Book Title: Hingul Prakaran
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 15
________________ Jain Educationa २ कथी उत्पन्न थएला दुःखने मेलवे बे; अने एवी रीते माणसोना समूहो श्रीकृमनी पेठे, ( पोते ) करेलां कर्मोने जोगवे बे. ॥ ५ ॥ ( इति क्रोधप्रक्रमः ) ( अथ मानप्रक्रम: ) यः स्तब्धो गुरुणा साक- मन्यस्यनमनं कुतः । न बाया यै न लाजाय, मानी कंथेरवन्नृणाम् १ अर्थ- जे मानी माणस गुरुनी समीपे पण अक्कड थइने रहे बे; त्यारे बीजाने नमवानी तो वातज शी करवी ? अने एवी रीते मानी माणस कंथेरना वृक्षनी पेठे माणसोने बायादायक के लाभदायक थइ शकतो नथी. ॥ १ ॥ स्थाणुर्वा पुरुषो वाऽयं, दृट्वेति तर्कयं तियम् । स मानी दूरतस्त्याज्यो नम्रा दिगुणवर्जनात् ॥ १॥ अर्थ- जेने जोड़ने व बे के पुरुष बे ? एवी रीते लोको तर्क करे बे, एवी रीते नम्रादिक गुणोथी | रहित थएला मानीने दूर तजवो ॥ २ ॥ शिक्षां बनते नो मानी, विद्यामीयान्न कर्हिचित् । विनयादि क्रियाशून्यः, स्तंजवत्स्तब्धतां गतः ॥ ३॥ For Personal and Private Use Only Calibrary.org

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