Page #1
--------------------------------------------------------------------------
________________
जैन इतिहास संग्रह
( भाग नौवाँ ) [ मथुरा का कंकाली टीला]
-ज्ञानसुन्दर
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #2
--------------------------------------------------------------------------
________________
ऐसा सुवर्ण अवसर हाथों से न जाने दीजिये ! मूर्तिपूजा का प्राचीन इतिहास
और श्रीमान् लौंकाशाह ये ग्रन्थ क्या है एक प्राचीन ऐतिहासिक एवं स्व-परमत्त के शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाणों का एक बस खजाना ही खोल दिया है तथा खोद काम करवाने से भूगर्भ से मिली हुई हजारों वर्ष पूर्व का प्राचीन मूर्तियाँ जो तीर्थङ्करों की तथा पूर्वाचार्यों (हाथ में मुँहपत्ती वाले ) के बहुत चित्रों से तो मानो एक अजायबघर ही तैयार कर दिया है। मर्तिपूजा मुँहपत्ती और लौंकाशाह के विषय की चर्चा तथा स्वामी अमोलखऋषिजी कृत ३२ सूत्रों के • हिन्दी अनुवाद में उड़ाये हुए मूल सूत्रों के पाठ और स्वामी .. घासीलालजी की बनाई हुई उपासक दशांग मूत्र की टीका में
बनाये हुए नये पाठों के लिए १०० प्रन्यों और ४५ या ३२ सूत्रों को पास में रखने की जरूरत नहीं है, यह एक ही पुस्तक सबका काम दे सकती है। इस पुस्तक को इस ढंग से लिखी है कि साधारण पड़ा हुआ मनुष्य भी उपरोक्त बातों का समाधान आसानी से कर सकता है। पृष्ट सं० १०००, चित्र सं० ५२ पके कपड़े की दो जिन्हें होने पर भी प्रचारार्थ मूल्य मात्र रु. ५)। ओर्डर शीघ भेज कर एक प्रति कजे कर लीजिये वरना यह बाद में पचीस रुपयों में भी मिलना मुश्किल है।
पता-शाह नवलमलजी गणेशमलजी
कटरा पाजार, जोधपुर ।
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #3
--------------------------------------------------------------------------
________________
ANTIN0000000000000NROE
श्री जैन इतिहास ज्ञान भानु किरण नं. ९ श्रीरत्नप्रभ सूरीश्वर पादपद्धेभ्योनमः
जैन मन्दिरों की प्राचीनता
मथुरा का कंकाली टोलाविश्य
没age伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊伊自母每每每每日
लेखक इतिहास प्रेमी मुनिश्री ज्ञानमुन्दरी महाराज
®®®®®88888880MM®®®88888888
द्रव्य सहायक
सोजत श्रीसंघ [श्री भगवती सूत्र की प्रारम्भिक पूजा के द्रव्य से ]
श्रोसवाल सम्वत २३६४
सं० २४६३ [प्रति ५०० ] वि० सं० १९८४ मूल्य पठन पाठन और मनन करना
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #4
--------------------------------------------------------------------------
________________
SE-2-2-2-2-22-2--2e-era
प्रकाशक श्री रत्नप्रभाकर ज्ञानपुष्पमाला o मु. फलोदी (मारवाड़) Z------e-e-ee-es
Preere
पूज्यपाद इतिहासप्रेमी मुनि श्री ज्ञानसुन्दरजी और गुणसुन्दरजी महाराज साहिब वा वि० सं० १९९४ का चातुर्मास सोजत नगर में हुआ। व्याख्यानमें महाप्रभाविक सूत्र श्री भगवतीजी वंचने का निर्णय होने पर श्रीमान् सम्पतराजजी भंडारी (वकील)ने १०५मण घृत की बोली बोल कर श्री सूत्रजो को अपने मकान पर ले गये । वहां पूजा प्रभावना रात्रि जाग. रण हुई और आसाढ़ सुदि ५ को बड़े ही समारोह से मय बैंड बाजा
और नकारा निशानादि लवाजमा के साथ वरघोडा चढ़ा कर सूत्रजी को लाकर गुरु महाराज के कर क पलों में अपंग किया। तत्पश्चात् भंडारीजी ने श्री संघ के साथ ज्ञान पूजा की जिसका द्रव्य करीब ४००) आया। यह पुस्तकें छपवाने में लगाने का श्री संघ से निश्चय हुआ जिसकी यह दूसरी किताब छपी है।
O.००००००००००००००००००००००000000000000000000
((.0.:०००.Do...
.....000000
मुद्रक
शम्भूसिंह भाटी आदर्श प्रेस, अजमेर में मुद्रित '
७००००००००००००००००००००........nooni Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #5
--------------------------------------------------------------------------
________________
जैन इतिहास ज्ञान भानु किरण नं. ९
श्री मद्रत्नप्रभसूरि सद्गुरुभ्यो नमः ।
जैन मन्दिरों की प्राचीनता
और
मथुरा का कंकाली टीला।
भारत एक ऐतिहासिक क्षेत्र है। इसकी धार्मिक,
- सामाजिक और राजकीय सभ्यता आदर्श एवं • उच्च कोटि की थी। अन्य देशवासियों ने सभ्यता के पाठ भारत से ही सीखे हैं। इस विषय में भारत को अन्य देशों का गुरु कह देना भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है । क्योंकि इस बात का प्रमाण आज भले ही भारतीयों के पास न हो, पर अन्य देशों का साहित्य स्वयमेव इस बात की गवाही दे रहा है कि भारत सभ्यता की मातृभमि है। ___ भारत का सिलसिलेवार इतिहास न मिलने का मुख्य कारण यह है कि मदान्ध मुसलमानों ने भारत पर कई बार क्रूरतापूर्वक
आक्रमण कर अनेकों अमूल्य ज्ञानभण्डार ज्यों के त्यों जला दिये। शिल्पकला के आदर्श उदाहरण असंख्य मन्दिर मूर्तिएं एवं संख्या
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #6
--------------------------------------------------------------------------
________________
(
४
)
तीत शिलालेख नष्ट भ्रष्ट कर दिये । इतना कुछ होने पर भी जो थोड़ा बहुत ऐतिहासिक मसाला बचा था वह भी ऐसे संकीर्ण हृदय वालों के अधिकार में रहा कि उन्होंने उस प्राचीन साहित्य को किसी दूरदर्शी पंडित को बतलाने में महापाप समझ उसकी अपेक्षा भंडारों में सड़ाना ही श्रेष्ठ समझा । तथा मन्दिर मूर्तियों के स्मर काम करवाने में उन प्राचीन शिलालेखों की परवाह तक न रक्खी। यही कारण है कि आज हम हमारे इतिहास लिखने में दो क़दम पीछे खड़े हैं।
फिर भी यह सौभाग्य का विषय है कि पौर्वात्य एवं पाश्चात्य विद्वानों एवं पुरातत्त्वज्ञों के अथाह परिश्रम एवं शोध खोज से
