Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1118
________________ १०२८ ] [ भी: प्र. चिन्तामणि पक्ष भी घटित नहीं होता है । क्योंकि इस पक्ष में 'अवाच्य' ऐसे शब्द का भी प्रयोग करना नहीं बन सकता है। .: कुछ कार्य देव से होते हैं और कुछ कार्य पुरषार्थ से होते हैं, इस प्रकार पृथक पृथक् कार्यों की अपेक्षा से देव और पुरुषार्थ की मान्यता बन जायेगी, सो यह बात ठीक नहीं है। जब देव का. एकान्त पक्ष और पुरुषार्थ का एकान्त पक्ष जब परस्पर में सर्वथा विरुद्ध पड़ता है, तो इसी कारण से पृथक् पृथक् कार्यों की अपेक्षा इन दोनों बातों को (पक्षों को) स्वीकार करना स्वयं विस्तादि दोषों को प्राह्वान करते हैं। बिना पुरुषार्थ के देव लंगड़ा है और बिना देव के पुरुषार्थ पंगु है, अतः ये दोनों पक्ष सर्वथा परस्पर की निरपेक्षता में कैसे निर्दोष रूप में संभावित हो सकते हैं, क्योंकि निरपेक्ष अवस्था में इनका अस्तित्व ही नहीं बनता है । दैव पुरुषार्थ का, पुरुषाथ देव का निर्माण कर्ता है । इसी तरह इन दोनों की सर्वथा अवाच्यता स्वीकार करने पर ये प्रवाच्य हैं। इस प्रकार का निद शात्मक बंचन उसमें नहीं बन सकता । है। अन्यथा अवाच्य मानने का प्रसंग प्राप्त होता है। इसलिए इन दोनों को यदि मान्य करना है तो स्याद्वादनीति का ही अवलम्बन करना चाहिये कारण कि उसके अवलम्बन किये बिना इनका सदभाव ही सिद्ध नहीं हो सकता है। . जब अनेकान्तवादी ने एकान्त भाग्य से किम्वा एकान्त पुरुषार्थ से किम्बा पृथक् २ भाग्य एवं पुरुषार्थ से कार्य सिद्धि का निषेद्ध कर दिया तब एकान्तियों ने परास्त होकर, अपमानित भरे क्रोध से कहने लगे कि हे ! समय सुयोगवादी, लुढकपंथी, संयवादी, अनेकान्तवादी तुम महान् मुर्ख एवं स्वार्थी हो! जिस समय जिस पक्ष की जीत होती है उस समय तुम उस पक्ष का पक्ष लेते हो पराजय पक्ष को अपमानित करने से तुम पक्षपाती भी हो । वर्तमान पक्षपात छोड़कर तुम बताओ कि कार्य सिद्धि किस प्रकार होती है। सब अनेकान्तवादी अत्यन्त गंभीर एवं मधुर स्वर में कहने लगा कि सुन-- दूषयेत् प्रज्ञ एवोच्चैः स्याद्वादं नतु पण्डितः । अज्ञप्रसापे सुज्ञानां न द्वेषः करणेवं तु ॥२१७३॥ अशलन ही स्याद्वाद पर महान दोधारोपण करते हैं विज्ञ लोग नहीं, . अज्ञानियों के प्रलाप पर सुधी पुरुष रोषन कर करुणा करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह अज्ञता का कार्य है न कि उस पुरुष का । इसलिये अज्ञं करुणा के पात्र हैं । यदि

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