझे चुप रहना पडता है। 'हस्तौ दानविवर्जितौ' इसने जीवन में हाथ से कभी दान किया ही नहीं । जगत को लूटने में ही इसका प्रयोग किया। अर्पण में कभी इसका उपयोग नहीं किया। केवल दुरुपयोग किया है। इसलिए भूलकर भी इसके हाथ का भक्षण मत करना, वरना तेरी रही-सही भी चली जाएगी। भवान्तर में इससे भी भयंकर योनि में तुझे जन्म लेना पड़ेगा । जो हाथ सेवा के लिए कुदरत ने दिया, जिस हाथ से परमात्मा या साधुओं, मुनिजनों की भक्ति करनी चाहिए। जो हाथ दीन-दुखियों की सेवा के लिए मिला है, उसका उपयोग आज तक हमने किसके लिए किया? कोई साधन बुरा नहीं होता, साधन का उपयोग बुरा या भला होता है। चाकू कितने व्यक्तियों को जीवन दान देता है, न जाने कितने व्यक्तियों का प्राण लेता है। चाकू निरपेक्ष है, निर्दोष है, उसका उपयोग यदि विवेक पूर्वक किया तो लाभ के लिए है। विवेक शून्य होकर यदि उपयोग करें तो हानिकारक है। ये सारी इन्द्रियाँ मोक्ष प्राप्ति में सहायक बनती हैं। सारी इन्द्रियाँ कर्म क्षेत्र में सहयोग देने वाली बनती हैं। परन्तु यदि दुरुपयोग किया जाए तो दुःख को आमन्त्रित करती हैं। हाथ का उपयोग कभी हमने इस प्रकार किया ही नहीं । सेवा के लिए इसका उपयोग हमसे कभी न हो पाया । 'हस्तौ दानविवर्जितौ' For Private and Personal Use Only व्यक्तियों की आदत है जगत् को प्राप्त करना । हमें प्राप्ति में आनन्द का अनुभव होता है, अर्पण में जरा भी आनन्द नहीं आता है। लोग क्षणिक प्राप्ति के अन्दर बड़ी शान्ति का अनुभव करते हैं । परन्तु वह शान्ति स्थायी नहीं रहती, अस्थायी होती है। न जाने इस प्राप्ति के लिए कितना भयंकर पाप करना पड़ता है। जगत् को प्राप्त करने के लिए न जाने कितने अनाचार का सेवन करना पड़ता है। कितना घोर दुरुपयोग हम करते हैं, इस हाथ का अपनी लेखनी के द्वारा । असत्य का प्रयोग करके Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 6 यदि हम धन उपार्जन करें तो वह कैसे शान्ति देने वाला बनेगा? धर्म का जो साधन है, उस साधन का यदि दुरुपयोग किया जाए। सरस्वती के साधन का यदि दुरुपयोग किया जाए, तो वह दर्द और पीड़ा का कारण बनता है । हमने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं, लिखकर असत्य की वकालत करके, अप्रमाणिकता से जीवन चलाकर, कितना हमने अपनी आत्मा के लिए अनर्थ उपस्थित किया है, कभी उसका हिसाब हमने देखा ही नहीं । OCTOBER-2014 पुराने जमाने में चौपड़ा रखा करते थे, हिसाब किताब के लिए दुकान पर । आपको मालूम होगा काली स्याही से, होल्डरों से चौपडा लिखा जाता था । दिवाली के दिन मुहूर्त करते समय उसी का प्रयोग किया जाता था । वह मांगलिक माना जाता है। हमारी परंपरा है। तो चौपडा लिखते-लिखते हमें मालूम है, उस समय ब्लोटिंग पेपर नहीं होता था, रेती रखी जाती थी। धूल सूखी हुई, यदि कहीं ज्यादा स्याही जम जाए तो उसे डाल देते। वह सूख जाती थी। स्याही और कलम ने आपस में मिलकर बड़ी मित्रता की, स्याही ने कहा- परोपकार पूर्वक अपना जीवन अर्पण कर देना, यह मेरी भावना है। तुम मुझे सहयोग दो । कलम ने कहा- ठीक है, मैं भी घिस - घिस कर अपना प्राण अर्पण करने को तैयार हूँ। दोनों के अन्दर बलिदान की बड़ी सुंदर भावना रही कि अपना बलिदान करके लोगों का हम पेट भरें। लोगों के जीवन निर्वाह करने में मदद करें, परिवार का भरण पोषण करने में सहायक बनें। आप देखिए! दोनों में कैसी सुंदर अपूर्व मित्रता है । कलम जैसे ही स्याही में डुबोया जाता है, स्याही का साथ मिलता है। दोनों में बड़ी अच्छी मित्रता रहती है। जैसे-जैसे कलम आगे चली, उसके पीछे स्याही सूखती हुई चली जाती है। मित्र के वियोग में, कवि की बड़ी सुंदर कल्पना है, वह स्याही अपना प्राण दे देती है । मेरा मित्र आगे चला गया उसके वियोग में मेरा जिन्दा रहना कोई मूल्य नहीं रखता । स्याही सूख जाती है, मर जाती है। कलम आगे चली जाती है । For Private and Personal Use Only कई बार आपने देखा होगा, लिखते-लिखते दो चार लाइन हम नीचे आ जाएँ और यदि कहीं स्याही जीवित रह जाए, सूखे नहीं। ऐसे में यदि पन्ना बदलना पड़े तो क्या करते हैं? वह धूल लेकर ऊपर डाल देते हैं। वह धूल क्यों डालते हैं? तेरा मित्र तुझे छोड़कर, कहाँ चला गया, मित्र के वियोग में तू अभी तक जीवित है। तेरे मुँह पर धूल पडे। हमारी परंपरा बड़ी अपूर्व वस्तु है। आत्मा को छोड़कर, धर्म को छोड़ कर Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर 7 अक्तूबर २०१४ यदि आप जीवन में आगे बढ़ जाएं, तो ज्ञानीयों ने कहा कि आपके मुंह पर भी कर्म राजा धूल डालता है । धिक्कार है तुम्हें। धर्म तुम्हारे जीवन का परम कल्याणकारी मित्र है । उसको छोड़कर तुम इतने आगे बढ़ गए ? आत्मा और धर्म को छोड़कर यदि आगे बढ़ोगे तो मुँह पर धूल पड़ेगी । धिक्कार है ऐसे जीवन को । इस जीवन का कोई मूल्य नहीं है, कोई महत्त्व नहीं है । तिरस्कार के योग्य है ऐसा जीवन । योगी पुरुष ने बहुत सुंदर ढंग से उसको समझाया, कहा- कि तू इसे छोड़ दे। कैसी भी तुझे भूख लग जाए, उपेक्षा कर दे। यदि प्राण चला जाए तो भी चिन्ता न कर। वह तो जाने वाला है ही। दो दिन पहले चला जाए तो क्या हुआ । अतः इसके हाथ कभी मत खाना। वरना तुम्हारे अंदर की सारी उदार वृत्ति नष्ट हो जाएगी। न जाने भवान्तर में कहाँ किस योनि में जन्म लेना पड़े? सियार कहता है 'और कुछ नहीं, अगर इसका पेट खा लूँ तो, योगी ने कहा कि 'यह तो पाप का गोदाम है।' अन्यायोपार्जितवित्तपूर्णमुदरम्। अन्याय से उपार्जन किए हुए द्रव्य से इसने अपना पेट भरा है। कभी नीति और न्याय का पैसा इसके पेट में नहीं गया। कभी भूल कर के इस पेट का भक्षण मत करना। यह तो पाप का गोदाम है। बिचारा सियार विचार में पड़ गया। एक-एक अंग को लेकर के उसने चाहना की। कि भगवन्! यदि आपकी इच्छा हो तो इसको खा लूं । आखिर में सियार ने कहा 'भगवन्! इसके माथे को ही खा लूँ।' योगी पुरुष ने कहा 'यह तो पाप की पार्लियामेंट है। सारे दुर्विचार वहां से ही पैदा हुए। इसके अंदर पाप की मति है । गर्वेण तुंगं शिरः बड़े गर्व से इसने अपने माथे को ऊपर रखा है। इस सिर का भक्षण मत करना । नहीं तो अहंकार प्रवेश कर जाएगा। ये सारे पाप के विचार तेरे अंदर आ जाएंगे। उसका परिणाम तू जानता है । भवान्तर में बुद्धि मिलेगी नहीं, निर्बुद्धि होगा । इसलिए भूल कर भी इसके माथे का भक्षण मत करना' । For Private and Personal Use Only (क्रमश:...) Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra SHRUTSAGAR www.kobatirth.org 8 ગુરુવાણી જ્ઞાન અને ક્રિયાના સહયોગથી મોક્ષપ્રાપ્તિ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir OCTOBER-2014 આચાર્ય પદ્મસાગરસૂરિ * રૂપી પદાર્થોની પાછળ અરૂપી તત્ત્વ કામ કરી રહેલ છે. અરૂપી આત્મા વગર રૂપી શરીરની કિંમત કંઈ જ નથી. જે નથી દેખાતું તે જોવા માટે જ્ઞાનની જરૂર છે. જ્ઞાન સાથે ક્રિયા, સ્વાધ્યાય અને ધ્યાનની આવશ્યકતા છે. * ક્રિયામાં રસમગ્ન બનવા માટે જ્ઞાનના અભ્યાસની જરૂર છે. આત્માની વાત અભ્યાસથી જાણવાની-સમજવાની જરૂર છે. ‘સૂત’ શબ્દના અનેક અર્થ થાય છે તો તે શબ્દના અર્થનું જ્ઞાન હોય તો ક્રિયામાં અનેરો આનંદ પ્રગટે છે. શબ્દ અને અર્થને લક્ષમાં રાખીએ તો દરેક ક્રિયા સુંદર ફળ આપે છે. * જીવનમાં લક્ષ ન હોય તો કટોકટી પ્રસંગે માનવ હામ હારી જાય છે, દામ ખોઈ નાખે છે અને તેના કામનાં કોઈ ઠેકાણાં હોતાં નથી તેથી તે થાકી જાય છે જે એકને (આત્માને) જાણે છે તે બધાને જાણે છે. લક્ષથી માણસ જીવનમાં આગળ વધી જાય છે. * જેની આંખો સ્થિર નથી તે નિશાનને વીંધી શકતો નથી. ભણવા બેસો ત્યારે મનને સ્થિર કરીને ભણશો તો જ્ઞાન યાદ રહી જાય છે. દુધ પણ સ્થિર રહે તો દહીં બની શકે છે. જ્યાં સ્થિરતા છે ત્યાં જમાવટ છે, માટે લક્ષની આવશ્યકતા પ્રથમ છે. ૐ ધર્મને જીવનનું લક્ષ બનાવો. તેનું જ્ઞાન મેળવો. તદાનુસાર ક્રિયા કરો તો જીવન ધર્મમય બની કલ્યાણકારી બનશે. રસપૂર્વકની ક્રિયાથી ધર્મમાં રુચિ જાગ્રત થાય છે. દોડાદોડ કરી જે તે ક્રિયા કરવાથી ધર્મમાંથી રસ ઓછો થઈ જાય છે. * જીવનમાં ધર્મ સમજીને વિચારીને કરવાનો છે. લક્ષસહિત કરેલ ધર્મ ક્રિયાના મિશ્રણથી રસમય તેમજ ફળદાયી બને છે. * પ્રભુ સાથેનાં લગ્ન અખંડિત છે. જ્યાં નથી વિયોગ કે વિરહ. સંસારનાં લગ્ન ખાંડનાં રમકડાં સમાન છે. For Private and Personal Use Only * જ્ઞાનને લક્ષમાં લઈ ક્રિયા કરવાથી એક શ્વાસોચ્છ્વાસમાં મેરુપર્વત જેટલા કર્મોનો નાશ કરે છે. આમ જ્ઞાન પ્રકાશ છે. તે પ્રકાશ અનેક ક્રિયામાં જોડે છે ને જ્ઞાન તથા ક્રિયાના સહયોગથી મોક્ષપ્રાપ્તિ થાય છે. Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Beyond Doubt Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Acharya Padmasagarsuri Once again, Indrabhuti began to wonder as to who this greater Omniscient could be, since in his opinion, he was the greatest. He said that if these gods were so particular to pay their obeisances to the Omniscient, they ought to bow to him and listen to his discourse. He could not understand why those gods were heading past the great scholars assembled for the Yagna. In the words of poet, Indrabhuti's feelings can be expressed thus: crat gu: zei ezanzdterfzy za aruer: 1 कमलाकरवद् भेकाः मक्षिकाश्चन्दनं यथा ॥ करभा इव सद्वृक्षान् क्षीरान्नं शूकरा इव । अर्कस्यालोकवद् घूकास्त्यक्त्वा यागं प्रयान्ति यत् ।। Oh! It is such a pity that the illusioned souls are drifting past this holy place. They are like the crows which fly away from the holy places and like the frogs that abandon the lakes. Just as bees leave the sandalwood tree and camels fail to recognise the importance of fruitful trees, pigs look over good food and the owls close their eyes to sunlight, so also these devas are illusioned. He also said that the union of the so-called omniscient and the devas was like that of a village mimic (dancer) entertaining a company of fools since two fools are most pleased with each other's company. Someone advised the bitter gourd not to creep over the neem tree since it would become more bitter. But the creeper paid no heed to the advice and the adviser remarked that he did not find fault of the bitter gourd () in doing so, but said that everybody seems to find pleasure For Private and Personal Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 10 SHRUTSAGAR OCTOBER 2014 in the company of those possessing similar qualities and interest. Though a crow flaps over neem fruits, the mango fruit does not lose its sweetness and its taste is in tact as before. Indrabhuti said:"Just as mango is the king of fruits so am I the king of scholars as I have defeated great scholars. There is none who can par my knowledge and greatness, and is capable of competing and facing me in any kind of scholarly debate. लाटा दूरगताः प्रवादिनिवहा मौनं श्रिता मालवा:, मूकत्वं मगधागता गतमदा गर्जन्तिनो गूर्जराः । काश्मीराः प्रणता: पलायनपरा जातास्तिलङ्गोद्भवाः, विश्वेचापिस नास्ति यो हि कुरुते वादं मया साम्प्रतम् ॥ The scholars of Latadesha fled away fearing defeat. Malwa scholars imposed dumbness on speech, the debators of Gujarat gave up their wits; the scholars of Kashmir bowed their heads in shame and the Telang scholars fled from the place on hearing my name. What more to say? There is none who can dare to face me leave along trying to compete with me. When such is the pathetic condition of all the so called great scholars, then how come there exists such an omniscient! To me, He only seems to be a magician of some kind and has attracted the gods by His magical powers”. As Indrabhuti was deeply immersed in self-pride and self-praise, he saw the devas returning after paying their obeisance and he enquired from them about the personality of the kevali they visited. He said that it was astonishing, that being gods they could not distinguish between reality and falsehood. He begged them to tell him something about the omniscient they visited. (Continue...) For Private and Personal Use Only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org एक विशेष पत्र Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir मुनिश्री सुयशचंद्रविजय प. पू. आचार्य श्रीधर्मसूरिजी म. सा. (काशीवाळा )नी परंपरामां पू. मंगलविजयजी, पू. हिमांशुविजयजी, पू. विद्याविजयजी, पू. जयंतविजय जेवा घणा विद्वानो थया. ते बधा विद्वानोमां कोई विशेष होय तो ते पू. आचार्यश्रीविजयेंद्रसूरीश्वरजी. तेओ पुरातत्त्व, संस्कृत, न्याय जेवा विषयोमां अस्खलित गति धरावता हता. देश-विदेशमां तेओ ख्यातनाम हता. तेमनी आवी प्रतिभाथी प्रभावित थई गणदेवीना एक नझरअली हसनभाई मूखी नामना विद्वान तेमना परिचयमां आव्या. जैन दर्शननो सामान्य अभ्यास करी विशेष अभ्यास माटे श्रीतत्त्वार्थाधिगम सूत्र तथा उपमितिभवप्रपंचा कथा भण्या. उपमिति भवप्रपंचा कथाए तेमना मानस पर केवी अमीट छाप मुकी हशे ते प्रस्तुत पत्रमां देखाय छे. खास पत्रमां जोवा मळतो मुखी साहेबनो गुरु समर्पणभाव पण अद्भुत छे. जैनेत्तर व्यक्तिनो आवो समर्पणभाव तेमने उंची कक्षाए लई जाय तेमा नाही. आपणे पण आवो उत्तम भाव केळवीए एज मंगल प्रार्थना. 5-4-1932 N.H.Mookhi C/o Gulamhusen N. Shariff Merchants & C. Agents Palghar, Dist. Thana Branch - Kevla Road For Private and Personal Use Only श्री शीवपुरी श्री सद्गुरु परमात्मान् श्री विजयेंद्रसूरीश्वरजी महाराजना चरणकमलमां... आपनो प्रेमपूर्ण पुनित प्रभावना रूप पत्र ता. २-४-३२ना दिने मल्यांथी पुलकित थवाना कारणमां आ निष्पुण्यक जीवात्मा प्रत्येना करुणा भावज चोख्खा “भुलता नहिं” ए शब्दोमां सूचनारूपे समजाया. हुं अहिं गया बुधवारे एक संबंधीनी बीमारीमां सारवार करवामां मददगार थवा Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 12 OCTOBER 2014 आव्यो छऊ. एकाद अठवाडीआमां मन्दुर मरिजने शारू जणाता गणदेवी जवानुं थशे. पत्र व्यवहार त्यांज थवा देशोजी. आपनी सूचना आग्रामां आपणा पूज्य गुरुश्रीनी लाईब्रेरी' जोवा लायकनी जणावी त्यां जवा आग्राह कर्यो. हुं त्यां जरूर जईश. बनशे तो एकाद दिवस त्यां रही ए सद्गत गुरुश्रीना स्मारकरूप फोटो, मूर्ति के अन्य कांइ स्थापना हशे तो तेने वांदीश. तेमनी चरणरज मारी आंख मांथे चडावी कृतकृत्य थइश. त्यांना व्यवस्थापक महाथयने मारा त्यां आगमन टाणे मने मददरूप थाय तेम भलामण लखी जणावी आभारी करशो. मारी मुसाफरी सुरत- वडोदरा - गोधरा - रतलाम - मथुरानी थतो मथुरां उतरी ग्वालीअर तरफ जती जी.आइ.पी रेल्वेमां मुसाफरी करीश. (थवा धारणा छे) मारे साथेमां बिछानुं इत्यादि शुं जोइशे ते जो लखशो तो बनती तजवीज करीश. जो के हुं तो मारा कोइ पुण्योदयना प्रतापे योगी अने ज्ञानीना घरमां अवतार लेवा ज आवुं छु तेथी मारे तो अपरिग्रहनो अभ्यासी थवं छे छतां परिग्रहना पदार्थोनी बहुलता थवानी छे. अने ते सघलो प्रताप पेली 'उपमिति भवप्रपंचकथा' मांहेना सदागम नामना पात्र अर्थात् श्री गुरु अने तेमना पाटे आवनाराओ आप सउ अंतेवासीओनो ज छे. आ जीव निमित्त मात्र ज छे. 'उपमिति भवप्रपंचा कथा' पूरी करी श्रीतत्त्वार्थसूलनां तण सूत्रो ज थयां अने हुं अहि आव्यो छउ पण हवे तो सदागमरूप आपश्री जीवता सूत्रो अने आगमो रूप गत सिद्धपुरुषोना करुणाना पात्ररूप थवानो तो ज्ञाननी तो भूख भांगवानी ज छे. श्री न्यायविजयजी महाराज विहारमां छे मने छेल्लो पत्र आपनो मारा प्रत्येना आज्ञा संबंधनो हतो बाद विशेष जाण तेओ साहेब तरफथी मुद्दल ज नथी. उमेद राखु छउ के आपनी सेवामां आवतां पूर्वे एक वखत वांदीश (दर्शनसमागमरूप पासपोर्ट मेलवीश.) आपनो प्रभावना रूप पत्र पांच वखत फरी फरी वांची हर्षित थाऊं छउ. जो के हर्ष प्रशस्त छे पण परिग्रहरूपे तो ठीक ज नथी. द्वंद्वातीत थवाना अभ्यासी थईशु. केवळ निर्वाणपदना पूजक छइ. जैन साहित्यरूप विद्यामहासागरमां हवे तो मनगमता तरशुं. कसरत करीशुं अने ए सर्वमां आप तरतां शीखवाडनारा छो. हवे फिकर ते बा. (बाबत) नी तो पूरी थइ छे. चित्तने चिंतन तो चिंतव्यनुं ज होय. १. वर्तमानमां आ भंडार आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबा खाते संग्रहित छे. For Private and Personal Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org श्रुतसागर 13 अक्तूबर २०१४ पण ज्यारे ज्यारे चित्तने चिंतव्य ज प्राप्त थाय त्यारे अद्वेत थई त्यां भेदभाव नीकळी पुलकितपणुं सहेज भान थाय छे. त्यांनी ऋतु अहिं सुरत जिल्लाथी थोडाक फेरफार वाळी छे. ते जणावशोजी. