Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 38
________________ जैन दर्शन में पुरुषार्थ चतुष्टय : ३७ ४. जो मनुष्य शरीर में आसक्त हैं वे विषयों की ओर खिंचे चले जाते हैं और इस प्रकार बार-बार दुःख उठाते हैं। काम-भोगों के ये कटु परिणाम हैं। इन्हें भ्रान्ति जान लेना चाहिए।७० ५. इन्द्रिय-विषय व्यक्ति को चारों ओर से घेर लेते हैं। जैसे एक आवर्त (भंवर) में फँसा व्यक्ति निकल नहीं सकता वैसे ही विषयों में घिरा व्यक्ति स्वयं को असहाय पाता है। इसीलिए कहा गया है कि जो विषय है, वह आवर्त है और जो आवर्त है, वह विषय है। विषय और आवर्त का एकत्व प्रतिपादन कर यह निर्दिष्ट किया गया है कि साधक को यदि विषयों का ग्रहण करना ही पड़े तो मूर्छा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मूर्छा से ग्रस्त व्यक्ति इच्छा के अधीन होकर विषय लोलुप हो जाता है और फिर विषयों से छुटकारा लगभग असम्भव हो जाता है। ६. कामनाओं का अतिक्रमण सहज नहीं है। वे विशाल हैं, दुराग्रही और हठीली हैं। इसलिए अज्ञानी पुरुष उनकी पूर्ति के लिए क्रूर से क्रूर कर्म करने को उद्यत हो जाते हैं। क्रूर कर्म करते हुए वे सुख की बजाय दुःख का सृजन करते हैं और इस प्रकार 'विपर्यास' को प्राप्त होते हैं। सुख का अर्थी इस तरह दुःख को प्राप्त होता है।७२ सुखवाद की यही विडम्बना है। सुख की तलाश अपने आप में दुःखद है। इसी को पाश्चात्य नीतिशास्त्र में 'पैराडॉक्स ऑव हेडोनिज्म' कहा गया है। काम की उपर्युक्त सीमाओं को देखते हुए मनुष्य को सही निर्णय लेना आवश्यक है। वस्तुतः जैसा कि कहा जा चुका है कि भोग अपने आप में न अच्छा है न बुरा है, न समत्व जाग्रत करने वाला है और न ही विषम है। काम-भोग में विकृतियाँ या विषमताएँ आती हैं। वे काम के प्रति व्यक्ति के ममत्व, आसक्ति के कारण आती हैं। यह लिप्तता ही काम को विषम बनाती है। अतः आवश्यकता इस बात की इतनी नहीं है कि काम से व्यक्ति पूर्णतः विरत हो जाए या उसे निरस्त कर दे। जब तक व्यक्ति के पास शरीर है, ऐसा किया भी नहीं जा सकता। किन्तु आवश्यकता इस बात की है कि वह - (क) अपने काम का वृत्त कम करे। कामनाओं को असीमित न होने दे, बल्कि उनकी सीमा निर्धारित करता जाए और धीरे-धीरे इस सीमा को, काम के दायरे को, संकुचित करता जाए। (ख) काम के प्रति आसक्ति न रखकर एक निःसंग, निष्काम-भाव विकसित करे ? विषय भोगों की विकृतियों से इसी प्रकार बचा जा सकता है। सत्पुरुष इसीलिए काम आदि विषय-भोगों का सेवन सम्यक्त्व भाव से करते हैं न कि उनमें लिप्त होकर। जैसे कमलिनी का पत्र स्वभाव से ही जल में लिप्त नहीं होता, वैसे ही सत्पुरुष सम्यक्त्व के प्रभाव से विकारों और विषयों में लिप्त नहीं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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