Book Title: Jain_Satyaprakash 1945 12
Author(s): Jaindharm Satyaprakash Samiti - Ahmedabad
Publisher: Jaindharm Satyaprakash Samiti Ahmedabad

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Page 15
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir કંઇક શંખેશ્વર સાહિત્ય घणु स्युं कहुं कर जोडो, हो मद छोडी, स्वामी सांभलो, कहे मोहन चित लाय ॥ सं० ॥ ६ ॥ (५) संखेसर स्वामी स्तवन श्रीजिनसुखसूरिकृत अधिक उलास, हो प्रणमौ पास जिणेसर, श्रीसंखेसर सामि । इण संसार, हो आरै पंचम सुरतर, कामित पूरै काम ॥ अ० ॥१॥ जग सहु आवै, हो भावै मिलि मिलि जातरा, गावै प्रभु गुण गान । बहु धन परचे, हो अरचे, सवै सुगति सुं, परचै मुगति प्रधान ॥ अ० ॥ २ ॥ आज इण वेला, हो महिमा अतिघणो, दूर हरै दुख दंद। सुख सहु आपै, हो थापै आणंद इण भवे, परभव परमानंद ॥ अ० ॥ ३ ॥ मन मैं ऊमाहो, हो हुतौ दिवस घणा तणौ, जाई कीजइ जात । तेह जुहार्यो, हो वायौँ भमवौ भव भवै, ग्यांन गिण्यौ ए गात ॥ १० ॥ ४ ॥ होयडौ हरण्यौ, हो परण्यौ समकित सुध सही, नयन थया नेहाल । जिगमुखमाइ, हो भावै पूरइ भेटीयो. पातक परहो षाल ॥ अ० ॥ ५ ॥ (६) संषेसर साहिब स्तवन श्रीजिनसुखसरिकृत श्रीसंखेसर साहिब पास, मोसुं महिर करीजै ॥ ध्यान तुम्हारौ नित्त धरीजै, दूजो चित्त न दीजै ॥ सुनिजर एहवी कीजै, सांमी, जिम भक्जलधि तरीजै ॥श्रो०॥ ५. प्रत न. ५१७७, ५ न. ९७. (सलियानी xalka नयी.) 1.अपना नं. ५, पत्र न.८. - - For Private And Personal Use Only

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