Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1114
________________ १०२४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि दोनों अवस्था में तन्मय होने के कारण वर्तमान तुमको दण्ड रूप में भी तन्मय होना पड़ेगा। तुमने जो निर्जीव एवं स्थानान्तरित क्रिया से रहित काल को जो दोष लगाया, वह भी तुम्हारी पूर्तता का परिचायक है। जैसे एक व्यक्ति ने अपनी शत्रुता के प्रतिशोध लेने की इच्छा से अपने शत्रु के घर को जला दिया। पकड़ा गया, तब कहता है कि मैं दोषी नहीं हूँ। आकाश दोषी है क्योंकि प्राकाश यदि अग्नि को अवकाश (जगत) नहीं देता तब अग्नि किस प्रकार उसका घर जला सकती थी ? तुम लोग पक्षपात करने से तुम लोग दण्ड के पात्र हो, क्योंकि प्राकाश बड़ा होने के कारण उसको दण्ड नहीं दे सकते हो, मैं छोटा होने के कारण मेरे को दण्ड देने का विचार कर रहे हो। ठीक है-- “सबै सहायक सबलके दुर्बल कोउ न सहाय । पवन बुझावत दीपक आग देत जलाय ।" तुम्हार कालवाद एकान्त होने से मिथ्या है। कालो सब जरणयदि कालो सवं विरणस्सदे भदं । जागत्ति हि सुत्त सुदि म सक्कदे वंचित् कालो ॥२१६५॥ काल ही सबको उत्पन्न करता है और काल ही सबका नाश करता है, सोते हुए प्राणियों में काल ही जागता है, ऐसे काल के उगने को कौन समर्थ हो सकता है ? इस प्रकार काल से ही सबको मानना यह कालवाद जो एकान्त होने से मिथ्या है। इस प्रकार तुमने दोष किया, फिर दोष को छिपाने के लिये मायाचार, असत्य अनेकान्तमयी जिनवारणी का अपवाद निर्दोषियों में दोषारोपण प्रादि अनेक गहित पाप किया एवं जिन धर्म में कलंक लगाया। तम दण्ड के भाजन हो। राजा--(अत्यन्त गंभीर एवं तेजस्वी भाषा में) अरे मूर्ख ! तू यह नहीं समझता कि अहिंसा जिसका प्रारण है, ऐसे जैनी; धर्य को लोप करने वाले को नैतिकाचार को ध्वंस करने वाले को, प्राध्यात्मिकता के परदा में शिथिलाचार को फैलाने वाले को 'might is right" को घोषणा करने वालों को दमन करके धर्म के नाम से अधर्म के प्रचार को लोप नहीं कर सकता । तू यह भी नहीं समझता कि उत्तम क्षमादि भृषरण से विभूषित जैनी कायर, दुर्बल, दीन होते हैं। तू यह भी नहीं समझता कि अनेकान्तबादी कंचित् धर्म का लोप करने वालों को सहायता भी करते हैं और कथञ्चित् दण्ड भी देते हैं। वे तुम्हारे जैसे बगुला भगत नहीं होते हैं, वह तो राज एवं गरुड (हंस) जैसे होते हैं यदि एक भी जैनी है और सारा विश्व यदि धर्म .. -- - - - - - - - ...-.-..-..----...---. -.-...-....-.--.

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