Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1091
________________ अध्याय : दसवां ] [ १००१ व्याकुलता रहित का है । सुख का इसलिये यह मालूम होता है सुख नाम मूल निर्व्याकुलपना है वह froriकुल अवस्था श्रात्मा में ही है । विषय सेवन में नहीं भोजनादि जिव्हा इन्द्रिय का विषय भी उस समय नहीं है। स्त्री सेवनादि स्पर्श का विषय नहीं है । और गंध माल्यादिक नाक का भी विषय भी नहीं है। दिव्य स्त्रियों का रूप अवलोकनादि नेत्र का भी विषय नहीं है । और कानों का मनोज्ञ गीत वादित्रादि शब्द विषय भी नहीं है । इसलिये जानते हैं कि सुख आत्मा में ही है । ऐसा तू निश्चय कर, जो एकोदेश विषय व्यापार से रहित है । उनके एकदेश स्थिरता का सुख है । तो वीतराग निवकल्प स्वसंवेदन ज्ञानियों के समस्त पंचइन्द्रियों के विषय और मन के विकल्प जालों की रूकावट होने पर विशेषता से निर्व्याकुल सुख उपजता है । इसलिये ये दो बातें तो प्रत्यक्ष ही दृष्टि गत हैं। जो पुरुष निरोग और चिंता रहित है । उनके विषय सामग्री के बिना ही सुख शासता है और जो महा मुनि शुद्धोपयोग अवस्था में ध्यानारूद हैं उनके निर्व्याकुलता प्रगट ही दीख रही है । वे इन्द्रादिक देवों से भी अधिक सुखी हैं । इस कारण जब संसार अवस्था में ही सुख का मूल निर्व्याकुलता दीखती है । तो सिद्धों के सुख की बात ही क्या है ? यद्यपि वे सिद्ध दृष्टिगोचर नहीं हैं, तो भी अनुमान कर ऐसा जाना जाता है कि सिद्धों के भावकर्म, द्रव्यकर्म, तो कर्म नहीं तथा विषयों की प्रवृत्ति नहीं है, कोई भी द्रिय आत्मीक सुख ही है ! वही सुख उपादेय है चारों गतियों की पर्याये हैं उनमें कदापि सुख नहीं है। सुख तो सिद्धों के है या महामुनीश्वरों के सुख का लेश मात्र देखा जाता है । दूसरे के जगत की विषय वासनाओं में सुख नहीं है - ऐसा ही कथन श्री प्रवचनसार में किया है । "अइसय" इत्यादि । सारांश यह है कि जो शुद्धोपयोगकर प्रसिद्ध ऐसे श्री सिद्ध परमेष्ठि हैं, उनके ग्रतीन्द्रि सुख है, वह सर्वोत्कृष्ट है और ग्रात्मजनित है तथा विषय-वासना से रहित हैं अनुपम है जिसके समान सुख तीन लोक में भी नहीं है, जिसका पर नहीं ऐसा बाधा रहित सुख सिद्धों के है । विकल्प जाल नहीं हैं, केवल प्रतीअन्य सुख सब दुःखरूप ही हैं जो आ. योगीन्दु देव परमात्म प्रकाश श्रध्याय २, गा. ६-७-६ .

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