Book Title: Shatpadi Bhashantar
Author(s): Mahendrasinhsuri
Publisher: Ravji Devraj Shravak

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Page 201
________________ शतपदी भाषांतर. ( पाक्षिक.) " पाक्षिकचूर्णिमां क छे के “ दररोज विशुद्धि करतां छतां पण पक्षांत आवतां विशेष पडिकमणुं करवुं." ए वचनथी पाखीपडिकमणुं पक्षना अंतेज कर सिद्ध थाय छे. हवे पक्षनो अंत ज्योतिष्करंडादिकमां पनरमी तिथिएज क छें. माटे पाक्षिक पण तेज दहाडे करवुं घंटे छे. ( १८१ ) वळी दशाश्रुतस्कंध चूर्णि, व्यवहारचूर्णि, पाक्षिकचूर्णि, पाक्षिकवृत्ति, तथा आवश्यक टिप्पनक ए पांचे ग्रंथोमां पाखीथी चौदश जूदीज कही छे. तेना दाखला. (१ - २) दशाश्रुतस्कंध तथा व्यवहारचूर्णिमां "पाक्षिक तथा पौपधिक दिनोमां तप करतुं करावबुं " ए वाक्यनी व्याख्यामां लख्युं छे के पाक्षिक एटले अर्धमासपर्व, अने पौषधिक एटले आठम वगेरा पर्व. (३) पाक्षिकसूत्री चूर्णिमां पण "दिवस, पौषध, तथा पक्ष व्यतिक्रम्यो" ए सूत्र ऊपर व्याख्या करतां चूर्णिकारें " पौषध एटले आठमचउदशनो उपवास करवो" एवो अर्थ लखतां पोसह शब्दथीज चौदश लीधी छे, पण पक्ष शब्दथी नथी लीधी. ( ४ - ५ ) पाक्षिकसूत्रनी टीका तथा आवश्यकना टिप्पनकमां पण एवी व्याख्या करीछे के “पौषध ते पर्वरूप दिवस अने पक्ष ते अर्धमासरूप. " बळी मासनी समाप्ति पण पूनमेज थाय छे. कारण के निशीथचूर्णिमां कह्युं छे के साधुओ चोमासुं पूरुं थतां पण कारणवशे वधु मुदत सां रहे तो त्यां वे महिनानी मुदतना दरम्यान कोइ वस्त्र वोरावे तो ते नहि लेतां बे मास पूरा थया केडे चोरवा. हवे

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