Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1112
________________ ....... ....... .- .. .. .... . .. . - ........... ... ..... . - --.... amaARINDIAGRAwarmumanA १०२२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि उपादान कारण होने से कर्ता है, इसी प्रकार व्यभिचार क्रिया में कर्त्ता वह स्त्री है और उसके निमित्त से मेरे को जो कष्ट हुना, समय नष्ट हुआ, इतना मेरा स्वसमय नष्ट करके आप लोक को प्राध्यात्मिक अनेकान्त ज्योति को प्रदान किया, इन सबका दंड उस व्यभिचारिणी स्त्री को देना चाहिए और मेरे स्वदार संतोष ब्रह्मचारी अणुव्रत में दोष लगाकर पापिनी बनी उसके लिए मेरे से प्राकरः क्षमा याचना करें एवं प्रायश्चित लेकर पाप का प्रक्षालन करें। जरा वर्तमान, देश, काल, विधान के अनुसार विचार अनेकान्त दृष्टि से करिये । उन्हीं के आंगन में रात्रि के समय में उस स्त्री की सोना और मेरा उपस्थित होना एवं स्त्रीलिंग, पुल्लिग संयोग रूपी विधान से कार्य होने से कथचित् रात्रि दो बजे का दोष कथंचित, उस प्रांगन का दोष, कंथचित उस विधान का दोष है। वस्तुतः इन लोगों को सम्मिलित होकर मेरे को बाधने का उपादान इन लोगों में था, अतः यह कार्य हुआ । इसलिए यह सब लोक का दोष है । यदि निश्चय से विचार करें तो आपको यहां वर्तमान समय में न्यायाधीश होकर समाधान करने का उपादान रहने के कारण यह सब अनर्थ हुआ। अतः आप ही दण्ड के भागी हैं । आप अपना दोष नहीं देखकर मेरे दोष की समीक्षा कर रहे हैं। सम्यग्दृष्टि का कार्य तो अपना दोष देखना, दूसरे का दोष ढंकना और यह उपगुहन अंग है । न्याया-जत्तु जदा जेरण जहा जस्स च रिणयमेख होदि तत्तु तदा । तेरा सस्स तहा हवे इदि वादो पियति बादो दो ॥२१६०।। जो जिस समय जिससे जैसे जिसके नियम से होता है, वह उस समय उससे . . . वैसे उसके ही होता है ----ऐसा नियम से सब वस्तु को मानना उसे नियतिवाद कहते हैं, जो कि एकान्त होने से मिथ्या है। तूने एकान्त नियति याद का आश्रय लेकर अपना दोष नियति के ऊपर डाला है। तू विषयान्ध होने के कारण महान्ध है इसलिए तुझको अनेकान्तमय प्रकाश में भी नहीं दिखाई दे रहा है। अन्धादयं महानन्धो विषया-धो कृतेक्षरणः ।। चक्षुणान्धो न जानाति विषयान्धो न केनचित् ॥२१६१॥ तू वीतराग · सर्वज्ञता की आड़ लेकर अपने दोष छिपा रहा है। दिनकर का जब उदय होता है, उल्लू को मालुम होता है कि वर्तमान रात्रि कर का उदय हो N AMAN

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