Book Title: Anekant 1948 03
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Jugalkishor Mukhtar
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष ६ अनेकान्त फाल्गुन, संवत् २००४ :: मार्च, सन् १९४८ संस्थापक-प्रवर्तक वीर सेवामन्दिर, सरसावा सम्पादक-मंडल जुगलकिशोर मुख्तार प्रधान सम्पादक मुनि कान्तिसागर 224 दरबारीलाल न्यायाचार्य अयोध्याप्रसाद गोयलीय डालमियानगर (विहार) 1170 किरण सञ्चालक-व्यवस्थापक भारतीय ज्ञानपीठ, काशी लेखोंपर पारितोषिक 'अनेकान्त' के इस पूरे वर्ष में प्रकाशित सर्वश्रेष्ठ लेखोंपर डेढ़सौ. १५०), सौ १०० और पचास ५०) का पारितोषिक दिया जाएगा । इस पारितोषिक स्पर्धा में सम्पादक, व्यवस्थापक और प्रकाशक नहीं रहेंगे। बाहरके विद्वानोंके लेखोंपर ही यह पारितोषिक दिया जाएगा । लेखोंकी जांच और तत्सम्बन्धी पारितोषिकका निर्णय 'अनेकान्त'का सम्पादक मण्डल करेगा । व्यवस्थापक 'अनेकान्त' Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विषय-सूची विश्व होली होली है ! (कविता)-['युगवीर' २.. समन्तभद्र-भारतीके कुछ नमूने (युक्त्यनुशासन)-[सम्पादक ३. गांधीजीका पुण्य-स्तम्भ-[श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल ४. रत्नकरण्डके कर्तृत्व-विषयमें मेरा विचार और निर्णय-[सम्पादक ५. पं० गोपालदासजी वरैया-[अयोध्याप्रसाद गोयलीय ६, यशोधरचरित्र-सम्बन्धी जैन-साहित्य-[श्रीअगरचन्द नाहटा ७. शङ्का-समाधान-[दरबारीलाल कोठिया ८. भिक्षुक-मनोवृत्ति-[अयोध्याप्रसाद गोयलीय ९. सम्पादकीय-[अयोध्याप्रसाद गोयलीय १०. निरीक्षण और सम्मति-[पं० कैलाशचन्द्र जैन शास्त्री ११. साहित्य-परिचय और समालोचन-[दरबारीलाल कोठिया १०५ १०८ ११३ ११५ ११९ . . १२३ १२४ विद्वत्परिषद्का चतुर्थ वार्षिक अधिवेशन श्री भा० दि. जैन विद्वत्परिषदका चतुर्थ वार्षिक अधिवेशन पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय न्यायाचार्य पं० गणेशप्रसादजी वर्णीकी, जिन्होंने अब शुल्लकके महनीय पदकी दीक्षा ले ली है. अध्यक्षतामें ता० २४. २५ मार्च सन् १९ (झाँसी)में अपूर्व समारोहके साथ सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशनमें भाग लेनेके लिये इन्दौर, बनारस, बड़ौत, सूरत, जबलपुर, सागर, बीनाललितपुर,पपौरा, मथुरा, देहली, मेरठ, सहारनपुर, देहरादून, सरसावा आदि देशके विविध भागोंसे विद्वान् और धार्मिक-जन पधारे थे । क्षुल्लकजी महाराजके संघमें अनेक त्यागी, ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी, दुल्लक श्रादि व्रतीजन पहलेसे ही मौजूद थे और जिनका भी एक महत्वका व्रती सम्मेलन हुआ । अष्टाहिका पर्वका समय होनेके कारण बहुत धार्मिक अानन्द रहा । अनेक लोगोंने व्रतादि ग्रहण किये । वात्सल्य-मूर्ति बाबू रामस्वरूपजी बरुआसागरकी श्रोरसे सिद्धचक्र विधान हुश्रा और अन्य समस्त प्रायोजन भी इन्हींके द्वारा हुए । विद्वानोंके महत्वपूर्ण मार्मिक भाषण हुए। इस अधिवेशनमें विद्वत्परिषद्ने नये अनेक प्रस्ताव पास न कर पुराने प्रस्तावोंको ही तत्परताके साथ अमल में लानेके लिये दोहराया। महात्मा गाँधीकी मृत्युके शोक-प्रस्तावके अतिरिक्त एक महत्वका :नया प्रस्ताव यह किया गया है कि जैनसमाजसे अनुरोध किया जाय कि वह अपने योग्य विद्यार्थियोंको अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, श्रादिकी उच्च शिक्षा प्राप्त करनेके लिये विदेशोंमें भेजनेके वास्ते एक वृहत् छात्रवृत्ति फण्ड कायम करें । इसी फण्डसे विदेशोंमें जैन-संस्कृति अहिंसा-प्रधान जैनधर्मका प्रचार करनेके लिये योग्य विद्वान् भेजे, जो एक वर्ष तक विद्वत्परिषद्के नियन्त्रणमें रहकर उच्चतम धार्मिक शिक्षा और आचरणका अभ्यास करें । अधिवेशनमें और भी अनेक समस्याओंपर गहरा विचार हुआ । वर्णीजी (अब क्षल्लकजी) की अध्यक्षतासे विद्वत्सम्मेलनको एक सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि विद्वानोंमें उच्च चारित्रकी भावना दृढमूल होती जारही है और उसमें पर्याप्त वृद्धिकी श्राशा है । शङ्का-समाधान विभाग पूर्ववत् कायम रहा । उसमें बाबू रतनचन्दजी रि० मुख्तार सहारनपुरका नाम और शामिल किया गया है । इस तरह यह अधिवेशन विचार-लाभ, धर्मलाभ,-सजन-समागम श्रादि कई दृष्टियोसे महत्वपूर्ण रहा । और सनीने वर्णीजीकी अमृतवाणीका अपूर्व लाभ लिया। दरबारीलाल कोठिया For Personal & Private Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वार्षिक मूल्य ५) वर्ष ९ किरण ३ न क विश्व तत्त्व-प्रकाशक ॐ अर्हम् नीतिविरोधध्वंसी लोकव्यवहारवर्तकः सम्यक् । | परमागमस्य बीजं भुवनैकगुरुर्जयत्यनेकान्तः ॥ ( १ ) ज्ञान-गुलाल पास नहि, श्रद्धा 2 समता रङ्ग न रोली है । नहीं प्रेम- पिचकारी कर में केशर - शान्ति न घोली है ॥ स्याद्वादी सुमृदङ्ग बजे नहिं " नहीं मधुर - रस - बोली है । कैसे पागल बने हो चेतन ! कहते 'होली होली है' !! वोर सेवामन्दिर ( समन्तभद्राश्रम), सरसावा, जिला सहारनपुर फाल्गुण, वीरनिर्वाण संवत् २४७३, विक्रम संवत् २००४ होली होली है !! वस्तु तत्त्व-संघोतक भीगी नहीं ज़रा भी देखो -------- एक किरणका मूल्य II) (२) ध्यान - अग्नि प्रज्वलित हुई नहि, कर्मेन्धन न जलाया है । असद्भावका धुआँ उड़ा नह " सिद्ध-स्वरूप न पाया है ॥ मार्च १९४८ For Personal & Private Use Only स्वानुभूतिकी चोली है । पाप-धूलि नहिं उड़ी, कहो फिरकैसे 'होली होली है' !!* रचयिता - 'युगवीर' * श्रीसम्मेदशिखरकी बीसपन्थी कोठीके जैनमन्दिरकी एक दीवारको इस रचनासे अलकृत किया गया है-सुन्दर पेंटिंगद्वारा मोटे अक्षरों में इसे उसपर लिखा गया है। Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त [वर्ष ९ समन्तभद्र भारतीके कुछ नमूने युक्त्यनुशासन प्रवृत्ति-रक्तः शम-तुष्टि-रिक्त रुपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्ग-निष्ठा । प्रवृत्तितः शान्तिरपि प्ररूढं तमः परेषां तव सुप्रभातम् ॥३८॥ 'जो लोग शम और तुष्टिसे रिक्त हैं-क्रोधादिककी शान्ति और सन्तोष जिनके पास नहीं फटकते-(और इस लिये) प्रवृत्ति-रक्त हैं-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील तथा परिग्रहमें कोई प्रकारका नियम अथवा मर्यादा न रखकर उनमें प्रकर्षरूपसे प्रवृत्त हैं-आसक्त हैं-उन (यज्ञवादी मीमांसकों) के द्वारा, प्रवृत्तिको स्वयं अपनाकर, 'हिंसा अभ्युदय (स्वर्गादिकप्राप्ति) के हेतुकी आधारभूत है' ऐसी जो मान्यता प्रचलित की गई है वह उनका बहुत बड़ा अन्धकार है-अज्ञानभाव है । इसी तरह (वेदविहित पशुवधादिरूप) प्रवृत्तिसे शान्ति होती है ऐसी जो मान्यता है वह भी (स्याद्वादमतसे बाह्य) दूसरोंका घोर अन्धकार है क्योंकि प्रवृत्ति रागादिकके उद्रेकरूप अशान्तिकी जननी है न कि अरागादिरूप शान्तिकी । (अतः हे वीरजिन !) आपका मत ही (सकल अज्ञान-अन्धकारको दूर करनेमें समर्थ होनेसे) सुप्रभातरूप है, ऐसा सिद्ध होता है।' शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखैर्देवाकिलाऽऽराध्य सुखाभिगृद्धाः । सिद्धयन्ति दोषाऽपचयाऽनपेक्षा युक्तं च तेषां त्वमृपिने येषाम् ॥३९॥ 'जीवात्माके लिये दुःखके निमित्तभूत जो शीर्षोपहारादिक हैं-अपने तथा बकरे आदिके सिरकी बलि चढ़ाना, गुग्गुल धारण करना, मकरको भोजन कराना, पर्वतपरसे गिरना जैसे कृत्य हैं उनके द्वारा (यक्ष-महेश्वरादि) देवोंकी आराधना करके ठीक वे ही लोग सिद्ध होते हैं-अपनेको सिद्ध समझते तथा घोषित करते हैं-जो दोषोंके अपचय (विनाश) की अपेक्षा नहीं रखते-सिद्ध होनेके लिये राग-द्वेषादि विकारोंको दूर करनेकी जिन्हें पर्वाह नहीं है और सुखाभिगृद्ध हैं-काम सुखादिके लोलुपी हैं !! और यह (सिद्धि-मान्यतारूप प्ररूढ अन्धकार) उन्हींके युक्त है जिनके हे वीरजिन! आप ऋषि-गुरु नहीं अर्थात् इस प्रकारकी घोर अज्ञानताको लिये अन्धेरगर्दी उन्हीं मिथ्यादृष्टियोंके यहाँ चलती है जो आप जैसे वीतदोष-सर्वज्ञ-स्वामीके उपासक नहीं हैं । (फलतः) जो शुद्धि और शक्तिकी पराकाष्ठाको पहुँचे हुए आप जैसे देवके उपासक हैं-आपको अपना गुरु-नेता मानते हैं-(और इसलिये) जो हिंसादिकसे विरक्तचित्त हैं, दया-दम-त्याग-समाधिकी तत्परताको लिये हुए आपके अद्वितीय शासन (मत) को प्राप्त हैं और नय-प्रमाणद्वारा विनिश्चित परमार्थकी एवं यथावस्थित जीवादि तत्त्वार्थों की प्रतिपत्तिमें कुशलमन हैं, उन सम्यग्दृष्टियोंके इस प्रकारकी मिथ्या-मान्यतारूप अन्धेरगर्दी (प्ररूढतमता) नहीं बनती; क्योंकि प्रमादसे अथवा अशक्तिके कारण कहीं हिंसादिकका आचरण करते हुए भी उसमें उनके मिथ्या-अभिनिवेशरूप पाशके लिये अवकाश नहीं होता-वे उससे अपनी सिद्धि अथवा आत्मभलाईका होना नहीं मानते।' यहाँ तकके इस युक्त्यनुशासन स्तोत्रमें शुद्धि और शक्तिकी पराकाष्ठाको प्राप्त हुए वीरजिनेन्द्रके अनेकान्तात्मक स्याद्वादमत (शासन) को पूर्णत: निर्दोष और अद्वितीय निश्चित किया गया है और उससे बाह्य जो सर्वथा एकान्तके आग्रहको लिये मिथ्यामतोंका समूह है उस सबका संक्षेपसे निराकरण किया गया है, यह बात सद्बुद्धिशालियोंको भले प्रकार समझ लेनी चाहिये ।] स्तोत्रे शुक्त्यनुशासने जिनपतेर्वीरस्य निःशेषतः, संप्राप्तस्य विशुद्धि-शक्तिपदवीं-काष्ठां परामाश्रिताम् । निर्णीतं मतमद्वितीयममलं संक्षेपतोऽपाकृतं, तद्वाह्य वितथं मतच सकलं सद्धीधनबुध्यताम् ॥ -विद्यानन्दः For Personal & Private Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाँधीजीका पुण्य - स्तम्भ [श्रीवासुदेवशरण अग्रवाल ] [इस लेख के ले० डॉ० श्रीवासुदेवशरणजी अग्रवाल एक बहुत बड़े प्राच्य विद्या- विशारद विद्वान् है । मथुरा और लखनऊ के म्यूज़ियमों में क्यूरेटर (Curator) के प्रतिष्ठित पदपर रह चुके राजकल न्यू देहलीमें सरकारी पुरातत्त्व विभाग के एक बहुत ऊँचे पदपर आसीन हैं । बड़े ही उदार हृदय एवं सज्जन-स्वभावके महानुभाव हैं । आपने गाँधीजीके पुण्य-स्तम्भके सुझावको लेकर यह जो लेख लिखा वह बड़ा ही महत्वपूर्ण है । इससे विजय - कीर्तिस्तम्भादि विविध स्तम्भोंके प्राचीन इतिहासपर भारी प्रकाश पड़ता है । सहृदय पाठक इसपरसे स्तम्भोंकी दृष्टि और उनके महत्वका कितना ही बोध प्राप्त कर सकते हैं । यह लेख प्रथमतः २२ फरवरी सन् १९४८ के दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकट हुआ है और वहींसे यहाँपर उद्धृत किया जाता है । लेखक महोदय ने हिन्दुस्तानमें मुद्रित लेखको पुनः पढ़कर उसकी अशुद्धियों को सुधार देनेके साथ लेखसम्बन्धी स्तम्भ-चित्रोंके ब्लॉक भी हिन्दुस्तान ऑफिससे दिला देनेकी कृपा की है । इस अनुग्रहके लिये हम आपके बहुत आभारी हैं। साथ ही हिन्दुस्तानके सहायक सम्पादकजीका भी आभार मानते हैं, जिनके सौजन्यसे चित्रोंके ब्लॉक शीघ्र प्राप्त हो सके हैं। - सम्पादक ] "जहाँ वे बैठे वह मन्दिर होगया और जहाँ उन्होंने पैर रखा वह पवित्र भूमि बन गई । " नेहरूजी के ये शब्द गाँधीजीके प्रति राष्ट्रके मनमें भरी हुई देश व्यापी भावना को प्रकट करते हैं। वह एक ज्योति थे | ज्योतिका मन्दिर उनका शरीर, प्रकाश स्तम्भकी तरह जहाँ-जहाँ गया उसने वहाँ वहाँ युग-युगसे फैले हुए अन्धकार और मूर्छाको हटाकर चैतन्य लोक फैला दिया । निखिल भुवनमें भरी हुई दिव्य ज्योति उनके द्वारा जिस-जिस स्थानपर विशेषरूप से प्रकट होती रही वह सब सचमुच पवित्र हैं— न केवल वतमान युगके लिये अपितु आने वाली पोढ़ियोंके लिये भी । कोटानुकोटि जन इस