Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1122
________________ १०३.२ । [गो. प्र. चिन्तामरिण कोई सफलता प्राप्त करता है तो अन्य कोई निष्फलता को प्राप्त होता है । एक जीव ने पुण्य से न्याय रूप पुरुषार्थ से सम्पदा प्राप्त को किन्तु सम्पदा सुख देने वाली तभी हो सकती है यदि पुण्य का उदय है. तो पुण्य के उदय नहीं रहने पर सम्पदा सुख नहीं दे सकती है। अतः पुण्य संसार सुख का कारण है उससे सम्पदादिक प्राप्त होता है किन्तु यह एवंागत हनि. पुण्य से ही सम्पदा प्राप्त हों और पुरुषार्थ से नहीं हो या पुरुषार्थ से ही हो देव से न हो किन्तुं दोनों में से एक की गौणता एवं मुख्यता पर अवलम्बित है। देव पुरुषार्थ की संप्त भंगी-- १. स्यात् भाग्यकृत---अबुद्धि पूर्वक की अपेक्षा से। . २. स्थात् पुरुषार्थ कृत---बुद्धि पूर्वक की अपेक्षा से । ३. स्यात् भाग्य पुरुषार्थ कृत-क्रम से अबुद्धि पूर्वक और बुद्धि पूर्वक की . अपेक्षा से। ४. स्यात् अववतव्य---युगपत् दोनों विवक्षाओं को नहीं कह सकने की अपेक्षा । ५. स्यात् भाग्यकृत् प्रवक्तव्य -- अबुद्धि पूर्वक की और युगपत् न कह सकने ' की विवक्षा से। ६. स्यात् पुरुषार्थकृत अवक्तव्य-बुद्धि पूर्वक की और युगपत् न कह सकने की विवक्षा से। ७. स्यात् भाग्य पुरुषार्थ कृत अवक्तव्य-~- क्रम से. अबुद्धि पूर्वक एवं युगपत् न कह सकने की अपेक्षा से । इस प्रकार देव एवं पुरुषार्थ परस्पर सापेक्ष है। अनादि से भाग्य शक्ति शाली है । काल लब्धि पाकर जब जीव शक्तिशाली होता है तब वह भाग्य की शक्ति को धीरे २ अपने पुरुषार्थ के बल पर नाश करते हुये शेष में संपूर्ण रूप से भाग्य को नाश करके अपना विजय वैजयन्ति मनन्त काल के लिये लोकाय में फैरा देता है । हम सभी उस मण्डे के नीचे प्रतिज्ञा बद्ध हुये कि जब तक उस झण्डा को प्राप्त नहीं कर सकते तब तक चीर शत्रु भाग्य के साथ युद्ध करने में पीछे नहीं हटे । "पिछे हटे नाहीं वीर

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