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पत्र गणदेवी ज लखशो. दर्शन लाभमां जेटलो समय जाय छे ते अनिवार्य ज छे. अने अनिच्छित छे. दर्शनाभिलाषि आज्ञांकित सेवक नझरअली हसनभाई मुखी गणदेवीवालाना मत्थएण वंदामि My addres as under N. H. Mookhi The health Home. Gandevi Via. Billimora, B. B. re. Ry. Baroda State (Dist. Surat ) एक नवलुं प्रकाशन गच्छमत प्रबंध आजथी सत्ताणुं वर्ष पहेला योगनिष्ठ प. पू. आचार्यभगवंत श्री बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म. साहेबे श्रीसंघना चरणोमां समर्पित करेल गच्छमत प्रबंध एना नवा साजसज्जा साथे तैयार थईने प्रकाशित थई रह्युं छे. पूज्य गुरुदेवश्रीए ए समयमां श्रमणसंघ अने श्रमण परंपरानी अविच्छिन्नता दर्शावता दरेक गच्छनो परिचय आपती एक अभ्यासात्मक नोंध बनावी हती.. जे विक्रम संवत् १९७३मां गच्छमत प्रबंधना नामे प्रकाशित थई. पूज्य गुरुदेवश्रीं आचार्यपदनुं शताब्दीवर्ष अत्यारे प्रवर्तमान छे त्यारे पूज्यश्री श्रीसंघ अने शासन उपर करेला उपकारोनी स्मृतिमां आवा विशिष्ट अने स्वाध्याय समा ग्रंथनुं प्रकाशन थई रह्युं छे. * प्रकाशन तारीख : १-१२-२०१४ नाकोडा तीर्थ * प्रकाशन स्थळ : For Private and Personal Use Only Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir विजय हीरसरिजीना नामोल्लेखवाळीकेटलीक प्रतिलेखन पुष्पिकाओ हिरेन के. दोशी विक्रमनी १७-१८ मी सदीनी केटलीक पुष्पिकाओ अत्रे प्रस्तुत छे. आ प्रतिलेखन पुष्पिकाओ ज्ञानमंदिरमां संगृहीत प्रतोमा जोवा मळे छे. आ प्रतिलेखन पुष्पिकाओ प्रायः क्यांय नोंधायेल नथी. प्रतिलेखन पुष्पिकाओनो ऐतिहासिक सामग्रीमा नोंच-पात्र फाळो रह्यो छे. पुष्पिकाओमां समाविष्ट ऐतिहासिक विगतोने उजागर करवाना आशये श्रुतसागरना माध्यमे प्रतिलेखन पुष्पिकाओ प्रकाशित करी छे. ____वाचकोनी उपादेयता माटे पुष्पिकाओमां सौ प्रथम अनुक्रम त्यारबाद प्रतमां आलेखायेल कृतिनुं नाम, एपछी पत्नी विगतो अने त्यारबाद प्रत क्रमांक आपवामां आव्यो छे. आ अंकमा प्रकाशित प्रस्तुत पुष्पिकाओमां खास करीने आ जगद्गुरु पू. आचार्यदेव श्रीमद्विजय हीरसूरीश्वरजी म. सा. ना हयातीना समयमां अने स्वनिश्रामां लखायेली तेमज एमना नामोल्लेखवाळी पुष्पिकाओने स्थान आप्यु छे. पू. आचार्यदेव श्री हीरसूरीश्वरजी म. सा. नो जन्म वि. सं. १५८३ना मागशर सुद ९ना दिवसे पालनपुरमां थयो हतो. तेमज वि. सं. १६५२ना भादरवा सुद ११ने उना मुकामे एमनो काळधर्म थयो हतो. पूज्यश्रीना जीवन संबंधी विशेष विगतो जाणवा इच्छुक वाचकोए कवि ऋषभदासकृत श्रीहीरविजयसूरि रास के हीरस्वाध्याय भाग १-२नु अवलोकन करवा विनंती... १. सम्यक्त्वकौमुदी कथा, पत्र संख्या - ९४, प्रत क्रमांक-३७४ संवत् १६३९ वर्षे भाद्रवा वदि १३ दिने गुरुवारे ॥ श्रीहीरविजयसूरिस्वर तल्शिष्य पंडित प्रकांडपंडित श्री५श्री विशालसत्यगणि तत्शिष्य तेजविजयगणिनाऽलेखि । दावड ग्रामे ॥ शुभं भवंतु ॥ श्रीरस्तु ॥ कल्याणमस्तु ॥ २. कल्पसूत्र सह किरणावली वृत्ति, पत्र संख्या - २२१, प्रत क्रमांक-६७७ ___ श्रीहीरविजयसूरिशिष्य पं. कमलविजयगणि शिष्य श(शि)वविजयगणिनी प्रतिः ॥ For Private and Personal Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर 15 अक्तूबर २०१४ ३. कल्याणमंदिरस्तोत्र सह बालावबोध, पत्र संख्या - १३, प्रत क्रमांक - ५२०३ संवत १७११ वर्षे चैत्र सुदि १३ दिने । आदित्यवारे सकलभट्टारकपरंपरापुरंदर भट्टारक श्री १०८ श्रीहीरविजयसूरीश्वरशिष्य सकलपंडितसभाभामिनीभालस्थलतिलकायमान पंडितप्रवर पंडित श्री २१ श्री वरसिंगर्षिगणिशिष्य पंडितोत्तमपूज्याराध्य पंडित श्री ५ श्री तेजविजयगणिशिष्य पंडितप्रधान पंडित श्री५ श्रीगुणविजयगणिचरणाम्बुजचंचरीकसमान स्वशिष्यसौभाग्यविजयेन लिखितं । गणिगणमुख्यगणि श्री३श्री लड्डू ऋषी शिष्य गणि गजेंद्र गणिश्री कीर्त्तिवर्धन गणि। मुनीगणमुख्य मुनीश्वरमु. प्रीतिवर्धन तत्शिष्य मुनि हर्षवर्धन पठनार्थं ॥ वाच्यमानं चिरंजियात् ॥ संवत १७११ वर्षे चैत्र सुदि ७ सोमे ॥ पंडित श्री ५ श्री गुणविजयशिष्य मुनि सौभाग्यविजयेन ग. श्रीप्रीतिवर्धनशिष्य मुनि हर्षवर्धन पठनार्थं । लांबीयां नगर मध्ये ॥ शुभं भवतु लेखकपाठकयोश्च ॥ श्रीरस्तुः ॥ I ४. अनुयोगद्वार सूत्र, पत्र संख्या - ६४, प्रत क्रमांक - ५२४० सुश्रावक गंधर्वज्ञातीय ठा. राघवेनेदं पुस्तकं श्रीहीरविजयसूरिभ्यः प्रतिलाभितं ॥ संवत् १६४८ वर्षे इति भद्रं ॥ ५. दशवैकालिकसूत्र, पत्र संख्या - १६, प्रत क्रमांक - ५५३१ श्रीतपागच्छाधिराजभट्टारक श्री श्री श्रीः हीरविजयसूरीश्वरतत्शिष्य महोपाध्याय श्रीविद्यासागर तत्शिष्य पंडितप्रवरमुख्य श्रीसहजसागर तत्शिष्य गणिगणमुख्य गणिश्री हाथी तत्शिष्येन गणि प्रेमसागरेण परोपकारार्थं लिखितं ॥ संवत् १६५० वर्षे आसु सुदि शुक्ल अष्टम्यां थावरवारे पूर्णं कृतं ॥ ६. शुकराज कथा, पत्र संख्या - ०९, प्रत क्रमांक - ९५७४ श्री श्री हीरविजयसूरीश्वर तत्शिष्य पंडितोत्तम पं. श्री श्री विशालसत्यगणि तत्शिष्य गणिवर गणि श्री श्री तेजविजय गणि तत्शिष्य हर्षविजय गणीना लेखि पाटरी ग्रामे ॥ लेखक पाठकयो शुभं भवतु ॥ कल्याणमस्तु ॥ ७. सिद्धान्तस्तवन सह अवचूरि, पत्र संख्या - ०४, प्रत क्रमांक - ३१०६० संवत् १६४१ वर्षे ४ चतुर्थी मंगलवासरे तपागछे भट्टारक श्री ५ श्री हीरविजयसूरिविजयराज्ये तत्शिष्य वाचकचक्रचक्रभृत्प्रतिम श्रीमन् महोपाध्याय श्री५श्री सुमतिविजयगणि तत्शिष्य मुनि नेमिविजयनालेखि ॥ शुभं भवतु ॥ श्रीरस्तु ॥ For Private and Personal Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra SHRUTSAGAR मांगल्यमस्तु लेखकपाठकयोः ॥ www.kobatirth.org 16 Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir OCTOBER-2014 ८. चतुःशरण प्रकीर्णक, पत्र संख्या - ०३, प्रत क्रमांक - ४९४७७ श्री६ श्री हीरविजयसूरिराज्ये संवत् १६५९ वर्षे कार्त्तिक कृष्ण चतुर्थी बुधे झंझूवाडादूर्गे श्रीराजविजयसूरिशिष्य पं. रामविजयो लिलेख ॥ निर्जरार्थं ॥७॥ ॥ श्री ॥ ॥छ॥ ॥श्री॥श्रीः ॥ श्री ॥ छ ॥ श्री ॥ पंडित श्रीदेवविमलगणि' ९. सिद्धदंडिका यंत्र सहित, पत्र संख्या - ०१, प्रत क्रमांक- ५०२३४ पू. श्रीहीरविजयसूरिशिष्य गणि हर्षविजय पठनार्थं ॥ लिखितं मुनि गुणविजये फतेपुरे नगरे | शुभं भव [तु] For Private and Personal Use Only १०. उत्तराध्ययनसूत्र सह वृत्ति, पत्र संख्या - २९४, प्रत क्रमांक - ५४३४३ पं. उदयतिलक लिखतं ॥ संवत् १६४९ वर्षे मृगसिर वदि ३ शुभवारे ॥ श्रीविक्रमनगरे ॥ शुभं भवतु ॥ श्री ॥ श्रीश्रीश्री७ श्रीहीरविजयसूरिशिष्य पंडित श्रीश्रीश्री पद्मविजयगणि शिष्य शिवविजयगणिशिष्य मुनि लब्धिविजय वाचनार्थेः ॥छ॥ ॥ श्री ॥ ॥छ॥ ॥शु ॥ ११. शोभन स्तुति, पत्र संख्या - ०५, प्रत क्रमांक - ५६६२५ भट्टारक श्री श्रीश्री १०८ श्री हि ( ही ) रविजयसूरीश्वरजीशिष्य पंडित श्री ५ श्रीश्री शुभविजयगणिजी तत्शिष्य पंडित श्री ५ श्री श्री भावविजयगणिजी तत्शिष्य पंडित श्री५श्री पं.श्री ऋद्धिविजयगणिजी तत्शिष्य पंडित श्री ५ श्री पं. चतुरविजयगणि गुरुभ्यो नमः तत्शिष्य पण्डित श्री ५ श्री विवेकविजयगणि गुरुभ्यो नमः तत्शिष्य पण्डित श्री ५ श्री प्रमोदविजयगणि गुरुभ्यो नमः तत्शिष्य पं. श्री५ न्यां (ज्ञा ) नविजय गणि लिखितं तत्शिष्य गणि दर्शनविजय गणि तत्शिष्य रायचंद पठनार्थं संवत १८१६ वर्षे माह शुदि १३ दिने वार बुधे छठीआडा ग्रामे शुभं भवतुः कल्याणमस्तु श्रीयं भवतुः ॥ १२. सूत्रकृतांगसूत्र, पत्र संख्या - ५९, प्रत क्रमांक - ५७१७७ ॥ संवत् १६५२ वर्षे अश्विन् मासे शुक्लपक्षे द्वितीया दिने गुरुवारे श्रीमत्तपागच्छे श्रीविजयदानसूरि तत्पट्टे श्रीहीरविजयसूरिविजयराज्ये महोपाध्याय श्रीविद्यासागरगुरुणामुपदेशेन अवंतीवास्तव्य उपकेशवंशे लघुशाखायां साह नाथाख्येन जैनसिद्धांतः लिखापितः ॥ १. प्रशस्ति अपूर्ण होय एवं लागे छे. Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org श्रुतसागर 17 अक्तूबर २०१४ १३. मानतुंग मानवती रास, पत्र संख्या- ३२, प्रत क्रमांक- ५७७६५ संवत् १७७० वर्षे चैत्र वदि ११ तिथौ गुरुवासरे श्रीशेखपुरमध्ये लिख्यों छई ॥ परमगुरुभट्टारक श्रीश्री १०८ श्रीहीरविजयसूरिश्वर. लेखकपाठकयो र्शुभंभवतु ॥ श्रीरस्तु ॥ कल्याणमस्तु ॥ १४. सारस्वत व्याकरण सह टीका, पत्र संख्या - १७, प्रत क्रमांक - ६०८३५ श्रीमत्तपागच्छश्रृंगारहार जगद्गुरुवि (बि) रुदधारक भटारक श्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्री श्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीश्रीहीरविजयसूरीशिष्य उ. श्री १०८ श्री कनकविजय तच्छिष्य श्री १०८ श्रीमहोपाध्याय पुण्यविजयतच्छिष्य पंडित श्री १०८श्रीगुणविजयतच्छिष्यविनयेन पंण्डितशिरोमणि पंण्डितश्री १०८ श्रीमानविजय तच्छिष्य सकलपंडित श्री १०८ श्रीविमलविजय तच्छिष्य पंडित वि (वी) रविजय तच्छिष्य सकलशिरोमणि प्रधानपण्डित अमि (मी) विजय तच्छिष्य पं. रामविजय तच्छिष्य पं. श्री १०८ श्री पं. तिकमविजय तच्छिष्य पं. मोहनविजय लपिकृतम् स्ववाचनार्थं ॥ संवत् १९१४ फाल्गु मासे शुक्लपक्षे तिथौ १ प्रतिपदायां भानुवासरे लिखितं ॥ वृधिविजय पठणार्थं ॥ १६. उपधान विधि, पत्र संख्या - ०९, प्रत क्रमांक - ६२९५२ ० ग. = गणि o पं. = पण्डित ० उ. = उपाध्याय Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रीहीरविजयसूरिश्वरतत्शिष्य तेजविजय गणिना लेखि । नविननगरे ॥ संवत् १६४३ वर्षे पोस वदि १ दिने शुक्रवासरे ॥ शुभं भवतु ॥ श्रीरस्तु ॥ श्री ॥ छ ॥ संसूचि ० ठा. = ठाकुर, ठक्कर ० पू. = पूज्य ० मु. = मुख्य For Private and Personal Use Only १. प्रशस्तिनी नोंध मात्र अहीं सुधी मळे छे. अहींथी आगळनी प्रशस्ति स्याहीथी नष्ट थयेली छे. Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir हस्तप्रत लेखन परंपरा से सम्बद्ध विद्वान परिचय संजयकुमार झा आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर में तकनीकी मदद से लाइब्रेरी प्रोग्राम अन्तर्गत विविध स्तरों के विद्वानों का परिचय सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप से संग्रह किया जाता है. चाहे जिस प्रकार के विद्वान हो, चाहे उनके जो भी कार्यक्षेत्र हों यदि हस्तप्रत, कृति या प्रकाशन में कहीं भी विद्वान का उल्लेख मिलता है तो यहाँ प्रस्तावित नियमानुसार उस विद्वान का उपयुक्त रूप यथास्थान संयोजन किया जाता है, उनके मिल रहे परिचय को भी विद्वान के नियत फिल्ड में स्थान दिया जाता है. ज्ञानमंदिर में किसी भी कृति की क्वेरी की जाती है, उसके कई विकल्प हैं. उनमें मुख्यतया कृतिनाम आधारित, विद्वाननाम आधारित व आदि - अंतिमवाक्य आधारित उल्लेखनीय है. सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप से कृति ढूंढने के तो ढेर सारे विकल्प हैं. यूं समझें कि जितने फिल्ड्स उतने अलग-अलग ढूंढने के विकल्प हैं. इसी श्रेणी में विद्वान आधारित विकल्प एक प्रामाणिक, सचोट व शीघ्र परिणामदायी विकल्प हैं. जिस प्रकार उपर्युक्त पद्धति से हम कृति ढूँढते हैं उसी प्रकार हस्तप्रत, विद्वान, प्रकाशन आदि विविध क्षेत्रों में भी नियत पद्धति से ढूंढने पर शीघ्रातिशीघ्र अपेक्षित परिणाम पा सकते हैं. आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर की सूचना संग्रहण पद्धति तथा सूचना अन्वेषण पद्धति दोनों ही वाचकों के लिये वरदान रूप हैं. यही कारण है कि सुदूरवर्ती पूजनीय साधु भगवंत, हमारे आदर्श वाचक, शोधछात्र, गवेषक, विदेशी शोधार्थी भी आकृष्ट होकर कोबा की सूचना पद्धति से सतत लाभान्वित होते रहते हैं. मानो कि वाचकों की संतुष्टि ही ज्ञानमंदिर का लक्ष्य व ध्येय हो. पत्र के द्वारा, इमेल के द्वारा, किसी को भेजकर या स्वयं भी आकर, अर्थात् किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति देते ही हैं. अस्तु! इस अंक में मात्र हस्तप्रत लेखन से सम्बन्धित किसी न किसी रूप में जुड़े विद्वानों के प्राप्त प्रकार तथा उसका परिचय देने का प्रयास किया जा रहा है. सामान्यतया रचना करनेवाला, संशोधन-संपादन करनेवाला अथवा रचना से संबंधित कोई भी रचनात्मक कार्य करनेवाला, विद्वत्तापरक कार्य करनेवाला, रचना प्रेरक, रचना सहयोगी आदि को विद्वान कहा जाता है. लोकरूढ मान्यतानुसार यह बात तो है ही. किन्तु, आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर में सूचना संग्रहण सौकर्य For Private and Personal Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर अक्तूबर-२०१४ हेतु हस्तप्रत लेखनादि कार्य से संबंधित व्यक्तियों को भी विद्वान के रूप में जाना जाता है. अर्थात् व्यक्तिवाची नामों की सूचि में विद्वानों की बहुलता होने की वजह से सभी विद्वान के रूप में समझा जाता है. इन विद्वानों को अपने-अपने कार्य के अनुसार उनका अलग-अलग विद्वान प्रकार के रूप में ग्रहण किया जाता है. इससे सबसे बड़ा लाभ तो यह होता है कि एक ही विद्वान द्वारा चाहे जितने ही प्रकार के काम किये गये हों तो विद्वान की सूचि में तो नाम एक ही रहता है किन्तु उनके द्वारा अथवा तो उनके लिये रचित, लिखित, पठित, संशोधित, प्रेरित, क्रीत, विक्रीत, गृहीत, समर्पित, निश्रा, राज्ये, राज्यकाले आदि जो-जो कार्य सम्पन्न हुए हों उस हेतु से उस प्रकार का संकेत वहाँ उस विद्वान के साथ जुड़ जाता है. __ जैसे कि एक ही विद्वान ने किसी कृति की रचना की हो तथा उसी विद्वान के द्वारा उक्त कृतिवाली प्रत लिखी गयी हो तो कृति हेतु विद्वान प्रकार में 'कर्ता' तथा हस्तप्रत के लिये विद्वान प्रकार में 'प्रतिलेखक होगा. एक ही विद्वान के द्वारा विविध कार्य संपादित होने से वे विद्वान जिन-जिन कार्यों से जुड़े होंगे उनके विद्वान प्रकार भी उसी प्रकार से जोड़े जाते हैं. ___ ये सभी विद्वान प्रकार' अपने-अपने स्थान पर अपनी महत्ता व उपादेयता को सिद्ध करते हैं. आज प्रकाशन के युग में एक प्रकाशित पुस्तक में जितने विद्वानों की अलग-अलग भूमिकाएँ होती है उससे कहीं अधिक विद्वान एक हस्तप्रत लिखनेलिखवाने में अलग-अलग दायित्वों से जुड़े रहते है. ___ आज के इस यांत्रिक युग में व्यक्ति का अधिकांश कार्य यंत्र कर देता है. जिसमें भावनाओं का आंशिक ही सम्मिश्रण होता है. जबकि हस्तप्रत लेखन से जुड़े लोग अपनी भावना, अपने समर्पण, श्रुतसेवा के प्रति पूजनीय भाव, एक-एक अक्षरदेह को सरस्वती का स्वरूप समझकर तथा जिनवाणी को प्रत्यक्षदर्शन कराने के लिये अपनी कला, अपनी विद्या तथा अपनी अनुपम सेवा का अद्भुत परिचय देते हैं. ___ यदि एक प्रतिलेखक को विद्वान, कलाकार, श्रुतभक्त व परोपकारी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. शुद्धतापूर्वक लिखने से वह प्रतिलेखक एक विद्वान है, कलात्मक, आकर्षक, सुंदर व सुवाच्य अक्षरों में लिखने से कलाकर भी कह सकते हैं. लिखते समय सावधान होकर भूल व त्रुटि न हो इसके लिये जागरूक रहने से इनमें श्रुतभक्ति देखी जाती है. प्रामाणिक लेखन साधन-सामग्री का यथोचित For Private and Personal Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 20 OCTOBER-2014 उपयोग करने से ही तो आज ये दुर्लभ, महिमामयी हस्तप्रतें हम अपने हाथों में रखकर प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं. इस दृष्टिकोण से हम इनके चिरऋणी है. प्रतिलेखकों के शुद्ध व प्रामाणिक लेखन से ही आज हम इतिहास का वास्तविक दर्शन कर पाते हैं. हस्तप्रतों से संलग्न विद्वानों के भाव को तथा लेखन शैली एवं इनके उद्गारों को यदि संकलन किया जाय तो एक महाग्रंथ बन जायेगा. अब हस्तप्रतों से संबद्ध विविध विद्वानप्रकारों को अधोलिखित रूप से बताने का प्रयास करते हैं विद्वान प्रकार प्रतिलेखक - हस्तप्रत लिखने का जो कार्य करे उसे लिपिकार, प्रतिलेखक या लहिया कहते हैं. हस्तप्रतों में यह सूचना प्रतिलेखन पुष्पिका के अंदर मिलती है. प्रतिलेखक संपूर्ण प्रत लिखने के बाद अंत में प्रतलेखन से जुडी अनेक बातों का विवरण देता है. प्रतिलेखक अपनी योग्यता तथा अभिरुचि के अनुसार कभी तो सीधी-सादी भाषा में तो कभी गूढार्थ / पर्यायगर्भित व सांकेतिक रूप में प्रतिलेखन पुष्पिका में अपना संपूर्ण विवरण देता है. यह पुष्पिका प्रायः गद्यात्मक होती है, क्वचित् पद्यमय भी देखी जाती है. इसके अन्तर्गत लेखन संवत्, मास, पक्ष, तिथि, दिन, कोई विशेष प्रसंग हो तो उसका उल्लेख, लेखन स्थल, लिखवानेवाला, लेखनप्रेरक, राज्यकाल, गच्छाधिपतिराज्य, पठनार्थे आदि विवरणों के साथ उल्लेख करता है, जिस धर्मस्थान में लिखा जा रहा हो उस स्थान का भी उल्लेख करते हैं, उक्त सूचनाओं में से सभी सूचनाएँ सभी प्रतों में नहीं मिलती है. ये सूचनाएँ अनियमित रूप से मिलती है. किसी प्रत में आंशिक, किसी में सीमित, किसी में मात्र लेखन संवत्, किसी में लेखन स्थल तो किसी में सविस्तृत सूचनाएँ भी मिलती है. यदि स्तुति, स्तोत्र, स्तवन, सज्झाय, प्रकरणादि की संग्रहात्मक प्रत हो अथवा आकार में बड़ी प्रत हो, तो थोड़े-थोड़े अन्तराल पर कृति पूर्ण होने पर अलग-अलग संवत्, स्थल, प्रतिलेखक व पठनार्थे आदि सूचनाएँ भी मिलती हैं. कभी गुरुपरंपरापूर्वक तो कभी मात्र अपने नाम का ही उल्लेख मिलता है. उपर्युक्त पाठांशों के कुछेक उदाहरण देखने योग्य है, यथा गूढार्थ / पर्याय/संकेतगर्भित प्रतिलेखन पुष्पिका-प्रतसंख्या- ७३२१८ में उल्लिखित-संव्वत् १९०३ वर्षे भाद्रपदस्याकृष्णसप्तम्यान्तिथा७वादित्यजे सकलपंडित कविसार्वभौमः पं. ।