Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 45
________________ ४४ : श्रमण/जनवरी-मार्च/१९९६ २५. वही, ९१ २६. वही, १०० २७. वही, ९२ २८. वही, १०२ २९. वही, १०४ ३०. वही, १०९ ३१. वही, १११-११२ ३२. स्थानाङ्गसूत्र, २. १ ३३. वही, २. १५ ३४. स्वामी समन्तभद्र, रत्नकरण्डक श्रावकाचार, वीर सेवा मन्दिर ट्रस्ट, वाराणसी, १९७२, १. २ ३५. देखें, पं० पन्नालाल 'बसंत' द्वारा सम्पादित रत्नकरण्डक श्रावकाचार, वाराणसी, ७२, पृ० ६ ३६. सुखितस्य दुःखितस्य च संसारे धर्म एव तवकार्यः । सुखितस्य तदभिवृद्ध्यै दुःखभुजस्तदपघातपं ।। आत्मानुशासन, १८ ३७. वही, १९ ३८. वही, २० ३९. वही, २१ ४०. ज्ञानार्णव, १०. ८-९ ४१. वही, १०. १६ ४२. यतोऽभ्युदय-निःश्रेयस सिद्धि स धर्मः। वैशेषिक सूत्र, १. १. २ ४३. पन्नालाल 'बसंत' (सं०) रत्नकरण्डक श्रावकाचार, पृ० ७-८ ४४. देखें प्रो० सागरमल जैन का आलेख, "मूल्य और मूल्यबोध की सापेक्षता का सिद्धान्त", श्रमण, जनवरी-मार्च, अंक १-३ ४५. दशवैकालिक नियुक्ति, २६२-२६४ ४६. 'अन्योन्या प्रतिबंधेन त्रिवर्गमति साधयन्'। योगशास्त्र, १. ५२ ४७. देखें, उपाध्याय अमर मुनि का लेख - 'धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष', श्री अमर भारती, जून १९९५, वीरायतन, राजगिरि ४८. क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्य प्रमाणातिक्रमाः।। तत्त्वार्थसूत्र, ७. २४ ४९. वित्तं सोयरिया च। सूत्रकृताङ्ग, १. १.५ ५०. कामसूत्र ९, परिशीलन, वाचस्पति गैरोला, संवर्तिका प्रकाशन, इलाहाबाद, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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