Book Title: Gommat Prashnottar Chintamani
Author(s): Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
Publisher: Digambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti

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Page 1084
________________ ९९४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि ध्यान में रखकर माक्रान्त एकांतवादी को न्याय का सही रास्ता बताये। यही न्याय निश्चयनय और व्यवहार नय पक्ष को विस्मरण करने वाले एकान्तवादी चिन्तक के विषय में लगाना चाहिये । एकान्तवादी सत्य को विकृत करता है । स्याद्वादवादी सत्य के सच्चे सौन्दर्य को प्रकाशित करता है। इसलिये समन्वय पथ ही न्याय मार्ग है । एकान्त पथ सत्य पद का विनाशक है; मिथ्यात्व है तथा संसार सागर में जीव को डुबाने वाला है । यह काल कूट विष से भी भयंकर है ।। स्याद्वाद चक्र, पं. सु. दि. जो जीव अपने को सम्यग्दृष्टि मान कर अहंकार करते हैं और अपने को निरबंध मानते हैं, सो क्या ठीक है ? सम्यग्दृष्टिः स्वयमवमहं आतु बंधो न मे स्या। वित्युत्तानोत्पुलक वदना रागिरणोप्याचरंतु ।। प्रालंबता समिति परतां ते यतोऽद्यापि पापा । प्रात्मानात्माव गम विरहात्संति सम्यक्त्वरिक्ता ।।२१२१।।. ___ जो पर द्रव्य में राग द्वेष मोह से संयुक्त हैं और अपने को ऐसा मानते हैं कि मैं सम्यग्दृष्टि के बंध होना नहीं कहा है। ऐसा मानकर जिनका मुख गर्व सहित ऊँचा हुआ है । तथा हर्ष सहित रोमांच रूप हुआ है, वे जीव महाव्रतादि प्राचरण करे तथा वचन विहार पाहार की क्रिया में यत्न से प्रवर्तने की उत्कृष्टता को भी अब अवलम्बन करे तो भी पापी मिथ्याष्टि ही हैं, क्योंकि प्रात्मा और अमात्मा के ज्ञान से रहित हैं, इसलिये सम्यक्त्य से शून्य हैं। - जो अपने को सम्यादृष्टि माने और परद्रव्य से राग करे तो उसके सम्यक्त्व कैसा? - व्रतसमिति पालें तो भी आप पर के ज्ञान के बिना पापी ही हैं, तथा अपने बंध नहीं होना मानकर स्वच्छंद प्रवलें तो कैसा सम्यग्दृष्टि ? क्योंकि चारित्र मोह के राग से जब तक यथास्यात चारित्र न हो तब तक बंध तो होता ही है । जब तक राग रहता है, तब तक सम्यग्दृष्टि अपनी निदा (गर्हा) करता ही रहता है, ज्ञान होने मात्र से तो बंध से छूटता नहीं, ज्ञान होने के बाद उसी में लीन रूप शुद्धोपयोग रूप चरित्र से बंधन कटता है । इसलिए राग होने पर बंध का न होना मानकर स्वच्छंद

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