Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 16
________________ प्राचीन जैन आगमों में राजस्व व्यवस्था : १५ जन्म के अवसर पर दस दिनों के लिये 'दण्ड-कर' बन्द कर दिये गये थे। नीतिवाक्यामृतम् के अनुसार राजा का अपनी प्रजा से दण्ड स्वरूप धन प्राप्त करने का उद्देश्य मात्र धन-संग्रह नहीं, अपितु प्रजा की रक्षा होता है। बेगार : कर देने में असमर्थ लोगों को राजा के लिये बेगार करनी पड़ती थी। उत्तराध्ययन में उल्लेख है कि श्रमिक राजाज्ञा से बेगार करते थे, अपनी इच्छा से नहीं। बेगार लेना राजा का अधिकार था।३८ गौतमधर्मसूत्र में भी शिल्पियों द्वारा महीने में एक दिन राजा के लिये बेगार करने और राजा द्वारा उस दिन उन्हें भोजन देने का उल्लेख है। कर-संग्रह : कर-संग्रह कठोरता से किया जाता था। निशीथचूर्णि" के एक प्रसंग में सोपारक नगर के राजा द्वारा व्यापारियों पर लगाये गये कर को न देने से क्रुद्ध राजा ने उन्हें अग्नि-प्रवेश का दण्ड दिया था। विपाकसूत्र, बृहत्कल्पभाष्य और जातककथा में भी अत्यन्त कठोरता से कर-संग्रह का उल्लेख है। इस कठोरता के कारण कुछ कर-अधिकारी उत्कोच लेने का भी प्रयास करते थे। ये अधिकारी झूठे और लोभी भी होते थे। निर्धारित तिथि तक कर जमा न कर पाने की स्थिति में कभी-कभी कुछ समय की छूट भी दी जाती थी, जिसके समाप्त हो जाने पर करदाता दण्डित किया जाता था।३ कर-मुक्ति : प्रजा को कभी-कभी कर से मुक्त भी कर दिया जाता था। राजा सिद्धार्थ ने महावीर के जन्मोत्सव पर कुण्डग्राम को दस दिनों के लिये करमुक्त कर दिया था। राजा श्रेणिक द्वारा भी मेघकुमार के जन्म पर राजगिरि को दस दिनों के लिये सभी करों से मुक्त कर देने का उल्लेख है।५ करापवंचन : कुछ लोग करों से बचने के लिये अपनी आय छुपाने का भी प्रयत्न करते थे। राजप्रश्नीय से ज्ञात होता है कि कुछ व्यापारी राजकीय शुल्क से बचने के लिये राजमार्गों से यात्रा नहीं करते थे। उत्तराध्ययनचूर्णि में ऐसा उल्लेख है कि विदेशों से व्यापार कर लौटे अचल नामक व्यापारी ने करापवंचन का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप राजा ने उसके द्वारा अर्जित सोना-चाँदी तथा बहुमूल्य मोतियों को छीन लिया। राजकीय व्यय राज्य के कोष का बहुत बड़ा भाग जनहित के कार्यों पर व्यय किया जाता था। कर लेने के बाद भी यदि राजा प्रजा की देख-भाल नहीं करता, तो वह कुनृप माना जाता था। सूत्रकृताङ्ग. के अनुसार उत्तम राजा पीड़ित प्राणियों का रक्षक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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