Book Title: Sarvarthasiddhi Vachanika
Author(s): Jaychand Pandit
Publisher: Shrutbhandar va Granthprakashan Samiti Faltan

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Page 337
________________ वच मिनि निका पान अवगाह कर ऐसे हैं । बहार ते एक दोय तीनि च्यारि संख्यात असंख्यात समयकी स्थितिकू लेकरि तिष्ठे हैं। पंच BI वर्ण, पंच रस, दोय गंध च्यारि स्पर्श गुणरूप भावकू लिये आवै हैं । आठप्रकार कर्मकी प्रकृतिकै योग्य हैं, ते योगके वशतें आत्मा आप ग्रहण करै है । ऐसें प्रदेशवंधका स्वरूप संक्षेपतें जानना ॥ माथH आगें बंध पदार्थके अनंतर पुण्य पाप भी गिणने ऐसी प्रेरणा है, सो पुण्यपाप बंधपदार्थवि4 अंतर्भूत हैं, से जानना । तहां ऐसा कह्या चाहिये, जो, पुण्यवंध तो कहा है ? अर पापबंध कहा है ? तहां ऐसा पहले तो पुण्यमक प्रकृतिकी संख्या कहनेकू सूत्र कहै हैं ॥ सवेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥२५॥ याका अर्थ-- सातावेदनीय शुभआयु शुभनाम शुभगोत्र हैं ए पुण्यप्रकृति हैं । तहां शुभ तौ प्रशस्तकूँ कहिये, सराहने योग्य होय, सो शुभ है । सो शुभशब्द आयुआदि तीनि कर्मके न्यारा न्यारा कहना । तातै शुभआयु शुभनाम शुभगोत्र ऐसा जानना । तहां शुभआयु तो तीनि हैं । तिर्यचआयु मनुष्यआयु देवआयु ऐसें । तहां शुभनामप्रकृति तैंतीस हैं । मनुष्यगति, देवगति, पंचेन्द्रियजाति, पांच शरीर, तीनि अंगोपांग, समचतुरस्रसंस्थान, वज्रवृषभनाराचसंहनन, प्रशस्तवर्ण रस गंध स्पर्श ए च्यारि, मनुष्यदेवगत्यानुपूर्य दोय, अगुरुलघु, परघात, उछ्वास आतप, उद्योत, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, वादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, सुभग, शुभ, सुस्वर, आदेय, यश कीर्ति, निर्माण, तीर्थकर ऐसे बहुरि उच्चगोत्र सातावेदनीय ऐसें व्यालीस प्रकृति पुण्यकर्मकी हैं । आगे पापप्रकृतिनिके जानन· सूत्र कहै हैं-- ॥ अतोऽन्यत् पापम् ॥ २६ ॥ याका अर्थ--- एकही जे पुण्यप्रकृति तिनतें अवशेप रही ते पापप्रकृति हैं। इस पुण्यनामा कर्मप्रकृतिके समूहते अन्यकर्म है सो पाप ऐसा कहिये । ते कौन कौन ? ज्ञानावरण पांच, दर्शनावरण नब, मोहनीयकी छव्वीस, अंतरायकी पांच, नरकगति, तीर्यचगति, जाति च्यारि, संस्थान पांच, संहनन पांच अप्रशस्त वर्ण गंध रस स्पर्श ए च्यारि, नरकगत्यानुपूर्व्य, तिर्यचगत्यानुपूर्व्य, उपघात, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशःकीर्ति ऐसे चौतीस नामकर्मकी प्रकृति बहुरि असातावेदनीय नरकआयु

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