महापुरुषकी वन्दना के लिये आते हुए उनउन स्थानोंमें अपनी श्रद्धाञ्जलि चढ़ायेंगे और हृदय एवं बुद्धि की कृतज्ञता से पूर्ण प्रणाम-भाव अर्पित करेंगे। महान् पुरुष अमर विचारोंके प्रतीक होते हैं। उनके लिये जो स्मारक हम रचते हैं वे उन विचारोंके प्रति हमारे सम्मानके प्रतीक बन जाते हैं । विचार और कर्म इन्हीं दोनोंका समुदित नाम जीवन है । • सुन्दर और लोकोपयोगी जीवन-तत्त्वको किसी एक व्यक्तिने इतनी अधिक मात्रा में इतने थोड़े समयमें और इतने बहुसंख्यक व्यक्तियों के लिये सुलभ और प्रत्यक्ष सिद्ध बनाया हो, इसका उदाहरण भारतके इतिहासमें दूसरा नहीं । हमारे इतिहासका लम्बा भूत-काल अपने समस्त तेज और हितकारी अंशका लेकर गाँधीजीकी आत्मा में प्रविष्ट होगया और उनके शब्दोंमें और कर्मों के द्वारा फूट निकला। वे कर्म और वे शब्द राष्ट्रके भावी जीवनमें सच्चे स्मारककी भाँति स्थायी रहेंगे । भौतिक स्मारक भी इन्हींको चिरजीवन प्रदान करने के साधनमात्र बन सकते हैं । वेदोंके हिरण्यस्तूप वेदोंके समय से इस प्रकार के स्मारकोंकी कल्पना की जासकती हैं, जब दिव्य विचार और दिव्य For Personal & Private Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९२ अनेकान्त वर्ष ९ कर्मोको पृथ्वीके साथ सम्बन्धित करके किसी स्तूप जाते थे उन समारोहोंके स्मारक भी बनाये जाते या स्तम्भके रूपमें स्थायित्व प्रदान किया गया। वेदों- थे। वस्तुतः यह स्मारक वही खम्भे थे जिन्हें यज्ञकी के हिरण्य-स्तूप एक ऋषिके संज्ञक हैं। 'सुनहली वेदीके बीचमें खड़ा किया जाता था और उनके लिए .. ज्योतिका स्तूप' यह नाम अवश्य ही सत्यके उस पुराना पारिभाषिक नाम यूप था । वैदिक यज्ञ-सिद्धांत सुनहले स्वरूपसे लिया गया है जो इस विश्वमें के अनुसार बिना यूपकी स्थितिके कोई यज्ञ नहीं सृष्टिके आदिसे ही स्थापित है । भौतिक पक्षमें किया जा सकता। यज्ञीय कर्म करनेके लिये यूपकी रात्रिके तम और आवरणको हटाकर सूर्यका बड़ा पूर्वस्थिति आवश्यक है। इस सत्यात्मक नियमको सुनहला स्तूप नित्यप्रति हमारे सामने बनता है। हम अपने ही हालके इतिहास में चरितार्थ देखते हैं। सूर्यके रूपमें मानो हम नित्यप्रति उस सत्य और भारतवर्षमें जो राष्ट्रीय यज्ञ किया गया जिसके चारों ज्योति तत्वका एक बड़ा स्मारक देखते हैं, जिसकी ओर देशके लाखों-करोडों आदमी एकत्र होगये उस किरणें सारे संसारमें फैल जाती हैं। अन्धकारपर विराट यज्ञके यूप-स्तम्भ गांधीजी थे। ऋग्वेदकी एक ज्योतिकी, विजय यह इस नाटकीय स्मारकका कल्पना है कि जब देवताओंने पुरुषका सुधार करनेके स्वरूप है। लिये पुरुषमेध यज्ञ करना चाहा तो उस पुरुषको पशु ब्रह्मकी स्तम्भ-रूपसे कल्पना बनाकर उन्होंने उस यज्ञके खम्भेके साथ बाँध लिया। किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण एक दूसरी कल्पना है। इसका तात्पर्य यही है कि मनुष्यमें जितना भी पाशजिसमें ब्रह्मको ही स्तम्भ या खम्भा कहा गया है। विक अंश है उसको हटानेके लिये सर्वप्रथम यज्ञके ईश्वरीय शक्तिका यह स्तम्भ सारे ब्रह्माण्डकी विधृति खम्भेके साथ बाँधकर उसीकी भेंट चढ़ाई गई। है अर्थात् उसके धारण करने वाली नींव, उसके राष्ट्रीय यज्ञमें भी इसीको दोहराया गया और गांधीसंस्थान या ढाँचेको खड़ा रखने वाली दृढ़ टेक और 'रूपी यूपसे बांधकर राष्ट्रका जो, जड़ता और पशुता उसकी रक्षक छत है। बिना ईश्वरीय खम्भेके एक क्षण का अंश था वह धीरे-धीरे मिटाया गया और संस्कृत को भी इस जगतकी स्थिति सम्भव नहीं। यही बनाया गया। सौभाग्यसे कर्मकाण्डीय यज्ञोंके स्मारक गांधीजीकी विलक्षण राम-निष्ठा थी। उनका यह ध्रुव रूप बनाये जाने वाले यज्ञीय स्तम्भ या यूपोंके कई विश्वास कि बिना रामकी इच्छाके कुछ नहीं मिलता अच्छे उदाहरण भारतीय-कलामें प्राप्त हुए हैं । इनमें उसी पुराने सत्यका नई भाषामें उलथा था। सत्य, । दूसरी शताब्दीका मथुराका यज्ञीय स्तम्भ कलाकी दृष्टि धर्म, अमृत, जीवन और प्राण नाना प्रकारके से बहुत महत्वपूर्ण है । इसका निचला भाग चौकोर निर्माणकारी तत्व उसी एक मूल ईश्वरीय खम्भेके और ऊपरका अठकोण है एवं चोटीपर एक सुन्दर अनेक रूप हैं जिनसे हमारा समाज टिका हुआ है। माला पहनाई गई है। चौकोर भागके एक ओर इस प्रकारके महापुरुषरूपी खम्भे जो राष्ट्र और समाज सुन्दर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषामें एक लेख की टेक बनते हैं उसी एक मूल ब्रह्म-स्तम्भके रूपान्तर उत्कीर्ण है जो ई० दूसरी शताब्दीमें राजा वसिष्कके या टुकडे कहे जा सकते हैं। गांधीजी सचमुच इस राज्य कालका है । यह खम्भा यमुनाके किनारे बालूमें एक प्रकारके महान स्तम्भ थे । राष्ट्रकी मानस-भूमिपर गडा हुआ मिला था जहाँ किसी समय वह यज्ञ इस उन्नत स्तम्भकी सत्ता बहुत काल तक अडिग किया गया होगा। रहेगी। महाभारतकी इन्द्रयष्टि वैदिक यज्ञोंके यूप महाभारतके पुराने इतिहासमें राजा उपरिचार वैदिक यज्ञोंके रूपमें जो व्यक्तिगत और सामा- वसुकी एक कहानी दी हुई है, जिसमें यह कल्पना की जिक रीतिसे उदात्त और लोकोपकारी कार्य किये गई है कि समृद्धिशाली राष्ट्रका हँसता-खेलता हुआ For Personal & Private Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] गाँधीजीका पुण्य-स्तम्भ जो स्वरूप है वह एक खम्भा है जिसका सार्वजनिक धर्म-यात्रीके पड़ावके सूचक और भी स्तम्भ बनवाये पूजन अनेक प्रकारसे राष्ट्रकी जनता करती है। इस गये। अशोकका नाम न केवल भारतवर्ष बल्कि खम्भेका नाम वहाँपर इन्द्रयष्टि कहा गया है, और एशियाके इतिहासमें सबसे महत्वपूर्ण है । उसने सबसे इसीके साथकी मालाका नाम वैजयन्ती बताया गया पहले एशियाकी एकताका स्वप्न देखा और अपनी है, जो राष्ट्रीय-विजय-सूचक