Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi
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वैदिक एवं श्रमण परम्परा में ध्यान : ५९
२२.
२१. रागद्वेषमिथ्यात्वासंश्लिष्टज्ञानं ध्यानमित्युच्यते। भगवती-आराधना, विजयोदया
टीका, अनु० पं० कैलाशचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, जैन संरक्षक संघ, शोलापुर, १९७८, २१, पृ० ४४ चत्तारि झाणा पण्णत्ता, तं जहा अट्टेझाणे, रोद्दझाणे, धम्मेझाणे, सुक्केझाणे। स्थानाङ्गसूत्र, प्रधान संपा० मुनि श्री मधुकर, श्री आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर (राजस्थान), १९८१, २१, पृ० ४४
आर्तरौद्रधर्मशुक्लानि। तत्त्वार्थसूत्र, ९/२९ २३. स्थानाङ्गसूत्र, सम्पादक मधुकर मुनि, ४/२४७ २४. निष्क्रिय करुणातीतं ध्यानधारणवर्जितम्। ज्ञानार्णव, अनु० बालचन्द शास्त्री,
जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, १९७७, ३९/४१ २५. तत्त्वार्थसूत्र भाष्य (हरिभद्रसूरि), ऋषभदेव जी केशरीमल जी, जैन श्वेताम्बर
संस्था, रतलाम, १९३६, अध्याय ९, पृ० ४८७ २६. इण्डियन फिलॉसफी, भाग-१, डॉ. राधाकृष्णन, जॉर्ज ऐलेन ऐण्ड अन्विन,
लन्दन, पृ० ४३६ २७. विसुद्धिमग्गो, प्रथम भाग, संपादक पं० बद्रीनाथ शुक्ल, पालि ग्रन्थमाला,
वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, १९६१, १/३६ २८. सासने कुलपुत्तानं पतिट्ठानित्य यं बिना। वही, १/२३ २९. चित्तैकागता लक्षण: समाधिः। बोधिचर्यावतार, प्रका० श्री परशुराम वैद्य,
बौद्ध संस्कृत ग्रन्थ, मिथिला विद्यापीठ, दरभंगा, १९६०, ८/४ पंजिका पर ३०. विपश्यना तथाभूतपरिज्ञानस्वभावा प्रज्ञा। वही, ८/४ ३१. विपश्यना द बुद्धिस्ट वे, संपा० डॉ० हरचरण सिंह सोवटी, ईस्टर्न बुक
लिंकर्स दिल्ली, १९१२, पृ० १-२ ३२. बौद्ध संस्कृति का इतिहास, ले० डॉ० भागचन्द जैन 'भास्कर', आलोक
प्रकाशन, नागपुर, १९१२, पृ० २८१ ३३. विसुद्धिमग्ग (खन्दनिद्देश), भाग-२, संपा० धर्मानंद कोसाम्बी, महाबोधि
सभा, सारनाथ (बनारस), १९४३, पृ० १०४-१११ ३४. ते झायिनो साततिका निच्चं दलद्ह पखकमा ।
फुसन्ति धीरा निब्बाणं योगक्खेमं अनुत्तरं ।। धम्मपद, राहुल सांकृत्यायन, १९३७, २/३
* प्रवक्ता, पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी
ल
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