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समयसार अनुशीलन
ऐसा यह ज्ञान - दर्शनस्वभावी अनादि - अनन्त अचल आत्मतत्त्व स्वसंवेद्य है, स्वानुभूति से जाना जा सकता है। 'नहीं जाना जा सकता' । ऐसा भी नहीं है और वर्णादि व रागादि से जाना जावे ऐसा भी नहीं है, व्रत - शील- संयम से जाना जावे
ऐसा भी नहीं है । यह
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एकमात्र स्वानुभूति से ही जाना जा सकता है।
कहा भी है कि " आत्मानुभूति से प्राप्त तत्त्व मैं ज्ञानानंदस्वभावी
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ऐसा यह भगवान आत्मा मैं ही हूँ । इसमें ही अपनापन सम्यग्दर्शन है, इसे ही निजरूप में जानना सम्यग्ज्ञान है और इसमें ही जमना - रमना सम्यक्चारित्र है । यही धर्म है, मुक्ति का मार्ग है, सन्मार्ग है, सुखी होने का उपाय है ।
अब आगामी कलश में यह स्पष्ट करते हैं कि जीव का लक्षण चेतनत्व ही क्यों है ।
( शार्दूलविक्रीडित )
वर्णाद्यैः सहितस्तथा विरहितो द्वेधास्त्यजीवो यतो । नामूर्तत्त्वमुपास्य पश्यति जगज्जीवस्य तत्त्वं ततः ॥ इत्यालोच्य विवेचकैः समुचितं नाव्याप्यतिव्यापि वा । व्यक्तं व्यंजित जीवतत्त्वमचलं चैतन्यमालंब्यताम् ॥ ४२ ॥ ( सवैया इकतीसा )
मूर्तिक अमूर्तिक अजीव द्रव्य दो प्रकार,
इसलिए अमूर्तिक लक्षण न बन सके । सोचकर विचारकर भलीभांति ज्ञानियों ने,
कहा वह निर्दोष लक्षण जो बन सके ॥ अतिव्याप्ति अव्याप्ति दोषों से विरहित,
चैतन्यमय उपयोग लक्षण है जीव का । अतः अवलम्ब लो अविलम्ब इसका ही,
क्योंकि यह भाव ही है जीवन इस जीव का ॥ ४२ ॥