Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 1086
________________ PAR ६६६ ] | गो. प्र. चिन्तामणि के नहीं है, और जिसके मिथ्यात्व सहित राग है वह सम्यग्दृष्टि नहीं है । उस भेद को सम्यग्दृष्टि ही जानता है। मिथ्यादृष्टि का अध्यात्म शास्त्र में प्रथम तो प्रवेश ही नहीं है और जो प्रवेश करे तो उलटा समझता है, व्यवहार को सर्वधा छोड़ भ्रष्ट हो जाता है, अथवा निश्चय को अच्छी तरह नहीं जानकर व्यवहार से ही मोक्ष मानता है, परमार्थ तत्व में मूढ है । इसलिए यथार्थ स्याद्वादनय द्वारा सत्यार्थ समझने से ही सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है। समयसार क. पृ. २६७६ ।। गाथा नं. २००, आचार्य श्रमृत. प्रश्न :--स्वसंवेदन के साथ प्राध्यात्मिक ग्रन्थों में विसराग विशेषण क्यों लगाया जाता है ? स्वसंवेदन जाने वीतराम विशेषणं किमर्थ मितिपूर्वपक्ष ? . उत्तर :----"विषयानुभव रूप स्वसंवेदन ज्ञानं सरागमपि दृश्यते तनिषेधार्थमित्यभिप्रायः ।" . ... .. . . जो स्वसंवेदन अर्थात् अपने कर अपने को अनुभवना इसमें वीतराग विशेषण क्यों कहा? क्योंकि जो स्वसंवेदन ज्ञान होवेगा, वह तो रागरहित होवेगा ही। इसका समाधान श्री गुरु ने किया कि विषयों के आस्वादन से भी उन वस्तुओं के स्वरूप का जानपना होता है, परन्तु राग भाव कर दूषित है, इसलिये निज रस का आस्वाद नहीं है, और बीतराग दशा में स्वरूप का यथार्थ ज्ञान होता है, प्राकुलता रहित होता है। तथा स्वसंबेदन ज्ञान प्रथम अवस्था में चौथे, पांचवे गुणस्थान वाले गृहस्थ के भी होता है । वहां पर सराग देखने में आता है, इसलिए रागसहित अवस्था के निषेध के लिये वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान ऐसा कहा है। रागभाव है, वह कषायरूप है. इस कारण जब तक मिथ्यादृष्टि के अनंतानुबंधी कषाय है, तब तक तो बहिरात्मा है, उसके तो स्वसंवेदन ज्ञान अर्थात् सम्यकज्ञान सर्वथा ही नहीं है, व्रत और चतुर्थ गुरणस्थान में सम्यग्दष्टि के मिथ्यात्व तथा अनंतानुबंधी के अभाव होने से सम्यग्ज्ञान तो हो गया, परन्तु कषाय की तीन चौकड़ी बाकी रहने से द्वितीया के चन्द्रमा के समान विशेष प्रकाश नहीं होता, और श्रावक के पांचवें गुरणस्थान में दो चौकड़ी का अभाव है, इसलिये राग भाव कुछ कम हुमा, वीतराग भाव बढ़ गया, इस कारण स्वसवेदन ज्ञान भी प्रबल हुआ, परन्तु दो चौकड़ी के रहने से मुनि के समान प्रकाश नहीं हुआ । मुनि के तीन चौकड़ी का अभाव है, इसलिये राग भाव तो निर्बल हो

Loading...

Page Navigation
1 ... 1084 1085 1086 1087 1088 1089 1090 1091 1092 1093 1094 1095 1096 1097 1098 1099 1100 1101 1102 1103 1104 1105 1106 1107 1108 1109 1110 1111 1112 1113 1114 1115 1116 1117 1118 1119 1120 1121 1122 1123 1124