Book Title: Shrutsagar 2017 05 Volume 04 Issue 01
Author(s): Hiren K Doshi
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir RNI:GUJMUL/2014/66126 ISSN 2454-3705 श्रुतसागर | श्रुतसागर SHRUTSAGAR (MONTHLY) Jun-2017, Volume : 04, Issue : 01, Annual Subscription Rs. 150/- Price Per copy Rs. 15/EDITOR: Hiren Kishorbhai Doshi BOOK-POST / PRINTED MATTER मर्यानिनमःसिंहाअाईकलूपगनजी प्रभाकरवगयङवजफनाटकमडटरगतयदक्षन यफबजमाटारलवायसहलंदशकरकम्गम्घ डाकृष्ण कखगघुराइ क्रमप्यमणकलाव जदष्टवकरचस्तितप्तश्नरलेशहादालिंकालीक केकाकिककिकूकेकैकाकाकका१२३४५६७ २०॥मितियास्वनदावलिजितररदेवावद सम्राट संप्रति संग्रहालय, कोबा स्थित कक्कापाटी का चित्र आचार्य श्री कैलाससागसूरि ज्ञानमंदिर For Private and Personal Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir सूर्यतिलक महोत्सव HLOD आचार्य श्री कैलाससागरसूरीश्वरजी म.सा. के अग्निसंस्कार की स्मृति में प्रति वर्ष 22 मई को मूलनायक भगवान महावीर स्वामी के ललाट पर होने वाला सूर्य तिलक. जिनालय में सूर्यतिलक का दर्शन करते साधुसाध्वी भगवन्त व श्रद्धालु भक्त. 22 मई को सूर्यतिलक का दर्शन करने हेतु पधारे श्रद्धालु भक्त. For Private and Personal Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir RNI : GUJMUL/2014/66126 ISSN 2454-3705 (आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का मुखपत्र श्रुतसागर श्रुतसागर SHRUTSAGAR (Monthly) वर्ष-४, अंक-१, कुल अंक-३७, जून-२०१७ Year-4, Issue-1, Total Issue-37, June-2017 वार्षिक सदस्यता शुल्क-रु. १५०/- * Yearly Subscription - Rs.150/अंक शुल्क - रु. १५/- ** Price per copy Rs. 15/ आशीर्वाद राष्ट्रसंत प. पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. * संपादक * * सह संपादक * *संपादन सहयोगी * हिरेन किशोरभाई दोशी रामप्रकाश झा भाविन के. पण्ड्या एवं ज्ञानमंदिर परिवार १५ जून, २०१७, वि. सं. २०७३, जेष्ठ कृष्ण-६ आराधन वीर जैन a महावी केन्द्र. सया . 4 - अमृतं तु विद्या সুকাকু आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर (जैन व प्राच्यविद्या शोध-संस्थान एवं ग्रन्थालय) श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर-३८२००७ फोन नं. (079) 23276204, 205, 252 फैक्स : (079) 23276249, वॉट्स-एप 7575001081 Website : www.kobatirth.org Email : [email protected] For Private and Personal Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra 1. संपादकीय 2. कक्कावलि 3. Beyond Doubt 4. रूपपुर पार्श्वजिनेश्वर स्तवन 5. बारव्रत सज्झाय 6. ऋषभपंचाशिका 7. गुरुपरंपरा 8. प्रकाश्यमान www.kobatirth.org अनुक्रम रामप्रकाश झा आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी Acharya Padmasagarsuri गणि सुयशचंद्रविजयजी श्रीमती डिम्पल निरव शाह किरीट के. शाह मुनि श्री न्यायविजयजी Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir * प्राप्तिस्थान आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर तीन बंगला, टोलकनगर, होटल हेरीटेज़ की गली में डॉ. प्रणव नाणावटी क्लीनिक के पास, , पालडी अहमदाबाद - ३८०००७, फोन नं. (०७९) २६५८२३५५ सौजन्य स्व. श्री पारसमलजी गोलिया व स्व. श्रीमती सुरजकँवर पारसमल गोलिया की पुण्य स्मृति में हस्ते : चाँदमल गोलिया परिवार की ओर से बीकानेर - मुम्बई KUSAM-MECO For Private and Personal Use Only R 3 8 2 2 2 2 13 25 27 32 Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir संपादकीय रामप्रकाश झा श्रुतसागर का यह नवीन अंक आपके करकमलों में सादर समर्पित करते हुए अपार प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। प्रस्तुत अंक में गुरुवाणी शीर्षक के अन्तर्गत योगनिष्ठ आचार्यदेव श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म. सा. का कृति “कक्कावलि” के 'क' से 'न' तक के अक्षरों की गाथा प्रकाशित की जा रही है। इस कृति में वर्णमाला के अक्षरों के अनुसार मानव-जीवन के कल्याण हेतु सार्थक उपदेश दिए गए हैं, द्वितीय लेख राष्ट्रसंत आचार्य भगवंत श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. के प्रवचनांशों की पुस्तक 'Beyond Doubt' से क्रमबद्ध श्रेणी के अंतर्गत संकलित किया गया है। अप्रकाशित कृति प्रकाशन स्तंभ के अन्तर्गत इस अंक में दो कृतियों का प्रकाशन किया जा रहा है। प्रथम कृति गणिवर्य श्री सुयशचन्द्रविजयजी म. सा. द्वारा संपादित "रूपपुर पार्श्वजिनेश्वर स्तवन” है, जो अद्यावधि सम्भवतः अप्रकाशित है। इस कृति के कुल चार ढालों में पार्श्वनाथ प्रभु के जन्म से विवाह तक के वृत्तान्त का संक्षेप में वर्णन किया गया है, साथ ही रूपपुर नगर से संबंधी ऐतिहासिक वर्णन किया गया है। द्वितीय कृति शहरशाखा, पालडी में कार्यरत श्रीमती डिम्पलबेन शाह के द्वारा सम्पादित मुनि सुखविजय के द्वारा वि.सं. १७६६ में रचित “बारव्रत सज्झाय” है, जो कि संभवतः अप्रकाशित है। इस कृति में सम्यक्त्वमूल बारह व्रतों का विस्तृत वर्णन करने के बाद कर्ता ने संक्षेप में पन्द्रह कर्मादान का भी वर्णन किया है। यह कृति सभी जैन श्रावकों हेतु अत्यन्त उपयोगी व उपदेशप्रद सिद्ध होगी। अन्य विशिष्ट प्रकाशनस्तंभ के अंतर्गत इस अंक में कवि धनपालरचित "ऋषभपंचाशिका” के अन्तिम भाग गाथा ४० से ५० तक का प्रकाशन ब्राह्मीलिपि में किया जा रहा है। इस कृति का लिप्यंतरण कार्य श्री किरीटभाई के. शाह द्वारा किया गया है। पुनःप्रकाशन श्रेणी के अन्तर्गत इस अंक में श्रमण भगवान महावीर स्वामी के बाद के एक हजार वर्ष की गुरु परम्परा प्रकाशित की जा रही है, जिसमें आर्य सुधर्मा स्वामी, जंबूस्वामी, प्रभवस्वामी तथा शय्यंभवसूरि का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत अंक में प. पू. आचार्य श्री विजयमुनिचन्द्रसूरिजी म. सा. से प्राप्त वर्तमान में संशोधन-सम्पादन के क्षेत्र में प. पू. साधु-साध्वीजी भगवन्तों के द्वारा किए जा रहे कार्यों की सूचनाएँ प्रकाशित की जा रही हैं, जिससे विद्वद्वर्ग को जैन ग्रन्थों के ऊपर किये जा रहे कार्यों के विषय में जानकारी प्राप्त होगी. आशा है, इस अंक में संकलित सामग्रियों के द्वारा हमारे वाचक लाभान्वित होंगे व अपने महत्त्वपूर्ण सुझावों से अवगत कराने की कृपा करेंगे, जिससे अगले अंक को और भी परिष्कृत किया जा सके। For Private and Personal Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir कक्कावलि आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी कपटी कपटी शं कहो छो, कपट न जाणे कोय; कर्मनी साथे कपट करो तो, साचा कपटी सोय; सुणजो वात हमारी लोक, शाने मनमां फूलो फोक ? ॥१॥ खाखी खाखी शुं कहो छो, सहुनी थाशे खाख; साचा खाखी अंतरना जे, जाणे माया राख. सुणजो०॥२॥ गांडो गांडो शुं कहो छो, गांडा सहु कहेवाय; भेद छेद आतमना ज्ञाने, समजु तेह गणाय. सुणजो०॥३॥ घारी घारी शुं कहो छो, घारी समता लेख; समता स्वादे सुखिया संतो, अंतरमां ते पेख. सुणजो०॥४॥ चाकर चाकर शुं कहो छो, चाकर नर ने नार; करे चाकरी परमातमनी, साचो चाकर धार. सुणजो०॥५॥ छानु छानु शुं कहो छो, छा सत्य न क्यांय मायाथी छानो छे आतम, शाने मन हरखाय. सुणजो० ॥६॥ जाति जाति शुं कहो छो, जात न भात न कोय; जन्मीने जन्मे नहीं जे जन, जाति तेनी जोय. सुणजो० ॥७॥ झाझ झाझ एम शुं कहो छो, साचुं नहीं छे झाझ; देह झाझ परगट पेखो आ, पामो शिवपुर राज. सुणजो० ॥८॥ टेंटें टेंटें शुं करो छो, टळवळता सहु जाय; स्थिरता आतममां जेनी छे, टेंटे तस नहि थाय. सुणजो०॥९॥ ठोठ ठोठ एम शुं कहो छो, सहुने ए छे छाप; अंतरमा परमातम परखे, नहि ते ठोठ अपाप. सुणजो०॥१०॥ डाह्या डाह्या शुं कहो छो, डाह्या गांडा सर्व; निर्लेपी निर्मोही डाह्या, कदि न करता गर्व. सुणजो०॥११॥ ढढ्ढो ढढ्ढो शुं कहो छो, सहु ढढ्ढा शिरदार; भूल्या मोह मायामां जे जन, साचा ढढ्ढा धार. सुणजो०॥१२॥ For Private and Personal Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org SHRUTSAGAR 5 ढोल ढोल एम शुं कहो छो, सहु छे फूट्या ढोल; ढम ढम वागी ढोल कहे छे, सहुनी वर्ते पोल. अभिमानना तोरे फूले, छे ते साचा ढोल; जेना दिलमां वात न टकती, बोले निंदा बोल. ढम ढम वागी ढोल कहे छे, अंतर दृष्टि खोल; ढोल पोलना जेवी दुनिया, करजे तेनो तोल. ढुंढी ढुंढी ढुंढो सघळं, ढूंढवुं होय ते ढूंढ; अंधारे अजवाळं घेर्युं, ए अंतरनुं गूढ. तारूं तारूं शुं करे छे, फोगट ले 'अवतार; नहि छे तारूं चेतन चेतो, पोताने तुं तार. स्थावर स्थावर शुं कहे छे, जगमां तुं छे स्थिर; स्थिरता सेवो साची समजी, पामो भवजल तीर. दाता दाता शुं कहो छो, दाता जगना दास; दान करे अंतरना गुणनुं, छोडी सघळी आश.. धर्मी धर्मी शुं कहो छो, धर्मी सहु कहेवाय; वस्तु स्वभावे आतमधर्मे, विरला समजे भाय. नागो नागो शुं कहो छो, नागा जन्मे सर्व; नागो नुगरा जनने सेवे, करतो दिलमां गर्व. नफ्फट नफ्फट शुं कहो छो, नफ्फटनो नहीं पार; समजी धर्मने पाप करे ते, साचो नफ्फट धार. निर्मल निर्मल शुं कहो छो, निर्मल कोई कहेवाय; कूड कपटथी न्यारो वर्ते, सुमति संग सदाय. न्यायी न्यायी शुं कहो छो, न्यायीमां अन्याय; परमात्माने प्रेमे परखे, भेददृष्टिथी न्याय. नीच नीच तुं शुं कहे छे, नीचा संत सदाय, जुओ ताड छे ऊंचां केवां, पर्वत जो पेखाय. For Private and Personal Use Only Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir June 2017 सुणजो० ||१३|| सुणजो०॥१४॥ सुणजो०॥१५॥ जो० ||१६|| सुणजो०॥१७॥ सुणजो० ॥१८॥ जो० ||१९|| O सुणजो० ||२०|| सुणजो० ||२१|| सुणजो० ||२२|| सुणजो०॥२३॥ सुणजो०॥२४॥ सुणजो०॥२५॥ (वधु आवता अंके) Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Beyond Doubt (Continue...) Acharya Padmasagarsuri Dust, particles stick to the person who applies oil on his body and sits in the open air. In the same way righteousness and sin are like the dust particles that stick to the soul in the form of Karma. One who is free from attachment and aversion need not fear the bondage of Karma because Karma does not bind one who is free from them. All the evil Karmas may be destroyed, but if the meritorious deeds remain to be destroyed, the person has to take birth in heaven to experience the fruit of righteousness. Therefore it is false to think that it is precise to believe in Papa tattva alone.” Thus Achalabhratha got his doubt cleared and submitted himself to the Lord along with his group of students. After being imparted with the knowledge of tripadi, the ninth Gandhara Achalabhratha too constructed the Dvadashanga. “अर्थ परभवसन्दिग्धमेतार्थं नाम पण्डितप्रवरम्, ऊचे विभर्यथार्थम वेदार्थ किंन भावयसि?" The great scholar Metarya followed Achalabhratha to the Samavasarana along with his 300 disciples. The Lord told him that until he interpreted the Vedas correctly, he will not be able to grasp the right meaning and his doubt shall remain un-cleared. The Lord said, “Oh Metarya, Reincarnation i.e. rebirth is a reality or not, this is your doubt and the basis for it is the following Vedic verse. “विज्ञान धन ऐवैतेभ्यो Ha22: Her arrang fasierufà, TACH HŞIlfti” i.e. the soul comes into existence when the Panchamahabhutas constitute together and after death, it dissolves into the elements. Therefore there is no existence of any kind of life after death. But the exact meaning of the verse is that the modification of knowledge inherent in the soul undergoes change based on the objects of cognition. The Vedic verse does not deny rebirth and another world. By inference one is to know the truth. “अस्ति परलोकः इहलोकस्य अन्यथानुपपत्तेः” Rebirth is a truth. If it were not so, then the present birth also would have been non-existent. Since the present birth is a reality, the previous births are also a reality. Just as you exist today, your forefa For Private and Personal Use Only Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org SHRUTSAGAR 7 June-2017 thers and ancestors also had existed. A new born baby is not taught how to suck milk. Such activity is a result of the impressions of the previous births. There are so many dissimilarities in all the worldly beings and there has to be a reason for all these differences. Without accepting the rebirth theory, one cannot understand the cause for all these variations in all creatures. The accumulated Karmas (meritorious and evil) of the previous births is the cause of all inequality. If previous birth exists, then naturally rebirth also exists where the Jivatman1 experiences the Karmas accumulated in this birth. Thus innumerable births of the past and the following births of each birth is proved and the theory of rebirth is established." Thus the Lord clarified the doubt of rebirth which Metarya Swami had and established him as the tenth Ganadhara. His three hundred disciples too surrendered to Lord Mahavira. The Lord preached the 'Tripadi', and Metarya Swami created the Dvadashangi. All the ten great scholars got their doubts cleared and became the Prime disciples of Lord Mahavira. How could the last of the eleven scholars, remain behind? Prabhas, the eleventh brother followed them to the place of sermon of the Lord, along with his family of 300 disciples. He had a doubt about 'Nirvana'2 which he desired to get it clarified from Lord Mahavira and thus become the way farer on the path of infinite bliss and joy. As soon as the Lord saw Prabhas Swami, he said, “Oh Prabhas! a fua” i.e. One should perform the Agnihotra i.e. a kind of a sacrificial ceremony throughout his life in order to gain heaven, after death. The result of performing such ceremony is the attainment of heaven and the aspirant does not benefit any other thing other than going to heaven. Heaven is the ultimatum of this ceremony and there is no scope for Nirvana or salvation. Hence such an aspirant never attains emancipation and this proves that there is no such thing as Nirvana. But there is another tenet of the Vedas which says, 1 Jivatman- Bondaged soul 2 Nirvana- Beatitude Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 1 there are two ‘Brahmas'. One is para (final beatitude) and the other is Apara (Posterior) from this statement one infers Nirvana to be a reality. Because of these two contradictory statements, you are unable to decide the truth and since years you are curious to know the truth." (Continue...) For Private and Personal Use Only Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir रूपपुर पार्श्वजिनेश्वर स्तवन गणि सुयशचंद्रविजयजी घणां वखत पूर्वे “रूपपुर पार्श्वजिनेश्वर स्तवन” नामनी प्रस्तुत कृति जोवा मळेली. पहेली नजरे तो कृतिनी रचना पार्श्वनाथ प्रभुनां जीवनचरित्र उपर बनी होय तेवु लाग्यु पण साद्यंत कृति वांची त्यारे तेमांनी ऐतिहासिक विगत जाणी कृतिने संपादित करवी एम विचार्यु हतुं अने आजे ते कृति वाचकोनां अभ्यासार्थे अहीं प्रकाशित करीए छीए. कृति परिचय कृति कुल ४ ढाळमां विभक्त थयेली छे. जेमां प्रथम ढाळ विछियानी देशी, बीजी रसियानी, त्रीजी कनक कमल पगला करे' ए थोइ जेवी देशी अने चोथी झूबखडानी देशी ए रागोमां रचायेल छे. कृतिकारे प्रथम ढाळनां शरूवातनां ज पद्योमां पार्श्वनाथ प्रभुनां जन्मथी लई लग्न सुधीनो वृत्तांत खूब ज संक्षेपमां आलेख्यो छे, ज्यारे त्यारबादनी कडीओमां तथा बीजी ढाळमां प्रभु पर कमठासुरे करेलां उपसर्गर्नु अने ते दोषनां कारण- वर्णन करे छे, अहीं खास कमठने समकित पमाड्यानी वात ध्यानार्ह छे. त्रीजी तथा चोथी ढाळमां कवि अनुक्रमे रूपपुरनगरनी उत्पत्ति, त्यांनी लोकव्यवस्था, गामनां मंदिर तथा जिनालयनुं पोतानां रूपपुरनां चातुर्मास दरम्यान श्रीसंघमां पर्युषण दरम्यान थयेली तपश्चर्यानुं ऐतिहासिक वर्णन करे छे. तेमांय रूपादेनां नामे नगर वसाव्यानी, पटेल व्यापारी तेडाव्यानी पादर देवीनी स्थापना कर्यानी विगतो खास वांचवा योग्य