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श्रमण / जनवरी-मार्च/१९९६
एवं अभित्या मो (मे) भावसुगंधेण परमधूवेण । तित्थयरसिद्ध मुहा सव्वे वि कुणन्तु भवविरहं ।। १४ ।।
एवं अभित्थुया = इस प्रकार स्तुति; मो = मेरे द्वारा; भाव सुगंधेण = भाव सुगंध से; परमधूवेण = परम धूप से; तित्थयरसिद्धपमुहा सव्वे वि = तीर्थङ्कर सिद्ध प्रमुख सभी; मे = मुझे; भवविरहं = भव से विरत; कुणन्तु = करे ।
अनुवाद : इस प्रकार मेरे द्वारा तीर्थङ्कर, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु प्रमुख सभी देवी-देवताओं को भावरूपी सुगंधित धूप से की गई यह स्तुति मुझे भव (संसार) से मुक्त करे ।। १४ ।।
(१) जानवर
मारता है
जानवर को
पेट की खातिर ।
आदमी
मारता है
जानवर को
जीभ की खातिर ।
तीन कवितायें
( ३ )
पेड़ से
तोड़ लिये
(२)
खेल समझकर चींटी एक
मसल दिया है तुमने; निष्करुणा से
जीवन एक मिटा दिया है तुमने ।
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गुड़हल के फूल
उन्होंने;
मुस्काते
और हर्षात
सुन्दर जीवन
कर दिये समाप्त
उन्होंने ।
डॉ० रमेश कुमार त्रिपाठी आचार्य एवं अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र-विभाग,
महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी
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