आज जो थोड़ी बहुत ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध हुई है उससे हम अपने देश की प्राचीन सभ्यता, धर्म भावना, शिल्प सौन्दर्य, सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिमत्ता के विषय में थोड़ा बहुत हाल जान सकते हैं। इतना ही क्यों बल्कि उपलब्ध सामग्री को यदि क्रमवार एकत्रित कर इतिहास लिखा जाय तो उसमें भी । अच्छी सफलता मिल सकती है।
यद्यपि जैन धर्म के इतिहास के लिये उक्त अनेकानेक कटिनाइयों का सामना करना पड़ता है पर उपलब्ध साधनों से इतना तो कहा जा सकता है कि भगवान महावीर से सम्राट् संप्रति एवं महामेघवाहन चक्रवर्ती महाराजा खारवेल के समय जैनधर्म राष्ट्रधर्म कहा जाता था और भारत के प्रत्येक प्रान्त में जैन धर्म का उस समय प्रचुरता से प्रचार था। इतना ही क्यों पर भारत के बाहिर पाश्चात्य प्रदेशों में भी जैनधर्म का मण्डा फहरा रहा था। सम्राट् श्रोणिक (बिंबसार) ने पाश्चात्य प्रदेशों में अपने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #7
--------------------------------------------------------------------------
________________
मूर्त्तिपूजा का प्राचीन इतिहास
1320
यह मूर्ति भगवान महावीर की है आष्ट्रीय देश के बुद्धप्रेस्त नगर के एक किसान के खेत में खोद काम करते भूगर्भ से मिली है इसकी प्राचीनता सम्राट चन्द्रगुप्त या सम्प्रति के समय की बतलाई जाती है जिसको भाज २२०० वर्ष से अधिक वर्ष हुए हैं।
Page #8
--------------------------------------------------------------------------
________________
इतिहास के अमूल्य साधन
Joramaswamicyanohandar-umara, surat
खुदाई के काम में भूगर्भ से मिले हुए प्राचीन जैन स्मारक
Page #9
--------------------------------------------------------------------------
________________
खानगी मनुष्यों को भेज कर जैनधर्म का प्रचार कराया था । यही कारण है कि अनार्य देश के आर्द्रकपुर नगर के राजपुत्र आईक कुमार ने भगवान महावीर के चरणकमलों में भगवती जैनदीक्षा को स्वीकार कर धर्म का प्रचार किया था। तत्पश्चात् सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी अपने सुभटों को भेज अनार्य देशों में जैनधर्म का प्रचार किया था। बाद में सम्राट् संप्रति ने तो इस कार्य में अधिक प्रयत्न किया और आपको सफलता भी अच्छी मिली । यही कारण है कि आज पाश्चात्य प्रदेशों में खुदाई के काम से भूगर्भ के अन्दर से अनेक ऐसे पदार्थ निकल रहे हैं कि वे पूर्व जमाने में वहाँ जैन धर्म का प्रचार होना साबित करते हैं। जैसे
आष्ट्रिया प्रान्त के हगरी शहर में भगवान महावीर की अखंड मूर्ति मिली है। अमेरिका में ताम्रमय सिद्ध चक्र का गटा और मंगोलिया प्रान्त में अनेक जैन मन्दिरों के ध्वंसाऽवशेष उपलब्ध हो रहे हैं । इतिहास से यह भी पता मिलता है कि एक समय अफ्रीका में एक जैन धर्माचार्य की अध्यक्षता में शत्रुञ्जय गिरनार
आदि तीर्थों की रचना हुई जिससे वहां के लोगों पर जैनधर्म का अच्छा प्रभाव पड़ा था। इसी प्रकार एक समय तिब्बत में शास्त्रार्थ का काम पड़ने पर भारत से जैनाचार्य ने तिब्बत में जाकर शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त कर जैनधर्म का झण्डा फहराया था। इत्यादि साधनों से पाया जाता है कि एक समय जैनधर्म का डंका चारों ओर बज रहा था।
जैनियों को धर्म भावना यहां तक बढ़ी हुई थी कि वे अपने पूज्य आराध्य तीर्थङ्करों की जन्मभूमि तक को पवित्र समम वहां
की यात्रा कर अपने को कृतकृत्य समझते थे, और आज भी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #10
--------------------------------------------------------------------------
________________
समझ रहे हैं और उस भूमि को कल्याणक भमि के नाम से पुकारते हैं। जैसे :-अयोध्या, सावत्थी, कौशांबी, बनारसी, चन्द्रपुरी, काकंदी, भदलपुरी, सिंहपुर, कपिलपुर, रत्नपुर, गजपुर, मिथला, राजगृह, मथुरा, शौरीपुर और क्षत्रियकुण्ड नगर ये तीर्थङ्करों के जन्म स्थान हैं। जैन जनता बहुत दूर दूर से इन कल्याणक भूमियों की यात्रा करने को आती है और उन कल्याणक भूमि का स्पर्श कर अपने आपको सफल हुई समझता है।
पूर्वोक्त कल्याणक भूमियों में मथुरा भी एक कल्याणक भमि है। इक्कीसवें तीर्थङ्कर नमिनाथजी का जन्म मथुरा नगरी में हुआ था। अतएव मथुरा में जैनियों के सैंकड़ों मन्दिर और हजारों घर होना स्वाभाविक है। अर्थात् एक समय मथुग जैनों का केन्द्र स्थान समझा जाता था और इसके कई प्रमाण भी मिलते हैं :
(१) ऐतिहासिक साधनों एवं शिलालेखों से ज्ञात होता है कि विक्रम पूर्व दो तीन शताब्दी तक तो वहां ( मथुरा में ) जैनाचार्यों का आना जाना और उपदेश हुआ करता था और वे आचार्य वहां की जनता को जैन धर्म की ओर आकर्षित भी किया करते थे।
(२) आचार्य स्कन्दलसूरि के समय ( विक्रम की दूसरी शताब्दी ) मथुरा में जैनों की एक विराट सभा हुई थी। दुष्काल . के बुरे असर से जैनागम अस्त-व्यस्त हो गये थे। अतः उनकी सिलसिलेवार प्रतिसंकलना आप ही की अध्यक्षता में हुई थी। यही कारण है कि जैनों में अङ्ग उपाङ्ग सूत्रों को आज भी माधुरी वाचना कहते हैं।
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #11
--------------------------------------------------------------------------
________________
( ७ )
( ३ ) हेमवन्त पट्टावलि से ज्ञात होता है कि आचार्य स्कन्दलसूरि के समय जो मथुरा में सभा हुई थी, उस समय मथुरा निवासी ओसवंशी श्रावक पोलाक ने कई सूत्र अपने द्रव्य से लिखवा कर जैनाचार्यों को और ज्ञानभण्डारों को अर्पण किये थे ।
(४) कल्पसूत्रादि पट्टावलि प्रन्थों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जैन श्वेताम्बर समुदाय में कई गण शाखाएँ निकलीं उनमें एक माथुरी शाखा भी निकली जो मथुरा नगरी से उत्पन्न हुई थी।
