Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1101
________________ tandanandMusicine अध्याय : ग्यारहवा ] [ १०१६ साबित हो जाता है, यदि ऐसा कोई भाग्य की कृतज्ञता प्रदर्शन करने के लिए मानेगा तो "मोक्ष का कारण भूत जो पुरुषार्थ होता है। वह भी तो भाग्य कारण होता हैं" अतः परम्परा से ऐसा सम्बन्ध होने से मुक्ति भी देव के कारण है। तब तो स्याद्वाद अनेकांतवाद होने से सत्य हुआ जो कि बस्तु स्थिति है। समादिठ्ठी पुष्णं रख होई संसार कारणं णियमा। मोक्खस्स होइ है जहवि रिगयाणं ण सो कुणई ॥२१३।। द्रव्यसंग्रह। सम्यक्त्वी का (शुभ पुरुषार्थी) भाग्य का कारण नहीं होता है । यदि वह निदान (भाग्य के अधीन में रहने की इच्छा) नहीं करता है, तो वह भाग्य परम्परा से मोक्ष का हेतु होता है। कारण येनांशेन सुदृष्टि स्तनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । पेनांशेन तु राग स्तेनाशे नास्य बन्धनं भवति ।।२१३६।। जितने अंश में सम्यक्त्वपना (पुरुषार्थ) है, उतने अंश में भाग्य की पराधीनता (बन्धन) नहीं है और जितने अंश में मिथ्यात्व (असत् पुरुषार्थ) है, उतने अंश में भाग्याधीन (बन्धन) है। शुभाशुभे पुण्यपापे, सुखे दुःखे च षट् त्रयम् । हितमाद्य मनुष्यंटेयं शेषत्रम् माहितम् ॥२१३७॥ तत्राप्यय परिस्याज्यं शेषौ न स्त: स्वतः स्वम् । शुभं च शुद्ध त्यक्त्वान्तते प्राप्नोति परमं पदम् ।।२१३८॥ शुभ और अशुभ, पुण्य और पाप तथा सुख और दुःख में से आत्मा के लिए हितकारक होने से आदि के तीन शुभ, पुण्य एवं सुख आचरण के योग्य हैं। शेष तीन-~अशुभ, पाप और दुःख-अहित कारक होने से छोड़ने के योग्य हैं । शुभ, पण्य और सुख में से शुभ पुरुषार्थ का परित्याग करना चाहिए। तब शुभ पुरुषार्थ से उत्पन्न होने वाला पुण्य सुभान्य एवं उसका कार्य सुख (सांसारिक सुख) ये दोनों स्वयं ही नहीं रहेंगे । इस प्रकार शुभ पुरुषार्थ को त्याग करके परम पुरुषार्थ में रमण करने से अन्त में पुरुष अपना पुरुषार्थ सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। भाग्य परम्परा से मोक्ष का कारण होने से व्यवहार से (एक दष्टि से) मोक्ष का कारण माना जाता है, किन्तु एकान्ततः भाग्य ही मोक्ष का कारण मानने

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