है । कहा जाता है कि निर्मल दृष्टि और दृढ़ निश्चयसे प्रेम और अहिंसाके राजा वसुने तपश्चर्या की जिससे इन्द्रको डर लगा कि द्वारा मनुष्यका मनुष्यके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेकहीं यह स्वर्ग तो नहीं चाहता। तब इन्द्रने उसके का जो नया प्रयोग उसने चलाया उसमें सम्मिलित तपसे प्रसन्न होकर कहा कि तुम पृथ्वीपर रहते हो होनेके लिये अपने पड़ोसी देशके राजाओंको भी और मैं स्वर्गमें, मैं तुम्हें पृथ्वीपर ही अपना प्रिय मित्र निमंत्रण दिया। देहरादून जिलेमें कालसी नामक बनाता हूं, तुम ऐसा देश बसाओ जहाँके निवासी स्थानकी चट्टानपर खुदे हुए लेखमें उसने सीरिया, धर्मशील और सदा संतुष्ट हों, जो हँसीमें भी झूठ न मिस्र और यूनानके उन राजाओंका नाम दिया है बोलें, जहाँ मनुष्य तो क्या पशुओंपर भी अत्याचार जिनके पास उसने अपने दूत भेजे थे ताकि वे उन्हें न हो, जहाँ सब अपने-अपने कर्तव्य या सधर्मको भी धर्म-विजयका संदेश सुनाएँ । अपने पुत्र महेन्द्र पूरा करें, जहाँ भूमि अच्छी हो और सब तरहका और अपनी पुत्री संघमित्राको सिंहलमें धर्म-प्रचारके धनधान्य पूर्ण हो । ऐसे सब प्रकारसे रमणीय और लिए भेजकर उसने इतिहास में एक अद्भुत उदाहरण ऐश्वर्ययुक्त देशमें तुम राजा बनो । इस प्रकारके सर्व- रखा । अशोकके मनकी यही प्रेरणात्मक शक्ति थी सुखी राष्ट्रकी सूचक यह इन्द्रयष्टि मैं तुमको देता हूँ। जो उसके अनेक देवोत्तर कार्योंके द्वारा प्रकट होती देशका जो मनानन्दी रूप है, उसकी प्रतीक यह है। बर्मा, नैपाल आदि भारतके पड़ोसी देश भी इन्द्रयष्टि है । यष्टिको ही प्राकृतमें लाठी और हिन्दीमें अशोककी धर्म-विजयसे लाभ उठानेमें समर्थ हुए । उसीको लाठ या लाट कहते हैं। इस प्रकारकी यष्टि सम्राटको जितनी स्वदेशकी चिन्ता थी सम्भवतः या स्तम्भके अनेक उदाहरण प्राचीन भारतीय सिक्कों दूसरे देशोंकी उससे कम न थी। स्वदेश और विश्वपर और प्राचीन भारतीयकलामें पाये जाते हैं, जिसमें का-यह विलक्षण समन्वय अशोककं जीवनमें जैसा एक ऊँचे खम्भेपर फहराते हुए दोहरे झण्डेकी आकृति था वैसा ही गांधीजीके जीवनमें भी प्रकट होता है। बनी हुई होती है। . अशोकके धर्मका मूलमन्त्र समवाय या पारस्परिक सम्राट अशोकके धर्मस्तम्भ मेलमिलापपर आश्रित था । 'समवाय एव साधु' इस भारतीय इतिहासमें स्तम्भ और स्मारकोंकी अपने एक वाक्यमें मानो सम्राटने भारत-राष्ट्रकी सर्वोत्तम देन मौर्य सम्राट महाराज अशोकसे हमें सदा-सदाकी विशेषता और जीवनकी आवश्यकताका प्राप्त होती है। अशोकने बुद्धके लगाये हुए छोटेसे निचोड़ बता दिया है। अशोकका साम्राज्य अफगापौधेको राष्ट्रकी शक्तिसे सींचकर संसारव्यापी बना निस्तानसे मैसूर तक फैला हुआ था। उसने सारे राष्ट्र दिया। उनका मन बुद्धके गुणोंका ध्यान करके व्यक्ति में चट्टानों और खम्भोंपर अभिलेख खुदवाये जिनमें गया। उन्होंने बुद्धके जन्मस्थानकी बार-बार सीधे-सादे शब्दोंमें सच्चाईके उन नियमोंको यात्रा की और नेपालकी तराईमें बुद्धके जन्मस्थान बताया गया है जिनसे व्यक्ति, समाज और देशका लुम्बिनी गाँव में एक स्तम्भ बनवाया जिसपर लिखा जीवन उदात्त बनाया जा सकता है । अपने विचारोंके है, “यहाँ भगवानका जन्म हुआ था। यह गाँव अनुसार राष्ट्रका निर्माण करते हुए उसने दीन, दरिद्र, राज-करसे मुक्त किया जाता है ।" पाटलीपुत्रसे दुखी, स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी सबके उद्धार और उन्नतिका लुम्बिनीकी यात्राका मार्ग तय करते हुए संभवतः ध्यान रखा है । इन लेखोंको लिखवाते समय अशोक For Personal & Private Use Only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९४ अनेकान्त [वर्ष ९ के सामने ईरानी सम्राट महान दारा प्रथमका उदाहरण था जिसने तीन-तीन भाषाओंमें बड़े-बड़े लेख बिहिस्तूनं. (प्राचीन भगस्थान अर्थात् देवताओंका स्थान) और सूसा (संस्कृत शूषा) आदि स्थानोंमें अपनी दिग्विजयका डङ्का पीटनेके लिये लिखवाये । वे लेख आज भी अस्तित्वमें हैं और दाराकी हिंसा और मारकाटसे भरे हुए दिग्विजयके चित्रको हमारे सामने लाते हैं । पर अशोककी विजय दूसरे प्रकारकी थी और उसके शब्दोंमें हम एशियाकी आश्वस्त आत्माकी पुकार सुन सकते हैं। अशोकका आदर्श भविष्यके लिये है। दाराका यज्ञ परिमित किन्तु अशोकका अपरिमित है। अशोक सच्चे अर्थों में भारतीय संस्कृतिका पुत्र था। अशोक-स्तम्भोंकी विशेषता भाषा, लिपि और विषयकी दृष्टि से भी अशोकके शिलालेख और स्तम्भलेख अशोक-स्तम्भ जो नन्दगढ़में बना हुआ है। हमारे लिये शिक्षाप्रद हैं। उसने जनताकी बोलचालकी भाषाको अपनाया। रिवाजोंका पचड़ा नहीं था बल्कि जीवनको ऊँचा उसने अपने एक लेखमें कहा कि मैं ठेठ देहातके उठानेके लिये आत्मासे निकली हुई एक सीधी पुकार मनुष्योंके (जानपदस जनस) दर्शन करना चाहता हूँ, थी जो सबकी समझमें आने योग्य थी। अशोकके उनका कुशल-प्रश्न पूछना चाहता हूँ और उन तक लेखोंकी दूसरी विशेषता उनकी ब्राह्मी लिपि है । उस अपने धार्मिक उपदेशोंकी आवाज पहुँचाना चाहता के अक्षर सुन्दर हैं और वह उस समयकी राष्ट्रीय हूँ। जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, यह रीति- लिपि थी। हमारी वर्तमान देवनागरी लिपि उसी International For Personnels Privatyusao Tw Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] गांधीजीका पुण्य-स्तम्भ ९५ अशोक-कालीन ब्राह्मी लिपिका ही विकसित रूप है। पन्द्रह खम्भोंका आँखो देखा वर्णन लिखा है, जिनमें लगभग २२०० वर्षोंसे अशोकके स्तम्भ देशके से कई अब नष्ट होचुके हैं। अब तक अशोशके शैलविभिन्न भागोंमें खड़े हुए उसके यशको उजागर स्तम्भ निम्नलिखित स्थानोंमें मिल चुके