Book Title: Avashyak Sutra Niryukterev Churni Part 01
Author(s): Manvijay
Publisher: Devchandra Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund
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________________ आवश्यकनिर्युक्तेरव नमस्कारनियुक्तिः नि० न. 973-980 चूर्णिः ||420 // एगा य होइ रयणी अट्टेव य अंगुलाई साहीआ। एसा खलु सिद्धाणं जहन्नओगाहणा भणिआ॥ 973 // ओगाहणाइ सिद्धा भवत्तिभागेण हुंति परिहीणा / संठाणमणित्यत्थं जरामरणविप्पमुक्काणं // 974 // अनित्थंस्थ-केनचित्प्रकारेण लौकिकेनास्थितं // 974 // जत्थ य एगो सिद्धो तत्थ अणंता भवक्खयविमुक्का / अन्नुन्नसमोगाढा पुट्ठा सव्वे अ लोगंते // 975 // फुसइ अणंते सिद्धे सव्वपएसेहि निअमसो सिद्धो / तेऽवि असंखिजगुणा देसपएसेहिं जे पुट्ठा // 976 / / / तेऽप्यसङ्ख्येयगुणा वर्तन्ते देशप्रदेशैर्ये स्पृष्टाः सर्वप्रदेशस्पृष्टेभ्यः, कथं?-सर्वात्मप्रदेशैरनन्ताः स्पृष्टास्तथा एकैकेन प्रदेशेनाप्यनन्ता एव, स चाऽसङ्ख्येयप्रदेशात्मकः // 975-976 // असरीरा जीवघणा उवउत्ता सणे अ नाणे अ / सागारमणागारं लक्खणमेअंतु सिद्धाणं // 977 // जीवाश्च ते घनाश्च जीवघनाः, ततश्च साकारानाकारं सामान्यविशेषरूपं लक्षणं स्वरूपमेतत् // 977 // केवलनाणुवउत्ता जाणंती सव्वभावगुणभावे / पासंति सव्वओ खलु केवलदिट्ठीहिऽणंनाहिं // 978 // सर्वभावगुणभावान्-सर्वपदार्थगुणपर्यायान, तत्र सहवर्त्तिनो गुणाः क्रमवर्तिनश्च पर्यायाः, आदौ ज्ञानग्रहणं प्रथमतया तदुपयोगस्थाः सिद्ध्यन्तीति ज्ञापनार्थ // 978 // नाणंमि दंसगंमि अ इत्तो एगयरयंमि उवउत्ता / सव्वस्स केवलिस्सा जुगवं दो नत्थि उवओगा // 972 // नवि अस्थि माणुसाणं तं सुक्खं नेव सव्वदेवाणं / जं सिद्धाणं सुक्खं अव्वाबाहं उवगयाणं // 28 // // 420 //

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