(५) मथुरा में एक नन्न नाम का भट्ट बड़ा भारी विद्वान् था । एक समय कोरंट गच्छीय सर्वदेवसूरि वहाँ पधारे और सर्वदेवसूरि तथा नन्न भट्ट के आपस में धर्म विषयक शास्त्रार्थं हुआ । अन्त में नन्न भट्ट ने जैनधर्म को सच्चा आत्म कल्याण करने वाला धर्म समझ श्राचार्य श्री के चरण कमलों में भगवती जैन दीक्षा को स्वीकार करली। और क्रमशः वे जैन शास्त्रों का अभ्यास कर आचार्य हुए और मथुरा के आस पास के प्रदेशों में भ्रमण कर बहुत से लोगों को जैन धर्म की शिक्षा दीक्षा देकर जैनधर्म का खूब प्रचार किया ।
( ६ ) दिगम्बर जैनों में एक माथुर नामक संघ है । उसकी उत्पत्ति मथुरा से हुई और इस संघ के कई आचायों ने मथुरा में रह कर अनेक ग्रंथों का निर्माण भी किया । ऐसा उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है ।
( ७ ) जैनों में ७४ ॥ शाह हुए हैं जिनमें नागदत्त नामक श्रेष्टी (ओसवाल ) विक्रम की दूसरी शताब्दी में मथुरा नगरी
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #12
--------------------------------------------------------------------------
________________
( ८ )
में हुमा था जिसने शत्रुञ्जय का संघ निकाल कर श्री संघ को सुवर्ण की लेग दी थी ।
(८) चीनी यात्री फाहियान (वि० सं० ४५६ ) सुंगयून ( वि० सं० ५१८ ) हुएनसंग ( वि० सं० ६८६ ) इत्सिंग ( वि० सं० ७२८ ) में भारत में आकर भ्रमण किया था । उन्होंने अपने यात्रा विवरण में मथुरा में जैन व बौद्धों के बहुत से मंदिर होना लिखा है ।
इन उपयुक्त प्रमाणों से स्पष्ट पाया जाता है कि एक समय मथुरा जैन मन्दिरों से खूब त्रिभूषित थी । पर दुःख इस बात का है कि जो मथुरा पहिले जैनों का केन्द्र स्थान थी वही आज कई वर्षों से जैनों से निर्वासिता दृष्टिगोचर होती है । और इसका खास कारण जानने के लिए आज हमारे पास ऐसा कोई साधन नहीं है जो हम इस बात का निर्णय कर सकें । परन्तु अनुमान से पाया जाता है कि किन्हीं विधर्मियों का जैनों पर आक्रमण हुआ होगा और उस से जैन मंथुरा को छोड़ अन्य स्थानों पर जा बसे होंगे ? हाँ, विक्रम की म्यारहवीं शताब्दी तक तो जैन श्वेताम्बर मथुरा में अच्छी संख्या में थे, यह बात वहाँ से मिले हुए शिलालेखों से पाई जाती है और मथुरा के शिलालेखों से यह भी पता चलता है कि वि० ग्यारहवीं शताब्दी तक वहाँ अनेकों जैन मंदिर मूर्त्तिएँ भी प्रतिष्ठित थीं जो इस सत्य तक भी यत्र तत्र भग्नावस्था में वहाँ विद्यमान हैं । परन्तु बाद में कब और किस कारण से जैनों ने मधुरा का परित्याग किया इसका कोई पुष्ट प्रमाण अब नहीं मिलता है । पर हम ऊपर लिख आए हैं कि किसी धर्मान्ध विदेशी ने जैनों
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #13
--------------------------------------------------------------------------
________________
पर घातक आक्रमण किया होगा और तब उन जैनों ने उस स्थान को अपने लिए सापद जान अन्य नगरों का आश्रय लिया होगा। खैर ! जो कुछ हो पर यह तो निर्विवाद है कि कोई दिन मथुरा में भी जैनों का अस्तित्व था । और वह आज मथुरा के इतस्ततः भूमि भाग का खोद काम करने से स्वतः परिस्फुट हो जाता है ।
मथुरा की खुदाई से भूगर्भ में से इतने जैन स्मारक एवं खण्डहर उपलब्ध हुए हैं कि वे भूतकालीन जैनियों की जाहुजलाली का वर्तमान में ठीक-ठीक परिचय करा रहे हैं। __ मथुरा के जिस कङ्काली टीला ने, ऐतिहासिक क्षेत्र पर जबर्दस्त प्रकाश डाला है, पुरातत्त्वज्ञों की नसों में एक नये सिरे का बिजली का चमत्कार प्रकट किया है। प्राचीन पदार्थों से अजायबघरों की शोभा बढ़ाई है और प्राचीन इतिहास लिखने में अच्छी सुविधाएँ कर दी हैं। आज हम उसी कङ्काली टोला का थोड़ा सा हाल अपने पाठकों की सेवा में रख देना चाहते हैं । पाठक उसे पढ़ कर अवश्य लाभ उठावें ।
__मथुरा का कङ्काली टीला [मथुरा के कंकाली टीला के विषय में कई पुरातत्त्वज्ञ अंग्रेजों ने और पौर्वात्य विद्वानों ने अनेक प्रकार से शोध खोज कर अपनी विद्वता से नाना लेख लिखे हैं जिनसे इतिहास क्षेत्र पर अच्छा प्रकाश पड़ा है। उन सब लेखों के सारांश रूप में श्रीमान् चन्द्रचूड़ चतुर्वेदी ने 'सरस्वती' मासिक पत्रिका सं० १९८६ आश्विन मास के अङ्क में एक लेख प्रकाशित करवाया है । उस लेख और भनेक अन्य लेखों का सांराश लेकर मैंने यह लेख आपकी सेवा में रखने का प्रयत्न किया है। 'लेखक' Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #14
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १० ) मथुरा में एक प्राचीन खंभे पर कङ्काली देवी की मत्ति है। और उसके पास ही में एक टीला आ गया है अतएव उस टीला का नाम ही कंकाली टीला कहा जाता है। मथुरा से नैर्ऋत्य कोण में आगरा और गोवर्धन जाने वाली सड़क के बीच ५०० फुट लंबा ३५० फुट चौड़ा विस्तार वाला यह कंकाली टीला है । उसके अन्दर से दो ढाई हजार वर्ष से भी प्राचीन कई वस्तुएँ निकली हैं। जिनमें प्राचीन जैन मन्दिरों के भग्न खण्डहर जैसे-स्तूप, तोरण, आयोगपट्ट, खंभे, खंभा पर की पट्टिये, छत्र
और मूर्तियें आदि मिली हैं और उन ध्वंसाऽवशेष खंडहरों में कोई ११० प्राचीन शिलालेख भी उपलब्ध हुए हैं। इन शिला. लेखों में जैनधर्म संबंधी कई घटनाएँ भी हैं। उन प्राचीन शिलालेखों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि:-"जैनधर्म न तो बौद्ध धर्म से पैदा हुआ है और न वेदान्तिक धर्म से, तथा न यह बौद्ध धर्म एवं वेदान्तिक धर्म की कोई शाखा ही है किन्तु जैनधर्म एक स्वतन्त्र धर्म और बहुत प्राचीन धर्म है। इतना ही क्यों बल्कि उन शिलालेखों में यह भी स्पष्ट हो गया है कि महात्मा बुद्ध से दो सौ वर्ष पूर्व भी मथुरा में जैन मन्दिर विद्यमान थे। जैनधर्म के आचार्य समय २ पर वहां (मथुरा में) आकर धर्मोपदेश कर लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया करते थे। तथा जैनों में लिये भी दीक्षा लेकर भ्रमण किया करती थीं" इत्यादि ये शिलालेख प्राचीनता पर खूब प्रकाश डालते हैं।
