Book Title: Jain Siddhant Pravesh Ratnamala 08
Author(s): Digambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
Publisher: Digambar Jain Mumukshu Mandal

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Page 292
________________ ( 6 प्र० ५६-सबसे बड़ा पाप क्या है ? उत्तर-अज्ञान ही सबसे बड़ा पाप है। प्र० ५७- सम्यग्ज्ञान किसे कहते है ? उत्तर-सच्ची समझ को सम्यग्ज्ञान कहते हैं। प्र० ५८-सम्यग्ज्ञान से अपना आत्मा कैसे समझ मे आता है ? उत्तर-आत्मा ज्ञान वाला है, आत्मा शरीर से अलग है, जीव को राग होता है वह उसका गुण नही है । सम्यग्ज्ञान से अपना आत्मा ही है ऐसा समझ मे आता है। प्र० ५६-जिसे सच्चा चारित्र हो उसे क्या कहते हैं ? उत्तर-जिसे सच्चा चारित्र हो उसे मुनि कहते है। प्र० ६०- कौन सी तीन वस्तुओ की एकता करने से मोक्षमार्ग होता है ? उत्तर-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यग्चारित्र की एकता करने से मोक्षमार्ग होता है। प्र. ६१-आत्मा को पहिचाने बिना चारित्र का पालन करे तो मोक्ष होता है कि नहीं ? उत्तर-आत्मा को पहिचाने बिना चारित्र होता ही नही । प्र० ६२-सच्चा चारित्र और मुनि दशा किसे हो सकती है ? उत्तर-जो आत्मा को पहिचाने उसके ही सच्चा चारित्र और मुनि दशा हो सकती है। प्र० ६३-जैन किसे कहते है ? उत्तर-आत्मा को पहिचान कर जो अज्ञान को जीते उसे जैन कहते है या __ आत्मा के वीतराग भाव से जो राग-द्वेप को जीते उसे जैन कहते है।

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