हैं:बनाते रहे हैं। अशोकके साढ़े छ: सौ वर्ष बाद आने (१) टोपरा, जिला अम्बाला। (२) मेरठ । (३) वाले चीनी यात्री फाहियानने छः खम्भोंका उल्लेख इलाहाबाद । (४) कौशाम्बी। (५) लौरिया-अरराज । किया है, लेकिन सातवीं शताब्दीमें हर्षके समयमें (६) लौरिया-नन्दनगढ़ (सिंह-शीर्षक-युक्त) । (७) आने वाले चीनी धर्म-यात्री यवान च्वाङ्गने अशोकके रामपुरवा। (८) साँची । (९) सारनाथ । (१०) संकिसा । (११) रुम्मिनि देई (बुद्धका जन्मस्थान)। (१२) निगलीव। हो सकता है इनमेंसे कुछ खम्भे अशोक से पहलेके भी रहे हों, क्योंकि अपने लेखमें उसने एक जगह ऐसा सङ्केत किया है'जहाँ शिलायन्त्र या फलक हों वहाँ यह धर्मलिपि लिखवा दी जाय, जिससे यह चिरस्थायी हो।" भौगोलिक बँटवारेकी दृष्टिसे भी अशोकके लेख विचारणीय हैं। उनमेंसे कुछ तो बुद्धके पवित्रस्थानोंको सूचित करते हैं, जैसे . रुम्मिनिदेईका स्थान, और कुछ उस समयकी बड़ी राजधानियोंको जैसे साँची, सारनाथ और कौशाम्बी आदि । उसके फैले हुए लेखोंसे उसके राज्य और विस्तारकी सीमा मिलती है। संभव है ये सभी दृष्टिकोण सम्राट्के मनमें रहे हों। अशोक-स्तम्भोंकी कला कलाकी दृष्टिसे अशोकके प्रयाग-स्थित अशोक-स्तम्भ खम्भे भारतीय कलाका एक Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९६ अनेकान्त विलक्षण चमत्कार कहे जासकते हैं । पत्थरके खम्भोंपर जो दमक है वह शीशे को भी मात करती है । सत्रहवीं शताब्दी में टौमकोरियेट नामक यात्रीने दिल्लीके खम्भेको तांबेका बना हुआ समझ लिया था । प्रसिद्ध इतिहास-लेखक श्री विन्सेण्ट स्मिथने लिखा है- "पत्थरका काम करने वालोंकी निपुणता इन खम्भोंके निर्माण में अपनी पूर्ण पराकाष्ठाको पहुँच गई थी और उन्होंने वह चमत्कार कर दिखाया जो शायद बीसवीं सदीकी शक्ति से भी बाहर है । तीस-चालीस फुट लम्बे कड़े पत्थर के खम्भोंपर बहुत ही बारीकीका काम हुआ है और ऐसा ओप लगाया गया है जो अब 2 किसी कारीगर की शक्तिसे बाहर है।" सारनाथका सिंह- शीर्षक स्तम्भ इस कलाकी पराकाष्ठाको सूचित करता है । य्वानच्वाङ्गने भी लिखा है कि यह खम्भा उस जगह लगाया गया था जहाँ बुद्धने पहली बार अपने धर्मका उपदेश दिया। यह खम्भा सत्तर फुट ऊँचा था और इसकी दमक यशबकी जैसी थी । अन्तिम बात आज भी ज्यों-की-त्यों सच्ची है । सर जान मार्शलने इस भारतीय कलाकी प्रशंसा Education Intemational अशोक-कालीन एक और स्तम्भ जो हैलीडोरोस नामक स्थानपर स्थित है । [ वर्ष ९ में लिखा है-“शैली और कारीगरी दोनों दृष्टियोंसे यह सर्वोत्कृष्ट है। इसकी नक्काशी भारतीय शिल्पमें अद्वितीय है और मेरे विचार में प्राचीन संसारमें कोई चीज इस क्षेत्रमें इससे बढ़कर नहीं बनी।" सारनाथका सिंहस्तम्भ और उसपर बना हुआ चक्र अब हमारी राष्ट्रीय मुद्रा और चक्रध्वज नामक For Personal & Private Use Only Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण-३ ] राष्ट्रीय झण्डेके साथ सम्बन्धित होगए हैं। इसके द्वारा नवीन भारतने एक प्रकार से अपने आपको अशोककी आत्मा के साथ मिला दिया है । इन खम्भोंके बनाने और कई सौ मील दूर लेजानेका कार्य भी एक बड़ी कठिन समस्या रही होगी । ये सब चुनार के गुलाबी पत्थर के बने हुए हैं । पचास-साठ फुट लम्बे पत्थरोंके बड़े टुकड़ोंको काटकर उन्हें तराशना, डौलियाना और मांठना बहुत ही कठिन कार्य रहा होगा । उस समय के नियर | कितने परिश्रमसे चुनार या पाटलीपुत्रकी केन्द्रीय शिल्पशालासे सुदूर स्थानों तक इन्हें लेगये इसका कुछ अनुमान हम सुलतान फिरोजशाह तुग़लकके वर्णनसे लगा सकते हैं। उसने दिल्लीकी अपनी राजधानीको सजानेके लिए अम्बाला जिलेके टोपरा गाँबसे अशोकका खम्भा उखाड़कर यहाँ खड़ा किया | उसके लिये बयालीस पहियोंकी एक गाड़ी बनाई गई, एक पहियेमें बँधे हुए रस्सेको दोसौ आदमी खींचते थे और खम्भे के सहित सारी गाड़ीके बोको ८४०० आदमी खींच रहे थे । खम्भेको नीचे लाने के लिये एक रूईका पहाड़ बनाया गया और धीरे-धीरे नीचा करके गाड़ीके बराबर लाकर खम्भेको उसपर लादा गया । वहाँसे जब उसे जमुनाके किनारे ये तो कई बड़ी नावोंपर उसे लादा गया और फिर दिल्लीमें उसका स्वागत किया गया। वहाँसे फिर वह खम्भा फिरोजशाह कोटले तक लाकर एक ऊँचे ठिकाने पर खड़ा किया गया। ऐसा करनेके लिए उस समयके बन्धानियोंने देशी ढङ्गसे तैयार होनेवाले रस्से बाँस-बल्लियोंका ठाठ और बालाकुप्पीका प्रयोग किया। इसका वर्णन करने वाली तत्कालीन पुस्तक प्राप्त हुई है जो पुरातत्व विभागसे सानुवाद प्रकाशित हो चुकी है। गाँधीजीका पुण्य-स्तम्भ समुद्रगुप्तका स्तम्भ अशोकके खम्भोंको बादमें भी लोगोंने खूब पसन्द किया होगा । इसका एक उदाहरण यह है कि गुप्त वंशके प्रतापी महाराज समुद्रगुप्तने अपनी दिग्विजयका लेख लिखवानेके लिये अशोकके खम्भे ९७ को ही चुना। उसमें कहा गया है 'कि मानो पृथ्वीने खम्भे के रूपमें आकाशकी ओर अपना ही एक हाथ ऊँचा उठा दिया' । एक यूनानी राजदुतका गरुडध्वज बाहर से आने वाले विदेशियोंने भी खम्भोंकी हिलियोडोरस नामका एक यूनानी राजदूत मध्यभारत परम्पराको अपनाया। पहली शताब्दी ईसवी पूर्व दीक्षित होगया और उसने विष्णुका बहुत सुन्दर के राजाके पास आया था । यहाँ वह भागवत धर्ममें नीचे अठकोना ऊपर सोलह कोना और फिर अन्तमें गरुडध्वज-स्तम्भ भेलसामें स्थापित किया । यह स्तम्भ गोल होगया है । इसका मस्तक पद्माकृति है । खम्भेके निचले भागके एक पहलूपर लेख उत्कीर्ण है जिसमें सत्य, दम और दान रूपी धर्मकी प्रशंसा की गई है। महरौलीका लोह-स्तम्भ प्राचीन कीर्ति स्तम्भों में एक बहुत अच्छा उदाहरण महरौलीका लोह-स्तम्भ है । इसका लोहा १५०० वर्षों से धूप और मेंहका सामना करते हुए भी जङ्गसे बिल्कुल