यों तो कङ्काली टीला को वहां के लोग खोद २ कर प्राचीन ईटें आदि ले जाया करते थे। पर विशेष खुदाई के काम के लिए सब से पहिला जनरल कनिंघहम का ध्यान कङ्काली टीला की Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #15
--------------------------------------------------------------------------
________________
( ११ ) ओर पहुँचा और उन्होंने ई० सं० १८७१ में उसका एक विभागः खुदवा कर कई प्राचीन पदार्थ प्राप्त किये। बाद ई. सं० १८७५ में खास मथुरा के प्रसिद्ध कलेक्टर ग्राऊज साहब ने इसे खुदवा कर प्राचीन मसाला हासिल किया। बाद में ई० सं० १८८७ से १८९६ तक डाक्टर ब्रजेस और डाक्टर फुहरर ने कङ्काली टीला पर कई बार खोद काम करवाया और उसके अन्दर से अनेक प्राचीन साधन एकत्र किये और वह लखनऊ के अजायबघर में रखे गये। इनके पश्चात भी कई विद्वानों ने कई बार इस टीलो . को खुदवाया और अनेक प्राचीन पदार्थ प्राप्त किये । और वही प्राचीन सामग्री आज इतिहास का अमूल्य साधन बन गई है।
जनरल कनिंघहम को जितने शिलालेख मिले हैं उनमें से कई शिलालेखों पर तो कनिष्क, हविष्क, और वासुदेव का नाम पाया जाता है। जिनका समय ई० सं० से पूर्व पचास वर्ष का है। और कई शिलालेख तो इनसे भी बहुत पुराने हैं।
कङ्काली टीला की खुदाई के काम में अधिक सफलता डाक्टर फुहरर को मिली। क्योंकि आप लखनऊ के अजायबघर के अध्यक्ष थे और वहां का पुरातत्व सम्बन्धी शोध खोज का सब कार्य आपकी निगरानी में ही हुआ करता था । परन्तु ई० सं०. १८९८ में आपने सरकारी नौकरी छोड़ कर अपने देश को गमन किया और वहाँ जाकर आपने कङ्काली टीला की एक रिपोर्ट लिखी थी । उस रिपोर्ट से कतिपय पदार्थों का विवरण केवल नमूना के तौर पर यहाँ दर्ज कर देता हूँ।
१-श्वेताम्बर जैनों की १० मूत्तिएँ हैं । उन पर शिलालेख भी अंकित हैं। जिनमें ४ शिलालेख तो ऐसे हैं कि जिनसे जैनों Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #16
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १२ ) के इतिहास पर अच्छा प्रभाव पड़ता है अर्थात् जिनसे बहुत कुछ जानने को मिल सकता है।
२-श्वेताम्बर जैनों के एक विशाल मन्दिर के ३४ टुकड़े हैं और वे हविष्क राजा के समय के हैं ।
३-महावीर की एक मूर्ति है उसे २३ तीर्थङ्करों को मूर्तियां घेर कर बैठी हैं जिसे जैन चौबीसो कहते हैं।
४-संवत १०३६ और ११३४ की बनी हुई पद्मप्रभ की दो मूर्तियाँ हैं।
५-ई० सन् के पहिली शताब्दी को बनी हुई बोधि सत्व, अमोघसिद्धार्थ की एक मूर्ति है।
६-बुद्ध की दश मूत्तिएँ लेख सहित हैं। ७-नर्तकी के पूरे कद की मर्ति सहित एक खंभ है ।
८-चार फुट व्यास का एक बहुत ही अच्छा पत्थर का छत्र (छत्ता) है।
इस प्रकार इस टीला का खोद काम करवाने पर भूगर्भ से जैन एवं बौद्ध दोनों धर्म से सम्बन्ध रखने वाली बहुत सी चीजें निकली हैं। अतएव यह निःशक है कि किसी समय मथुरा में जैन और बौद्ध एवं दोनों धर्मों का बड़ा प्राबल्य रहा था।
ई. सं० १८८९-९० में जब जैन स्तूप और दिगम्बर जैनियों के मन्दिर की खुदाई का काम हुआ तब ८० मूर्तिएँ जैन तीर्थङ्करों की निकली और उनके साथ ही १२० टुकड़े जो पत्थर की पट्टियों के थे निकले और उन पर बहुत से शिलालेख भी मिले। उन प्राप्त शिलालेखों में १७ शिलालेख तो बहुत पुराणे हैं। सबसे अधिक खुदाई का काम ई० सं० १८९०-९१ में हुआ और इन
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #17
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १३ ) वर्षों की निकली हुई चीजों में से कुछ चीजों का उल्लेख डाक्टर साहब ने इस प्रकार किया है कि :
१-पत्थर के ७३७ टुकड़े जिन पर बहुत ही अच्छा नकाशी का काम खुदा हुआ है। इनमें पटियों, चौरपटे, खंभे, तोरण, दरवाजे और मूर्तियां वगैरह भी शामिल हैं और शिल्पकलाविदों की जाँच से वे बहुत ही प्राचीन प्रमाणित होती हैं।
२-इन खण्डहरों में से ६२ टुकड़े ऐसे हैं जिन पर शिलालेख खुदे हुए हैं। वे शिलालेख ईसा के डेढ सौ वर्ष पहिले से लेकर ई० सन् १०२३ तक के हैं।
३-इनमें एक लेख ऐसा है जिसके अक्षर उस लेख से भी बहुत पुराणे हैं जो कि ईसा के १५० वर्ष पूर्व खोदा गया था। यह लेख एक मन्दिर का है। इसमें मन्दिर बनाने वाले का नाम भी है । इससे यह प्रमाणित होता है कि ईस्वी सन् से कई शताब्दियें पहले भी मथुरा में जैन मन्दिर विद्यमान थे । उस मन्दिर के ऊपर का काम यह सिद्ध करता है कि दो ढाई हजार वर्ष पूर्व भी इस देश में शिल्पकला अपनी उत्कृष्टता को पहुँची हुई थी।
४-एक और शिलालेख मिला है जो एक मूर्ति की बाँई तरफ खुदा हुआ है। उसमें लिखा है कि यह मूर्ति ईस्वी सन् १५६ वर्ष पूर्व स्थापित हुई थी और यह मूर्ति एक ऐसे स्तूप के हत्ते में थी, जिसको कि स्वयं देवताओं ने बनाया था । इससे जान पड़ता है कि जिस समय यह शिलालेख खोदा गया था उस समय इसमें उल्लिखित स्तूप को बने हुए को इतने बर्ष हो गये थे कि शिलालेख खोदने के समय वे लोग उस स्तूप को बनाने के काल को बिलकुल भूल गए थे । फिर भी
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #18
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १४ ) यह सौभाग्य का विषय है कि शोध खोज करने पर उस स्तूप का भी पता लग गया । ई. सन् १८९० में खोद काम करते समय यह स्तूप निकल पाया। इन बातों से पुरातत्व के पण्डितों ने यह अनुमान किया है कि यह स्तूप ईश्वी सन् से कई सदियों पहिले बन चुका था। और विद्वानों का यह भी मत है कि “यह इमारत इस देश में बहुत पुराणी है। क्या जैन मतियों और स्तूपों के लिए अब भी प्रमाणों की आवश्यकता है ?
