Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 69
________________ ६८ : श्रमण/जनवरी-मार्च/१९९६ प्रतिकूलता का / प्रतिकार नहीं करना / यह कायरता नहीं है । पुरुषार्थ हीनता नहीं है । अपितु पुरुष का परम - पुरुषार्थ इसी पथ पर... (पृष्ठ ७६) . - प्रो० सुरेन्द्र वर्मा पुस्तक : मुक्तक शतक, लेखक : दिगम्बर जैनाचार्य १०८ श्री विद्यासागरजी महाराज, मुद्रक : इण्डियन आर्ट प्रेस, नई दिल्ली, पृष्ठ : ३८, आकार : डिमाई, प्रथम संस्करण : १९९५, मूल्य : चिन्तन-मनन। 'मुक्तक शतक' में दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के चार-चार पंक्तियों के १०० मुक्तक संगृहीत हैं । इनमें जैन-दर्शन को एक काव्यात्मक पद्धति से अभिव्यक्ति दी गई है । 'शिव-सदन' तक पहुँचने के लिए 'शिव-पथ' बताया गया है जो स्पष्ट ही निवृत्ति-मार्ग ही है। इसी निवृत्ति मार्ग का पालन करते हुए, व्यक्ति 'शिव-सुख' प्राप्त कर सकता है। मुनि श्री कहते हैं - सुख दुःख में समान मुख रहे, तब मिले शिव सुख अन्यथा बस दुस्सह दुःख ऊर्ध्व, अधो, पार्श्व, सन्मुख ! मुक्तक शतक के मुक्तक दर्शन और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण हैं। इन्हें धार्मिक वृत्ति के लोग रुचि से पढ़ेंगे और मनन करेंगे । आचार्य श्री विद्यानंद के उपर्युक्त तीनों ही काव्य संग्रहों का प्रकाशन और मुद्रण सुरुचिपूर्ण ही नहीं बल्कि सभी दृष्टियों से उत्तम उत्पाद है। चिकने आवरण और पुष्ट-पीले कागज पर मुद्रित ये कृतियाँ संग्रहणीय हैं । सभी पुस्तकें इण्डियन आर्ट प्रेस में छपी हैं और उनकी शिष्या दृढ़मति माताजी के आशीर्वाद से प्रकाशित हुई हैं। -प्रो० सुरेन्द्र वर्मा पुस्तक : सचित्र-सिद्धसरस्वती सिन्धु, सम्पादक : मुनि कुलचन्द्रविजय, प्रकाशक : श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन मन्दिर, रान्देर रोड, श्वेताम्बर मूर्ति तथा जैन श्रीसंघ, अड़ाजण पाटिया, सूरत - १ (गुजरात), पृष्ठ : १४१, मूल्य : ६५ रुपये, प्रकाशन वर्ष : १९९४। इस पुस्तक में वाग्देवी सरस्वती की ६८ स्तुतियों का भव्य संकलन किया गया है। यह तीन विभागों में विभक्त है - प्रथम भाग में जैन कवियों की द्वितीय भाग में जैनेतर कवियों की तथा तृतीय में गुजराती कवियों की स्तुतियों का संग्रह है। For Private & Personal Use Only Jain Education International ___www.jainelibrary.org

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