Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 43
________________ ४२ : श्रमण/जनवरी-मार्च/१९९६ सुख ऐसा भी सम्भव है जो दुःख सापेक्ष न हो। जो वस्तुतः अनन्त और अतीन्द्रिय हो। गाथा के अनुसार कर्ममल से विमुक्त जीव ऊपर लोकान्त तक जाता है और वहाँ वह सर्वज्ञ और सर्वदर्शी के रूप में अतीन्द्रिय अनन्त सुख भोगता है। मोक्षावस्था इस प्रकार केवल दुःखाभाव ही नहीं है। वह अतीन्द्रिय और अनन्त सुख की अवस्था संक्षेप में कहा जा सकता है कि जैन-दर्शन में मोक्ष का अर्थ केवल नकारात्मक रूप से ही नहीं समझा गया है। बेशक मोक्ष कर्म-बन्धनों से, जन्म मरण के चक्र से, दुःख से मुक्ति है। यह इस प्रकार एक दुःखाभाव की स्थिति है किन्तु साथ ही यह अनन्त सुख की एक नित्य स्थिति भी है। आत्मा इस स्थिति में अमूर्त होते हुए भी अस्तित्ववान है, वैयक्तिकता से परे सर्वज्ञ है। मुक्ताकाश में स्थित वह केवलज्ञान, केवलदर्शन, केवलवीर्य, केवलसुख के गुणों से परिपूर्ण है। सन्दर्भ १. धर्मश्चार्थश्चकामश्च मोक्षश्चेति महर्षिभिः । पुरुषार्थोऽयमुद्दिष्टश्चतुर्भेदः पुरातनैः ।। ज्ञानार्णव, ३/४ शुभचन्द्र, परमश्रुत प्रभावक मण्डल, अगास, १९७८ २. वही, ३/३. ४.५ ३. परमात्मप्रकाश, योगिन्दुदेव, परमश्रुत प्रभावक मण्डल, अगास, वि० सं० २०२९, २.३ ४. देखें, आनन्द प्रकाश त्रिपाठी का आलेख, "जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में पुरुषार्थ चतुष्टय", तुलसी प्रज्ञा, लाडनूं, खंड २०, अंक १-२, पृ० ४२ ५. देखें, प्रो० सागरमल जैन का आलेख, "मूल्य और मूल्य-बोध की सापेक्षता का सिद्धान्त", श्रमण, वाराणसी, जनवरी-मार्च १९९२, पृ० १०-११ ६. देखें, योगशास्त्र (आचार्य हेमचन्द्र), पृ० १-५२ ७. असंजमे नियत्तिं च, संजमे य पवत्तणं अथवा 'असंयमानिवृत्तिं च, संयमे च प्रवर्तनम्। समणसुत्तं, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी, १९८९, श्लोक १२९ आयारो, संपा० मुनि नथमल, जैनविश्वभारती, लाडनूं, वि० सं० २०३१ में भी (२. २७, पृ० ७६) यही बात कही गई है - 'अरइं आउट्टे से मेहावी' अर्थात् जो अरति का निवर्तन करता है, वह मेधावी होता है। 'अरति' से यहाँ तात्पर्य स्पष्ट ही उद्वेगों से है। देखें, हिरियना, एम० : आउटलाइन्स ऑव इण्डियन फिलॉसफी, लंदन, पृ० १७० ८. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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