५-ई० सन् १८९५ में भी डाक्टर फुहरर ने कंकाली टीला को खोदवा कर कई प्राचीन चीजें निकाली। उनमें अहम् महावीर की भी एक परे कद की मूर्ति थी; जिस पर २९९ वें संवत् का एक शिलालेख है। यह संवत् कनिष्क, हविष्क और वासुदेव आदि कुशान वंशो राजाओं का है। अभी तक इस सन का आरंभ ईस्वी सन् ७८ वें वर्ष से माना जाता था और विद्वानों का मत था कि इसे कनिष्क ने चलाया होगा। पर जब से यह शिलालेख मिला तब से विद्वानों का वह मत बदल गया। अब उनका खयाल है कि यह सम्बत् ईसा के ५० वर्ष पहिले प्रचलित हुआ होगा।
६-डाक्टर फुहरर ने कंकाली टीला के लेख और प्रसिद्धप्रसिद्ध पदार्थों की प्रतिलिपियाँ और चित्र डॉ. बुलर को भेजे थे। उन्होंने वे सब शिलालेख और चित्र “एपि प्राफिया इन्डका" में प्रकाशित किये हैं और उनके सम्बन्ध में आपने स्वतंत्र विद्वत्तापूर्ण अनेक लेख भी लिखे हैं। इन शिलालेखों और चित्रों से
जैनियों के प्राचीन इतिहास और धर्म की अनेक बातें मालूम हो Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #19
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १५ )
सकती हैं । भारत की प्राचीन वर्णमालाएँ तथा प्राकृतिक भाषायें और उनका व्यकरण एवं शिल्पकला तथा राजकीय और सामाजिक व्यवस्था इत्यादि का बहुत कुछ पता इस प्राप्त प्राचीन पुरातत्त्व की सामग्री से मिल सकता है ।
-
७ - जो शिलालेख वहाँ मिले हैं वे ईसा के डेढ़ सौ वर्ष पूर्व से १०५० वर्ष तक अर्थात् १२०० वर्ष के होने से १२०० वर्ष तक का हाल उन शिलालेखों से विदित हो सकता है । उन शिलालेखों में कई ऐसे भी शिलालेख हैं कि जिनमें सन या संवत् नहीं है । वे ईसा से पचास वर्ष से भी अधिक पुणे हैं । पत्थर पर जो काम है वह बहुतबारीकी का है । उस पर जो - मूत्तियां और बेलबूटे हैं वे सब प्रायः इस देश की शिल्पकला से संबन्ध ररूते हैं । परन्तु किसी किसी विद्वान का मत है कि 'फरिस, आसिरिया, ओर बाबुल की कारीगरी की भी कुछ २ 'झलक उनमें अवश्य है'। इस टीला में जो पदार्थ मिले हैं वे जैन ग्रंथों में लिखी हुई बातों को दृढ़ करते हैं अर्थात् जो कथाएँ जैन ग्रंथों में हैं वे इन प्राप्त चित्रों और मूर्त्तियों पर उत्कीर्ण हुई उपलब्ध हुई हैं ।
८ – इन शिलालेखों से एक बात और भी सिद्ध होती है वह यह है कि जैन धर्म बहुत पुराणा धर्म है । दो हजार वर्ष पहिले भी इस धर्म के अनुयायी इन २४ तीर्थङ्करों में विश्वास रखते थे। यह धर्म बहुत करके उस समय भी वैसा था जैसा कि इस समय है । गण, कूल और शाखा का विभाग तब भी हो गया था । स्त्रियां साधुवृत्ति धारण कर भ्रमण करती थीं। धार्मिक जनों में उस समय उनका विशेष आदर था ।
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #20
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १६ ) .९ -मथुरा के कङ्काली टीला से जो प्राचीन चीजें मिली थीं वे सब प्रायः लखनऊ के ही अजायबघर में रखी गई हैं। डाक्टर फुहरर ने उनमें से मुख्य २ चीजों के फोटो लेकर एक पुस्तक लिखने का विचार किया था, पर इसके पहिले ही वे सरकारी नौकरी से अलग हो गए । इसलिए इस प्रान्त के भूतपूर्व छोटे लाट सर एटोनी मेकडानल ने यह काम डाक्टर स्मिथ साहब को सौंपा, और उन्होंने इसका सम्पादन किया। परन्तु प्रारंभ में जिसने इन शिलालेखों का या चित्रों का संग्रह कर इनके फोटो लिए थे यदि वही इनका वर्णन लिखते तो बात कुछ और ही थी। क्योंकि संग्रह किये हुए पदार्थों का तात्त्विक विवेचन जैसा. संग्रहकर्ता स्वयं कर सकता है वैसा तटस्थ व्यक्ति नहीं कर सकता। फिर भी स्मिथ साहिब ने कङ्काली टोला से प्राप्त हुई चीजों की ठीक ही समालोचना की है और यह जनोपयोगी कार्य कर ऐतिहासिक जगत् में अपना नाम अमर कर लिया है। आपको इस कार्य में बाबू पूरनचन्द्र मुकर्जी ने भी पर्याप्त सहायता दी थी। स्मिथ साहिब की उक्त पुस्तक को ई० सन् १९०१ में गवर्नमेन्ट सरकार ने प्रकाशित करवा दिया है। और विषय के अनुसार उसके २३ विभाग किये हैं। उसमें १०७ चित्र हैं। यह लेख भी उसी पुस्तक की सहायता से तैयार किया गया है। अब मैं थोड़े में उस पुस्तक के अन्तर्गत प्रधान २ चित्रों की आलोचना कर इस लेख को समाप्त करता हूँ।
१-आयाग पट्ट-यह एक पत्थर का चौरस टुकड़ा है। इसके बीच में एक जिन मत्ति है। उसके चारों ओर बहुत सुन्दर नक्काशी का काम है। तीर्थङ्करों के सन्मानार्थ ऐसे ९ पट्ट
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #21
--------------------------------------------------------------------------
________________
मथुरा का कंकाली टीला 2-2-2-en-e-e-e-er-2-22-2-~~-22-2-22
Preeeeeeeeer-2re-em22-22-22222222
4222222222222222222222 22-2--222
घर पर
मनु
113
ter ruinsex
ऊपर का आयागपट्ट मथुरा के कंकालीटीला के खोद काम करते समय भूमि से प्राप्त हुआ है। इसके लिये भारतीय विद्वान् पुरातत्वज्ञ श्रीमान् राखलदास वेनर्जी का मत है कि “साधारण रीते चार मत्स्य ।
पूच्छना केन्द्र स्थले एक गोलाकार स्थानने विषय एक बेठी जैनमूर्ति होय । के छे वि० सं ना प्रारम्भ पूर्व बे सौ वर्ष उपर सिंहक वणिकना पुत्र अने "
कौसिकी गौत्रीय मात्ताना संतान सिंहनादि के मथुरा मां जे आयागपट्टनी के प्रतिष्ठा करीहती तेमां उपरोक्त विवस्था जोवामा आवे छे" -
: क्या मूर्तिपूजा की प्राचीनता में अभी भी किसी को शंका है ? नहीं।
e-or
-e-e-2-2
-e-ee-
recree-e
Page #22
--------------------------------------------------------------------------
________________
मथुरा का कंकाली टोला
)
(A)०००००००००००००० D०००००००००००००
600००००००००००००००
