Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 26
________________ जैन दर्शन में पुरुषार्थ चतुष्टय : २५ परिभाषित किया गया है। __ धर्म की एक अन्य परिभाषा जो उसके स्वरूप को सुस्पष्ट करती है, हमें निम्नलिखित सूत्र में मिलती है - “धम्मो वत्थुसहावो।।१४ अर्थात, धर्म वस्तु का स्वभाव है। सामान्यतः जब हम कहते हैं कि अग्नि का धर्म जलाना है, जल का धर्म शीतल करना है या वायु का धर्म बहना है तो यहाँ धर्म से हमारा तात्पर्य कथित वस्तुओं के स्वभाव से ही है। अत: मानव परिप्रेक्ष्य में पूछा जा सकता है कि मनुष्य का स्वभाव क्या है कि जिसे धर्म कहा जाए ? स्पष्ट ही मनुष्य का सार उसकी चेतना में है। जो मनुष्य जीवित नहीं है, वह जड़ है। शरीर निश्चित ही मनुष्य का एक पक्ष है किन्तु शरीर गौण है। जीवन/चेतना के अभाव में शरीर का कोई महत्त्व नहीं है। चेतन शरीर स्वतः मूल्यवान है और शरीर परतः मूल्यवान है। अतः कहा जा सकता है कि जो चेतना का स्वलक्षण होगा वही मनुष्य का वास्तविक धर्म होगा। हमें अपने धर्म को समझने के लिए 'चेतना' के स्वलक्षण-स्वभाव को जानना होगा। चेतना क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर हमें भगवान महावीर और गौतम के बीच हुए एक संवाद में मिलता है। गौतम पूछते हैं --- 'भगवन् ! आत्मा क्या है और आत्मा का अर्थ या साध्य क्या है ? महावीर उत्तर देते हैं - 'गौतम! आत्मा का स्वरूप 'समत्व' है और समत्व को प्राप्त कर लेना ही आत्मा का साध्य है। १५ । दूसरे शब्दों में समता या समभाव स्वभाव है और विषमता विभाव है। जो विभाव से स्वभाव की दिशा में हमें ले जाता है, वही धर्म है। धर्म विषमता से समता की ओर अधिगमन है। समता धर्म है, विषमता अधर्म है। समता का अर्थ है अपने मूल स्वभाव में विकृति न आने देना। सदैव स्व-भाव में स्थित रहना। आचार्य हेमचंद्र सूरि ने कहा है - आदीप आस्यौअ समत्व भावं। आयारो में तो स्पष्ट ही कहा गया है - 'समियाए धम्मे'१६ अर्थात् धर्म समता में या समता है। समता और धर्म में कोई अन्तर नहीं है। जो समता है वह धर्म है और जो धर्म है, वही समता है। जिस प्रकार आत्मा ज्ञान है और ज्ञान आत्मा है (अप्पा णाणं, णाणं अप्पा), उसी तह समता और धर्म एकरूप हैं।" प्रवचनसार में समता को धर्म के रूप में और अधिक मूर्तमान लिया गया है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि चारित्र्य ही धर्म है और धर्म निश्चित ही समता है।८ मोह-क्षोभ से रहित आत्मा की जो परिणति है, वही साम्य है। जो लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, जीवन-मरण, निन्दा-प्रशंसा, मान-अपमान से विचलित नहीं होता और For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International

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