Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 1094
________________ A [ गो. प्र. चिन्तामणि वस्तु अनेक स्वभावात्मक होने के कारण पूर्ण रूप से वचनों के अगोचर होने परं भी वस्तु को सर्व प्रवक्तव्य कहना भी असद्वाद है। क्योंकि इस दशा में "श्रवक्तव्य" यह वचन भी नहीं बोल सकेंगे जैसे कि मौनव्रती "मैं मौनव्रती हूं" यह शब्द भी नहीं बोल सकता है और भी जैसे कोई व्यक्ति कह रहा है कि मैं आपकी बात नहीं सुन रहा हूं क्योंकि "मैं गाढ़ निद्रा में सोया हूँ" इस प्रकारं वस्तु अव्यक्तव्य नहीं है । उसका कथन गौरण मुख्य रूप से होता है । “अर्पितनापित सिद्ध:":- धर्मान्तर विवक्षा प्रापित प्राधान्यमर्पित अनेकात्मकस्य वस्तुनः प्रयोजनक्शात् पर-३ मा विनर विवक्षय प्रापित प्राधन्यम् अर्थस्यमर्पितमुपनीतमिति यावत् । गौण और मुख्य विवक्षा से एक ही वस्तु में नित्यत्व और अनित्यत्व धर्म सिद्ध है इस प्रकार अनेक धर्म भी प्रयोजनवश अनेकान्त वस्तु के जिस धर्म की विवक्षा होती है या विवक्षित जिस धर्म को प्रधानता मिलती है उसे अर्पित कहते हैं। तद्विपरीतमनर्पितम्। प्रयोजन भावात् सतोऽप्यविवक्षा भवति इत्युपसर्जमो भूतमनर्पितमित्युच्यते जिन धर्मों के विद्यमान रहने पर भी विवक्षा नहीं होती, उन्हें 'अनर्पित' कहते हैं । "Substances are endowed with an infinite nuber of attributes. When we describe a substance we can do so by adopting one pojat of vi at a time so giving prominece to a fewattributes However it does not mean that other attributes are of no purpose to us at that time.” . वर्तमान युग वैज्ञानिक युग है। इस युग में प्रत्येक कार्य वैज्ञानिक सिद्धात ( Scientific theory ) के अनुसार विश्लेषण किया जाता है । परीक्षा प्रधानी व्यक्ति वैज्ञानिक कार्यकारण भाव के अनुसार प्रत्येक विषय को परीक्षा करके में उसको ग्रहण करता है । वर्तमान युग के आधुनिकता रूपी रंग के चश्मा धारण करने वाले व्यक्ति अाधुनिकता में जो कुछ हो रहा है। भले वह नैतिक पतन का कारण हो, किम्वा, आध्यात्मिकता का प्रध्वंसक हो, अहिंसा का घातक हो, जन गण का अहितकारी हो, विश्व का विध्वसंक हो, प्रेम, भातृत्व वात्सल्य का लोप करने वाला हो, समाज में धर्म में, साधर्मी में भेद डालने वाला हो तो भी उसको सहर्ष ग्रहण करता है। उसका यह कार्य अपाततः रमरणीय होने पर भी उसका कल किपाक फल भक्षण के समान विपाक मधुर नहीं होगा और 'विषकुम्भ पयोमुख' के समान अन्तः ।

Loading...

Page Navigation
1 ... 1092 1093 1094 1095 1096 1097 1098 1099 1100 1101 1102 1103 1104 1105 1106 1107 1108 1109 1110 1111 1112 1113 1114 1115 1116 1117 1118 1119 1120 1121 1122 1123 1124