०००००००००००००००००००००००० ००००००००००००००००० ०००००००००००००००००००००००
०००००००००००००० ००००००००००००००
हर
27.XXoxolk-X.11.4Kान
(C)000000000000000
J००००००००००००००
RTOXILal
ES10
०००००००००००००००००००००००/
१०००००००००००००००००
bed 000000000000000000 4००००००००००००००००००००००००(७
1०००००००००००००००००००००० 1)0000०००००००००००००००००
boor ००००००००००००००0000000000 J00000००००००००००००००००
००००००००००००००००००००० ..००००००००००००००००००००
D०००००००००००००००0000०००००। 11400000००००००००००००००००
००००००००००००००००० ०००००००००००००
मथुरा के कंकालीटीला के खोद काम से पत्थर का ध्वंश विशेष मिला है। जो चित्र ऊपर दिया गया है इसमें ऊपर के भाग में समवसरण के दोनों बाजु तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। बीचे जैन श्रमण कृष्णार्षि की मूर्ति है जिसके एक हाथ में रजोहरण और दूसरे हाथ में मुखवस्त्रिक है। विद्वानों का मत है कि यह वि० सं० के पूर्व दो शताब्दियों जितना प्राचीन है। इस प्राचीनता से सिद्ध है कि जैनसाधु मुँहपत्ती कदीम से हाथ में ही रखते थे।
००००००००००००००००००००००० 1००००००००००००००००००००००००
0000000000000 १०००००००००००००
loo00.000000000000000
90000000000000000000000
1000०.००००००००००००००००
००००-००००००००००००००००
Page #23
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १७ )
करवा कर पुराने समय में जैन लोग जैन मन्दिरों में रखते एवं लगाया करते थे । इस पट्ट के नीचे प्राचीन लिपि में एक शिलालेख भी खुदा हुआ है । उसकी नकल यह है :"नमोअरहंताणं सिंहकस्स वणिकस्स ( पुत्तेन ) कोसिकी पुत्त' सिंहनादिकेन यागपटो थापितो अरिहंत पूजाय"
यह लेख प्राकृत भाषा में है । इसका भाव यह है कि सिंहक नामक वणिक की कौशकी नामक भार्या का पुत्र सिंहनादक उसने अरिहंतों की पूजा के लिए इस पट्ट को स्थापित किया है । इसका समय देखो चित्र में ।
२ - लाल पत्थर का छत्ता -- यह सब प्रकार से अखंडित है । इसमें पत्थर पर जो काम है उसे देख कर तबियत खुश हो जाती है। अनुमान है कि यह किसी मूर्ति के ऊपर लगा हुआ होगा ? यह भी बहुत प्राचीन है ।
३ - दरवाजा की बाजु - मथुरा से पश्चिम ७ मील पर मोरीमय ग्राम के खण्डहरों में मिला है इनके ऊपर का काम भी खास देखने काबिल है ।
४ - सूर्य की प्रतिमा - जिस बैठक पर यह मूति है उसकी बनावट बहुत ही अच्छी है । मूर्त्ति के एक एक हाथ में कमलपुष्प है । यह मूर्त्ति कंकाली टीला से नहीं किन्तु केशवजी के मन्दिर से मिली है ।
५ - श्रमण मूर्ति - यह एक तरफ से खण्डित जैन श्रमण कृष्णर्षि की मूर्त्ति है ( इससे जैन श्रमणों के वेष का ठीक पता मिल
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #24
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १८ )
जाता है कि वे एक हाथ में रजोहर्णा और दूसरे हाथ में मुंहपत्ती रखते थे)
६-नर्तकी-यह एक नर्तकी की मूर्ति है अर्द्ध दिगम्बरावस्था में यह एक दिगम्बर बालिका के ऊपर खड़ी हुई है ।
७-खंभे-कंकाली टीला से कई प्रकार के खंभे निकले हैं। बनाने वालों ने उन पर बहुत ही सुन्दर काम करने में कुछ भी कसर उठा नहीं रक्खी है। वे खंभे एक से एक बढ़ कर कारीगरी वाले हैं । उनको प्रत्यक्ष देखने से ही उनकी सुन्दरता का अनुभव हो सकता है।
८-पाटव के खंभे-इन पर अजब अजब तरह की मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। मूर्तियों में विशेष कर वस्त्र विरहित स्त्रियों की मूर्तियाँ अधिक हैं। एक स्त्री अद्भुत जीव के ऊपर खड़ी है। वह जीव मनुष्य और बन्दर की शकल का है । उसका पेट बहुत बड़ा है। कमर में जांघिया सा पहना हुआ है।
९-जिन तीर्थङ्कर की एक पूरे कद की मूर्ति-इसका उपरि भाग दाहिनी तरफ से थोड़ा सा टूट गया है शेष मूर्ति अखंडित है। नेत्रों को निमीलित किए हुए पद्मासन में अधिष्ठित इस मूर्ति को देख कर हृदय में भक्ति का भाव सहज ही में उमड़ उठता है मर्ति के ध्यानस्थ आकार से गंभीर और पूज्य भाव टपक पड़ता है। - १०-तीर्थङ्कर की एक मति-यह मर्ति भी पद्मासन में ध्यानस्थ बैठी है। इसके नीचे एक शिलालेख है जिसमें सं० १०३८ (ई० सन् ९८१) खुदा हुआ है । मथुरा के जैन श्वेताम्बरों ने इस मूर्ति की स्थापना की थी। मुहम्मद गजनी ने ई. सं. २०१८ में मथुरा को ध्वंस किया था। वह मूर्ति Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #25
--------------------------------------------------------------------------
________________
मथुरा का कंकाली टोला
G००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००G०.०००००००
२२०० वर्षों की जैन तीर्थंकरों की प्राचीन मृत्तिएं
००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००14-26.००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
०००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००
मथुरा के कंकाली टीला के खुदाई का काम करते समय जैन तीर्थंकरों की अनेक मूर्तियां मिलीं जिनमें यह दो मूर्ति भी हैं। लखनऊ के म्यूजियम में विद्यमान है। इनका समय गुप्तकाल अर्थात् वि० पू० दो सौ वर्ष का बतलाया जाता है। इस समय के पूर्व भी जैन धर्म में मूर्तिपूजा प्रचलित थी जिसका यह एक अकाट्य प्रमाण है। क्या अब भी मूर्तिपूजा धर्म का एक अंग मानने में कोई भी सभ्य पुरुष शंका कर सकता है ? नहीं।
ငဝဝဝဝဝဝဝဝဝဝဝဝဝဝ ဝ ဝ ဝ၀ဝ၀ဝ ဝဝဝဝ
Page #26
--------------------------------------------------------------------------
________________
मथुरा का कंकाली टोला
२२०० वर्षों की प्राचीन
..........
JAINA TIRTHANI ARAS CITTA ANG PASISTA IMAGES जिनतीर्थोकी मूर्तियां
...........
