Book Title: Sramana 1996 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 25
________________ २४ : श्रमण/जनवरी-मार्च/१९९६ इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए, जैन दर्शन के अनुसार धीर पुरुष को क्षण-भर का प्रमाद नहीं करना चाहिए - 'धीरे मुहुत्तमवि णो पमादए। कुशल व्यक्ति वही है जो बिना प्रमाद के पुरुषार्थ में विश्वास करता है। कुशल को प्रमाद से भला क्या प्रयोजन ? जैन दर्शन में इस प्रकार हम मानव प्रयत्न के लिए एक विशेष आग्रह पाते हैं। इसी कारण जैन साहित्य में हमें स्थान-स्थान पर प्रमाद की निन्दा और पुरुषार्थ की प्रशंसा भरपूर मिलती है। धर्म का स्वरूप पुरुषार्थ-चतुष्टय में प्रथम मूल्य 'धर्म' है। धर्म से आशय यहाँ मुख्यतः नैतिक मूल्यों से है। जैन दर्शन में धर्म के स्वरूप को स्पष्ट करने वाले अनेक सूत्र और गाथाएँ हैं। वे जहाँ एक ओर धर्म के आकारगत स्वरूप पर प्रकाश डालती हैं वहीं वे दूसरी ओर धर्म की अन्तर्वस्तु को भी स्पष्ट करती हैं। _नैतिक मूल्यों के एक वर्ग के रूप में धर्म को पुरुषार्थ पद्धति में प्रथम स्थान प्राप्त है। जिस प्रकार सभी मूल्यों का स्वरूप आदेशात्मक होता है, धर्म का आकारगत स्वरूप भी आदेशात्मक ही माना गया है। नैतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति सदैव ही आदेश के रूप में होती है। हम क्या करें या क्या न करें, नैतिक मूल्य इस सम्बन्ध में ऋणात्मक अथवा धनात्मक उपदेश देते हैं। हम सत्य बोलें, हिंसा न करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें और चोरी न करें इत्यादि ऐसे ही उपदेशात्मक मूल्य हैं जो आज्ञाओं के रूप में प्रस्तुत किये गए हैं। ये सभी हमें एक विशेष प्रकार के आचरण के लिए प्रेरित करते हैं। अतः धर्म को 'प्रेरणास्वरूप' कहा गया है। धर्म नियोजक है, विहित है। वेद वाक्य अन्य लक्षणों के अतिरिक्त विहित होने के नाते ही धर्म हैं। जैन दर्शन में भी धर्म के आदेशात्मक स्वरूप पर स्पष्ट आग्रह है। आचार्य महाप्रज्ञ, 'आज्ञायां मामको धर्मः' सूत्र द्वारा, अपने महाकाव्य सम्बोधि में, धर्म को पारिभाषित करते हैं। इस सूत्र का आगमिक स्रोत आयारो में देखा जा सकता है। आचाराङ्ग में स्पष्ट कहा गया है - 'आणाए मामगं धम्म १२, अर्थात् आज्ञा में ही धर्म का गूढ़ तत्त्व छिपा हुआ है। इसके रहस्य को जानने वाला ही उसको प्राप्त कर सकता है।१३ स्पष्ट ही धर्मादेशों में आदेश के बल के अनुसार भिन्नताएँ हो सकती हैं किन्त किसी भी नैतिक वाक्य की यह विशेषता है कि वह नियोजक (प्रेस्क्रिप्टिव) हो। उसका यह नियोजकत्व, स्पष्ट ही, उसे स्वयं नैतिक मूल्यों से ही प्राप्त होता है, किसी बाह्य कारक से नहीं। धर्म को इसीलिए 'आणाए मामगं धम्म', सूत्र द्वारा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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