Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1104
________________ mi a १०१४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि का विश्वास (सम्यग्दर्शन); भाग्य से उत्पन्न पर्यायों से भिन्न अपनी शुद्ध सत्ता का यथावत् ज्ञान. सम्यग्ज्ञान एवं भाग्य कृत पर्यायों के आधीनता से मुक्ति पाकर अपने परमपुरुषाकार में स्थिर हो जाना सभ्याचारित्र है इन तीनों का समुदाय ही पुरुषार्थसिद्धयुपाय है। दसणारणारण चरित्तासि सेविदध्याणि सास लिया। तारिण पुण जारण तिरिवि ,अप्पारणं चैव णिच्छयदो ॥२१४३॥ Right belief, right knowledge and right conduct should always De pursued by a saint always. Know all these three, again, to be the sou! it self from the real standpoint, पुरुषार्थियों को (साधुओं के ) निरन्तर सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र को ही पुरुषार्थ में लाने योग्य हैं और वे तीन हैं, तो वास्तव में (निश्चय नय से) एक पुरुष (आत्मा) ही जानो। ___ "Self-reverence, self-knowlede, self contral. These three alone jead life to soureign power." सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्गः । सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र तीनों का समुदाय रूप परम पुरुषार्थ ही मोक्ष का मार्ग व उपाय है । इस प्रकार बीज अंकुर न्यायवत् अनादि के अनन्त असत् पुरुषार्थ एवं भाग्य की परंपरा को परम पुरुषार्थ रूपी अग्नि से जलाकर भस्म कर देने के कारण जिस प्रकार अनादि परंपरा से चले आऐ बीज को दाघ कर देने से फिर उस बीज से, अनन्त काल बीत जाने पर भी अंकुर नहीं हो सकता; उसी प्रकार भाग्य को दग्ध करने के बाद उस भाग्य से भाग्यांकुर (संसार) पैदा नहीं हो सकता है । दग्धे बोजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति . नांकुर । कर्म बीजे तथा दाधे न रोहति भयांकुर ॥२१४४॥ जिन पुरुष ने पुरुषार्थ के द्वारा अपना स्वाधीन राज्य प्राप्त करके अनन्त सुख के भोक्ता बने, उन महापुरुषों ने भाग्याधीन असत्पुरुषार्थी के दीनता को देखकर अत्यन्त -maritramaMareAmw n --

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