Book Title: Prakrit Vyakarana Author(s): Kamalchand Sogani Publisher: Apbhramsa Sahitya AcademyPage 67
________________ त + त्तो + दो + ओ = तत्तो, तदो, तओ (वहाँ से) इ + तो + दो + ओ = इत्तो, इदो, इओ (यहाँ से) 11. हि, ह, और त्थ प्रत्यय : (हेम - 2/161) सप्तमी अर्थक स्थानवाची प्रत्यय हि, ह और त्थ सर्वनामों में तथा विशेषणों में प्रयोग किये जाते हैं । निर्मित शब्द अव्यय होते हैं। जैसे - ज + हि + ह + त्थ = जहि, जह, जत्थ (जिस स्थान में/पर) त + हि + ह + त्थ = तहि, तह, तत्थ (उस स्थान में/पर) क + हि + ह + त्थ = कहि, कह, कत्थ (किस स्थान में/पर) अन्न + हि + ह + त्थ = अन्नहि, अन्नह, अन्नत्थ (अन्य स्थान में/पर) सव्व + हि + ह + त्थ = सव्वहि, सव्वह, सव्वत्थ (सब स्थान में/पर) 12. सि, सिअं और इया प्रत्यय : (हेम - 2/162) एक समय के अर्थ में सि, सिअं और इया प्रत्यय जोड़े जाते हैं। निर्मित शब्द अव्यय होते हैं। जैसे - एक्क + सि एक्कसि । एक्क + सिअं - एक्कसि। [एक समय = एगया ] एक्क + इया = एक्कइया । 13. स्वार्थिक प्रत्यय : (हेम - 2/170) (i) आलिअ प्रत्यय : मीस + आलिअ = मीसालिअ (वि.) (संयुक्त) अथवा मीस (वि.) (ii) र प्रत्यय : (हेम - 2/171) दीह + र = दीहर (वि.) (लम्बा ) अथवा दीह (वि.) (iii) ल प्रत्यय : (हेम - 2/173) (58) प्राकृतव्याकरण : सन्धि-समास-कारक -तद्धित-स्त्रीप्रत्यय-अव्यय Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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