: मथुरा के कंकाली टीला का खुदाई काम करते समय जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां उपलब्ध हुई उनमें से यह मूर्ति भी एक है। लखनऊ के म्यूजियम में सुरक्षित है । इसका समय गुप्तकाल अर्थात् २२०० जितना प्राचीन बतलाया जाता है ।
.................................................
maswamrsjenbrandaUmateSurat
Page #27
--------------------------------------------------------------------------
________________
( १९ ) कोई ३७ वर्ष उससे पहिले स्थापित हुई थी परन्तु मोहम्मद की चढ़ाई के पीछे भी स्थापित की गई मूर्तियाँ वहाँ मिली हैं इससे जान पड़ता है कि दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी में मथुरा में जैन श्वेताम्बरों की काफी संख्या थी और वे वहाँ के (मथुरा के ) मन्दिरों में सानन्द पूजा अर्चा करते थे। उनके साथ बहुत कम रोक टोक की जाती थी, अतएव इन सब बातों से पाया जाता है कि एक समय मथुरा जैन धर्माऽवलम्बियों का भी केन्द्र था। ___कंकाली टीला की खुदाई का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है । यदि क्रमशः उसकी खुदाई का काम होता रहेगा तो उम्मेद है कि इसके अन्दर से और भी अनेक प्राचीन साधन जो कि ऐतिहासिक क्षेत्र पर पूर्ण प्रकाश डालने वाले सिद्ध होंगे, प्राप्त होते जायेंगे।
प्राचीन ऐतिहासिक सामग्री केवल मथुरा के कंकाली टीला के खोद काम करने से ही जैन मन्दिर मूर्तियाँ आदि निकली हों सो बात नहीं है किन्तु और भी अनेक जगहों से जहां जहां खुदाई का काम हुआ है वहां वहां से भूगर्भ में से अनेक प्राचीन पदार्थ मन्दिर मूर्तियाँ आदि प्राप्त हुए हैं । सर्व साधारण की सुविधानुसार कतिपय उदाहरण यहां उद्धृत कर दिए जाते हैं।
१-श्री स्थम्भन तीर्थ में एक पार्श्वनाथ की प्राचीन मूर्ति है उसके पृष्ट भाग में एक शिलालेख खुदा हुआ है उसमें लिख 1 है कि:
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #28
--------------------------------------------------------------------------
________________
( २० ) "नमे स्तीर्थ कृत स्तीर्थे, वर्षे द्विक चतुष्टये । आषाढ श्रावको गौड़ोऽकारयत् प्रतिमा त्रयम्॥"
तत्व निर्णयप्रसाद पृष्ट ५३४ अर्थात् इक्कीसवें तीर्थङ्कर श्री नमिनाथ के २२२२ वर्षों के बाद गौड़ देश के आषाढ़ नामक श्रावक ने तीन मूर्तियाँ बनवाकर प्रतिष्ठा करवाई थी, जिनमें एक चारूप नगर में, एक श्रीपत्तन में
और एक स्तंभनतीर्थ में विराजमान की । इन प्रतिमाओं का समय प्रायः पांच लाख वर्षों का है।
२-उत्तर भारत में खोद काम करवाने से वहां के भूगर्भ में से कई सिक्के मिले हैं। जिनमें कितनेक सिक्कों पर चैत्य का चिह्न है । जैसे कि वर्तमान निजाम स्टेट के सिक्कों पर मसजिद का चिह्न है । उत्तर भारत में मिले हुए सिक्कों के ब्लॉक श्रीमान त्रिभुवनदास लहरचन्द बड़ोदा वाला ने बनवा कर अपने "भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास" भाग दूसरे के पृष्ठ १३२ पर दिये हैं। इससे पाया जाता है कि उस समय धर्म कार्यों में मन्दिर मूर्तियों का स्थान मुख्य था । और भूमि पर तो क्या परन्तु चलनी सिक्कों पर भी मन्दिरों के चिह्न अंकित करवा दिये जात थे।
३-तक्षशिला के पास अंग्रेजों ने खुदाई का काम करवाया था। जिसमें भूमि में से एक नगर निकला, जिसे आज कल "मोहन जाडरों" कहते हैं । और उस नगर में से करीब ५००० वर्षों की प्राचीन ध्यानावस्थित एक मूर्ति उपलब्धि हुई है।
४-सिन्ध और पञ्जाब की सरहद पर भूमि से एक नगर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #29
--------------------------------------------------------------------------
________________
( २१ ) फिर निकला है। जिसका नाम "हरप्पा" रखा गया है । वह नगर करीब दश सहस्र वर्ष जितना पुराना कहा जाता है। उसमें से भी कई मूर्तियाँ निकली हैं। वे भी उस नगर के बराबर ही प्राचीन बताई जाती हैं। क्या मूर्तियों की प्राचीनता के लिए अब भी प्रमाणों की जरूरत है ? ।
५-कलिङ्गदेश के उदयगिरि, खण्डगिरि पहाड़ियों की हस्ती गुफा से एक प्राचीन शिलालेख मिला है। उसमें "कलिंग जिन' नाम की एक मूर्ति का जिक्र है और पटावलियों से पता मिलता है कि वह मूर्ति सम्राट् श्रेणिक ने बनवा कर प्रतिष्ठित करवाई थी। इसके अतिरिक्त वहाँ गुफाओं की भित्तियों पर उसी पाषाण की कोतरी हुई कई प्राचीन जैन मूर्तियाँ आज भी विद्यमान हैं।
६–श्रीमान पं. गौरीशंकरजी ओमा की शोध खोज से एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। वह वीरात् ८४ वर्ष का है और वह अजमेर के अजायब घर में सुरक्षित है।
७-आकोला ( बरार ) के पास एक ग्राम में भूगर्भ में से कई मत्तियाँ निकली हैं जिन में कई मूर्तियाँ तो विक्रम संवत् से कई शताब्दियों पहले की बताई जा रही हैं ।
८-पटना के पास खुदाई का काम करते समय जो जैनमूर्तियाँ मिली हैं वे सम्राट कोणिक ( अशोक चंद्र ) के समय बतलाई जाती हैं।
९-जैतलसेर ( काठियावाड़ ) के पास डाका ग्राम से मिली हुई जैन मूर्तियाँ विक्रम पूर्व कई शताब्दियों की हैं।
१०-मथुरा के कंकाली टीला का हाल ऊपर लिखा गया
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #30
--------------------------------------------------------------------------
________________
( २२ ) है वहाँ से मिली हुई मूर्तियाँ तथा स्तूप भगवान महावीर के समय से भी पुराने हैं।
११-मथुरा से १४ मील के फासले पर परखम ग्राम है। वहाँ के खोद काम से मिली हुई मतियाँ विक्रम पूर्व २५० वर्षों की हैं।
१२-नागोर ( मारवाड़ ) के बड़े मन्दिर में सर्व धातु की कई मतियाँ हैं जिनमें एक मत्ति पर वीर० ३२ वर्ष का शिलालेख खुदा हुआ है।
१३-घन कटक प्रान्त के भूगर्भ से मिली हुई जैन मूर्तिएँ चक्रवर्ती खारवेल के दो सौ वर्ष पहले की हैं ।
१४-वैनातट के खुदाई काम से प्राप्त हुई जैन मूर्तियाँ भी २३०० वर्षों की प्राचीन हैं।
१५--श्रावस्ती नगरी के पास में खोदाई का काम करते समय भूगर्भ में से एक संभवनाथ का मन्दिर मिला है। वह भगवान् महावीर के समय का या उनसे भी प्राचीन है।
