Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1115
________________ अध्याय : ग्यारहवां ] [ १०२५ के विरुद्ध उसके सम्मुख कुछ क्रिया करेंगे तो वह सारे विश्व के विरुद्ध भी पदाक्षेप लेने के लिये कभी पीछे हटेगा ही नहीं । ( सिपाहियों के प्रति ) इस धूर्त को काला मुँह करके गधे के ऊपर बैठाकर मेरे राज्य के बाहर कर दो क्योंकि यदि एक भी इस प्रकार धर्म के नाम पर धर्म का प्रचार करने वाला राज्य में रहेगा तो अनेक भोले प्राणी कुमार्गगामी हो जायेंगे एवं धर्म का नाम सुनकर जनगरण में एक घृणा की भाव पैदा हो जायेगा । अन्य क्षेत्र में ग्रधर्म करने वालों से धर्म क्षेत्र में अधर्म करने वालों का पाप अधिक होता है । अन्य क्षेत्र कृतं पाप धर्मक्षेत्रे विनश्यति । धर्मक्षेत्रे कृतं पापं वज्रलेपी भविष्यति ॥२१६६॥ जब इस प्रकार अनेकान्तमयी अमोघ अस्त्र के द्वारा परमपुरुषार्थी ने श्रनादि कालीन एक छाप भाग्य को पराजय कर ग्रपना स्वाधीन राज्य प्राप्त किया, तब एकान्ती पुरुषार्थ गर्जना करके कहता है कि आलसड्ढी freच्छाहों पलं किचि र भुजदे । eneraीराव पाणं वा पउरसेण विणा ण हि ।।२१६७११ जो आलस्य कर सहित हा उद्यन करने में उत्साह रहित हो, वह कुछ हो ७था उच भी फल नहीं भोग सकता । जैसे स्तनों का दूध पीना, बिना पुरुषार्थ के कभी नहीं बन सकता। इसी प्रकार पुरुषार्थ से एकान्ततः सब कार्य की सिद्धि होती है, ऐसा मानता पुरुषार्थवाद है जो कि एकान्त होने से मिथ्या है। क्योंकि पुरुषार्थं करते हुए भी प्रत्येक कार्य की सिद्धि नहीं देखी जाती है । पौरुषादेव सिद्धिश्चेत् पौरुषं दैवतः कथम् । पौरुषाच्चेदमोठा स्यात्सर्य प्राणिषु पौरुषम् ॥२१६८॥ अन्वय---चेत् पौरुषात् एव सिद्धिः तदा देवतः पौरुषं कथं स्यात् पौरुष सात् चेत् तहि सर्व प्राणिषु पौरुषं प्रमोघं स्यात् । यदि पुरुषार्थ से ही अर्थ की सिद्धि होती है, ऐसा माना जाय तो देव से जो पुरुषार्थ की सिद्धि होती हुई देखी जाती है, उसका निर्वाह कैसे हो सकेगा । यदि इस प्रकार समाधान किया जायेगा कि पुरुषार्थ की सिद्धि पुरुषार्थ से ही होती है, देव से नहीं, सो इस प्रकार की मान्यता में सर्व प्राणियों का पुरुषार्थं सफल ही होने का प्रसंग प्राप्त होता है । वर्तमान पुरुषार्थ भी पूर्व देव की अनुरूप होता है । 8

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