छे. अहीं प्रश्न थशे के जो कृतिकारने पार्श्वनाथ प्रभुनी स्तवना ज करवानी छे तो तेमां चातुर्मासनो उल्लेख करवानी शी जरूर छे? जो के आ प्रश्ननो जवाब शोधवो तो अघरो छे पण एम विचारी शकाय के कविने स्तवना जे करवानी छे ते रूपपुरमंडण पार्श्वनाथ प्रभुनी करवानी छे, ते रूपपुर क्युं ? तो कविए चोमासु कर्यु ते, पाछु ते रूपपुर केQ? तो ज्यां आटली बधी तपश्चर्यादि आराधनाओ थई ते. आम, रूपपुरनगरनां पार्श्वनाथनी स्तवना साथे लोको ते नगरनां आराधकोनी पण अनुमोदना करी शके ते आशयथी कविए चातुर्मासादिनी विगतो उमेरी हशे एम लागे छे. आजे तो वोट्स अपथी दुनिया खूब झडपी थइ गइ छे. हजू तो कोइ सारी घटना घटी नथी के वातो वहेती थई नथी. पाछां आपणे पण ए घटनाने अनुलक्षीने २-४ स्टेटमेंट आपीने पाछां निजानंदमां खोवाइ जइए. पण सुकृतनी अनुमोदना For Private and Personal Use Only Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR June-2017 करवी जोइए एवं य आपणने लागतु नथी. पूर्वे तो समाचारनी आप-ले करवी घणी दुष्कर हती त्यारेय विज्ञाप्तिपत्रो, खामणा पत्रिकाओ द्वारा संघो एक–बीजाने त्यांनी आराधनानी अनुमोदना करतां. पोताने त्यां गुरूभगवंत पधारे त्यारे एथी पण भव्य आराधना करवानी इच्छा राखतां. कदाच प्रस्तुत कृति पण तेवां ज अनुमोदनानां उद्देशथी रचाई हशे. कृतिमा उल्लेखित सांजी, रातीजगो, भक्तिभावना, दान, आगम, पूजा, प्रभावना, व्याख्यान श्रवणनी वातो पर्वाधिराजनां तत्कालीन उजमणानां स्वरूपनी नोंध छे. काव्यने कविए पोतानां गच्छनां तथा गुरुभगवंतनां नामोल्लेखपूर्वक काव्यसमापन कर्यु छे. कृतिनी रचना कविए कई संवतमां करी ते अंगे काव्यमां कोइ स्पष्ट उल्लेख नथी पण वि.सं.-१७५४मां अहीं पोते चोमासु रह्यां होई त्यारे ज आ कृति रची होय तेवू बने. प्रान्ते संपादन माटे प्रस्तुत कृतिनी झेरोक्ष आपवा बदल श्रीहेमचंद्राचार्य जैन ज्ञानमंदिर-पाटणनां व्यवस्थापक श्री यतिनभाईनो खूब खूब आभार. दहा ॥॥सकल सुमति ध(दे)इ सारदा, वाधइ जग यशवेल; रूपपुर पास जिणेसरू, स्तवतां रूपारेल' ढाल-विंछीयानी श्रीरूपपुर पास जिणेसरु, गुण गावा मुझ मन थाय रे, लाला नयरी वणारसी जाणीयै, तिहां अश्वसेन नामै राय रे ॥१॥ श्री रूपपुर... रानी वामा धरणी सती, जनम्या श्रीपासकुमार रे, लाला नीलकमलवरण नव हाथनी, काया जेहनी सुखकार रे ॥२॥ श्री रूपपुर... जसु लंछन सर्प सोहामणुं, सोभागी श्रीजिनराय रे, लाला मनवंछित पूरइ लोकनां, दूख दालिद्र दूर मिटाय रे ॥३॥ श्री रूपपुर... इम जगगुरु यौवन पामीयुं, परण्या परभावती नारि रे, लाला मनईच्छारहीत अरिहंतजी, सुख भोगवइ जग-हितकार रे ॥४॥ श्री रूपपुर... इणि अवसर कमठ ते आवीयुं, तापस तपस्यानो पूर रे, लाला चिहुं पासि अगनि कुंडे भरी, उपरि तप तपतो सूर रे ॥५॥ श्री रूपपुर... ॥१॥ 1 रेलंछेल. For Private and Personal Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जून-२०१७ तिहां लोक आवै अति कौतुकी, देखता अचिरज थाय रे, लाला विस्तरी वात घणी तिहां, लोक सह कोई यश गाय रे ॥६॥ श्री रूपपुर... श्रीपासकुमर ते सांभली, पुहता तापसनै पास रे, लाला जिन अवधिज्ञानै जोयनै, कहै कमठ प्रति उलास रे ॥७॥ श्री रूपपुर... ढाल-रासीयानी रे रे कमठ तुं नवि जाणै कांइ, तुं अज्ञानी रे एह रे भोला, जीव हणे नवि जाणै मन माहिं, नहीं ए माहिं संदेह रे भोला ॥१॥ जगगुरु जीवन पास जिणेसरू, कहै सेवकनै रे सार रे भोला, काढु लाकड जे ए अध बल्युं, न करो चीरंता वार रे भोला ॥२॥ लाकड चीरु तेहवै नीकल्यो, बलतो उछलतो साप रे भोला, श्रीनवकार सुणाव्यो तेहने, छूटो पापनो ताप रे जगगुरू... ॥३॥ मरण लही धरणेध(द)र ते थयो, कोप्या लोक अपार रे भोला, कमठ हठी कूटीने काढीयो, वाध्यो जिनयश सार रे जगगुरू... ॥४॥ पास जिणेसर दीक्षा आदरी, उभा वडलाने मूळ रे भोला, कमठ हठी देखी जिन कोपीउ, करइ उपसर्गो प्रतिकूल रे जगगुरु... ॥५॥ घटा ऊमटी मेघ तणी घणी, काली काजलवान रे भोला, वीज जबूक टबूक धडुकतो, गाजै गयण असमान रे जगगुरु... ॥६॥ जिन नासा ताइ जल आवीयुं, कांप्यु आसन ताम रे भोला, त्यां धरणधर आव्यो ततखिणि, खंधइ आरोप्या स्वामि(म) रे जगगुरु... ॥७।। अवधिं धरणीध(द)र जांणी करी, तेडी कहि सुणि सठ रे, प्रभु पाये लगाड्यो प्रेमस्युं, समकित लहै तिहां कमठ रे जगगुरु... ॥८॥ ढाल-३ कनक कमल पगलां ठवै ए एहनी जिनवर केवल पामीयु ए, समोसरण रचै देव, नमो जिनरायनै ए; आवे असुर-नर-देवता ए, करइ जिनरायनी सेव, नमो जिनरायनै ए ॥१॥ भविक लोकनै बुझवै ए, आपइ आपइ समकित शील, नमो जिनरायनै ए; करम खपावी प्राणीया ए, पामै पामै अविचल लील, नमो जिनरायनै ए ॥२॥ सेवंता सुख संपजें ए, लहै लहै लक्ष्मीकल्लोल, नमो जिनरायनै ए; पूजंता जिन भावस्युं ए, दिन दिन हुइ रंगरोल, नमो जिनरायनै ए ॥३॥ For Private and Personal Use Only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 11 June-2017 ॥४॥ ॥७॥ ॥८॥ ॥९॥ SHRUTSAGAR पुहता शिवपुर पासजी ए, पामीयुं अविचल राज, नमो जिनरायनै ए; रूपपुरमाहि थापीया ए, पूरइ पूरइ वंछित काज, नमो जिनरायनै ए राजानी रानी भली ए, रूपादे मनरंग, नमो जिनरायनै ए; रूपपुर नगर वसावीयु ए, आणी आणी उलट अंग, नमो जिनरायनै ए ॥५॥ जिहां तलाव सोहामणुं ए, पाषाणबंध चुसाल, नमो जिनरायनै ए; आरा चिहुँदिशि शोभता ए, पावडीयाला विसाल, नमो जिनरायनै ए ॥६॥ धडनालां जाली भली ए, जल भर्यु लहिरे जाय, नमो जिनरायनै ए; सारस हंसने मोरडा ए, करइ करइ केलि सदाय, नमो जिनरायनै ए च्यारि वरण वसावीया ए, हरख धरी मनमाहिं, नमो जिनरायनै ए; पटिल साध सोहामणां ए, आण्या गामथी इयांहि , नमो जिनरायनै ए ॥८॥ वखतवंत व्यवहारीया ए, जीवदया प्रतिपाल, नमो जिनरायनै ए; पाधरदेवी थापीया ए, करै सहुनी रखवाल, नमो जिनरायनै ए चतुर्भुजदेव ईश्वर तणा ए, जिहां सोहै प्रासाद, नमो जिनरायनै ए; तिहां श्रीपासजिणेसरु ए, चैत्ये घंटानाद, नमो जिनरायनै ए ॥१०॥ पास मूरति तु मूलगी ए, बीजा बिंब अपार, नमो जिनरायनै ए; वंछित मनना पूरवइ ए, लोक तणा आधार, नमो जिनरायनै ए श्रीमहिमाप्रभसूरिना ए, शिष्य सुविनेयी सवीनीत, नमो जिनरायनै ए; श्रावक भाव घणो धरी ए, तेडी आण्या सुंदर चीत, नमो जिनरायनै ए ॥१२॥ ढाल-४ झूबखडांनी संवत सतरसत्तावनै, परव पज्जूसण सार, जयो जिन पासजी; रूपपूरमाहिं शोभता, पूरइ सहूनी आस, जयो जिन पासजी श्रावक भाव भली परि, कीधा तप अपार, जयो जिन पासजी; (आंकणी) श्रीमांडण महिता तणा, त्रण पुत्ररतन, जयो जिन पासजी; मानसिंघ १ हाथी २ हीरजी ३ खरचइ धन सुभ मन, जयो जिन पासजी ॥२॥ साह रहीयाना बेटडा, धरमी श्रावक चीत, जयो जिन पासजी; सीहा चांपसी रूडै मनै, सहु श्रावक सुविनीत, जयो जिन पासजी श्री फूलबाई श्राविका, कीधा पन्नर उपवास, जयो जिन पासजी; अठाईतप अतिघणा, पंच उपवास उल्लास, जयो जिन पासजी ॥११॥ ॥१॥ ॥३॥ ॥४|| For Private and Personal Use Only Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 12 ॥७॥ ॥८॥ श्रुतसागर जून-२०१७ छठ अठम तप आकरा, कीधा धरम अनेक, जयो जिन पासजी; पडिकमणां पोसा घणा, श्रावक धरीय विवेक, जयो जिन पासजी ॥५॥ सांगी देवरावी घणी, रातीजगा कर्या सार, जयो जिन पासजी; भेरी नफेरी वाजतै, ताल कंसाल अपार, जयो जिन पासजी ॥६॥ याचक जन गायै घणुं, आप्या बहुलां दान, जयो जिन पासजी; पोथी पूजी प्रेमस्युं, आप्या आहर मान, जयो जिन पासजी प्रभावना पूजा करी, सांभल्या कल्प वखाण, जयो जिन पासजी; पास जिणंद पसाउले, सह चड्या तप परिमाण, जयो जिन पासजी पुनिमगच्छ दीपावक, पूरइ वंछित कोडि, जयो जिन पासजी; एहवा श्रावक गुणनिला, आणंदादिक जोडि, जयो जिन पासजी खरच कर्या मन खांति स्युं, संतोष्या सहू साथ, जयो जिन पासजी; लाहो लीधो लक्ष्मी तणो, पामी पुन्यनी आथ, जयो जिन पासजी पुनिमगच्छपट्टोधरुं, जयवंता गुरुराय, जयो जिन पासजी; यश-कीरति जगमै घणी, प्रणमै सहू कोई पाय, जयो जिन पासजी ॥११॥ श्रीमहिमाप्रबसूरिना, भावरतन भणइ सीस, जयो जिन पासजी; रूपपुर पासजिणेसरू, गाता लही जगीस, जयो जिन पासजी ॥ इति श्रीरूपपुर पार्श्वजिनेश्वर स्तवनम्॥सम्पूर्णम्॥सर्वगाथा ४०॥ ** ॥९॥ ॥१०॥ ॥१२॥ क्या आप अपने ज्ञानभंडार को समृद्ध करना चाहते हैं ? पस्तकें भेंट में दी जाती हैं। आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबा में आगम, प्रकीर्णक, औपदेशिक, आध्यात्मिक, प्रवचन, कथा, स्तवन-स्तुति संग्रह आदि विविध प्रकार के साहित्य तथा प्राकृत, संस्कृत, मारुगुर्जर, गुजराती, राजस्थानी, पुरानी हिन्दी, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं की |भेंट में आई बहुमूल्य पुस्तकों की अधिक नकलों का अतिविशाल संग्रह है, जो हम किसी भी ज्ञानभंडार को भेंट में देते हैं. ___ यदि आप अपने ज्ञानभंडार को समृद्ध करना चाहते हैं तो यथाशीघ्र संपर्क करें. पहले आने वाले आवेदन को प्राथमिकता दी जाएगी. For Private and Personal Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir बार व्रतसज्झाय ___ श्रीमती डिम्पल निरव शाह जे जिनने अने जिनना वचनने माने ते जैन कहेवाय. जैननी मान्यता जिननी मान्यताथी जुदी न होय. धर्म जिनाज्ञाने आधीन रहेवामां रहेलो छे. माटे ज जिनेश्वर देवनी आज्ञाने मान आपवानुं जैन- प्रथम कर्तव्य छे. जैन श्रावके कुदेव, कुगुरू अने कुधर्मनी मान्यतानो त्याग करीने सुदेव, सुगुरू अने सुधर्मनी दृढ मान्यता राखवी जोईए. अने आ मान्यता शुद्ध सम्यक्त्व धारण करवाथी ज मळे छे. सम्यक्त्वनी सलामती उपर ज धर्मनो आधार छे. ___ आम, धर्म शुद्धिनो आधार व्यवहार शुद्धि नथी. व्यवहार शुद्धि जाळवनार जैन श्रावक ज देव-गुरु-धर्मनी शोभा वधारी शके, अने आ शुद्धि केळववा जो कोई वस्तु सर्वथी अधिक अगत्यनी होय तो ते एक ज छे, मनशुद्धि. मन ज कर्म बंधनमां तथा कर्मक्षयमां कारणभूत छे. एटला माटे पापमय व्यापारोमांथी मनने रोकी पवित्र चिंतनमां अथवा कल्याणकर ध्यानमां तेने जोडq ए अत्यावश्यक छे. पवित्र मन द्वारा थयेली प्रार्थना फळ आप्या वगर रहेती ज नथी. कदाच संपूर्ण पवित्र मनथी देवमंदिरमा न पण जवाय कारणके मनने दृढपणे वशीभूत राखq ए सहज वात नथी. पण व्रत आपणा हृदय उपर पवित्रतानी असर करे छे. आपणा मनने थोडा क्षण पर्यंत शुचिमय बनावे एवी मानसिक तत्परता अने शुद्धि केळववानी भावना बार व्रत द्वारा संभवी शके छे. सामान्य रीते आपणे श्रावकनां बार व्रतोथी तो परिचित छीए ज तथा आ विषय पर आपणी पासे घणु साहित्य उपलब्ध पण होय छे, परंतु आ कृतिमां कर्ताए बार व्रतोतुं महत्व समजाववा विवेचन तथा स्पष्टता साथे जे वर्णवेल छे, ते खरेखर श्रावक/ श्राविकाओ माटे अत्यंत उपयोगी तथा महत्वपूर्ण छे. प्रत व कृति परिचय : ___बार व्रत सजझाय' नामनी प्रस्तुत कृतिनुं संपादन कार्य आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबानी एकमात्र हस्तप्रतने आधारे करवामां आव्यु छे. आ प्रतनो क्रमांक - ४०८९० छे. अद्यावधि लगभग अप्रकाशित आ प्रतनी पत्र संख्या ४ छे. अक्षर सुंदर अने सुवाच्य छे. अक्षरो पडिमात्रा अने अत्यारे प्रचलित मात्रानु मिश्रण धरावे छे जैन देवनागरी लिपिमां आ कृति लिपिबद्ध छे. प्रतनी For Private and Personal Use Only Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जून-२०१७ लंबाई २६ सें.मी. तथा चौड़ाई ११ सें.मी. छे. प्रत्येक पत्रमा १३ पंक्तिओ छे तथा प्रत्येक पंक्तिमां लगभग ३५ थी ३६ अक्षरो छे. प्रतनी भौतिक स्थिति सारी छे. प्रतिलेखक द्वारा भूलथी अमुक जग्याए अक्षरो आडा- अवळा थई गयेल लागे छे. १२मी सदीथी १९मी सदी पूर्वार्ध सुधी- साहित्य, जेने आपणे प्राचीन के मध्यकालीन गुजराती साहित्य तरीके ओळखीए छीए तेनो उल्लेख आ प्रतमां करवामां आव्यो छे. प्रतिलेखन पुष्पिकामां उल्लिखित लेखनकाळ विक्रम संवत १७६६ छे. पुष्पिका अंतर्गत प्रतिलेखके पोतानो परिचय आप्यो नथी. कृति परिचय : ____ अपभ्रंश मिश्रित जुनी गुजरातीनी आ रचना छे. आ कृतिना कर्ता सुखविजय छे, तेमना गुरु पंडित दयाविजय छे. तेओ तपागच्छना साधु छे. प्रशस्तिमा रचनाकाळनो उल्लेख नथी. पण, प्रतनी लेखन संवत १७६६ छे. तो रचना एना पूर्वनी होवी जोईए. अनुमानित १७/१८मी सदीनी आ रचना होवी जोईए. सकल जिनेश्वरने, गुरूजनने तेमज सरस्वतीने प्रणाम करी बार व्रतनुं विवरण संक्षिप्त रीते समजाववामां आव्यु छे. सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमां स्थूल प्राणातिपात विरमण व्रत' प्रथम व्रत छे. ते सर्व व्रतोमां श्रेष्ठ अने मुख्य व्रत छे. आ व्रतना पालनथी जे 'अहिंसकभाव' प्रगट थाय छे अने उत्तरोत्तर वृद्धि पामे छे. ते 'अहिंसक भाव' ज वास्तवमां आत्मानो शुद्ध भाव छे. कोई त्रस जीवने जाणी जोईने संकल्पीने ईरादापूर्वक हणवानी बुद्धिए हणवा नहिं. बार व्रतमां बीजं व्रत ‘स्थूल मृषावाद विरमण व्रत' छे. 'मृषावाद' नो अर्थ छे खोटुं बोलवू. आ प्रमाणेनी श्रावकनी प्रतिज्ञाविषयक जे पांच मोटा जूठाणां छे. तेने शास्त्रमा आ प्रमाणे कयां छे. १. कन्यालीक : कन्या संबंधी सगपण विवाहादिमां जूठु बोलवू नहिं. २. गवालीक : गाय, पशु आदिक चतुष्पद संबंधी तमाम प्रकारनां असत्य ते बीजं मोटु जूठ छे. जे श्रावके बोलवा नथी. ३. भूम्यलीक : भूमि, खेतर, मकान संबंधी जूळू न बोलवू. ४. थापणमोसो : पारकी थापण ओळववी नहिं. तेने न्यासापहार पण कहेवामां आवे छे. न्यास' एटले थापण, तेनो 'अपहार' करवो एटले तेने ओळववी. ५. कूट साक्षी : कोईनी खोटी साक्षी पूरवी ए महा अनर्थन मूळ छे. For Private and Personal Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 15 June-2017 सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमां लीजें व्रत स्थूल अदत्तादान विरमण व्रत' छे. अदत्त = नहिं आपेलं, आदान = ग्रहण करवू द्रव्यना मूळ मालिकनी परवानगी मेळव्या विना तेनुं धन मेळवीने के पडावी लईने तेनी पर पोतानो अधिकार स्थापित करवो, ते 'अदत्तादान' छे. ___ सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमा चोथु व्रत स्थूल मैथुन विरमण व्रत' छे. स्त्री-पुरुषनां युगलथी कराती कामक्रीडा अने कामक्रिया ते मैथुन छे. तेनाथी सर्वथा अटकवू ते संपूर्ण मैथुन विरमण व्रत छे, जे साधुओने होय छे. गृहस्थने तो स्व-पति/पत्नी सिवाय अन्य सर्व साथे मैथुन संबंधोनो त्याग, तेने स्थूल मैथुन कहेवाय छे. जे कोई आ व्रतनुं संपूर्ण पालन करे छे, ते मोक्षरूपी फळ प्राप्त करे छे. पांचमुं व्रत 'स्थूल परिग्रह परिमाण व्रत' छे. तेमां सूक्ष्म एटले सर्वथा अने स्थूल एटले मोटो जेना वगर मन न माने एटली जे वस्तुओनो, ‘परिग्रह' एटले संग्रह करवानी वृत्ति अने परिमाण' एटले तेनुं प्रमाण नक्की करवू. धन, धान्य, क्षेत्र(भूमि), वास्तु (घर-गाम वगेरे), रूपु, सुवर्ण, कुप्य (कांसु वगेरे धातुओ तथा धरवखरी के अन्य राच-रचीलु), द्विपद (मनुष्य, पक्षी वगेरे) अने चतुष्पद (जानवर) आ नव प्रकारनो परिग्रह होय छे. तेने प्रमाणयुक्त करवो अर्थात् अमुक वस्तु अमुक प्रमाणथी वधु न राखवी ते 'स्थूल परिग्रह परिमाण व्रत' छे. छ→ 'दिग्परिमाण व्रत' छे. दिग् एटले दिशा अने परिमाण एटले माप(प्रमाण) चार दिशा, चार विदिशा, ऊर्ध्व दिशा अने अधो दिशा, आम दशेय दिशामां जवाआववा माटेनुं प्रमाण नक्की करवू. ते 'दिग्परिमाणव्रत' नामनुं पहेलू गुणव्रत छे. निश्चित करेल क्षेत्रसीमानी आगळ क्यांय न जवं. आवां नियमोवाळो श्रावक क्षेत्रमर्यादानी बहार पोते जाय, अन्यने मोकले के त्यांथी कोई पण वस्तु मंगावे के मोकले तो पण तेने दोष लागे छे. सम्यक्त्वमूळ बार व्रतमां सातमुं भोगोपभोग परिमाण नामनुं बीजु गुणव्रत छे. भोगनो अर्थ भोगवद्, माणवू, अनुभव करवो के स्पर्श करवो वगेरे थाय छे. भोगववा योग्य पदार्थो बे प्रकारना छे, तेमां जेनो एक ज वार उपयोग थई शके तेवा आहार, पुष्प, विलेपन वगेरेने भोग्य पदार्थ कहेवाय छे, अने जेनो वारंवार उपयोग थई शके तेवा स्त्री, घर, वस्त्र, अलंकार आदिने उपभोग्य पदार्थ कहेवाय छे. ___ उपर प्रमाणे भोग अने उपभोगनी वस्तुनु परिमाण करवू तेने सातमु भोगोपभोग' परिमाण व्रत कहे छे. For Private and Personal Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर 16 जून-२०१७ बावीस प्रकारनां अभक्ष्य श्रावक माटे वर्ण्य छे. जैन धर्मथी प्रभावित आत्मा नीचेनी २२ अभक्ष्य वस्तुओनो त्याग करे. १. वडना फळ, २. पीपळानां फळ, ३. प्लक्ष जातना पीपळानी टेटीओ, आ पांच उदुंबर जातिनां फळो छे. जेमां ४ उंबराना टेटा, ५ ककोदुंबरना टेटा, जेमां नानां नानां घणां जंतुओ होय छे, ६. दरेक जातनो दारु, ७. दरेक जातनां मांस मादक छे, बुद्धिने मंदकरनार, तमोगुणनी वृद्धि करनार अने हिंसान कारण छे, ८. मध, ९. माखण. मधमां तुरंत अने माखणमां छाशमांथी बहार काढ्या बाद ते ज रंगना असंख्य सूक्ष्य त्रस जीवोनी उत्पति थाय छे. १०. बरफ, ११. करां, असंख्य अपकाय जीवमय छे. १२. विष - प्राणनो नाश करनार छे. १३. सर्व प्रकारनी माटी–सचित्त छे अने प्राण धारण माटे अनावश्यक छे. १४. रात्रिभोजनजीवहिंसादि घणा दोषो रहेला छे. १५. घोलवडां(दहीवडी)- कठोळ अने काचा दहींनां संयोगथी बने छे माटे 'विदळ' थाय. १६. रींगणां- कामवृत्ति पोषक अने बहु निद्रा लावनार छे तथा बहुबीज