Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1098
________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि formed (in to its impure thought-activity) by reason of operation of Karmic matter. जीव परिणाम को निमित्त मात्र करके पुद्गल कर्म भाव से परिगमन करते हैं, पुद्गल कर्म को निमित्त मात्र कर जीव भी परिणमन करता है । इसी प्रकार देव को शक्ति प्रदान करने वाला पुरुष (परम पुरुषार्थ हीन पुरुष) है और उस शक्ति के अनुशासन में शासित होने वाला पुरुष है । जब पुरुष उसको शक्ति प्रदान करता हैं, तब दैव विभिन्न रूप धारण करके विभिन्न कार्य करता हैं । . .. जह पुरि सेरगाहाले पहिलो परिमादि मावनिह। मंसवसारहिरादि भावे उदयरगि संजुत्तो ॥२१३०॥ As the food taken by a man is modified in many way, in the form of flesh, nerver, blood, etc., by reason of the digestive heat of the human system. That like the molecules of the Karmic mater modified in many, in the form of eight kinds of Karma by impure thought activity of the mundane soul. · जैसे पुरुष द्वारा ग्रहण किया गया आहार वह उदराग्नि से युक्त हुश्रा अनेक-अनेक प्रकार मांस रस रुधिर आदि भावों रूप परिणमता है, उसी प्रकार कर्म पुद्गल भी जीवों के रागादि भावों को प्राप्त करके ४ प्रकार अथवा अनेक प्रकार देव रूप से परिणमन करता है । जिस प्रकार अतितुच्छ धूलि मन्त्र शक्ति युक्त होकर अनेक प्राश्चर्यजनक कार्य करती हैं, उसी प्रकार कर्मरूपी धूलि भी रागद्वेष शक्ति से युक्त होकर अनेक आश्चर्य जनक कार्य करती है, जिस प्रकार हल्दी एवं चूना मिलकर अपना रूप त्याग करके लाल रंग हो जाते हैं, और उस अवस्था में दोनों का पृथक्-पृथक् सत्ता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती है, उसी प्रकार पुरुष एवं दैव की अवस्था होती है। अविज्ञातस्थानो व्यपगततनुः पापमलिनः, खलो राह स्विश शसकरा क्रान्त भुवनम् ।.:.. स्फुरन्तं स्विन्त किल गिलति हा कष्टम परः, . परिप्राप्ते काले विलसति विधौ को हि बलवान ॥२१३१॥ प्रात्मानुशासनं

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