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कविता
तत्त्व की आज मैंने सुनी बाँसुरी
तत्त्व की आज मैंने सुनी बाँसुरी । तो विषय भोग माया तजी आसुरी ।। देह पुलकित हुई गीत सम्यक्त्व सुन । गूंजती कर्ण में ज्ञान आसावरी ॥ १ ॥ तत्त्व की आज मैंने
ये अनन्तानुबन्धी सहज उड़ गयी । देख कुमता पिशाचिन अरे कुढ़ गई। मेरी सुमता सखी मुझसे ही जुड़ गई। हाथ जोड़े खड़ी है, बना आंजुरी ।। ३ । तत्त्व की आज मैंने
इन कषायों के बादल बिखर सब गये। निज स्वभावों के पर्वत निखर अब गये || मोह मिथ्यात्व के गिर शिखर अब गये। ज्ञान की खिल गई इक इक पंखुरी ।। २ ।। तत्त्व की आज मैंने
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मैं तो परिपूर्ण हूँ सुख का भंडार हूँ । मैं चिदानन्द, चैतन्य, अविकार हूँ ।। बल अतुल का धनी सौख्य आगार हूँ। मेरी आतम स्वयं ज्ञान की निर्झरी ।। ५ ॥ तत्त्व की आज मैंने सुनी बाँसुरी
राजमल पवैया*
मैंने जाना है आतम का सच्चा धरम | मैं हरूँगा विभावों से आठों करम ।। परभावों से हटने की खाई कसम। मेरा यह भव है निश्चित ही अब आखिरी ।। ४ ।। तत्त्व की आज मैंने
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* 44, इब्राहिमपुरा, भोपाल (म० प्र०)
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