Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 65
________________ ६४ : श्रमण / जनवरी-मार्च/१९९६ एवं अभित्या मो (मे) भावसुगंधेण परमधूवेण । तित्थयरसिद्ध मुहा सव्वे वि कुणन्तु भवविरहं ।। १४ ।। एवं अभित्थुया = इस प्रकार स्तुति; मो = मेरे द्वारा; भाव सुगंधेण = भाव सुगंध से; परमधूवेण = परम धूप से; तित्थयरसिद्धपमुहा सव्वे वि = तीर्थङ्कर सिद्ध प्रमुख सभी; मे = मुझे; भवविरहं = भव से विरत; कुणन्तु = करे । अनुवाद : इस प्रकार मेरे द्वारा तीर्थङ्कर, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु प्रमुख सभी देवी-देवताओं को भावरूपी सुगंधित धूप से की गई यह स्तुति मुझे भव (संसार) से मुक्त करे ।। १४ ।। (१) जानवर मारता है जानवर को पेट की खातिर । आदमी मारता है जानवर को जीभ की खातिर । तीन कवितायें ( ३ ) पेड़ से तोड़ लिये (२) खेल समझकर चींटी एक मसल दिया है तुमने; निष्करुणा से जीवन एक मिटा दिया है तुमने । Jain Education International गुड़हल के फूल उन्होंने; मुस्काते और हर्षात सुन्दर जीवन कर दिये समाप्त उन्होंने । डॉ० रमेश कुमार त्रिपाठी आचार्य एवं अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र-विभाग, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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