छे. १७. बोळ अथाणां- त्रण दिवस पछी अभक्ष्य छे. १८. अजाण्यां फळ-फूल- प्राणहानि तथा रोगोत्पतिनी संभावना छे. १९. तुच्छ फळ- खावानुं थोडं अने फेंकी देवानुं वधारे होय छे. २०. चलित रस- वर्ण, गंध, रस, स्पर्श बदली जवाथी हानि करी शके छे. २१. बहुबीज २२. अनंत काय. सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमां आठमुं अने गुणव्रतमां त्रीजुं व्रत 'अनर्थदंडविरमण व्रत' छे. अर्थ= प्रयोजन अने दंड= आत्माने जे दंडे, शिक्षा करे ते दंड कहेवाय छे. पोताना घर, कुटुंब, परिवार, धन-संपत्ति के संसारमा उपयोगी साम्रगी माटे जे हिंसादि पापो कराय छे तेने अर्थदंड कहेवाय छे. अने सांसारिक जीवन जीववा माटे जेनी जरूरियात नथी तो पण शोख, कुसंस्कारो, अज्ञानता के कर्मबहुलतानां कारणे ज निष्प्रयोजन पापारंभो करवामां आवे छे, तेने अनर्थदंड कहेवाय छे. सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमां नवमुं अने शिक्षाव्रतमां प्रथम सामायिक व्रत' छे. सम एटले समभाव अने आय एटले लाभ, जेनाथी समभावनो लाभ थाय तेने सामायिक कहेवाय छे. मर्यादित काळ माटे पाप-व्यापारनो त्याग करी समभावमा रहेवानां प्रयत्नस्वरूप छे सामायिक. सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमां दशमुं अने शिक्षाव्रतमां बीजुं व्रत देशावकाशिक व्रत' छे. 'देश' नो अर्थ छे, एक भाव अने 'अवकाश' नो अर्थ छे तेमां अवस्थान करवं, तेमां रहे. विशाळ आरंभनां क्षेत्रनो संक्षेप कही अल्प आरंभवाळा एक देशमां- एक भागमा रहे, ते देशथी अवकाशने 'देशावकाशिक' व्रत कहेवाय छे. For Private and Personal Use Only Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 11 SHRUTSAGAR June-2017 आ व्रत संयमजीवननी शिक्षा स्वरूप छे. तेथी जेम मुनिओ कोई पण चीजनी अपेक्षा न राखतां चलावी लेवानी भावनावाळा होय छे, तेम श्रावके पण ए ज लक्ष्यथी आ व्रतनो अभ्यास करवानो छे. सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमां अग्यारमुं अने शिक्षाव्रतमां त्रीजुं व्रत ‘पोषधोपवास व्रत' छे. पौषध शब्दनो अर्थ छे धर्मनी पुष्टि करे तेवी एक विशिष्ट क्रिया अने उपवासनो अर्थ छे आहारनो त्याग करी आत्मानी नजीक वसवानो प्रयत्न. उपवासपूर्वक करातां आ पौषधने पौषधोपवास व्रत कहेवाय छे. शब्दनी व्युत्पत्तिने आहार, शरीरसत्कार, अब्रह्म अने सावध व्यापार आ चारनो देशथी के सर्वथी त्याग करवो ते पौषधोपवास व्रत छे. वर्षमां अमुक संख्यामां पौषध करवा एवा नियम द्वारा आ व्रत- पालन करी शकाय छे. सम्यक्त्व मूळ बार व्रतमां छेल्लु अने शिक्षा व्रतमां चोथु अतिथिसंविभाग व्रत' छे. साधु आदि अतिथिने दान आपी पछी भोजन करवू ते अतिथिसंविभाग व्रत छे. स्व अने परना उपकार माटे पोतानी वस्तु अन्य पात्रने आपवी ते दान छे. ____ आ प्रमाणे बार व्रत यथाशक्तिए धारण करवाथी, प्रमाण नक्की करी तेनुं पालन करवाथी कर्मो खपे छे अने पुण्यानुबंधी पुण्यनु उपार्जन थाय छे. सम्यक्त्वमूल बार व्रतनुं विवरण कर्या बाद कर्ताए संक्षेपमां पंदर कर्मादाननी सुंदर रजूआत करी छे. १. अंगार कर्म : जेमां अग्निनो उपयोग वधु प्रमाणमां होय तेवो धंधो ते अंगारकर्म छे. चूनो, ईंट, नळीया, कोलसा, धुपेल तेल वगेरे चीज भठ्ठीथी पाकती होय तेनो वेपार न करवो. २. वन कर्म : जेमां वनस्पतिर्नु छेदन-भेदन मुख्य छे तेवा व्यापारथी धन कमावq ते वन कर्म छे. लाकड़ा, फळ, फूल, पत्रादि वेचवा वगेरेनो व्यापार वनकर्म कहेवाय. ३. शकट कर्म : गाडी, गाडां, ट्रक, वहाण, स्टीमर, प्लेन वगेरे अनेक प्रकारनां वाहनो, के तेना स्पेरपार्ट्स बनावी वेचवां के चलाववा अथवा ट्रावेल एजन्सी चलाववी ते शकटकर्म छे. आ धंधामां वाहनो बनाववामां अने वाहनोना वपराशमां स्थावर उपरांत त्रस जीवोनी घणी हिंसा थाय छे. ४. भाट कर्म : वाहनो तथा हाथी, घोडा, ऊंट वगेरे जानवरो भाडे आपी धनोपार्जन For Private and Personal Use Only Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 18 श्रुतसागर जून-२०१७ करवू, वगेरे ते भाटक कर्म छे. ५. स्फोटक कर्म : पृथ्वी-पथ्थर वगेरेने फोडवां , सुरंगो बनाववी गुफाओ के मार्ग बनाववा ब्लास्टींग करवू तथा घउं, चणा, जव वगेरे अनाज फोडवां, कुवा, तळाव, वाव वगेरे खोदाववां, खेतर खेडवां वगेरे व्यापारने स्फोटक कर्म कहेवाय ६. दांतनो व्यापार : दांतना उपलक्षणथी प्राणीनां कोई पण अवयवने ग्रहण करवाना छे जेमके नख, वाळ, रुंवाटी, हाडकां, चामडी आदिनो व्यापार करवो ए दंत वाणिज्य' नामना कर्मादानना धंधा कहेवाय छे. ७. लाखनो व्यापार : लाखना उपलक्षणथी अहीं तेना जेवां बीजां सावद्य द्रव्यो घातकी वृक्ष के जेनी छाल अने पुष्पमांथी दारु बने छे ते तथा टंकणखार, साबु बनाववाना क्षार वगेरेनो वेपार करवो ते 'लक्ष-वाणिज्य' नामना कर्मादाननो धंधो छे. ८. रसवाळा पदार्थोनो व्यापार : दूध-दही, घी, तेल, गोळ, मध, मदिरा, मांसनो व्यापार करवो. रसना उपलक्षणथी बधा आसवो एटले के मदिरानो व्यापार करवो ए रस-वाणिज्य' नामनो कर्मादाननो व्यापार छे. ९. केशनो व्यापार : पशु-पक्षी आदिना केशनो व्यापार करवो ते 'केश-वाणिज्य' नामना कर्मादान तरीके ग्रहण करवानो छे. १०. झेरी चीजोनो व्यापार : झेर, हरताल, वच्छनाग, सोमल आदि झेरी चीजो, डी.डी.टी., मच्छर-जू-उंदर मारवानी दवाओ तथा खेतीमां वपराती जंतुनाशक दवाओ वगेरे सर्वे झेरी चीजोनो व्यापार विष-वाणिज्य'नामना कर्मादान तरीके ग्रहण करवो. ११. यंत्र-पीलन कर्म : तेल काढवानी घाणी, शेरडी पीलवानो संचो, खांडणीओ, सांबेलु, पवनचक्की तथा अनाजने खांडवां, दळवां, भरडवां वगेरे यंत्रो चलावीने धंधो करवो ते 'यंत्र-पीलन कर्म' छे. वीजळीनी शक्तिथी चालती मील, जीन, प्रेस ए सर्व यंत्र-पीलन नामनुं कर्मादान कहेवाय छे. १२. निन्छन कर्म (अंगछेदन कर्म) : बळद, पाडा, ऊंट वगेरेनां नाक वींधवा, आंकवो, डाम देवा, आखला-घोडा वगेरेनी खसी करवी, ऊंट वगेरेनी पीठ गाळवी वगेरे कार्यों द्वारा आजीविका चलाववी ते 'निन्छन कर्म' नामना कर्मादान तरीके ग्रहण करवू. For Private and Personal Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org SHRUTSAGAR 19 June 2017 १३. दव-दानकर्म : आग लगाडवानुं कर्म ते 'दव - दानकर्म' छे. शोखथी के दुश्मनावटथी आग लगाडवी, जूनां घास, जंगलो वृक्षो वगेरेने बाळी नांखवा वगेरे 'दव-दानकर्म' नामना कर्मादान तरीके ग्रहण करवुं. १४. शोषण कर्म : धान्य उगाडवा माटे सरोवर, धराओ, नदी, नीक के नहेर द्वारा पाणी वहेवडाववी, कूवा-टांकी खाली करी आपवी वगेरे जल-शोषण कर्म छे. १५. असती-पोषण कर्म : असती एटले कुलटा-व्याभिचारिणी स्त्री. तेने पोषवानुं कर्म ते असती = व्रत विहीन पोषण कर्म छे. दास-दासीओ, नपुंसको वगेरेने हलको धंधो करवा माटे उछेरवा तेमनी पासे विविध खेल कराववा, पाळवां वगेरे असती पोषण कर्म छे. ॥८०॥ श्रीगुरूभ्यो नमः ॥ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir आ प्रमाणे सतर्क रही प्रमाद राख्या विना योग्य प्रमाण नक्की करी उत्तम कक्षाना गृहस्थजीवन माटे जरूरी धन मेळववा अल्पहिंसावाळा मार्गे आ जगतमां घणां छे. सावधान थई समकितनुं पालन करीए अने जो कदाच भूलथी नियमनो भंग थई जाय तो गुरु समक्ष एकरार करी तेनी आलोचना करीए एवो भावधरी तपागच्छना पंडित दयाविजयना शिष्य मुनि सुखविजये 'बार व्रत सजझाय' नी रचना श्रावकना हित माटे करी छे अने आ सज्झाय सांभळता सुखनो अनुभव थाय एवो भाव व्यक्त करे छे. संदर्भ सूचि १. जैननां कर्तव्यो, कर्त्ता - धर्मगुप्तविजयजी, प्रका० - वि. २०३२, २. श्रावकनुं कर्तव्य तथा विविध स्तवनादि, श्रावक भीमसिंह माणेक, प्रका० वि.१९७४, ३. सूत्र संवेदना (भाग-४), कर्त्ता - साध्वीश्री प्रशमिताश्रीजी बार व्रत सजझाय सकल जिनेसर पाय नमी, प्रणमी सह (द) गुरु राय; कविजन माता सरसती प्रेम प्रण पा बार व्रत संक्षेपथी सास्त्र तणई अनुहार; जे पालई मन सुधई, ते पामई भव पार For Private and Personal Use Only 11211 11211 Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जून-२०१७ __ ढाळ- नाहलीइ विलूधी उलंभा दीयइ रे। ए देशी। पहिलं समकित भविजन आदरोजी, सकल धर्म- मूल; दोष अढाररहित देवे आदरूंजी, अरिहंतदेव अनुकूल ॥३॥ पहि० पंच माहाव्रत पालइ प्रेमसुंजी, निरदूषण लीयइ आहार; धारइ गुण सत्तावीसइ साधनाजी, ते वंदं अणगार ॥४॥ पहि० धर्म जे सूधो भाख्यो केवलीजी, दया मूल गुणखांण; त्रिणइ तत्वइ सूधां सदहुंजी, एह प्रथम मंडाण ॥५॥ पहि० हरीहर इस्वर ब्रह्मा जे अछेरे, वली लोकोत्तर देव; कुगुरू कुदेव धर्म न आदरूजी, जो पाम्यो समिकित देव ॥