अछूता रहा । इसे स्मिथने 'धातुनिर्माणकी कलाका करिश्मा' कहा है। आज भी संसार में ऐसे कारखानोंकी संख्या थोड़ी ही है जो इतना बड़ा लोहेका लट्ठा ढाल सकें। इस स्तम्भपर खुदा हुआ संस्कृतका लेख चन्द्र नामक राजाका है, जिसने ४०० ई० के लगभग गङ्गासे बल्ल तक के समस्त देशको एकताके सूत्रमें बाँध दिया था । सम्भवतः यह सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य थे, जिनका नाम भारतीय साहित्यके क्षेत्र में अमर है । गुप्तकालीन विजय स्तम्भ गुप्तकाल में पत्थर के बने विजयस्तम्भकी परम्परा और भी फैली। गाजीपुर के भीतरा गाँव में स्कन्दगुप्तका एक खम्भा मिला है जिसके लेख में लिखा है कि उन्होंने अपने भुज- दण्डोंकी शक्तिसे युद्धभूमिमें हूणोंसे लोहा लेकर इस पृथ्वीको कम्पायमान कर दिया । गुप्त कालके बाद भारत में अनेक प्रकारके स्तम्भ बनाये जाने लगे। विशेषकर गुफाओं और मन्दिरोंके For Personal & Private Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९८ लिए बहुत प्रकार के स्तम्भोंका उपयोग होने लगा । अजन्ता की गुफाओं में या एलोराके कैलाश मन्दिर में अथवा चिदम्बरम के सहस्र खम्भों वाले मण्डपमें हम अनेक प्रकारकी कारीगरीसे सुसज्जित अच्छेसे अच्छे खम्भे पाते हैं । इनकी विविधता और संख्याको देखकर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष कला के क्षेत्र में स्तम्भोंका देश रहा है। स्तम्भोंकी निर्माण कला कला की दृष्टि से सुन्दर स्तम्भ के तीन भाग होने चाहिएँ—अधिष्ठान या नीचेका भाग, दण्ड या बीचका भाग और शीर्ष या ऊपरका भाग, इन तीनों के भी और कितने ही अलङ्करण कहे गये हैं । मध्यकाल में प्रायः प्रत्येक बड़े मन्दिरके सामने एक स्वतन्त्र स्तम्भ या मान स्तम्भ बनाने की प्रथा चल पड़ी थी। किन्तु प्राचीन विजय स्तभोंकी परंपरामें कीर्ति स्तम्भ भी बनने लगे थे जो पत्थरकी ऊँची मीनार कहे जा सकते हैं । चित्तौड़में राणा कुम्भाका कीर्ति स्तम्भ इसी प्रकारकी वस्तु है और कलाकी दृष्टिसे बहुत ही आकर्षक है। गांधीजीका पुण्य-स्तम्भ बुद्ध के उपदेशों को उनके शिष्योंने पीछे उनका धर्म अनेकान्त [ वर्ष ९ शरीर समझा था। गांधीजीने भी जो कुछ कहा वह उनके विचारोंका प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होनेके कारण उनका विचार-शरीर कहा जा सकता है। इसकी रक्षा और चिर-स्थितिका प्रयत्न हमारा राष्ट्रीय चित्तौड़का सुप्रसिद्ध विजय स्तम्भ इसे राणा कुम्भाने अपनी विजयके स्मारक में बनवाया था । For Personal & Private Use Onily Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] गाँधीजीका पुण्य-स्तम्भ कर्तव्य है। जिस प्रकार प्रियदर्शी अशोकने जनताकी करने योग्य है। आज प्रचारके अन्य अनेक साधन भाषामें जनताके बोधके लिए अपने विचारोंको लेखों- सुलभ होगये है फिर भी शिल्पकलाके द्वारा महाके द्वारा चिरस्थायी बनाया और यह प्रयत्न किया कि पुरुषोंकी वाणीको अङ्कित करनेका प्रयत्न अवश्य छोटे-बड़े सब तक वे विचार पहुँचाए जा सकें उसी ही आगे आने वाले युगोंके लिए अभिनन्दनीय प्रकारका प्रयत्न अपने अर्वाचीन राष्ट्र-पिताके लिए भी! रहेगा। महरौलीका लोह स्तम्भ Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रत्नकरण्डके कर्तृत्व-विषयमें मेरा विचार और निर्णय [सम्पादकीय] (गत किरणसे आगे) अब मैं प्रो. हीरालालजीकी शेष तीनों आपत्तियों- समय (ईसवी सन् ८१६के लगभग) के पश्चात और पर भी अपना विचार और निर्णय प्रकट कर देना वादिराजके समय अर्थात शक सं० ९४७ (ई० सन् चाहता हूं; परन्तु उसे प्रकट कर देनेके पूर्व यह बतला १०२५) से पूर्व सिद्ध होता है। इस समयावधिके देना चाहता हूँ कि प्रो० साहबने, अपनी प्रथम मूल प्रकाशमें रत्नकरण्डश्रावकाचार और रत्नमालाका आपत्तिको 'जैन-साहित्यका एक विलुप्त अध्याय' रचनाकाल समीप आजाते हैं और उनके बीच नामक निबन्धमें प्रस्तुत करते हुए, यह प्रतिपादन शताब्दियोंका अन्तराल नहीं रहता"'साथ ही आगे किया था कि 'रत्नकरण्डश्रावकाचार कुन्दकुन्दाचार्यके चलकर उसे तीन आपत्तियोंका रूप भी दे दिया; उपदेशोंके पश्चात् उन्हींके समर्थनमें लिखा गया है, परन्तु इस बातको भुला दिया कि उनका यह सब और इसलिये इसके कर्ता वे समन्तभद्र होसकते हैं प्रयत्न और कथन उनके पूर्वकथन एवं प्रतिपादनके जिनका उल्लेख शिलालेख व पावलियोंमें कुन्दकुन्द- विरुद्ध जाता है। उन्हें या तो अपने पूर्वकथनको के पश्चात पाया जाता है। कुन्दकुन्दाचार्य और वापिस ले लेना चाहिये था और या उसके विरुद्ध उमास्वामिका समय वीरनिर्वाणसे लगभग ६५० वर्ष इस नये कथनका प्रयत्न तथा नई आपत्तियोंका पश्चात् (वि सं० १८०) सिद्ध होता है-फलतः रत्न- आयोजन नहीं करना चाहिये था। दोनों परस्पर करण्डश्रावकाचार और उसके कर्तासमन्तभद्रकासमय विरुद्ध बातें एक साथ नहीं चल सकतीं। विक्रमकी दूसरी शताब्दीका अन्तिम भाग अथवा अब यदि प्रोफेसर साहब अपने उस पूर्व कथनको तीसरी शताब्दीका पूर्वार्ध होना चाहिये (यही समय वापिस लेते हैं तो उनकी वह थियोरी (Theory) जैनसमाजमें आमतौरपर माना भी जाता है)। साथ अथवा मत-मान्यता ही बिगड़ जाती है जिसे लेकर ही, यह भी बतलाया था कि 'रत्नकरण्डके कर्ता वे 'जैन-साहित्यका एक विलुप्त अध्याय' लिखनेमें ये समन्तभद्र उन शिवकोटिके गुरु भी होसकते हैं प्रवृत्त हुए हैं और यहाँ तक लिख गये हैं कि 'वोडिकजो रत्नमालाके कर्ता हैं। इस पिछली बातपर सङ्घके संस्थापक शिवभूति, स्थविरावलीमें उल्लिखित आपत्ति करते हुए पं० दरबारीलालजीने अनेक आर्य शिवभूति, भगवती आराधनाके कर्ता शिवार्य युक्तियोंके आधारपर जब यह प्रदर्शित किया कि रत्न- और उमास्वातिके गुरुके गुरु शिवश्री ये