१६–बौद्धग्रन्थ “महावग्ग" से पता मिलता है कि बुद्धदेव ने अपना धर्म प्रचार करने के निमित्त जब राजगृह में पदार्पण किया था तब वे सुपार्श्वनाथ के मन्दिर में ठहरे थे। जिसका समय भगवान महावीर के सम सामयिक है । पर वह सुपार्श्वनाथ का मन्दिर कितना पुराना होगा।
१७-सम्राट् चन्द्रगुप्त ने अपने शासन समय में एक यह भी कानून बनाया था.कि जो कोई व्यक्ति देवस्थानों के लिये यद्वातद्वा वचन बोलेगा या किसी प्रकार के उनकी प्राशातना करेगा वह महान दंड का पात्र समझा जायगा । जैसा कि लिखा है:Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #31
--------------------------------------------------------------------------
________________
( २३ ) "आक्रोशाद्देव चैत्याना मुत्तमं दण्ड महति" इससे पाया जाता है कि उस समय धर्म कार्य में मन्दिर मूर्तिएं मुख्य समझी जाती थीं।
१८-प्रभास पाटण ( काठियावाड़ ) में एक सोमपुरा को भूगर्भ से ताम्र पत्र मिला है। उसमें लिखा है कि "नेबुस देने झर" नाम राजा ने एक भव्य मन्दिर बना कर गिरनार मण्डन नेमिनाथ को अर्पण किया है" इत्यादि । इस ताम्रपत्र ने तो इतिहास क्षेत्र पर इतना प्रकाश डाला है कि बावीसवें तीर्थङ्कर को
आज-कल के विद्वानों ने एक ऐतिहासिक व्यक्ति करार दे दिया है। क्योंकि "नेबुस देने मर" का समय ई. स. पूर्व छट्टी सातवीं शताब्दी का बतलाया जाता है। उस समय पूर्व जैनों में, नेमिनाथ को तीर्थङ्कर मानते थे और गिरनार पर्वत पर उनका मन्दिर मौजूद था । मूर्तिपूजा के विषय में इनसे बढ़ कर और क्या प्रमाण हो सकते हैं । हमारे भाइयों को अब केवल आग्रह को छोड़ सत्य का उपासक बनना चाहिये ।।
१९-उपकेशपुर ( ओसियां) और कोरण्टपुर की प्रतिष्ठा वीरात् ७० वर्षे प्राचार्य रत्नप्रभसूरि के कर कमलों से हुई थी। चे दोनों मन्दिर आज भी विद्यमान हैं।
२०-भगवान महावीर अपनी छदमस्थ दीक्षा के समय मुण्डस्थल में पधारे । आपके दर्शनार्थ राजा नन्दीवर्धन आया,
और इस दर्शन की स्मृति के लिए वहां भगवान महावीर का मन्दिर बनाया था । कालक्रमशः वह मन्दिर उसी रूप में न रहा पर उसके खण्डहर तथा शिलालेख आज भी अपनी प्राचीनता
को ठीक गवाही दे रहे हैं। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
Page #32
--------------------------------------------------------------------------
________________
( २४ )
२१-कच्छ भद्रेश्वर के मन्दिर की प्रतिष्ठा भगवान सौधर्माचार्य के कर-कमलों से वीरात् २३ वर्ष में हुई । जिसका जीर्णोद्धार जघडूशाह ने करवाया था। उसका शिलालेख आज भी प्रत्यक्ष साक्षी है।
२.-पार्श्वनाथ पट्टावलि में ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि आचार्य हरिदत्तसूरि ने वेदान्तिक आचार्य लोहित्य को जैन दीक्षा दे; क्रमशः उनको आचार्य बना कर महाराष्ट्र प्रांत में भेजा
और उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ हिंसा बन्द करवा कर, कई मन्दिरों की प्रतिष्ठा करवा जैन धर्म का प्रचार किया। यही कारण है कि दुष्काल के समय आचार्य भद्रबाहु ने अपने शिष्यों को लेकर • महाराष्ट्र प्रान्त में जा, उन मन्दिरों की यात्रा की थी।
२३-आचार्य स्वयं प्रभसूरि ने श्रीमाल नगर और पद्मावती नगरी में जैन मन्दिरों को प्रतिष्ठा करवाई थी, इत्यादि ।
२४--अर्जुनपुरी ( गांगाली) में '३०० की प्राचीन सफ़ेद सोना की र्ति थी।
देखो किरण आठवीं। अन्त में मैं इतना हो कह कर मेरे इस लेख को यहीं समाप्त कर देता हूँ कि अब जैन मन्दिर मूर्तियों की प्रचीनता के विषय में सभ्य समाज को किसी प्रकार से शंका एवं सन्देह करने को स्थान नहीं रहा है । क्योंकि जब पांच लाख वर्षों की प्राचीन मूर्तिएँ शिलालेख के साथ मिलती हैं और इसी अर्से में तीर्थङ्कर नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, और महावीर हुए हैं तथा उनमें से किसी ने मूर्तिपूजा का निषेध नहीं किया बल्कि भगवान महावीर के बाद २००० वर्षों में सैकड़ों धर्म धुरन्धर बड़े-बड़े विद्वान् 'बहुश्रुत'
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #33
--------------------------------------------------------------------------
________________
गीतार्थ आचार्य हुए हैं और इन २००० वर्षों में गच्छ गच्छान्तर, मत मतान्तर भी कई निकले परन्तु मन्दिर मूर्तियों की सेवा पूजा व भक्ति के लिये किसी एक ने भी इन्कार नहीं किया, प्रत्युत सभी ने धार्मिक कार्यों में मन्दिर मर्तियों को सर्वोच्च आसन दिया है। अतएव सर्व साधारण के आत्मकल्याण के लिए अन्यान्य साधनों में मन्दिर मूर्ति भी मुख्य साधन हैं। इनके द्वारा प्रत्येक मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है। इतना ही क्यों पर मैं तो दावे के साथ जोर देकर यहाँ तक कह सकता हूँ, कि मुमुक्षुओं का यह सर्व प्रथम कर्तव्य है कि वे जैन मन्दिर मूर्तियों को वन्दन पूजन कर तीर्थकरों की अवश्य आराधना करें।
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com
Page #34
--------------------------------------------------------------------------
________________ ..... ....... बनारस में चांदी सोने की चीजों का कारखाना जिसमें कि हर प्रकार का चांदी सोने का सामान जैसे-टेबुल, कुर्सी, पलङ्ग, हौदा, गाड़ी, रथ, नालकी, वैदी, चौदह सुपना, सिंवासन, बिजली का झाड़, झूलन तथा हाथी व घोड़े का जेवर, आसा, सोटा, बल्लम, छड़ी वगैरह, गुलाबपास, अतरदान, फूलदान, पानदान, थाली, लोटा, गिलास इत्यादि हर तरह का फर्नीचर तैयार रहता है व ऑर्डर द्वारा ठीक समय पर तैयार किया जाता है। उचित मूल्य और बढिया काम इसके अलावा बनारसी साड़ियां, लहंगा, दुपट्टा, साफा खिनखाप, पोत, पातल, खंड और काशी सिल्क के कपड़े भी थोक तैयार रहते हैं-एक दफे ऑर्डर देकर अवश्य खात्री कीजिये। पता-बंसीलाल मोतीलाल जैन लक्खी चौंतरा-बनारस सिटी Benares City. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com