Book Title: Swadeshi Chikitsa Part 01 Dincharya Rutucharya ke Aadhar Par
Author(s): Rajiv Dikshit
Publisher: Swadeshi Prakashan

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Page 11
________________ - वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतैविपर्ययः। अर्थ : इन दोष, धातु एवं मलों की वृद्धि अपने सामान्य द्रव्य, गुण, कर्म के द्वारा किसी प्रतिबन्धक कारण के अभाव में होती है। दूसरी ओर इन दोष, धातु और मलों के द्रव्य, गुण, कर्म के विपरीत वस्तुओं से हानि होती है। विश्लेषण : किसी भी प्रकार से दोष, मलों एवं धातुओं के समान वस्तुओं से इनमें वृद्धि होती है। दूसरी ओर विपरीत या असामान्य वस्तु से दोष, धातु एवं मलों में कमी आती है। उदाहरण के लिये वायु का गुण रूक्ष (सूखा), शीत, लघु है। ऐसे में शरीर को रूक्ष, शीत आदि गुणों के पदार्थ दिये जायें तो फिर वायु का प्रकोप शरीर में बढ़ेगा। वायु. का कर्म चल है, अतः यदि व्यक्ति अधिक चलेगा तो वायु की वृद्धि शरीर में होगी। इसी प्रकार वायु के विपरीत गुणों वाले पदार्थों का उपयोग किया जाय, जैसे तेल आदि तो वायु का प्रकोप कम हो जाता है। इसी तरह यदि शरीर को स्थिर कर दिया जाय, अर्थात शान्त होकर बैठ जायें तो भी वायु का प्रकोप शरीर में कम हो जाता है। जो भी द्रव्य वायु के गुणों के विपरीत होते हैं वे सभी वायु को शान्त करने वाले होते हैं। जैसे गेंहू, वायु को शान्त करता है, लेकिन बाजरा वायु को बढ़ाता है। क्योंकि बाजरा का गुण रूक्ष है जो वायु के समान ही है। अतः समान गुण, कर्म की वस्तुओं से वायु में वृद्धि होती है और विपरीत गुण, कर्म वाली वस्तुओं से वायु में कमी आती है। किसी भी तरह के कटु रस (कडुवे रस जैसे-करेले का रस आदि) वात को बढ़ाते हैं। रसाः स्वाद्वम्ललवणत्तिकोषणकषायकाः शड् द्रव्यमाश्रितास्ते च यथापूर्वे बलावहाः।। अर्थ : रस 6 प्रकार के होते हैं। मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), तिक्त (तीखा), उष्ण (कटु अथवा कडुवा) और कषाय ये 6 प्रकार के रस होते हैं। विश्लेषण : जो भी द्रव्य या वस्तुयें होती हैं, उनमें 6 रस होते हैं। सभी द्रव्यों (वस्तुओं) की उत्पत्ति पंचमहाभूतों से होती है। पंच महाभूतों को अर्थ हैपृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्नि । मधुर (मीठा) रस की उत्पत्ति पृथ्वी और जल से होती है। शरीर का सबसे अधिक पोषण इसी रस होता है। पृथ्वी और जल नहीं हो तो कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती है। शरीर का पोषण और वृद्धि में मधुर रस का सबसे अधिक योगदान होता है। शरीर की वृद्धि और पोषण में वायु, अग्नि और आंकाश का भी योगदान होता है। मधुर रस को छोड़कर अन्य सभी रसों में वायु, अग्नि और आकाश की प्रधानता होती है। वायु एवं अग्नि को शोषक माना जाता है और आकाश को 10

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