Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 34
________________ जैन दर्शन में पुरुषार्थ चतुष्टय है, वह सड़कर बर्बाद हो जाता है । अर्थ और काम धर्म के प्रकाश से ही मोक्षोन्मुख होते हैं। : ३३ संक्षेप में कहा जा सकता है कि जैन दर्शन में भी अर्थ और काम को विमूल्य नहीं माना गया है, यदि वे धर्मानुकूल हैं। धर्म, 'अर्थ और काम' दोनों को ही मूल्यवत्ता प्रदान करता है। वह अमर्यादित अर्थ जिसमें दान के लिए, अपरिग्रह के लिए कोई स्थान नहीं है, और अमर्यादित काम जो आसक्तियुक्त है निश्चय ही मूल्य नहीं माने जा सकते। अर्थ का स्वरूप जैन दर्शन में 'अर्थ' की कहीं भी कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी गई है। मोटे तौर पर अर्थ से आशय यहाँ परिग्रह से लिया गया है और कुल मिलाकर परिग्रह का या तो पूर्ण निषेध किया गया है ( मुनिधर्म ), अथवा उसे मर्यादित किया गया है ( गृहस्थ - धर्म ) । यदि हम इस बात पर विचार करें कि किन वस्तुओं के परिग्रह का निषेध अथवा मर्यादा बताई गयी है तो हमें स्पष्ट ही 'अर्थ' का मतलब समझ में आ सकता है। अलग-अलग गाथाएँ / श्लोकों में अलग-अलग प्रकरण के अनुसार वस्तुओं के अपरिग्रह के लिए अथवा सीमित परिग्रह करने के लिए उपदेश हैं। तत्त्वार्थसूत्र में १. खेती बाड़ी और निवास हेतु जमीन, २. चाँदी - सोना, ३ . धन (रुपया-पैसा) और पशुधन तथा अनाज, ४. नौकर-चाकर और कर्मचारी, इत्यादि तथा ५ बर्तन - भाँडे, वस्त्रादि की मात्रा को निश्चित करने को कहा गया है।" इससे स्पष्ट है कि अर्थ के अन्तर्गत ये पाँचों वस्तुएँ आ जाती हैं । सूत्रकृताङ्ग में धन-सम्पत्ति और सहोदर भाई-बहिनों के त्याग की बात कही गयी है। इससे प्रतीत होता है कि नाते-रिश्तेदार भी अर्थ - रूप ही माने गए हैं जो सम्पत्ति की भाँति ही मनुष्य की रक्षा करने में समर्थ समझे जाते हैं किन्तु वस्तुतः ऐसा है नहीं । वे भी रक्षा करने में अन्ततः असमर्थ ही सिद्ध होते हैं, अतः उनके त्याग में भी मनुष्य का कल्याण ही है । सूत्रकृताङ्ग की ही एक अन्य गाथा सम्पत्ति और पशुओं के साथसाथ ज्ञानियों को भी धन अथवा अर्थ में सम्मिलित करती है क्योंकि वे भी त्राण और शरण देने वाले समझे गए हैं। इन सब उद्धरणों से स्पष्ट है कि जिसे भी हम अपना रक्षक और पोषक समझते हैं, अथवा वे सब जो त्राण या शरण देने वाले समझे गए हैं, 'अर्थ' के अन्तर्गत आ जाते हैं। इनकी निम्नलिखित वर्गों में गणना की जा सकती है १. क्षेत्र - वास्तु, हिरण्य- सुवर्ण, धन-धान्य और कुप्य आदि वस्तुएँ। २. दास - दासी, सहोदर भाई-बहिन, नाते-रिश्तेदार आदि । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org

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