Book Title: Mahavira Yuga ki Pratinidhi Kathaye
Author(s): Devendramuni
Publisher: Tarak Guru Jain Granthalay

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Page 289
________________ महावीर युग की प्रतिनिधि कथाएँ लीजिए कि मैं भी अनाथ था ओर मेरे प्रियजन भी अनाथ थे। अब तो आपने मुझे क्षमा कर दिया न ? मै पुन दुहराता हूँ कि मेरा आशय आपको दुखी करने या आपका अपमान करने का नही था । किन्तु आपने कहा था, तो मुझे भी सत्य तो कहना ही चाहिए था न ?” ६८ "हॉ, हॉ, योगी । मैंने बुरा नही माना । मुझे केवल विस्मय हुआ था । लेकिन फिर क्या हुआ ?” – राजा ने पूछा । " फिर क्या, राजन् | मैंने विचार किया -क्या है यह जीवन ? क्या भरोसा है इस संसार का ? कितना असहाय है मनुष्य ? क्या अर्थ है उन सासारिक सम्बन्धो का ? माता-पिता, भाई-बहिन, पत्नी-पुत्र - कोई भी तो किसी के काम नही आ पाते । जव दुख आता है, जव विपत्ति आती है तो कोई उसे वँटा नही पाता । सब टुकुर टुकुर देखते ही रह जाते हे יין "मैने निश्चय कर लिया — कोई किसी का नाथ नही है । कोई किमी का सहायक और साथी नही है । आत्मा अकेला है । वही अपना सेवकस्वामी सखा, जो कुछ भी मानिए सो है । इसके अतिरिक्त कुछ नही है । आत्मा ही आत्मा का रक्षक है-अत्ताहि अत्तनो नाथो ।” " राजन् । पीडा से व्याकुल मैं यही विचार करता-करता जाने कव सो गया। मुझे इन विचारो से, सत्य के इस साक्षात्कार से कुछ शान्ति मिली थी, इसलिए उस रात शायद नीद आ सकी । " " प्रात काल होने पर तो फिर मैं अपनी आत्मा की खोज में निकल पडा । किसी के रोके रुका नही । क्योकि जैसा कि मैं कह चुका हूँ- कोई किसी का है ही नही ।" " अव मैं मुनि हूँ । आत्मा के सान्निध्य मे रहता हूँ । मुझे कोई कष्ट नही है । मैं हूँ और मेरी आत्मा है ।" -- उत्तराध्ययन सूत्र, २०

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