श्री १०८ श्रीफतेन्द्रसागरगणेश्शिष्य मुनिना चिमनसिन्धुनालेखि For Private and Personal Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर 21 अक्तूबर २०१४ शीघ्रगतिना सन्ध्यायाम् ॥श्रीवालीग्रामे । जालोरी पडगने ॥ अर्थात् संवत् १९०३ भाद्र (अकृष्ण) शुक्लपक्ष सप्तमी, (आदित्यज) शनिवार को सकलपंडित कविसार्वभौम पं.श्री १०८ श्रीफतेन्द्रसागरगणि के शिष्य मुनि चिमनसागर के द्वारा सन्ध्याकाल में शीघ्रतापूर्वक यह प्रत लिखी गयी. जालोरी पडगने के अन्तर्गत वालीग्राम में. धर्मस्थान पर लिखी गयी प्रत - प्रतसंख्या- ६०३९७ में सतीसरोवणि बाईसुंदरी तिसके उपासरेमद्धे मंडिके लिक्षते. एक ही प्रत के अलग-अलग अध्यायादि के अलग-अलग प्रतिलेखकादिप्रतसंख्या-३५१ श्रीपालराजा का रास में प्रारंभिक तीनखंड मुनिश्री धनरूप एवं चतुर्थ खंड पं. नथमल्ल द्वारा लिखे जाने का उल्लेख मिलता है. पद्यमय प्रतिलेखन पुष्पिका - प्रतसंख्या- ७४३०३ में प्रतिलेखक हेतु नित्यं महाकविवरैरिहशस्यमानः, षट्शास्त्रविज्ञनथमल्लमुनीश्वरोभूत् । तच्छात्रशौडमुनिसत्तम चोथमल्लो वित्तसुकीर्त्तिरमरद्रुमवद्धि लोके ॥ १॥ तत्पादाम्भोरुहद्वन्द्वमधुपो लघुलेखकः । इदं लिखितवान् बाला- रामः सज्जनकिंकरः ॥ २ ॥ प्रतिलेखन पुष्पिका में उपलब्ध विद्वान सूचना में कितने विद्वानों की सूचना उपलब्ध हैं यह बताने के लिये प्रतिलेखन पुष्पिकाओं को निम्न पाँच प्रकार से सूचित किया जाता है. नहीं-प्रतिलेखक या कोई भी विद्वान प्रकार एक भी न हो तो वहाँ नहीं विकल्प मिलेगा. इससे वाचक को यह ज्ञात होगा कि प्रतिलेखनपुष्पिका संबंधी यहाँ एक भी विद्वान का उल्लेख नहीं है. सामान्य- प्रतिलेखन पुष्पिका में १ से ३ तक विद्वान उपलब्ध हो तो सामान्य प्रकार का विकल्प मिलेगा. मध्यम- - प्रतिलेखन पुष्पिका में ४ से ५ तक विद्वान उपलब्ध हो तो मध्यम प्रकार का विकल्प मिलेगा. विस्तृत प्रतिलेखन पुष्पिका में ६ से ७ तक विद्वान उपलब्ध हो तो विस्तृत प्रकार का विकल्प मिलेगा. अतिविस्तृत- प्रतिलेखन पुष्पिका में ८ या इससे भी अधिक अन्य विस्तृत सूचना सहित जानकारियाँ मिलती हों तो अतिविस्तृत प्रकार का विकल्प मिलेगा. प्रतिलेखन पुष्पिका के उपर्युक्त वर्गीकरण से वाचक को यह लाभ मिलेगा कि For Private and Personal Use Only Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 22 SHRUTSAGAR OCTOBER 2014 किस हस्तप्रत में प्रतिलेखकादि कितने विद्वान उपलब्ध हैं. उक्त विकल्पों को मात्र एक नजर देखते ही प्रतिलेखकादि संबंधित अपेक्षित जानकारी शीघ्र मिल जायेगी. ___ प्रतिलेखक की प्रत लिखने की पद्धति-जिस प्रकार रचयिता कृति निर्विघ्नतापूर्वक संपूर्ण हो जाए इस हेतु अपने गुरुदेव या इष्टदेव को स्मरण/वंदनपूर्वक मंगलाचरण करते हैं, उसी प्रकार अधिकांश प्रतिलेखक भी बाधारहित लेखन कार्य पूर्ण हो जाए इसके लिये प्रत लिखने के पहले ही मंगलसूचक चिह्न अंकित करते हैं. जिसे लोग भले मिंडु, ६० भले मिंडी के नाम से भी जानते है. इसके बाद सद्गुरुभ्यो नमः, ऐं नमः, अहँ नमः, गणेशाय नमः आदि में से अपनी अभिरुचि व श्रद्धा के अनुसार यहाँ अपने देव-गुरु का स्मरण करते हैं. ___कहीं मात्र भले मिंडी और कहीं तो मात्र दो दंड (11) मंगलाचरण के रूप में देकर लेखनकार्य आरंभ किया हुआ देखने को मिलता है. लेखन प्रारंभ करते समय भले मिंडी मंगलसूचक चिह्न एवं लेखनकार्य समाप्त होने पर पूर्णतासूचक पूर्णकुंभ के आकार का (ब) जैसा चिह्न लिखा हुआ मिलता है. कालान्तर में यही चिह्न ॥॥॥ब इस रूप में अभिप्रेत होने लगा. यदि प्रत के अंदर किसी अध्याय प्रकार वाले भाग का आदि/अंत हो, नयी कृति, नया विषय, पेटाकृति हो तो भी उक्त पद्धति का अमल किया जाता है. प्रतिलेखक की लेखनशैली तथा इनके उद्गार-प्रतलेखन कार्य संपूर्ण होने पर प्रतिलेखक अपने श्रमसाध्य कार्य हेतु भाँति-भाँति के उद्गार भी प्रकट करते हैं. उदाहरण तौर पर कुछेक उद्गार यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है... कभी-कभी तो अपना पल्लू झाड़ते हुए भी दोषमुक्ति हेतु निवेदन करते हैं कि यादृशं पुस्तकं दृष्ट्वा, तादृशं लिखितं मया। यदि शुद्धमशुद्धं वा मम दोषो न दीयते ॥ लेखन काल में अपने कष्टों का वर्णन करते हुए भी कहते हैं कि बद्धमुष्टि कटिग्रीवा, अधोदृष्टिरधोमुखम्। कष्टेन लिखितं शास्त्रं यत्नेन परिपालयेत् ॥ कभी ग्रंथ सुरक्षा हेतु निवेदन करते हैं कि उदकानलचौरेभ्यो मूषिकेभ्यो विशेषतः। कष्टेन लिखितं शास्त्रं यत्नेन परिपालयेत् ॥ For Private and Personal Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 23 श्रुतसागर अक्तूबर-२०१४ प्रत-पोथी आदान-प्रदान में सावधानी पर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं कि लेखनी पुस्तिका रामा, परहस्तेगता गता। कदाचित् पुनरायाता, नष्टा भ्रष्टा च लुंचिता ॥ प्रतिलेखक इस प्रकार के विविध भावपरक उद्गारों के द्वारा वाचक से निवेदन करता है. प्रतिलेखक की लेखनशैली तथा इनके उद्गार, निखालसता, श्रुतसमर्पित भावना आदि के बारे में उदाहरणपूर्वक लिखा जाय तो वह अपने आप में एक पुस्तकरूप बन जायेगा. यहाँ तो मात्र संक्षेप में प्रतिलेखक द्वारा लिखने की शैली का परिचय दिया गया है. एक बात है कि हस्तप्रत की नियत व आदर्श लेखन पद्धति होते हुए भी देश-काल-पाल, परंपरा आदि कारणों से लेखन शैली में भाँति-भाँति के लेखन आचार-व्यवहार देखने को मिलते हैं. __ प्रतिलेखक प्रतिलेखन पुष्पिका में भाषा अपनी रुचि व मति के अनुसार संस्कृत, देशी आदि प्रयुक्त करते हैं. प्रतिलेखकों की सहज व सरल भाषा तो कभी-कभी पढते हुए बड़ा आनंद होता है साथ में विस्मय भी होता है कि वे धन्य हैं, जो अपने लेखन में अपनी वास्तविकता को स्वीकारने से हिचकते नहीं. कुछेक बातें जो याद हैं वे इस प्रकार हैं-शीघ्रगत्या लिखितम्, शारदेन्दुप्रभायां लिखितम् आदि. एक तरह से देखें तो हस्तप्रत इतिहास का दर्पण है, संभावनाओं का समंदर है, ज्ञान की गंगा है. यूं कहें तो इसमें क्या नहीं है? ग्रंथेस्मिन् किन्न विद्यते! अंत में सम्पूर्णमलिखत् श्रीशांतिनाथ प्रसादात्, श्रीपार्श्वनाथ प्रसादात्. महावीरस्वामी सहाय छै. वाच्यमानं चिरं नन्द्यात्. शुभमस्तु लेखकपाठकयोः. कल्याणमस्तु, इत्यादि. प्रतिलेखन पुष्पिका में निम्न प्रकारों से विद्वानों एवं व्यक्तियों का उल्लेख होता है, जैसे कि___ आदर्श प्रतिलेखक-मूल रचना की सर्वप्रथम प्रति लिखनेवाला वह आदर्श प्रतिलेखक कहा जाता है. यहाँ तो इन्हें रचनासम्बद्ध विद्वान प्रकार की सूचि में रखा गया है किन्तु सर्वप्रथम प्रत लिखने के कारण उस प्रत के प्रतिलेखक तो हुए ही. वस्तुतः इनके द्वारा लिखी प्रत महत्ता की दृष्टि से दुर्लभ व मूल्यवान होती है. कारण कि वह एकमाल प्रति होती है. वह प्रत शुद्धप्राय होती है. संपादन-संशोधन की दृष्टि में वह प्रत अद्वितीय सिद्ध होती है. वह प्रत रचना For Private and Personal Use Only Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 24 OCTOBER-2014 के काल की प्रत होती है. एक अनुमान से यह भी कहा जा सकता है कि वह प्रत रचनाकार या अन्य विद्वानों द्वारा संशोधित होती है. इस कक्षा के प्रतिलेखक अन्य लहियाओं की भाँति मात्र नकल करनेवाले नहीं होते बल्कि रचनाकार की कृति को सर्वप्रथम लिपिबद्ध करके ग्रंथारूढ करते हैं. इस तरह वह कृति