६॥ पहि० मुंकुं दोकडा दश देहरासरजी, नाण लखावण पंच; जीव छोडावण पंच जपणि, लह्याजी वर्ष२ प्रति संच ॥७॥ पहि० पूजा एक सतर भेदी कहीजी, वरस प्रति गुणखांणि; नोकरवाली एक दिन प्रति गणुंजी, नित दोइ करूं पचखांण(णि) ॥८॥ पहि० सूर उगमतइ करूं नोकारसीजी, संध्याइ दुवीहार; छतइ योगइ गुरुनइ वादीयइजी, ए समकित विवहार ॥९॥ पहि० देहरइ दश आशातन टालीइजी, पालिइ सिर जिण आंण; ए समकित मूल पहिलो कांजी, सुखविजइ चट(ढ)तइ भांण ॥१०॥ पहि० ___ ढाळ- हुं वारी लाल ए देशी। पहिलं व्रत इम पालीयइ हुं वारी लाल, प्राणातिपात जस नाम रे; हुं० तरस जीव हणों नही हुं०, निरापराधइ न काम रे हुं० ॥१॥ पहि० उषध वेषधइ कारणइ हुं०, सजनादिकनइ काम रे; हुं० शरीरइ जे जीव उपजई हुं०, तेहनों जयणा ठाम रे हुं० ॥२॥ पहि० मृषावाद बीजुं का, ते मन सुद्धइ पालि रे; हुं० जूठां पांच जे मोटिकां हुं०, तेहना पांच अतिचार टालि रे; हुं० ॥३॥ बीजुं० कन्या गो भूमि थापणि हुं०, कुडी शाखिम देअरे; हुं० बीजी जयणा बोलवइ हुं०, दाखिण जयणा एह रे; हुं० ॥४॥ बीजुं० त्रीजा अदत्तादाननुं हुं०, करीयै हिव पचखाण रे; हुं० मोटकी चोरी न कीजीइ हुं०, जेहथी राजदंड जाणि रे हुं० ॥५॥ त्रीजुं० For Private and Personal Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 21 June-2017 ॥१॥ ॥२॥ SHRUTSAGAR पडी वस्तु लाधइ जिको हुं०, अरथइ धरमनइ ठाणि रे; हुं० लेवइ देवइ जे वली हुं०, ते पणि जयणा जांण रे; हुं० ॥६॥ त्रीजुं० चोथों व्रत इम पालसुं हुं०, जाव जीव एक भांण; हुं० पूरपुरुष हुं भनुं नहीं रे हुं०, मनवचन जयणा मान रे हुं० ॥७॥ चोथु० आ देश निरदेशथी हुं०, सज्जनवर्गनइ काम रे; हुं० इणि व्रतइ इम पालता हुं०, आपइ शिवपुर ठाम रे हुं० ॥८॥ चोधुं० ढाळ- भगति जुगति सीधाई रे। ए देशी। इच्छा मति प्रमाणि रे, तेहवि संक्षेपइ, परिग्रहनो लेषु कहि ए; सहस एकसो एक रे, जवहर पणि तिम, तोला पंचास कनक कहुं ए मोती जडित तमाहि, तेह पण एकसो, घरमेडी पांच बंधा ए; भाडत घर पणि पांच रे, सर्वधान सहुं जाति सतपांच मोकलु ए धात कुट परिमाण रे, वीस माण लहुं गाय, बि वेला सहीती ए; भिसनै बाली ए करे, दासदासी पणि ते जीमे, घी मण पनर मोकलु ए ॥३॥ गोल-खांड मण पांच, साकर अधमण, वेस पंचास पोता तणा ए; कापडं गज पचास रे, वली घर वापरो, सर्व मली सत पांसइ ए छु(छ)ठु दिशव्रत जोय रे, दिस सघली कही, एकेकी दिशइ कहुं ए; दोढसो जोयण मान रे, वली नीचु उर्छ, दो-दो जोयण जाणीइं मोटां वाहण जेह रे, ते तो परिहरुं नाव-होडीया मोकली ए: एम सातमो भोग-परिभोग रे, तेह विचरूं, अभक्ष्य बावीसइ टालीइ ए वड-पिंपल-पीपर फल रे, कछंबर-उबर, मद्य-मांस-माखण वली ए; हेम करह विष रे, वली उषध विण, माटी फल अणजाणुं ए ॥७॥ रयणी भोजन मीठो रे, काचूंजाणीइ, घोलवडा बिगण सही ए; ब(व)ली अथाणुं जोय रे, पीलुपीचूअ, बोरस खस२ करी ए पंपोटा बहुं जीव, त्रिदिननो उदन, वासी विदल वली कहुं ए; रातै राध्यों धान रे, विजा दिननों, बासि पणि तिमज सही ए इणि परि कह्या अभक्ष्य, ते सवि वोसरुं, वली अनंतकाय परिहरु ए; हवि जे खावा लेवा तेहना नाम ज, गुरुमुखथी ते धरू ए ॥१०॥ ॥४॥ ॥५॥ ॥६॥ ॥८॥ ॥९॥ For Private and Personal Use Only Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir जून-२०१७ ॥१॥ ॥२॥ ॥३॥ ॥४॥ ॥५॥ ॥६॥ श्रुतसागर चोंपई नीलवननो माडु मेलिं, सघली जाति तणां माहि भेलिं; दांतण लीबू कोठीबडा, पान तुरीया नै कालिंगडा चीभड जाति कहिसुं मिली, दाडिम बीजोरूं आंबली; कंकोडा डोडीनइ फली, मतीरा आंबा आरी यांवली फोहुंक गहुं जोयार बाजरी, खेजडी नीलीरायण सेलडी; अरूडूसो लीबडो जाति ज फली, नीलूओ फालसा लीउ मनरूली तुअर नीली लीला चणा, सूआभाजी काकडी महीमणा; नीलवणि ए मनमा धरू, धान तणी हवि संख्या करू चोखा जाति तूअर बाजरी, मसूर चोला मणची धरी; कलछ कोदीरा चिणो माल, मुंग मोंठ नइ जव तूरी वाल मेथी चिणा गह गोखरू, भींडी वे कही उबल वरूं: कूरी राई वेसण जेह, विरहा लावा लूलीआ तेह बरटी कांग अडद नै सूआ, सामो अलसी तिल जूजूंआ; समलाई आदिक धानह घणां, दिवस प्रति दश करूं सालणा दश सेर जन करू पकवान, मेवा-मीठाई दो सेर मान; सेर त्रीस राध्यों वली धान, घडा दोय पाणीनो मान पनर करमादान जे होय, मुज कायाइ न करूं सोइ; दोय सहस रूपीया संच, लेता-देता न करूं खलकंच थोडइ पापि करूं व्यापार, जेणिं जीव लहइ भवपार; आठमइ व्रतै कहुं ए सार, अनरथ दंड तणो परिहार भिंसा कूकड हाथी झूझता, नटुआ पात्र होइ नाचता; बजाणीयां कोतुग अतिचंग, एह तणा नवि निरखं अंग सती चोर मारी तो जे अ, उ देरी नवि जोउ ते अ; मरणदुखे सुखइ जीववू, इंद्रादिक पद सुख वांछवू गाम नगर देशादिक भंग, चिंतुं नहीं हुं धरी मनरंग; भंडी बूद्धि पाप उपदेश, देता होइ घणो कलेश घरटी उखल-मुंसल जेह, सज्ज करी नवि मुकुं तेह; षट्पर्वी माथा जोउ नहीं, पचखांण हवें ए सही ॥७॥ ॥८॥ ॥९॥ ॥१०॥ ॥११॥ ॥१२॥ ॥१३॥ ॥१४॥ For Private and Personal Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 23 June-2017 SHRUTSAGAR कारण विण नाहिण अंगोल, वस्त्र धोवा नावु रंगरोल; नोमैव्रतै कहीइं ए सार, सामाइक पडिकमणों उदार ॥१५॥ ढाळ ॥१॥ ॥३॥ एक वरसै रे वीस करूं हुं सार रे, दशमों व्रतरे पालतां होइ भवपार रे; सत्तावीस रे द्रव्य उगणच्यालीस ते जाणि रे. त्रीस कोस ज रे वलि जल शत जाणि रे विगय पांच ज रे जोडा पांच पग वाणही, अधर सेर ज सघलो बोल कहुं सही; कुसुमं सेर एक रे वेस पहिलं दस दिन व्रतें, साडात्रीस ज रे राखुं नवा निजघरि व्रतें ॥२॥ वाहण जाति ज रे पांच राखं ते अतिभली, शय्यादिक रे पाथरणा सहित वली; आठ राखुं रे अवर परिहरि सों मनरुंली, पांच सेर ज कुसुमादिक रूडी कली विलेपन रे अंग धरू सेर एक रे, मासै करीइ रे नाहण च्यारि विवेक रे; अंघोल वली रे मासे कीजै वीस रे. आठमि चोउदाशि रे टालीजें निसदीस रे जीव जीवैरे दिवसै हु ब्रह्म धरुं, परभाति रे चउद नीम संख्या करुं; एकादशमै रे पोसह पंच वरसै करुं, बारमे व्रत रे संवीभाग दोइ करूं अणमिलतै रे होइ सामि ते हु सार रे, दान देतां रे लहीइ भव नो पार रे; समकित मूल रे बारव्रतइ मली धरे, पंचलोकनी रे साखि भली मइ कीधरे ॥६॥ ढाळ पनर करमादान जे कह्या, तेहवि संक्षेपइ जी; अंगालु कर्म परिहरि पहिलोरूं, गुरुशाक्षि शुभ हेतइ जी॥१॥ ___ पापकर्म भव परिहरो। आंकणी। लुंगडुंग ज पांचसइ, रंगावों घरकामइ जी; व्यापार हेतइ नवि करूं, धूपेल दश सेर मानइ जी ॥२॥ पापकर्म० ॥४॥ ॥५॥ For Private and Personal Use Only Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर जून-२०१७ दलवु भरडवों शेकवों, खांड वरवां संख्याइ जी; अधमण त्रिणमण पांचमणा, बिमण पणि संख्याइ जी ॥३॥ पापकर्म० विहल गाडोनइ पोठीउ, भाडई करिवा तेह जी, मोटी गुणा पांच ज रे, राख्या मोंकला तेह जी ॥४॥ पापकर्म० मीण सेर दोई मोकलों, केश वाणिज्य पचखांण जी; हथीआर ज राखवा नहीं, लेवइ देवइ न आंण जी ॥५॥ पापकर्म० घरटी घाणी शस्त्र जे, पापो पग रणजे रे; नवि करुं राखं तेहनइ, गुरुमुख पचखां तेण रे ॥६॥ पापकर्म० टालइ निज आभनइ, उखला चूला पांच जी; खडी दश सेर मोकली, सोल रूकनइ धनसंच जी ॥७।। पापकर्म० कुभार कूटि वरस प्रतइ, रूपीया पणि पंच रे; पनर सेर कंकोडी कही। विलेपन मन(ण) पंच रे ॥८॥ पापकर्म० साबू सेरू पनर ग्रहुं, आमला सेर दश जी; आरीठा पनर सेर, मोटा वाहण निषेश जी ॥९॥ पापकर्म० गंधीयाणो सवहिइ मली, रूपीआ पंच परमाण जी, बीजी सह जयणा कही, मोटइ कारण मंडाण रे ॥१०॥ पापकर्म० ढाळ इणि परइ व्रत पालीजै भविजणा, छ छंडी चितधारि सनेही; राखी जइ रूडी परइ एहनइ, चित माहि चीतारि सनेही ॥१॥ इणि० सावधान थइनइ समकित पालीई, टालीइ एहोनो भंग सनेही; जाणिइ भंग जिन दिन आपणइ, आबिल जाणी करीइ निसंग सनेही ॥२॥ इणि० तपगछमंडण तिम रणइ, सकल साधु शिरदार सनेही; पंडित दयाविजइ गुरुनामथी, सुखविजइ सुखकार सनेही ॥३॥ इणि पर उपगारइ हेतइ को बार व्रतनो सज्झाय सनेही; श्राविक राधा ए हेतइ कर्यो, सुणतां सुखदाय सनेही ॥४॥ इणि ॥इतिश्री बारव्रत सज्झाय संपूर्णम्॥संवत्१७६६वर्षे पोस सुदि १३ सोमे लिखत॥श्री॥श्री॥छः॥ For Private and Personal Use Only Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ऋषभपंचाशिका ब्राह्मी लिपिमा एक प्रयास (गतांक से आगे...) किरीट के. शाह. ह:: + HI ४ वाईहिं परिग्गहिआ, करंति विमुहं खणेण पडिवक्खम । ६ L HEALE HAJ ॥४०॥ तुज्झ नया नाह महागय व्व अन्नुन्नसंलग्गा ॥४०॥ CREAHd HC पावंति जसं असमंजसा, वि वयणेहिं जेहिं परसमया। ABIYF LITH ॥४१॥ तुह समयमहोअहिणो, ते मंदा बिंदुनिस्संदा ॥४१॥ ८.:. ४ gatg FL पइ मुक्के पोअम्मि व, जीवेहिं भवन्नवम्मि पत्ताओ। HFBJ४४४LLPAPDF ४४८ ॥४२॥ अणुवेलमावयामुहपडिएहिं, विडंबणा विविहा ॥४२॥ वुच्छं अपत्थिआगयमच्छभवंतो मुहुत्त वसिएण। 18 HIF:: TIRE HE..81 ॥४३॥ छावठ्ठी अयराइं, निरंतरं अप्पइठ्ठाणे ॥४३॥ "LL HIDEBI ARUITH सीउन्हवासधारानिवायदुक्खं सुतिक्खमणुभूअं। KEHT HUIII४.:. ॥४४॥ तिरिअत्तणंमि नाणावरणसमच्छाइएणावि ॥४४॥ HTTLC CC CHJult अंतोनिक्खंतेहिं, पत्तेहिं पिअकलत्तपुत्तेहिं । For Private and Personal Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra श्रुतसागर www.kobatirth.org 26 सहिया *f _४}BF24k सुन्ना मणुस्सभवणाडएसु, 18 [LESL दिट्ठा रिउरिद्धीओ, आणाउ कया महाड्ढिअसुराणां । ACt1_1>&KI †.K_Kন निब्भाइआ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir जून-२०१७ प्रIL_+_४८ॣr थुओ भवभयसमुद्दबोहित्थबोहिफलो ॥४५॥ अंका ॥४५॥ AAK ||४६॥ हीणदेवत्तणेसु दोगच्चसंतावा ॥४६॥ [dKI_rb6I° L¥&_tj'> {६} भववणं, पाल्लट्टा पाल्लिआ रहट्टुव्व । ॥४७॥ सिंचते L/XOF A€P&PLE'S DOG घडिसंठाणो, सप्पिणिअवसप्पिणिपरिगया बहुसो ४] +JYIK ४ "LI° भमिओ कालमणंतं, भवंमि भीओ न नाह दुक्खाणं dl J↓ d ॥४८॥ All k४४' $6 संपय तुमंमि दिट्ठे, ६.: 8 +1To जइ विकत्थ जगगुरु, जायं च भयं पलायं च ॥४८॥ EAA६ ४६० ६. ४ Kudt मज्झत्थो जइ वि तह वि पत्थेमि । 56 MEI LE +55 I 1183/1 दाविज्जसु अप्पाणं, पुणो वि कइया वि अम्हाणं ॥४९॥ न FIŽUJ©89+¥©©BIOJPÍr ! ४ झाणग्गिपलीविअकम्मिन्धणबालबुद्धिणा वि मए । इअ ল 02 भत्तीइ For Private and Personal Use Only ॥४७॥ fr 114011 114011 (संपूर्ण) Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रमण भगवान महावीरस्वामी पछीना एक हजार वर्षनी गुरु परंपरा मुनिश्री न्यायविजयजी आमुख : अगियार गणधरो तेणं कालेणं तेणं समयेणं - ते काळे अने ते समये-प्रभु महावीरस्वामी, निर्वाण थयु ते ज रात्ने अवन्तिपति चंडप्रद्योतनुं अवसान थयु, अने पालक कुमार तेनी गादीए आव्यो. बीजे दिवसे प्रातःकाळे प्रभु महावीरनां प्रथम गणधर अने मुख्य शिष्य श्री गौतम-इंद्रभूतिने केवळज्ञान प्रगट थयु. ___ गौतमस्वामीनुं जन्मस्थान मगध देशमां गुब्बर (गोबर, आजे जेने कुंडलपुर कहे छे ते) गाम हतुं. तेमनां पितानुं नाम वसुभूति अने मातानु नाम पृथ्वीदेवी हतुं. ते त्रण भाई हता : इंद्रभूति, अग्निभूति अने वायुभूति. तेमनुं गोत्र गौतम हतुं. ए त्रणेय भाईओ चार वेदनां पारगामी अने चौद विद्यानां जाणकार हतां, अने पांचसो ब्राह्मण शिष्योनां गुरू हतां. तेमने त्रणेने एक-एक संशय हतो. भगवान महावीरस्वामीए ए संशयन समाधान कर्यु एटले एमणे तेमनी पासे पोतानां बधां शिष्यो साथे दीक्षा अंगीकार करी हती. तेमनां साथे साथे ज बीजां आठ विद्वान् ब्राह्मणोए पण दीक्षा अंगीकार करी हती : भारद्वाज गोत्रनां व्यक्त स्वामीए पांचसो शिष्यो साथे; अग्निवेश्यायन गोत्रनां आर्य सुधर्मा स्वामीए पांचसो शिष्यो साथे; वसिष्ठगोत्रनां आर्य मंडितपुत्रे साडां-त्रणसो शिष्यो साथे; काश्यपगोत्रनां आर्य मौर्यपुते साडां त्रणसो शिष्यो साथे; गौतमगोत्रनां आर्य अकंपिते त्रणसो शिष्यो साथे: हारिद्रायण गोत्रनां आर्य अचलभ्राताए त्रणसो शिष्यो साथे अने कौडिन्य गोत्रनां स्थविर आर्य मेईज्जे तथा स्थविर प्रभासे त्रणसोत्रणसो शिष्यो साथे, पोतपोतनां संशयो टळवाथी दीक्षा लीधी. ___आ अगियार गणधरमांना नव गणधरो तो महावीरस्वामीनी विद्यमानतामां ज राजगृही नगरीमां एक मासनु अनशन करी, मोक्षे गयां हतां, एटले गौतमस्वामी अने सुधर्मास्वामी ए बेज बाकी रह्यां हतां. आ बेमां पण गौतमस्वामी प्रभुमहावीरनां निर्वाण पछी बीजे ज दिवसे केवळज्ञानी थयां एटले श्री संघना नायक सुधर्मास्वामी ज गणाया, अने बधाय गणधरोनां शिष्यो तेमनी आज्ञामां वर्तवा लाग्यां. आ रीते प्रभु महावीरनां मुख्य पट्टधर सुधर्मास्वामी थयां. आथी में पण तेमने ज प्रथम पट्टधर मानी आ लेखमां तेमनी पट्टपरंपरा वर्णवी छे. For Private and Personal Use Only Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 28 पालक मौर्यराज्य श्रुतसागर जून-२०१७ ___ गौतमस्वामी पचास वर्ष गृहस्थपर्यायमां, वीस वर्ष साधुपदमां-गणधरपदमां रही प्रभु महावीरनी सेवामां अने बार बर्ष केवळी पर्यायमां गाळी वीर नि. सं.१२मां ९२ वर्षतुं आयुष्य भोगवी निर्वाण पाम्यां. साधुओमां तो युगप्रधान पट्टावली, वाचक पट्टावली अने स्थविरावली वगेरे मळे छे. ते बधांनो अहीं उल्लेख नथी को. मात्र गुरूपट्टावलीनां आधारे वीरनिर्वाण पछीनां एक हजार वर्षमांना पट्टपरंपरागत आचार्योनुं वर्णन आप्यु छे. आ साथे ज एक हजार वर्षमा थयेल केटलाक राजाओनी संवतवार ढूंकी याद अहीं आपुं छु: राजा राज्यकाळ वीरनि.सं. ६० सुधी नवनंद २१५ सुधी ३२३ सुधी पुष्यमित्र ३५३ सुधी बलमित्र/भानुमित्र ४१३ सुधी नभोवाहन ४५३ सुधी गर्दभिल्ल ४६६ सुधी शक ४७० सुधी विक्रम राजा ५३० सुधी धर्मादित्य ५७० सुधी भाइल्ल ५८१ सुधी नाइल्ल ५९५ सुधी नाहट आ प्रमाणे वीर नि. सं. ६०५ सुधीनां राजाओनी वंशावलीनी क्रमश: यादी मळे छे. वीर नि. सं. ६०५ पछी शक संवत शरू थाय छे, जेनो अनुक्रमे मळतो नथी. हवे प्रस्तुत लेखमां सुधर्मास्वामीथी शरू थती गुरूपट्टपरंपरा आपी छे ते नीचे मुजब छे. ६०५ सुधी For Private and Personal Use Only Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org 29 Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR १. सुधर्मास्वामी मगधदेशमां कोल्लाक सन्निवेश नामक गाममां. अग्निवेश्यायन गोत्रमां थिल्लविप्र नामक ब्राह्मणने त्यां तेमनो जन्म थयो हतो. तेमनी मातानुं नाम भद्दिला हतुं. तेमनुं लग्न वक्षसगोत्रनी एक कन्या साथे थयुं हतुं. तेमने एक पुत्री पण हती. तेओ चारवेदनां पाठी अने पांचसो ब्राह्मणपुत्रोनां गुरू हतां. तेमने 'जे जेवो होय ते तेवो थाय' ए विषयमां संदेह हतो. भ. महावीरे तेनुं निराकरण करवाथी पोतानां ५०० शिष्यो साथे तेमणे ५० वर्षनी वये दीक्षा लीधी हती. ३० वर्ष सुधी प्रभुनी सेवा करी तेओ १२ वर्ष सुधी गणनायक पदे रह्यां. पछी केवळज्ञान उत्पन्न थतां ८ वर्ष सुधी सर्वज्ञ अवस्था भोगवी कुल १०९ वर्षनुं आयुष्य पाळी वीर नि.सं. २०मां तेओ वैभारगिरि उपर निर्वाण पाम्यां. June 2017 आजे जे एकादशांगी' विद्यमान छे तेनां रचयिता सुधर्मास्वामी छे. तेमज आजे जैनसंघमां जे साधुसमुदाय छे तेनां आदिगुरू पण तेओ ज छे. भ. महावीरनां ११ गणधरोमां आ पांचमा हतां. २. जंबूस्वामी राजगृहीनगरीमा ऋषभदत्त ब्राह्मणने त्यां तेमनो जन्म थयो हतो. तेमनी मातानुं नाम धारिणी हतुं. माताएं स्वप्नमां जांबुनुं वृक्ष जोयुं हतुं तेथी तेमनुं नाम जबूकुमार पाडवामां आव्युं. तेमणे सुधर्मास्वामीना उपदेशथी चतुर्थ-ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार कर्तुं हतुं. आ पछी घरे आव्या पछी मातापिताए आग्रह करी तेमनुं ८ श्रीमंत कन्याओ साथे लग्न कराव्यं, पण जंबूकुमारे द्दढताथी पोतानुं व्रत पाळ्यं अने ए आठे कन्याओने उपदेश आपी पोतानी साथे लेवा माटे तैयार करी. आ वखते प्रभव नामनो चोर चोरी करवा आव्यो हतो तेने पण ए उपदेशनी असर थइ. एटले ते पण पोताना ४९९ साथीओ साथे दीक्षा लेवा तैयार थयो. बीजी बाजु ए आठ कन्यानां माबाप अने जंबूकुमारनां माबाप पण संसार त्यागवा तैयार थया. आ प्रमाणे ८ कन्याओ, १८ माबाप, प्रभव वगेरे ५०० चोर अने जंबूकुमार पोते एम ५२७ जणाए सुधर्मास्वामी पासे दीक्षा अंगीकार करी. जंबूकुमारनी उमर १६ वर्षनी हती. तेओए वीस वर्ष छद्मस्थ अवस्थामां रही गुरूनी For Private and Personal Use Only 1. एकादशांगीनां नाम : १. आचारांग, २. सूयगडांग, ३. ठाणांग, ४. समवायांग, ५. भगवती, ६. ज्ञाताधर्मकथा, ७. उपाशक दशांग, ८. अंतकृत्दशांग, ९. अनुत्तरोपपातिक, १०. प्रश्नव्याकरण अने ११. विपाकसूत्र. Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 30 श्रुतसागर जून-२०१७ सेवा करी. ४४ वर्ष सुधी तेओ युगप्रधानपद उपर रह्या. छेवटे वीर नि.सं.६४मा ८० वर्षनी वये तेओ निर्वाण पाम्या. तेमना निर्वाणनो संवत सूचवती गाथा आ प्रमाणे मळे छे. बारसवरसेहि गोधमो सिद्धो वीराओ वीसहि सुहम्मो। ___ चउसट्ठीए जंबू वुच्छिन्न तत्थ दसठाणा ॥ आ गाथामां जंबूस्वामीना निर्वाण पछी जे दस चीजोनो विच्छेद थयो मानवामां आवे छे ते आ प्रमाणे जाणवी: ___ मणपरमोहि पुलाए आहारग खगवसमे कप्पे। संजमतिय केवल सिज्झणा य जंबूम्मि वुच्छिन्ना॥ आ रीते आ पांचमा आरामां निर्वाण पामनार छेल्लामां छेल्ला महापुरूष ते जंबूस्वामी थया. तेमनी पछी कोइ मोक्षे गयु नथी. ३. प्रभवस्वामी विंध्याचळ पर्वतनी तळेटीमां आवेल जयपुर नगरमां, कात्यायन गोत्रना राजा जयसेनने त्यां तेमनो जन्म थयो हतो. तेमने विनयधर नामनो नानो भाइ हतो. राजाए विनयधरने योग्य जाणी राजगादी तेने आपी, आथी प्रभवने दुःख लाग्यु अने ते देश छोडी चाली नीकळ्यो. भावीना बळे ते भीलनी पल्लीमां जइ ४९९ चोरनो सत्कार बन्यो अने चोरीना धंधाथी पोतानो निर्वाह करवा लाग्यो. एक वार पोताना बधाय साथीओ साथे ते राजगृहीमां जंबूस्वामीना घरमां ज चोरी करवा गयो. ते वखते जंबूकुमार पोतानी स्त्रीओने उपदेश आपता हता. आ उपदेशनी असर प्रभव अने तेना चोरसाथीदारो उपर पण थइ. परिणामे ते बधाए पोतानो अधम धंधो छोडीने जंबस्वामी साथे सुधर्मास्वामी पासे दीक्षा लीधी. दीक्षा वखते तेमनी वय ३० वर्षनी हती. तेमणे ४४ वर्ष गुरुसेवा करी अने ११ वर्ष युगप्रधानपद भोगव्यु. 1. उ. श्री धर्मसागरजी महाराज कृत “तपागच्छपट्टावली” मां लख्युं छे के ‘चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि __ युगप्रधानपर्याये चेति।' 2. त्रणे संयम-चारित्रने एक साथे गणीए तो ज दस वस्तुओ थाय छे, नहीं तो बार थाय छे. 3. जंबूस्वामी अने प्रभवस्वामी वगेरे ५२७ जणाए एकी साथे दीक्षा लीधी हती तेना स्मारकरूपे मथुरामां ५२७ स्तूप बन्या हता. 'हीर सौभाग्य’ काव्यना १४ मा सर्गमां तेनो आ प्रमाणे उल्लेख मळे छ : जंबूप्रभवमुख्यानां मुनीनामिह स प्रभुः। ससप्तविंशतिं पंचशती स्तूपान् प्रणेमिवान् ॥२५०॥ For Private and Personal Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 31 SHRUTSAGAR June-2017 ___ पोतानी पाटने योग्य पुरूषनी तपास करतां तेमने कोइ पण योग्य पुरुष नहीं मळी आवतां तेमणे ज्ञाननो उपयोग मूक्यो. तेमां तेमणे जणायु के - शय्यंभवभट्ट जे ते वखते ब्राह्मण गुरू पासे यज्ञ करावी रह्यो छे ते पोतानी पाटने योग्य छे. आथी पोताना बे शिष्योने तेनी पासे मोकली 'अहो कष्टमहो कष्टं तत्त्वं न ज्ञायते परम्' कहेवरावी तेने उपदेश्यो-के हिंसाथी कांइ ज लाभ नहीं थाय. आथी शय्यंभवे पोताना ब्राह्मण गुरू पासे जइ, तलवार काढी पूज्यु, ‘महाराज, आमां सत्य शुं छे ते कहो!' बीकना मार्या गुरूए तरत जणाव्यु ‘आ यज्ञस्तंभ नीचे शांतिनाथनी प्रतिमा छे. अने तेना प्रभावथी यज्ञनो महिमा फेलायो छे. पछी ए जिनमूर्ति बहार काढी, तेना दर्शनथी प्रतिबोध पामी शय्यंभव भट्टे प्रभवस्वामी पासे दीक्षा लीधी' ___ शय्यंभव भट्टने योग्य जाणी प्रभवस्वामीए शासनधुरा तेमना हाथमां सोंपी. अने अनुक्रमे वीर नि. सं. ७५मां' ८५ वर्षनी वये तेओ स्वर्गे गया. ४. शय्यंभवस्वामी-सूरि तेमनां माता-पितानु नाम नथी मळतुं. तेओ जाते यजुर्वेदी ब्राह्मण हता. तेमनुं गोत्र वक्षस हतुं. एक वखत तेओ राजगृहीमां यज्ञ करावता हता त्यांथी प्रभवस्वामीए तेमने प्रतिबोध पमाडी दीक्षा आपी. ज्यारे तेमणे दीक्षा लीधी त्यारे तेमनी पत्नी सगर्भा हती. थोडा समये तेणे एक पुत्रने जन्म आप्यो. आ पुत्रे पण बाल्यावस्थामां ज पिता पासे दीक्षा लीधी तेनुं नाम मनक मुनि राखवामां आव्यु. दीक्षा पछी ज्यारे गुरूए जाण्यु के तेनुं आयुष्य अल्प छे त्यारे गुरूए पोताना शिष्यनुं जीवन उज्जवळ करवा माटे तेने साधुधर्ममां स्थिर करवाना आशयथी दशवैकालिक सूत्र बनाव्यु. आ ग्रंथना अध्ययनथी छ मासना टूका गाळामां आत्मकल्याण साधी मनक मुनि स्वर्गे गया. जैन सत्यप्रकाश वर्ष-४, पर्युषणपर्व अंकमांथी साभार (क्रमशः) 1. वीरवंशावलीमां लख्यु छे के ‘वीर नि. सं. ७५मां पार्श्वप्रभुनी पट्टपरंपरामां थयेला रत्नप्रभसूरिजीए ओईसा (ओसिया) नगरमां चामुंडा देवीने प्रतिबोधी घणा जीवोने अभयदान दीधुं अने तेनुं नाम साच्चिला (सच्चाईका) पाड्यु. पुनः ए ज नगरीना राजा उदयदेव परमारने प्रतिबोधी तेनी साथे १९९००० गोत्रीओने जैनधर्ममां स्थिर कर्या, अने त्यां पार्श्वप्रभुनी प्रतिमा स्थापी. आ वखतथी उपदेश ज्ञाति अने उपदेशगच्छ स्थपायां, जे अत्यारे ओसवालज्ञातिना नामथी ओळखाय छे. आ रीते ओसवाल समाजना आद्य उत्पादक श्री रत्नप्रभसूरिजी छे. आवी ज रीते भिन्नमालमांथी जे जैनो थया ते श्रीमाल अने पद्मावतीनगरीमाथी जे जैनो थया ते पोरवाल कहेवाया. For Private and Personal Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर 32 जून-२०१७ प्रकाश्यमान नवग्रंथसर्जन व संशोधन-संपादन के क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों के विषय में, जो कि यथासमय प्रकाशित होंगे, हमें आचार्य श्री विजयमुनिचंद्रसूरिजी म.सा. के द्वारा निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त हुई हैं, जो श्रुतसागर के वाचकों तथा संशोधन-संपादन कर रहे विद्वानों हेतु उपयोगी हो सके एतदर्थ यह सूचि प्रकाशित की जा रही है। चिद्रजी क्रम कृतिनाम | कर्तानाम | संपादक/संपादिका | जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति सह | टीकाकार- उपाध्याय | आ.श्री प्रमेयरत्नमंजूषा टीका | श्री शांतिचंद्रजी | विजयमुनिचंद्रसूरिजी | जीवाजीवाभिगमसूत्र सह | टीकाकार- आ.श्री आ.श्री टीका मलयगिरिसूरिजी | विजयमुनिचंद्रसूरिजी | निशीथसूत्र सह भाष्य+चूर्णि | चूर्णिकार- अज्ञात । | मुनि श्री जैनश्रमण | दिव्यरत्नविजयजी ४ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति सह टीका | टीकाकार- उपाध्याय | मुनि श्री | श्री पुण्यसागरजी | पार्श्वरत्नसागरजी ५ | अजितनाथचरितम् | कर्ता- आ.श्री | सा.श्री विनयपूर्णाश्रीजी देवानंदसूरिजी | (आ.श्री ॐकारसूरि | समुदाय) ६ | श्रेणिकचरित्र कर्ता- आ.श्री | सा.श्री हेमगुणाश्रीजी जिनप्रेमसूरिजी | तथा सा.श्री | दिव्यगुणाश्रीजी • वाचकों से अनुरोध है कि इस प्रकार की सूचनाएँ यदि आपके पास उपलब्ध हो, तो कृपया हमें प्रेषित करें। जो अन्य विद्वानों हेतु अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी। संपादक(श्रुतसागर) For Private and Personal Use Only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir सुब्रमण्यम स्वामी को आशीर्वाद देते हए प. पू. गुरु भगवन्त. गुजरात राज्य के शिक्षण मन्त्री श्री भूपेन्द्रसिंह चूडासमा के साथ चर्चा करते हुए प. पू. गुरु भगवन्त. For Private and Personal Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Registered Under RNI Registration No.GUJMUL/2014/66126 SHRUTSAGAR (MONTHLY). Published on 15th of every month and Permitted to Post at Gift City SO, and on 20th date of every month under Postal Regd. No. G-GNR-334 issued by SSP GNR valid up to 31/12/2018. श्री महावीर जैन मायभना सेना, काला, मा. भी केल्यामसागर गरि जान मदिर सर्वाश्रीगुरुत्यानमासकल निसरयायनमीपणमीसहगुरुरायाकविजनमातामरस नीचमश्षणमुपायाशाबारबमषेपछीसास्तणअनुदारा जपानश्मनसुधाया मश्सवपासादालानाला दिल्लीवलेसादायोपदेशी पक्षिसमकिनस्तवि अनादजिसकलधर्मभुम्लादीषश्टाररहितवादरूंजीनिरिहेसवनु कला यहिवाचनादायलयानपूवमसेजी निरपणनीयमाहाराहारगुणसा नावीससाधवीसांजीविंडेश्रणगारणापहिया धर्मजेहोसाव्याकशनीजादयाम नमुणवामा त्रिइस्तत्वधांसद जी पदपचनमारणायापणदरीदरश्चरखना निअरवलीनाकानरदेव गुरस्कदेवधर्ममन्त्रादरूनी जापाम्पासमिकितदेवाहा पामुकंदोकमावादहरासरजीमोगलबानणपंचाजीवडामावणवायलियाजी वर्षपतिसंवाजयणपूजाएकासारसेदीकहीजीवरसषतिगुणषाणानाकरखाली एकदिनवनिगएफजानिमदोरकरूपवषाणामापारगमकताकारसी। जासंध्याडवाहाखवश्थागत्रयमनवादायबजीएसमकितविवहाराणायन देखरामाशातनटालाजीयानिसिरजियाणा एसमकितनपहिला रूपादे श्राविका द्वारा ग्रहण किये गये बारव्रत सज्झाय की हस्तप्रत (लेख क्रम-५) BOOK-POST / PRINTED MATTER प्रकाशक श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबा जि. गांधीनगर 382007 फोन नं. (079) 23276204, 205,252 फेक्स (079) 23276249 Website : www.kobatirth.org email : [email protected] Printed and Published by : HIREN KISHORBHAI DOSHI, on behalf of SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, New Koba, Ta.&Dist. Gandhinagar, Pin-382007, Gujarat. And Printed at : NAVPRABHAT PRINTING PRESS, 9, Punaji Industrial Estate, Dhobighat, Dudheshwar, Ahmedabad-380004 and Published at : SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, New Koba, Ta.& Dist. Gandhinagar, Pin-382007, Gujarat. Editor : HIREN KISHORBHAI DOSHI For Private and Personal Use Only