चारों एक माला एक आधुनिक प्रन्थ है,रत्नकरण्डश्रावकाचारसे ही व्यक्ति है। इसी तरह शिवभूतिके शिष्य एवं शताब्दियों बादकी रचना है, विक्रमकी ११वीं शताब्दी- उत्तराधिकारी भद्र, नियुक्तियोंके कर्ता भद्रबाहु, द्वादशके पूर्वकी तो वह हो ही नहीं सकती और न रत्न- वर्षीय दुर्भिक्षकी भविष्यवाणीके कर्ता व दक्षिणापथकरण्डश्रावकाचारके कर्ता समन्तभद्रके साक्षात शिष्य को विहार करने वाले भद्रबाहु, कुन्दकुन्दाचार्यके गुरु की कृति ही होसकती है तब प्रो० साहबने उत्तरकी भद्रबाहु, वनवासी सङ्घके प्रस्थापक सामन्तभद्र और धुनमें कुछ कल्पित युक्तियोंके आधारपर यह तो लिख आप्तमीमांसाके कर्ता समन्तभद्र ये सब भी एक दिया कि “रलकरण्डकी रचनाका समय विद्यानन्दके ही व्यक्ति हैं।' १ जैन-इतिहासका एक विलुप्त अध्याय पृ० १८, २०। १ अनेकान्त वर्ष ७, किरण ५-६, पृ० ५४ । २ अनेकान्त २ अनेकान्त वर्ष ६, किरण १२, पृ० ३८०-३८२ । वर्ष ८,कि. ३, पृ० १३२ तथा वर्ष ६, कि. १ पृ०६,१०। For Personal & Private Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] . रत्नकरण्डके कर्तृत्व-विषयमें मेरा विचार और निर्णय १०१ और यदि प्रोफेसर साहब अपने उस पूर्व- को उपलब्ध नहीं है या किसीको भी उपलब्ध नहीं कथनको वापिस न लेकर पिछली तीन युक्तियोंको ही है अथवा वर्तमानमें कहीं उसका अस्तित्व ही नहीं वापिस लेते हैं तो फिर उनपर विचारकी जरूरत ही और पहले भी उसका अस्तित्व नहीं था ? यदि नहीं रहती–प्रथम मूल आपत्ति ही विचारके योग्य प्रो० साहबको वह उल्लेख उपलब्ध नहीं और किसी रह जाती है और उसपर ऊपर विचार किया ही दूसरेको उपलब्ध हो तो उसे अनुपलब्ध नहीं कहा जा चुका है। जासकता-भले ही वह उसके द्वारा अभीतक प्रकाशयह भी होसकता है कि प्रोत्साहबके उक्त विलन में न लाया गया हो। और यदि किसीके द्वारा प्रकाश अध्यायके विरोधमें जो दो लेख (१ क्या नियुक्तिकार में न लाये जानेके कारण ही उसे दूसरोंके द्वारा भी भद्रबाहु और स्वामी समन्तभद्र एक हैं ?, २ शिवभूति, अनुपलब्ध कहा जाय और वर्तमान साहित्यमें उसका शिवार्य और शिवकुमार) वीरसेवामन्दिरके विद्वानों अस्तित्व हो तो उसे सर्वथा अनुपलब्ध अथवा उस द्वारा लिखे जाकर अनेकान्तमें प्रकाशित हुए हैं। और उल्लेखका अभाव नहीं कहा जा सकता । और जिनमें विभिन्न आचार्योंके एकीकरणकी मान्यताका वर्तमान साहित्यमें उस उल्लेखके अस्तित्वका अभाव युक्तिपुरस्सरखण्डन किया गया है तथा जिनका अभीतक तभी कहा जा सकता है जब सारे साहित्यका भले कोई भी उत्तर साढ़े तीन वर्षका समय बीत जानेपर प्रकार अवलोकन करनेपर वह उसमें न पाया जाता हो। भी प्रो० साहबकी तरफसे प्रकाशमें नहीं आया, उन- सारे वर्तमान जैनसाहित्यका अवलोकन न तो प्रो० परसे प्रो० साहबका विलुप्त-अध्याय-सम्बन्धी अपना साहबने किया है और न किसी दूसरे विद्वानके अधिकांश विचार ही बदल गया हो और इसीसे वे द्वारा ही वह अभी तक हो पाया है । और जो भिन्न कथन-द्वारा शेष तीन आपत्तियोंको खड़ा करने- साहित्य लुप्त होचुका है उसमें वैसा कोई उल्लेख नहीं में प्रवृत्त हुए हों । परन्तु कुछ भी हो, ऐसी अनिश्चित था इसे तो कोई भी दृढताके साथ नहीं कह सकता। दशामें मुझे तो शेष तीनों आपत्तियोंपर भी अपना प्रत्युत इसके, वादिराजके सामने शक सं० ९४७ में विचार एव निर्णय प्रकट कर देना ही चाहिये । जब रत्नकरण्ड खूब प्रसिद्धिको प्राप्त था और उससे तदनुसार ही उसे आगे प्रकट किया जाता है। कोई ३० या ३५ वर्ष बाद ही प्रभाचन्द्राचार्यने उसपर (२) रत्नकरण्ड और आप्तमीमांसाका भिन्न- संस्कृत टीका लिखी है और उसमें उसे साफ तौरपर कतृत्व सिद्ध करनेके लिये प्रो० साहबकी स्वामी समन्तभद्रकी कृति घोषित किया है, तब जो दूसरी दलील (युक्ति) है वह यह है कि "रत्न- उसका पूर्व साहित्यमें उल्लेख होना बहुत कुछ स्वाकरण्डका कोई उल्लेख शक संवत् ९४७ (वादिराजके भाविक जान पड़ता है । वादिराजके सामने कितना पार्श्वनाथचरितके रचनाकाल) से पूर्वका उपलब्ध ही जैनसाहित्य ऐसी उपस्थित था जो आज हमारे नहीं है तथा उसका आप्तमीमांसाके साथ एककतृत्व सामने उपस्थित नहीं है और जिसका उल्लेख उनके बतलाने वाला कोई भी सुप्राचीन उल्लेख नहीं पाया ग्रंथोंमें मिलता है। ऐसी हालतमें पूर्ववर्ती उल्लेखका जाता।" यह दलील वास्तवमें कोई दलील नहीं है; उपलब्ध न होना कोई खास महत्व नहीं रखता और क्योंकि उल्लेखाऽनुपलब्धिका भिन्नकर्तृत्वके साथ न उसके उपलब्ध न होने मात्रसे रत्नकरण्डकी रचनाकोई अविनाभावी सम्बन्ध नहीं है-उल्लेखके न को वादिराजके सम-सामयिक ही कहा जा सकता है, मिलनेपर भी दोनोंका एक कर्ता होनेमें स्वरूपसे कोई जिसके कारण प्राप्तमीमांसा और रत्नकरण्डके भिन्न बाधा प्रतीत नहीं होती। इसके सिवाय यह प्रश्न पैदा कतृत्वकी कल्पनाको बल मिलता। होता है कि रत्नकरण्डका वह पूर्ववर्ती उल्लेख प्रो. सा. दसरी बात यह है कि उल्लेख दो प्रकारका होता १ अनेकान्त वर्ष ६, कि० १०-११ और वर्ष ७, कि० १-२ है-एक ग्रन्थनामका और दूसरा ग्रन्थके साहित्य For Personal & Private Use Only Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०२ अनेकान्त [वर्ष ९ तथा उसके किसी विषय-विशेषका । वादिराजसे पूर्व- तौरपर प्रो० साहबके सामने यह बतलानेके लिये का जो साहित्य अभीतक अपनेको उपलब्ध है उसमें रक्खे गये कि 'रत्नकरण्ड सर्वार्थसिद्धिके कर्ता पूज्ययदि ग्रन्थका नाम 'रत्नकरण्ड' उपलब्ध नहीं होता पादसे भी पूर्वकी कृति है और इसलिये रत्नमालाके तो उससे क्या ? रत्नकरण्डका पद-वाक्यादिके रूपमें कर्ता शिवकोटिके गुरु उसके कर्ता नहीं हो सकते' तो साहित्य और उसका विषयविशेष तो उपलब्ध होरहा उन्होंने उत्तर देते हुए लिख दिया