तथा वह प्रति पहली वार लोकसम्मुख आती है. चूंकि प्रथमादर्श लेखक का उल्लेख रचना प्रशस्ति में ही होता है, अतः उसकी सूचना कृतिप्रशस्ति में ही संलग्न होती है. फिर भी यदि प्रथमादर्श लेखक के हाथों से लिखित प्रत ही साक्षात् ज्ञानभंडार में हो तो उसका उल्लेख प्रतिलेखक के प्रत के रूप में होस है. एक ही कृति प्रतिलेखक भिन्न होने से रचना तो वही होगी किन्तु प्रतिलेखन पुष्पिका बदल जायेगी, लेकिन प्रथमादर्श प्रतिलेखक की सूचना रचना प्रशस्ति का अविभाज्य अंग होने से लेखक होते हुए भी वह सूचना नहीं बदलती है. अर्थात् रचनाकार प्रदत्त सूचना की भाँति ही आदर्श प्रतिलेखक की सूचना भी उस रचना प्रशस्ति के तुरंत बाद ही प्रथमादर्श प्रति लिखने की सूचना के साथ उसकी कड़ी बन जाती है. कारण कि कृति के कर्ता की भाँति उस कृति का दूसरा कोई प्रथमादर्श प्रतिलेखक नहीं हो सकता. उदाहरण के लिये संवत् ११२९ में श्रावक दोहडि श्रेष्ठि द्वारा प्रथमादर्श रूप में लिखित व नेमिचंद्रसूरि रचित उत्तराध्ययन की सुखबोधाटीका, आचार्य जिनलाभसूरि रचित आत्मप्रबोध ग्रंथ जिसके प्रथमादर्श प्रतिलेखक व संशोधक दोनों उपाध्याय क्षमाकल्याणकजी है. देखें इस कृति की प्रशस्ति-प्रथमादर्शे लेखि, क्षमादिकल्याणसाधुना श्रीमान् । संशोधितोऽपि सोऽयं, ग्रंथः सद्बोधभक्तिभृता ॥ व्यवसाय व आजीविकालक्षी प्रतिलेखक-पारिश्रमिक राशि लेकर प्रत लिखना, अन्य ग्राम-नगर में जाकर प्रत लिखना, प्रत लिखकर विक्रय करना, जिन्हें प्रायः लहिया शब्द से जाना जाता है.उदाहरण तौर पर स्थानीय ज्ञानभंडार में प्रतसंख्या ६०४२५ में-लिपिकृतं पंडित नारायणचंद्र व्यास लि० २/चुकती पाया। पठनार्थं ऋषि गोकुलचंद्रजी विजयगच्छ का हाल मुकाम अजीमगंज. दूसरा उदाहरण प्रतसंख्या-६०४६८ चितसंभुति रास की प्रतिलेखन पुष्पिकामें-वारैया ताराचंद राइचंद श्रीनवानगरवालाने कोरी ४५पीस्तालीस लखामणीनी लइ आ रास लखी आप्यो छे. अध्यात्मलक्षी/विद्याव्यसनी प्रतिलेखक-श्रुतभक्ति से ज्ञान संपदा को टिकाए रखने हेतु लिखना, ज्ञानार्जन हेतु लिखना, अपने पास प्रति न होने पर औरों से लेकर For Private and Personal Use Only Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 25 श्रुतसागर अक्तूबर-२०१४ प्रत लिखना. गुरुशिष्यपरंपरावर्ती प्रतिलेखक-साधु भगवंतों के द्वारा अपने शिष्य-प्रशिष्यों, मुमुक्षु, धर्मध्यानपरायण व श्रुतनिष्ठ श्रावकों के अध्ययनार्थ प्रत लिखना. स्वपरहिताय प्रतिलेखक-ज्ञानावरणी कर्मक्षय के लिये तथा अन्य किसी भी भावी योग्य पात्रों के पठनार्थ स्वपरहिताय ग्रंथ लिखा करते है. व्यक्तिगत उपयोगलक्षी प्रतिलेखक-धार्मिक स्वाध्याय आदि नित्यकर्म उपयोगी, औपदेशिक तथा ऐसे संकलन जैसे कि स्तुति, स्तवन, सज्झाय, रास आदि संग्रह जिससे निजानंद व अध्यात्म सुख पाते हैं. ऐसे प्रतिलेखक तो खुद के लिये लिखते है किन्तु कालान्तर में जाकर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय सिद्ध होते हैं. प्राचीन काल में विविध ज्ञानभंडारों में हस्तप्रतों की अनेक प्रतियाँ रखने हेतु श्रीसंघ द्वारा अपेक्षानुसार एकाधिक लहियाओं को बुलाकर हस्तप्रत लिखने, सुधारने का काम कराया जाता था. इस कार्य में स्थानीय व बाहर से भी प्रतिलेखक बुलाये जाते थे. कोई नये ग्रंथ की रचना हुई तो विविध भंडारों में हस्तप्रत रखने हेतु अधिक प्रतों की आवश्यकता पड़ती थी. उसी तरह से लेखन का काम अनवरत किया जाता था. क्वचित् विशिष्टतम कक्षा के ग्रंथ को हाथी की अंबाडी पर रखकर शोभायात्रा के साथ बड़े धूमधाम से उत्सवपूर्वक लोकाभिमुख किया जाता था. सिद्धहेमशब्दानुशान की रचना के बाद शोभायात्रा का प्रसंग तो भली भाँति सब जानते ही हैं. उदाहरण के लिये प्रत संख्या-६७७ में श्रीदानसूरि के सानिध्य में अहमदाबाद निवासी सहजपाल, उसकी पत्नी, पुत्र विमलदास ने शत्रुजय का संघ निकाला, तालध्वज एवं उज्जयंत तीर्थगिरि का जीर्णोद्धार किया एवं ज्ञानावरणीय कर्मक्षयार्थ इस प्रकार की शतश: प्रति स्वयं लिखवाई. इस प्रकार लिखना ही जब एकमात्र साधन था तो स्वयं लिखकर या लिखवाकर ग्रंथ संग्रह किया जाता था. सर्वाधिक लिखने का काम साधु-साध्वीजी भगवंत, यतिमहात्माओं द्वारा देखा गया है. इसका कारण है कि साधु जीवन स्वावलंबी होता हैं. सतत अध्ययन, अध्यापन, लेखन, संशोधन आदि कार्यों से जुड़े होने से यह कार्य इनके जीवन का एक हिस्सा बन जाता है. साथ ही इनके द्वारा लिखी गयी प्रत कोई गुरुनिश्रा आदि होने से शुद्धप्राय होती है. इसके बाद व्यवसायजीवी प्रतिलेखकों द्वारा लिखी गयी प्रतें मिलती हैं. गृहस्थ श्रावकों द्वारा लिखा जाना तो कम परन्तु For Private and Personal Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR OCTOBER-2014 लिखने हेतु द्रव्यव्यय तथा साधु भगवंतों को लेखनोपयोगी उपकरणों की पूर्ति में अनुपम योगदान की श्रुतनिष्ठा विपुलता से देखी गयी है. आज भी परंपरागत हस्तप्रत लेखन का कार्य नमूने तौर पर कुछेक जगह देखे जाते हैं. अनुपूर्तिकार-जब एक प्रतिलेखक द्वारा किसी कारण से लिखी हुई प्रत अधूरी रह जाती है, उस लेखनकाल के समीप या कुछ समय बाद किसी अन्य के द्वारा प्रत को पूर्ण किया जाता है, उसे अनुपूर्तिकार कहा जाता है. ऐसी प्रतों में मूल प्रत अपूर्ण लिखे जाने से प्रतिलेखक का नाम नहीं होता तथा जो अनुपूर्ति करता है उसके लिये भी लिखनेवाला प्रतिलेखक ही माना जाता है. किन्तु अनुपूर्ति रूप प्रत होने से प्रत की विशेषता कोड में अनुपूरित संकेत लगाया जाता है. ___कभी-कभी तो प्रतिलेखक का नाम भी नहीं लिखा मिलता है. ऐसी स्थिति में लिखावट देखकर समझा जाता है. उदाहरण के लिये प्रतसंख्या-७२८३३ पंचमहाव्रत सज्झाय नामक प्रत अपूर्ण है, इसके प्रारंभिक पत्र नहीं है तथा प्रथम महाव्रत सज्झाय अंत में किसी अन्य प्रतिलेखक द्वारा लिखी गई है. इसमें सज्झाय-२ से ४ अज्ञात प्रतिलेखक द्वारा लिखी गयी है तथा प्रथम सज्झाय अनुपूरित पाठ के रूप में प्रतिलेखक चिमनसिंधु (चिमनसागर) द्वारा लिखी गई है. लिखापितम् (लिखवानेवाला)-हस्तप्रत लिखवाने में जो धन व्यय करता है. प्रतिलेखन पुष्पिका में उस भाग्यशाली शेठ के नाम का उल्लेख करते हुए लिखापितम् ऐसा लिखा जाता है. 'धर्माराधक श्रेष्ठिवरेण स्वद्रव्यव्ययेन लिखापितेयं प्रति' ऐसा लिखा हुआ प्रतों में मिलता है. इस उदाहरण के द्वारा द्रष्टव्य है कि प्रतसंख्या-३५ महानिशीथसूत्र नामक प्रत की पुष्पिका में उल्लिखित विवरण के अनुसार मुंबई अन्तर्गत श्रावक माणेकलाल चुनीलाल ने वि.सं.१९९६ में प्रतिलेखक कस्तूरचंद व्यास के द्वारा प्रत लिखवायी है. प्रतिसंशोधक-प्रतिलेखक द्वारा लिखे जाने पर प्रत के अन्दर पाठ में रही भूलों को नियत संकेत द्वारा सुधारनेवालों को प्रति संशोधक कहा जाता है. प्रत की छवि बिगड़े भी नहीं तथा पाठ शुद्ध-शुद्ध पढा भी जाय, इस दृष्टि से विभिन्न परंपरागत संकेतों के द्वारा सुधारा जाता है. कोई-कोई प्रत में शुद्धिकरण पश्चात् प्रति संशोधक अपने नाम का भी उल्लेख करता है. आजकल जो प्रफरीडर काम करता है वही कार्य बड़े सलीके से हस्तप्रत का पाठ सुधारनेवाला प्रतिसंशोधक करता है. उदाहरण के लिये द्रष्टव्य है प्रतसंख्या-५८०८० धनदत्त चौपाई नामक प्रत को मुनि तेजसिंघ के For Private and Personal Use Only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर 27 शिष्य मुनि कानजी ने प्रतिसंशोधन किया है. गच्छाधिपति हस्तप्रत का लेखन कार्य जिन गच्छाधिपति के धर्मराज्य में किया गया हो,उन गच्छाधिपति श्री का उल्लेख प्रतिलेखक प्रतिलेखन पुष्पिका में करता है. उदाहरण के लिये द्रष्टव्य है प्रत संख्या ५२११९ धर्मोपदेशशतक- सटीक प्रत की प्रतिलेखन पुष्पिका में उल्लेख इस प्रकार है- “संवत् १६६१वर्षे पौषासितपंचम्यां शनौ श्रीबृहत्खरतरगच्छेश्वर युगप्रधान श्रीजिनचंद्रसूरि विजयराज्ये पं. लब्धिकल्लोलगणिनालेखि स्वशिष्य पं. गंगदासमुनि वाचनार्थे जगत्तारिणीमध्ये” अतः इस पुष्पिका से समझ सकते हैं कि गच्छाधिपति युगप्रधान आचार्य श्रीजिनचंद्रसूरि के विजयराज्य (धर्मराज्य) में यह प्रत लिखी गयी है. अक्तूबर २०१४ राज्यकाल - जिस राजा, महाराजा व बादशाह के शासनकाल में प्रत लिखी गयी हो. उसका उल्लेख कुछ प्रतिलेखक अपनी प्रतिलेखन पुष्पिका में करता है. ऐतिहासिक दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण सूचना होती है. जैसे कि प्रतसंख्या - ५५६९७ निर्घटुनाममाला की प्रतिलेखन पुष्पिका में प्रतिलेखक पंडित धीरसागर के द्वारा मेडतानगर में संवत् १७८० में राजा अजीतसिंघजी के राज्यकाल में प्रत लिखी जाने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. प्रत में इस प्रकार उल्लेख मिलता है- “लिखितवान् पं. धीरसागरः श्रीमेडतानगरे संवत् १७८० वर्षे शाके १६४५ प्रवर्त्तमाने चैत्रमासे शुक्लपक्षे १३ तिथौ अर्कवासरे माहराज श्रीअजीतसिंघजी राज्ये ॥ श्री | श्री ||” इससे उस समय में प्रतिलेखक व राजा दोनों की विद्यमानता का 1 भी प्रमाण मिलता है. उन दोनो की विद्यमानता से लिखी गयी प्रत के लेखनकाल की विश्वसनीयता भी प्रमाणित हो जाता है. यहाँ धर्मराजय व विजयराज्य दोनों में भेद को स्पष्ट किया जाता है कि धर्मराज्य उसे कहते हैं कि जिस गच्छ के गच्छाधिपति के प्रवर्त्तमान धर्मशासन काल में प्रत लिखी गयी हो उसे धर्मराज्य के रूप में जाना जाता है, हस्तप्रतों में प्राप्त प्रतिलेखन पुष्पिका में भी क्वचित् 'विजयिनि धर्मराज्ये, व 'विजयराज्ये' शब्द का उल्लेख मिलता है. राज्यकाल हेतु देश/प्रदेश / के प्रशासनिक राज्य शासन काल अन्तर्गत जिस राजा, महाराजा व बादशाह ( पातिशाह) आदि की विद्यमानता हो उसके लिये राज्ये रूप में समझा जाता है. For Private and Personal Use Only पठनार्थे- इसके अन्तर्गत प्रतिलेखक जिस किसी व्यक्ति को पढने के निमित्त से प्रत लिखता है, उसका नामोल्लेख करता है. वह व्यक्ति कोई भी हो सकता है. Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 28 SHRUTSAGAR OCTOBER-2014 जैसे कि-शिष्य-प्रशिष्य, मुमुक्षु, श्रावक, श्राविका राजा आदि. इसे बताने के लिये व्यक्तिविशेष का नाम लेते हुए पठनार्थे, वाचनार्थे, अध्ययनार्थे आदि पढने संबंधी शब्दार्थवाले पर्याय का उल्लेख करता है. उदाहरण के लिए प्रतसंख्या-२६ कल्पसूत्र को देखा जा सकता है कि इसमें प्रतिलेखक पंन्यास श्री निधानविजयजी ने अपने शिष्य मुनि रूपविजय के लिये प्रत लिखा है. प्रेरक-प्रतिलेखक को लिखने की प्रेरणा जिस व्यक्ति से मिलती है, उस व्यक्ति का नाम लिखा जाता है. प्रतिलेखक के मित्र, गुरु, शिष्य, श्रावक आदि कोई भी व्यक्ति प्रेरकरूप हो सकते हैं. उदाहरणार्थ प्रत संख्या-२६८९७ में उल्लिखित पुष्पिका के अनुसार श्रावक भगवानदास के आग्रह व प्रेरणा से वाराणसी में आचार्य विजयधर्मसूरि ने इस प्रत को लिखा है. उपदेशेन-हस्तप्रत लिखने अथवा लिखवाने के लिये जिस गुरु का उपदेश होता है, उसे हस्तप्रत लेखन उपदेशक कहा जाता है. समय-समय पर धर्मगुरुओं के द्वारा वे हस्तप्रत भंडार श्रुतसंपदासम्पन्न भंडार रहे, हर प्रकार के साहित्य उपलब्ध हो सकें, अपेक्षानुसार एक ग्रंथ की एकाधिक प्रतियाँ हों आदि आशय से श्रीसंघ को या श्रुतभक्तों को हस्तप्रत लिखवाने हेतु उपदेश दिया जाता था. प्रतिलेखक स्पष्ट रूप से उन आचार्य आदि का प्रतिलेखन पुष्पिका में उल्लेख करते है. ज्ञानमंदिर की संगणकीय तकनीकी व्यवस्था में उपदेशेन विकल्प के द्वारा अपेक्षित गुरुभगवंत के उपदेश से लिखवायी गयी प्रतों का पता लग सकता है. उदाहरणार्थ प्रत संख्या-१०९९१आचारांगसूत्र की प्रतिलेखन पुष्पिका में इस प्रत हेतु अंचलगच्छीय आचार्य श्री धर्ममूर्तिसूरि के उपदेश से लिखी जाने का उल्लेख मिलता है. गुरुपितृपरंपरा-हस्तप्रत प्रतिलेखन पुष्पिका में विद्वानों की जो परम्परा मिलती है, उसे दर्शाने के लिये आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर में संगणकीय तकनीकी पद्धति व ग्रंथालयीय नियम अन्तर्गत इस प्रकार का सांकेतिक/काल्पनिक विद्वान प्रकार बनाया गया है. ताकि विद्वान की गुरु या पितृपरंपरा संबंधी जो विवरण उपलब्ध होता हो उसका संग्रहण किया जा सके. परंपरागत यह प्रणाली रही है कि परिचय देते समय पहले गच्छ, दादा गुरु, आदि दीक्षागुरु तथा बाद में लघुता-सरलतापूर्वक अपना नाम बताते हैं, हस्तप्रतों में श्रमणपरम्परा की ऐसी रीति देखी जाती है. गृहस्थों में भी ज्ञाति, ग्रोत्र, पितामह, पिता इसके बाद अपना नाम लेते हैं. वैदिक For Private and Personal Use Only Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर अक्तूबर-२०१४ या श्रमण अथवा भारतीय ऐसी किसी भी परम्परा में अपना परिचय देने का एक अलग ही आदर्श था. परिचय इस प्रकार दिया जाता कि उसके अंदर आवश्यक सभी जानने जैसी सूचनाएँ मिल जाती. पुष्पिका में क्वचित् ही ऐसा मिलता कि मात्र अपने नाम का ही उल्लेख हो. इसका मुख्य कारण यह भी हो सकता है कि एक ही नाम के अनेक लोग होते हैं तो कौन किस गच्छ के, किसके शिष्य, किस जाति के किसके पुत्र-प्रपौत, कहाँ के रहनेवाले आदि सूचनाएँ एक में मिलकर भ्रामक न बन जाये. इस हेतु से अमुक गच्छे, अमुकान्वये, आचार्यप्रवर.....तच्छिष्य, प्रशिष्य, तदन्तेवासी, गुरुपादपा गेन अमुकमुनिनालेखि. इसी तरह तत्पौत्र, तत्पुत्र इत्यादि संबंधसूचक शब्दों का उपयोग करते हुए अपने नाम का उल्लेख करते हैं. प्रतिलेखन पुष्पिकागत इस प्रकार के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्ति, नामों को यूं ही न छोड़कर उसे उसी तरह संबंध बतलाते हुए, उन संबंधों को योग्य संयोजन करते हुए इस पद्धति के उपयोग से ऐसे प्रत्येक व्यक्ति नाम को संयोजन करके रखा जाता है. इसे संक्षेप में गुरुपितृपरंपरा कहते हैं. ___यद्यपि वर्तमान में लम्बी गुरुपितृपरंपरा की सूचना संयोजित नहीं की जाती है. उक्त गुरुपरंपरा का उदाहरण इस रूप रूप द्रष्टव्य है-प्रत संख्या-१४ में प्रतिलेखक मुनि रंगसौभाग्य है, इनके गुरु पंन्यास खुशालसौभाग्य, इनके गुरु उपाध्याय सुंदरसौभाग्य एवं इनके गुरु रंगसौभाग्य की परंपरा का उल्लेख किया गया है. गुरुभ्राता-एक ही गुरु से जो-जो व्यक्ति दीक्षा लेते हैं,तो उस गुरु के जितने शिष्य होते हैं वे गुरुभ्राता के रूप से जाने जाते हैं. उदाहरण के रूप में प्रत संख्या६३३८० की प्रतिलेखन पुष्पिका में अमृतविजय के शिष्य देवेन्द्रविजय व जयविजय हैं. अतः इन दोनों के परस्पर संबंध का उल्लेख गुरुभ्राता के रूप मिलता है. व्याख्याने पठित-प्रतिलेखक द्वारा लिखित प्रत जिस साधुभगवन्त के व्याख्यान में पढी गयी हो, उस विद्वान प्रकार का उल्लेख यहाँ करते हैं. प्रत लिखवाने के बाद गुरुभक्ति व श्रुतनिष्ठा से गुरुभगवंत को व्याख्यान में पढने हेतु निवेदन किया गया हो तथा गुरुभगवंत के द्वारा व्याख्यान में वही प्रत उपयोग हुई हो तो उसे प्रतिलेखक अपनी पुष्पिका में जिस प्रकार “व्याख्याने पठितम्” का उल्लेख करते हैं, उसी शब्द को यथावत् ग्रहण करते हुए वह नाम भी संग्रहित किया हुआ होता है. (क्रमशः) For Private and Personal Use Only Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पुस्तक समीक्षा डॉ. हेमन्तकुमार * पुस्तक नाम : जैन शिल्प विधान * संकलन-संपादन : मुनि श्री सौम्यरत्नविजयजी म. सा. भाग - १ शिल्पशास्त्र प्रवेशिका एवं भाग - २ शिल्पशास्त्र सचित्र विभाग प्रकाशक : जिनशासन आराधना ट्रस्ट, मुंबई * प्रकाशन वर्ष : ईस्वी सन् २०१३ * मूल्य : ३००/* भाषा . : गुजराती मुनिश्री सौम्यरत्नविजयजी म. सा. द्वारा संकलित एवं संपादित “जैन शिल्प विधान” मंदिर निर्माण हेतु एक मार्गदर्शक ग्रन्थ है. पूज्यश्री ने शिल्प संबंधी अनेक शास्त्रों का तलस्पर्शी अध्ययन व आलोडन किया है. साथ ही प्रस्तुत ग्रंथ को बहुपयोगी बनाने हेतु आपने १०वीं शताब्दी से २०वीं शताब्दी के मध्य निर्मित अनेकानेक मंदिरों का प्रत्यक्ष अभ्यास किया है, शिल्पविद्याशाखा के प्रतिष्ठित विद्वानों, विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों, संशोधकों, भूस्तरशास्त्र के विशेषज्ञों, वास्तु-उर्जा के वैज्ञानिकों एवं मंदिर निर्माण की परम्परा से जुड़े अनुभवी विद्वानों के साथ विचार-विमर्श कर मंदिर निर्माण के तत्त्वों को प्रस्तुत किया है. मुनिश्री ने प्रस्तुत ग्रंथ में अध्याय की जगह अपने प्रगुरु आचार्य श्री हेमचंद्रसागरसूरिजी म. सा. के नाम से हेमशिल्प का प्रयोग किया है. ९ हेमशिल्पों में विभक्त इस.