Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1088
________________ ६६८ ] [गो. प्र. चिन्तामणि जो मोक्ष में अधिक गुणों का समूह नहीं होता तो मोक्ष को तीन लोक अपने मस्तक पर क्यों रखता? अणु जइ जगह दि अहिययरू गुण-गणु तासु ण होह। . सो तहलोउ वि कि धरइ रिणय-सिर उपरि सोइ ॥२१२२॥ . आगे बतलाते हैं---जो मोक्ष में अधिक मुरणों का समूह नहीं होता, तो मोक्ष को तीन लोक अपने मस्तक पर क्यों रखता ? 'अन्य' फिर 'यदि' जो "जगत अधि" । सब लोक से भी 'अधिकतरः' बहुत ज्यादा 'गुणगणा:' गुणों का समूह 'तस्य' उस मोक्ष में न भवति' नहीं होता ततः' तो 'त्रिलोकः अपि' तीनों ही लोक 'निजशिरसि' अपने मस्तक के 'उपरि' ऊपर तमेव' उसी मोक्ष को कि धरति' क्यों रखते ? भावार्थ :--मोक्ष लोक के शिखर 'अग्रभाग' पर है, सो सब लोकों से मोक्ष में बहुत ज्यादा गुण हैं, इसीलिए उसको लोक अपने सिर पर रखता है, कोई किसी को अपने सिर पर रखता है, वह अपने से अधिक गुणवाला जानकर ही रखता है। यदि क्षायिक-सम्यक्त्व केवल दर्शनादि अनंत गुण मोक्ष में न होते, तो मोक्ष सबके सिर पर न होता, मोक्ष के ऊपर अन्य कोई स्थान नहीं है। सबके ऊपर मोक्ष ही है और मोक्ष के आगे अनंत अलोक है । वह शून्य है, वहां कोई स्थान नहीं है । वह अनंत अलोक भी सिद्धों के ज्ञान में भास रहा है। यहां पर मोक्ष में अनंत गुणों को स्थापन करने से मिथ्यादृष्टियों का खंडन किया । कोई मिथ्यादृष्टि वैशेषिकादि ऐसा कहते हैं कि जो बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार इन नव गुणों के अभाव रूप मोक्ष है ! उनका निषेध किया? क्योंकि इन्द्रियजनित बुद्धि का तो अभाव है । परन्तु केवल बुद्धि अर्थात् केवलझान का प्रभाव नहीं है। इन्द्रियों से उत्पन्न सुख का अभाव है। लेकिन अतीन्द्रिय सुख की पूर्णता है। दुःख इच्छा द्वेष यत्न इन विभाव रूप गुणों का तो अभाव ही है। केवल रूप परिणमन है । व्यवहार-धर्म का अभाव ही है और वस्तु का स्वभाव रूप धर्म वह ही है ! अधर्म का तो अभाव ठीक ही है और पर द्रव्यरूप-संस्कार सर्वथा नहीं है । स्वभाव संस्कार ही हैं। जो मढ़ इन गुरणों का प्रभाव मानते हैं। वे वृथा बकते हैं ! मोक्ष तो अनंत मुरारूप हैं । इस तरह निर्मुरावादियों का निषेध किया तथा बौद्धमति जीव के अभाव को मोक्ष कहते हैं । ये मोक्ष ऐसा मानते हैं. कि जैसे दीपक का निर्माण (बुझना) उसी तरह, जीव का अभाव वही मोक्ष है। ऐसी बौद्ध की श्रद्धा का भी तिरस्कार किया, क्योंकि जो जीव का ही प्रभाव हो गया तो मोक्ष किसको हुना ? जीव का शुद्ध होना वह मोक्ष है। ::TATTI

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