Book Title: Avashyak Sutra Niryukterev Churni Part 01
Author(s): Manvijay
Publisher: Devchandra Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund

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Page 429
________________ आवश्यक नियुक्तेरवचूर्णिः 421 // अव्याबाधां // 979-980 // नमस्कारसुरगणसुहं समत्तं सव्वद्धवापिंडिअं अणंतगुणं / न य पावइ मुत्तिसुहंऽणताहि वि वग्गवग्गूहिं // 981 // नियुक्तिः समस्तं अतीतानागतवर्तमानकालोद्भवं, पुनश्च सर्वाद्धापिण्डितं सर्वकालसमयगुणितं, तथा अनन्तगुणं, तदेवंप्रमाणं नि० गा. असत्कल्पनया एकैकाकाशप्रदेशे स्थाप्यते, एवं सकललोकालोकाकाशानन्तप्रदेशपूरणेनानन्तं स्यात् , न च प्राप्नोति तथा- 981-985 प्रकर्षगतमपि मुक्तिसुखमनन्तैरपि वर्गवगैर्वर्गितं // 981 // तथा चाह सिद्धस्स सुहो रासी सव्वद्वापिंडिओ जइ हविज / सोऽणंतवग्गभइओ सव्वागासे न माइजा // 982 // सुखराशिः सर्वाद्धापिण्डितो यदि स्यात् , अनेन कल्पनोक्का, अनन्तवर्गापवर्गितः सन् समीभूत एव सर्वाकाशे न मायात् , अयमर्थः-यत आरभ्य शिष्टानां सुखशब्दप्रवृत्तिस्तमाबादमवधीकृत्य एकैकगुणवृद्ध्या तावदसावाहादो विशेष्यते यावदनन्तगुणवृद्ध्या निरतिशयगुणनिष्ठां गतः, ततश्चासौ चरमाबाद एव सिद्धानां, तस्माच्चारतःप्रथमाच्चोर्द्धमपान्तरालवर्तिनो ये गुणा आहादविशेषास्ते सर्वाकाशप्रदेशादिभ्यो भूयांसः // 982 // जह नाम कोइ मिच्छो नगरगुणे बहुविहे विआणंतो। न चएइ परिकहेउं उवमाइ तहिं असंतीए // 983 // // 421 // इअ सिद्धाणं सुक्खं अणोवमं नत्थि तस्स ओवम्म। किंचि विसेसेणित्तो सारिक्खमिणं सुणह वुच्छ॥९८४॥ell तथापि किञ्चिद्विशेषेण 'एत्तो' त्ति अस्य सादृश्यमिदं वक्ष्यमाणं // 983-984 // जह सव्वकामगुणिअं पुरिसो भोत्तूण भोअणं कोइ / तण्हाळुहाविमुक्को अच्छिन्न जहा अमिअतित्तो॥९८५॥ मा०चू०३६

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