Book Title: Agam 17 Upang 06 Chandra Pragnapti Sutra Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 677
________________ चन्द्रप्रक्षप्तिसूत्रे गहगणाय ॥१॥ णक्खत्त तारगाणं, अवष्ठिया मंडला मुणेयव्वा । तेऽविय पयाहिण वत्तमेव मेरु अणु चरति ॥१९॥ रयणियरदिणयराण, उड्दच अहेय संकमो नत्थि । मंडलसंकमणं पुण, सभितर बाहिरंतिरिप ॥२०॥ रयणियरदिणयराण णक्खत्ताणं मह ग्गहाण च, चारविसेसेण भवे, सुहदुक्ख विही मणुस्साणं ॥२१॥ तेसिं पविसंताणं तावक्खेत्त त वडढए णिययं । तेणेव कमेण पूणो, परिहायइ निक्खम ताण ॥२२॥ तेसिं कलंबुया पुप्फसंठिया हुंति तावक्खेत्त पहा अंतो य संकुडा बाहिं वित्थडा चंदसुराणं ॥२३॥ केणं वडूढइ चंदो, परिहाणो केण होइ चंदस्स । कालो वा जोण्हो वा, केणणुभावेण चंदस्त ! ॥२४॥ किण्हं राहुविमाणं निच्च च देण होइ अविरहिय, च उरंगुलमसंपत्त, हिच्चा चदस्स तं चरइ ॥२५॥ बावठिं बावठिं दिवसे दिवसे उ सुक्कपक्खस्स । जं परिवडूढइ चंदो खवेइ तं चेव कालेण ॥२६॥ पण्णरसहभागेण य, चंदं पण्णरसमेव तं बरइ पण्णर सभागेणय पुणो वि तं चेव वक्कमइ ॥२७॥ एवं वड्ढइ चंदो परिहाणी एव होइ चंदस्स कालो जुण्हो वा, एवणुभावेण चंदस्स ॥२८॥ अंते मणुस्स खेत्ते हवंति चारोवगा उ उववण्णा । पंचविहा जोइसिया, चंदा सूरा गहगणाय ॥२९॥ तेण परं जे सेसा, चंदाइच्च गह तारणक्खत्ता'। नत्थि गईणवि चारो, अवट्टिया ते मुणेयव्वा ॥३०॥ एवं जंबुद्दीवे, दुगुणा लवणे चउग्गुणा होंति लवणा य ति गुणिया, ससिसूरा धायई संडे ॥३१॥ दो चंदा इह दीवे, वत्तारि य सायरे लवण तोए । धायइसंडे दीवे बारस चंदा य सूरा य ॥३२। धायइसंडप्पभिइसु, उर्दिट्टा तिगुणिया भवे चंदा । आइल्ल चंदा सहिया, अणंतराणंतरे खेत्ते ॥३३॥ रिक्खग्गह तारग्गं, दीवसमुहे जइच्छसिणा उ। तस्ल सीहिं तग्गुणियं, रिक्तगह तारग्गं त ॥३४॥ बहिया उमाणुसनगरस चंद सूराण वद्रिया जोण्हा। चंदा अभिई जुत्ता, सरा पुण हुँति पुस्सेहिं ॥३५॥ चंदाओ सूरस्स य, सूरा चंदस्स अंतरं होइ । पण्णास सहस्साई तु जोयणाणं अणूणाई ॥३६॥ सूरस्स य सूरस्स य ससिणो य अंतरं होइ । बाहिं तु माणुसनगस्स जोयणाणं सयसहस्सं ॥३७॥ सूरंतरिया चंदा, चंदंतरिया य दिणयरा दित्ता । चितरलेसागा, सुहलेसा मंदलेसा य ॥३८।। अट्टासीईच गहा, अट्ठावीसं च हुंति नक्खत्ता । एगसलो परिवारो, एतो ताराण वोच्छामि ॥३९॥ छावटि सहस्साई णवचेव सयाइं पंच सतराई । एगससी परिवारो तारागण कोडि कोडीण ॥३०॥ सू०१॥ (जम्बूद्वीपा दारभ्य पुष्कराई द्वीप पर्यन्त ज्यौतिश्चक्रप्रतिपादकं प्रथमसूत्र मूलम् ॥) छाया-तावत् कति खलु चन्द्र सूर्याः सर्वलोके अवभासयन्ति उद्योतयन्ति, तापयन्ति, प्रभासयन्ति ? आख्यातमिती वदेत् । तत्र खलु इमा द्वादश प्रतिपत्तयः प्रसप्ता, तत्रैके एवमाहुः तावत् एकश्चन्द्रः एक सूर्यः सर्वलोकम् अवभासते १ उद्योतयति २, तापयति ३. प्रभासयति ४, एके एवमाहुः ॥१॥ एके पुनरेव माहुः-तावत् त्रयश्चन्द्राः त्रयः सूर्याः सर्वलोके अवभासन्ते ४, एके एवमाहुः ॥२॥ एके पुनरेव माहुः-तावत् अर्द्धचतुर्थाश्चन्द्राः अर्द्धचतुर्थाः सूर्याः सर्वलोकं अवमा पन्ते ४, एके एवमाहुः ।। एवम् एतेन अभिलापेन यथा तृतीये प्राभृते द्वीपसमुद्राणां द्वादश प्रतिप्रत्तयस्ता एव इहापि चन्द्रसूर्याणां ज्ञातव्याः यावत् द्वासप्ततं चन्द्रसहस्र द्वासप्ततं सूर्यसहस्र सर्वलोकम् अवभासन्ते ४ सप्त चन्द्राः सप्त सूर्याः ।। दश चन्द्राः दश सूर्याः ५ द्वादश चन्द्रा द्वादश सूर्याः ।६। द्विचत्वारिंश चन्द्राः द्विवत्वारिंशत् सूर्याः ॥७॥ द्वासप्ततिश्चन्द्राः द्वासप्तति सूर्या ॥८॥ द्वि चत्वारिंशत्क

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