ग्रन्थ में मुनिश्री ने शिल्प सर्जन के क्षेत्र में आने वाली शंकाओं एवं दुविधाओं को शास्त्रविधि एवं परम्परा के अनुसार दूर करने का महत्तम प्रयास किया प्रस्तुत ग्रंथ के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि इसमें एकमात्र जैन मंदिर से संबंधित विषयों का ही प्रतिपादन हुआ हो ऐसा नहीं है, इसमें श्रमणसंस्कृति और For Private and Personal Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 31 श्रुतसागर अक्तूबर-२०१४ वैदिकसंस्कृति द्वारा मान्य मंदिरस्थापत्य निर्माणशैली का समान रूप से निरूपण किया गया है. भूमिग्रहण, खातमुहूर्त, शिलान्यास, तलशिल्प, शिखरशिल्प, ध्वजा आदि से संबंधित सभी विषयों का बहुत ही सुन्दर ढंग से विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है. वैसे तो शिल्पशास्त्र से संबंधित विभिन्न भाषाओं में अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं, जिनमें विभिन्न विषयों का समाधान तो मिलता है, किन्तु एक जगह सभी विषयों से संबंधित सामग्री का उपलब्ध होना अपने आप में एक आह्लादक विषय है. मंदिरनिर्माण से जुड़े व्यक्तियों को यह ग्रंथ मार्गप्रदर्शन करेगा. प्राचीन काल से ही भारतभर में मंदिरनिर्माण होता रहा है. अनेक मंदिर, राजमहल, किला, हवेलियाँ आज हमारे उच्च शिल्पस्थापत्य के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं. समय के साथ अनेक प्राचीन कलाएँ नामशेष रह गई हैं, परन्तु मानव समाज के लिये अत्यंत उपयोगी होने के साथ-साथ आनादिकाल से जुड़े होने के कारण आज भी शिल्पकला जीवन्त है. आज मंदिर या भवन बनाने में प्राचीन काल में उपयोग में आने वाली वस्तुओं की जगह सिमेन्ट-कंक्रीट ने ले ली है, जिसके कारण शिल्पकला का उतना उपयोग नहीं हो पा रहा है, फिर भी लकड़ी, मार्बल, संगमरमर आदि पत्थरों से निर्मित मंदिरों या भवनों में शिल्पकला का पूरा-पूरा उपयोग हो रहा है, जिसके कारण आज भी शिल्पकला जीवन्त है. पूज्य साधु-साध्वीजी भगवन्तों की पावन प्रेरणा से प्रेरित होकर श्रावक मंदिर निर्माण हेतु कार्य प्रारम्भ करते हैं. उनमें से अधिकांश लोगों को इस विषय का कोई ज्ञान नहीं होने के कारण उन्हें शिल्पी जो समझाता है उसी अनुसार कार्य करवाते हैं तथा अपने धन का सदुपयोग करते हैं. यहाँ सबसे बड़ी समस्या यह है कि अज्ञानता के कारण धन व्यय करने पर भी हम अपने लक्ष्य को पूरा-पूरा प्राप्त नहीं कर पाते हैं. केवल मंदिर निर्माण हेतु स्थल का चयन, योग्य डिजाइन-नक्शा आदि का उपयोग करने से ही मंदिर बनाने का उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है. क्योंकि मात्र मंदिर बनाने, नक्काशी करवाने आदि से ही मंदिर नहीं होता है, मंदिर मात्र संस्कृति का प्रतीक ही नहीं है, बल्कि यह पूर्णतः संस्कृति ही है. For Private and Personal Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 32 SHRUTSAGAR OCTOBER-2014 मानवजीवन की प्रत्येक घटना के साथ मंदिर का संबंध जुड़ा हुआ है. शुभकार्य के प्रारम्भ में और अशुभकार्य के अन्त में देवदर्शन हेतु या आध्यात्मिक अभिप्सा के लिए मानव के जीवन में मंदिर केन्द्र स्थान है. यदि पूरे विधि-विधान के साथ मंदिर या गृह का निर्माण किया जाए तो वहाँ चेतना के सर्जन का अनुभव होता है. गृह भी मंदिर की भाँति शांतिदायक सिद्ध होता है. गुजराती भाषा में निबद्ध तथा शिल्पविद्या के संपूर्ण विषयों को समाहित करता यह ग्रंथ मंदिरनिर्माण, गृहनिर्माण आदि कार्यों से जुड़े व्यक्तियों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगा. यह ग्रंथ दो भागों में प्रकाशित है. ___इसके प्रथम भाग में शिल्पशास्त्र से संबंधित विषयों का ज्ञान भरा हुआ है तो दूसरे भाग में मंदिरनिर्माण से संबंधित सभी वस्तुओं व मंदिर के सभी भागों का चित्र दिया गया है तथा चित्र के साथ आवश्यक दिशानिर्देश भी दिया गया है, जिससे इस कार्य का कमज्ञान होने पर भी किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की दुविधा उपस्थित नहीं होगी. गत कुछ वर्षों में मंदिरनिर्माणविधि में आई अशुद्धियों को प्राचीन शास्त्र व प्रचलित परंपरा आदि के प्रमाणों से शुद्ध करने का प्रयास किया है. आगे भी अनेक कार्य जो मुनिश्री कर रहे हैं, वे भी श्रीसंघ में प्रतीक्षिति हैं. इस ग्रन्थ के स्वाध्याय से मात्र भारत में ही नहीं विदेश की धरती पर भी मंदिर निर्माण करवाना हो तो सभी शिल्पियों एवं समग्र जैनसंघ को मंदिरनिर्माण से संबंधित विषयों हेतु समुचित मार्गदर्शन व प्रेरणा प्राप्त होगी. मंदिर निर्माण हेतु समस्त विषयों के संबंध में मार्गदर्शन प्रदान करते हुए प्रस्तुत ग्रंथ की रचना कर पूज्य मुनिश्री ने जिनशासन को एक बहुमूल्य कृति प्रदान की है. पूज्य मुनिश्री शिल्पशास्त्र के अध्येता हैं, इन्होंने पूर्व में भी शिल्पशास्त्र से संबंधित जिनालयनिर्माण मार्गदर्शिका, धारणागतियन पुस्तक एवं अनेक लेख लिखकर समाज को उपकृत किया है. मंदिरनिर्माणविधि आदि से संबंधित विषयों की अद्यतन सूचनाओं से परिपूर्ण Website : www.shilpvidhi.org से भी मार्गदर्शन प्राप्त हो सकता है, जिससे समाज लाभान्वित हो रहा है. भविष्य में भी जिनशासन की उन्नति एवं श्रुतसेवा में समाज को उनका अनुपम योगदान प्राप्त होता रहेगा, ऐसी शुभेक्षा सहित कोटिशः वन्दन. For Private and Personal Use Only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra Gulamhusen N. Shariff Horshanta & G. Tgonee. PALGHAR. पू. आचार्य श्री विजयेंद्रसूरिजी उपर लखायेलो पत्र BRANCHI-KELVA ROAD (III & G. 1. ny. ) www.kobatirth.org Cont 2 & Kallifari 1-विरार माई 49 होती. - सपनीमारानी आशा संपे PALGHAR (Dia. THANA )..... सि.न्यायविश्य माहा on एका बाई विशेष. कण मेसो बन कर कह शत्रु के वामनी कंप ум स्कीपर्यत बाहली (दर्श मलम . पासपोर्ट सपनो प्रदेश के भावना३प पत्र पाय my address an under. Not marthi Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पण परिभ्रत‌ ये नात कर दुकान विद्या ftRang देरी हेरी बकर्षित था 20 निकी का पुनर्म • ममता करी जैन साएिल३पनमा नवन 6 तर पकाना हो एवं होमिय पयारे सारे कि तिच्या भारत बाद सारे my m+ सवित राहो आपका यादव ई सांङ र सुरत (स्टार Rnew cola fimni नीकी समय छते सनिवार्य य विकिमिति वार्डन पद्मादिदील सविविधत छ The Heart Home - Goodan. Vie Billimora Bared.R. Borade Hot Chain Sunli ষ and a गाईको, बटन द For Private and Personal Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir TITLE CODE : GUJ MUL 00578. SHRUTSAGAR (MONTHLY). POSTAL AT. GANDHINAGAR. ON 15TH OF EVERY MONTH. PRICE : RS. 15/- DATE OF PUBLICATION OCTOBER 2014 शासताश्रीचनाकारालाश्रीगीतसुरवालदायीचश्चरितक्रबातमकमेद्यिातासवतराशावाकयुमिातपाणब पीश्रीमितिबिरिदमहताप्रामाश्चत्तचरिवाधिचरिवसंस्कृतंयधावाहवानस्मानानासोदाहालतियंकया। बचान्यूनाधिकानावाचाकामिध्यावतमस्तमाछाएलायत्रदयाकमाचलवलीसत्यलधोयरीकारुण्यं॥ क्रकीकलानिविदितश्चममतावादयाकटरमुनिदानमुलममुगौशास्तूसुथवाञ्चयोरट्रीवंगुणवकिज्ञाननिग दिततांबलामतकायाध्यामाघायंगणास्त्रारादागिरि-संघासतोमंडूना संधार्यप्रबलवतायतरणिःसंघामदामी गलदिशामघात्तीशितदानकल्पविटयानोवायुफरपाया मेघामजिनाधिनाधमदित सुंघश्चिरंनेदता।।। इतिश्रीश्रीचश्चशिवश्रीश्रीचे यत्रागसवात्रिरखेडराजाधिराजवाताधयावादिधक्रित्याहाकाहानानको विलज्ञाननिर्वाणवलीनानामचउध्यिाय समाप्त स्वत्समाप्तिासमाप्तश्रीश्रीवेत्रावलिचरित्रालि वितवसववरजवर्धनाधादशमनीया घायातिमादिश्रीवकवरमदारानाविराजमा तिबाधकालोदमचश्मृश्विवतखकुरमानेमप्लकनकदमुदाधितामारियंटदखने नही कुरमानमोचितंजीलाकररावमाथिकबराहीतश्रीदीरदिजयरिदलवावकपदार निद्रीयपनदिनिकमहापाध्यायश्रीयश्रीशनिशाणचरणकमलायामनारामकिन नामितभमरचश्गशिनासागणिश्रीजावेश्यावनलानाशकढीराथायामाबाकाबाबा प्रकाशक आचार्य श्री कैलाससागरसरि ज्ञानमंदिर श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर 382007 फोन नं.(०७९) 23276204, 205, 252, फेक्स (079) 23276249 Website : www.kobatirth.org email: [email protected] BOOK-POST / PRINTED MATTER PRINTED, PUBLISHED AND OWNED BY : SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, PRINTED AT: NAVPRABHAT PRINTING PRESS. 9-PUNAJI INDUSTRIAL ESTATE DHOBHIGHAT, DUDHESHWAR, AHMEDABAD-380004 PUBLISHED FROM: SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, NEW KOBA, TA, & DIST. 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