Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 96
________________ पाठकों की नज़र में : ९५ 'श्रमण' पत्रिका का हर अंक समय पर प्राप्त करने और पढ़ने की हमेशा उत्कण्ठा बनी रहती है। जैन धर्म और दर्शन के क्षेत्र में जिस असाम्प्रदायिक दृष्टि और उत्कृष्ट शोधपूर्ण आलेखों के साथ यह पत्रिका प्रकाशित होती है वह प्रशंसनीय है। पूर्णतः सम्प्रदाय निरपेक्ष दृष्टि से नियमित प्रकाशित यह पत्रिका भले ही बहुरंगी पृष्ठों से सुसज्जित न हो, किन्तु जैन जगत् के समाचारों, शोध लेखों आदि का जो सतत प्रकाशन इसमें हो रहा है, उसके लिए प्रधान सम्पादक प्रो० सागरमल जैन अन्य सम्पादकों डॉ० अशोक कुमार सिंह, डॉ० शिवप्रसाद तथा डॉ० श्रीप्रकाश पाण्डेय हार्दिक बधाई के पात्र हैं। प्रो० सागरमल जैन के निर्देशन में उच्चस्तरीय विद्वानों के सम्पादकत्व एवं श्री बी० एन० जैन ( मन्त्री, पार्श्वनाथ विद्यापीठ) की सम्प्रदाय निरपेक्ष दृष्टि से प्रकाशित 'श्रमण' पत्रिका जैन जगत् में आज भी सर्वोत्कृष्ट पत्रिकाओं में से एक है और विश्वास है भविष्य में भी इसका उच्च स्तर बना रहेगा। इसका प्रत्येक अंक जैनविद्या प्रेमियों के लिए संग्रहणीय अंक बने, ऐसी अभिलाषा एवं मंगलकामना करता हूँ। Thank you very much for my complimentary copy of your revered research quarterly (Oct.-Dec. 1995). It is indeed, very kind of you to give largest-coverage to this insignificant scrub's long awaited article Sri Hanumāna in Padma purāna. I feel enthrilled, God bless - - डॉ॰ सुरेश सिसोदिया शोध अधिकारी आगम अहिंसा-समता एवं प्राकृत संस्थान, उदयपुर our dear - 'ŚRAMANA' and long live our Jaina Religion. - Truly speaking, it was a jungle to roam about and only your discerning staff could manage to wade through various jaded arguments, a host of tedious Samskṛta quotations. A very honest composing & proof-reading have added excellent charm to the whole gamut of theme. Thanking You. Jain Education International - Surendra Kumar Garga Lecturer in English Muzaffar Nagar For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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