कि "सर्वार्थसिद्धिहै, तब यह कैसे कहा जा सकता है कि 'रत्नकरण्डका कारने उन्हें रत्नकरण्डसे नहीं लिया, किन्तु सम्भव कोई उल्लेख उपलब्ध नहीं है' ? नहीं कहा जा सकता। है रत्नकरण्डकारने ही अपनी रचना सर्वार्थसिद्धिके श्रा० पूज्यपादने अपनी सर्वार्थसिद्धिमें स्वामी समन्त- आधारसे की हो"। साथ ही रत्नकरण्डके उपान्त्यभद्रके ग्रन्थोंपरसे उनके द्वारा प्रतिपादित अर्थको कहीं पद्य 'येन स्वयं वीतकलङ्कविद्या को लेकर एक नई शब्दानुसरणके, कहीं पदानुसरणके, कहीं वाक्यानु- कल्पना भी कर डाली और उसके आधारपर यह सरणके, कहीं अर्थानुसरणके, कहीं भावानुसरणके, घोषित कर दिया कि 'रत्नकरण्डकी रचना न केवल कहीं उदाहरणके, कहीं पर्यायशब्दप्रयोगके और कहीं पूज्यपादसे पश्चात्कालीन है, किन्तु अकलङ्क और व्याख्यान-विवेचनादिके रूपमें पूर्णतः अथवा अंशतः विद्यानन्दसे भी पीछेकी है । और इसीको आगे अपनाया है-ग्रहण किया है और जिसका प्रदर्शन चलकर चौथी आपत्तिका रूप दे दिया । यहाँ भी प्रो० मैंने 'सर्वार्थसिद्धिपर समन्तभद्रका प्रभाव' नामक साहबने इस बातको भुला दिया कि 'शिलालेखोंके. अपने लेखमें किया है। उसमें प्राप्तमीमांसा. स्वयं- उल्लेखानुसार कुन्दकुन्दाचार्यके उत्तरवर्ती जिन भूस्तोत्र और युक्त्यनुशासनके अलावा रत्नकरण्ड- समन्तभद्रको रत्नकरण्डका कर्ता बतला आए हैं श्रावकाचारके भी कितने ही पद-वाक्योंको तुलना उन्हें तो शिलालेखोंमें भी पूज्यपाद, अकलङ्क और करके रक्खा गया है जिन्हें सर्वार्थसिद्धिकारने अप- विद्यानन्दके पूर्ववर्ती लिखा है, तब उनके रत्ननाया है, और इस तरह जिनका सर्वार्थसिद्धिमें उल्लेख करण्डकी रचना अपने उत्तरवर्ती पूज्यपादादिके बाद पाया जाता है । अकलङ्कदेवके तत्त्वार्थराजवार्तिक की अथवा सर्वार्थसिद्धि के आधारपर की हुई कैसे हो और विद्यानन्दके श्लोकवार्तिकमें भी ऐसे उल्लेखोंकी सकती है ?' अन्तः इस विषयमें विशेष विचार चौथी कमी नहीं है। उदाहरणके तौरपर तत्त्वार्थसूत्र-गत आपत्तिके विचाराऽवसरपर ही किया जायगा। ७वें अध्यायके 'दिग्देशाऽनर्थदण्ड' नामक २१ वें यहाँपर मैं साहित्यिक उल्लेखका एक दूसरा स्पष्ट सूत्रसे सम्बन्ध रखने वाले "भोग-परिभोग-संख्यानं उदाहरण ऐसा उपस्थित कर देना चाहता हूँ जो पञ्चविधं त्रसघात-प्रमाद-बहवधाऽनिष्टाऽनुपसेव्य- ईसाकी ७वीं शताब्दीके ग्रन्थमें पाया जाता है और विषयभेदात्" इस उभय-वार्तिक-गत वाक्य और वह है रत्नकरण्डश्रावकाचारके निम्न पद्यका सिद्धइसकी व्याख्याओंको रत्नकरण्डके 'सहतिपरि सेन के न्यायावतारमें ज्योंका त्यों उद्धृत होनाहरणार्थ,' 'अल्पफलबहुविघातात्,' 'यदनिटं तद् आप्नोपज्ञमनुल्लंध्यमदृष्टेष्ट-विरोधकम् । तत्त्वोपदेशकृत्सा शास्त्रं कापथ-घदनम् ॥९॥ व्रतयेत्' इन तीन पद्यों (न०८४, ८५, ८६) के साथ यह पद्य रत्नकरण्डका एक बहुत ही आवश्यक तुलना करके देखना चाहिये, जो इस विषयमें अपनी अङ्ग है और उसमें यथास्थान-यथाक्रम मूलरूपसे खास विशेषता रखते हैं। पाया जाता है। यदि इस पद्यको उक्त ग्रन्थसे अलग __परन्तु मेरे उक्त लेखपरसे जब रत्नकरण्ड और कर दिया जाय तो उसके कथनका सिलसिला ही सर्वार्थसिद्धिके कुछ तुलनात्मक अश उदाहरणके बिगड जाय । क्योंकि ग्रन्थमें, जिन आप्त, आगम १ अनेकान्त वर्ष ५, किरण १०-११, पृ० ३४६ ३५२ (शास्त्र) और तपोभृत् (तपस्वी) के अष्ट अङ्गसंहित For Personal & Private Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] रत्नकरण्डके कर्तृत्व-विषयमें मेरा विचार और निर्णय १०३ और त्रिमूढतारहित श्रद्धानको सम्यग्दर्शन बतलाया रूपसे उल्लेख करनेकी जरूरत होती, बल्कि उसीमें गया है उनका क्रमशः स्वरूप निर्देश करते हुए, इस अन्तर्भूत है । टीकाकारने भी शाब्दके 'लौकिक' और पद्यसे पहले 'श्राप्त' का और इसके अनन्तर 'तपोभृत' 'शास्त्रज' ऐसे दो भेदोंकी कल्पना करके, यह सूचित का स्वरूप दिया है; यह पद्य यहाँ दोनोंके मध्यमें किया है कि इन दोनोंका ही लक्षण इस आठवें पद्यअपने स्थानपर स्थित है, और अपने विषयका एक में आगया है' । इससे ९वें पद्यमें शाब्दके 'शस्त्राज' ही पद्य है । प्रत्युत इसके, न्यायावतारमें, जहाँ भी यह भेदका उल्लेख नहीं, यह और भी स्पष्ट होजाता है। नम्बर ९ पर स्थित है, इस पद्यकी स्थिति मौलिकता- तीसरे, ग्रन्थभरमें, इससे पहले, 'शास्त्र' या 'आगमकी दृष्टि से बहुत ही सन्दिग्ध जान पड़ती है-यह उसका , शब्दका कहीं प्रयोग नहीं हुआ जिसके स्वरूपका कोई आवश्यक अङ्ग मालूम नहीं होता और न इसको प्रतिपादक ही यह ९ वाँ पद्य समझ लिया जाता, निकाल देनेसे वहाँ ग्रन्थके सिलसिलेमें अथवा उसके और न 'शास्त्रज' नामके भेदका ही मूलग्रन्थमें कोई प्रतिपाद्य विषयमें ही कोई बाधा आती है। न्याया- निर्देश है जिसके एक अवयव (शास्त्र) का लक्षणवतारमें परोक्ष प्रमाणके 'अनुमान' और 'शब्द' ऐसे प्रतिपादक यह पद्य हो सकता । चौथे, यदि यह कहा दो भेदोंका कथन करते हुए, स्वार्थानुमानका प्रतिपादन जाय कि वें पद्यमें 'शाब्द' प्रमाणको जिस वाक्यसे और समर्थन करनेके बाद इस पद्यसे ठीक पहले उत्पन्न हुआ बतलाया गया है उसीका 'शास्त्र' नामसे 'शाब्द' प्रमाणके लक्षणका यह पद्य दिया हुआ है- अगले पद्यमें स्वरूप दिया गया है तो यह बात भी 'दृष्टेष्टाव्याहताद्वाक्यात् परमार्थाभिधायिनः । नहीं बनती; क्योंकि ८ वें पद्यमें ही 'दृष्टेष्टाव्याहती' तत्त्वग्राहितयोत्पन्नं मानं शाब्दं प्रकीर्तितम् ।।।। आदि विशेषणोंके द्वारा वाक्यका स्वरूप दे दिया गया इस पद्यकी उपस्थितिमें इसके बादका उपर्यक्त है और वह स्वरूप अगले पद्यमें दिये हुए शास्त्रके पद्य, जिसमें शास्त्र (आगम) का लक्षण दिर स्वरूपसे प्रायः मिलता जुलता है-उसके 'दृष्टेष्टा व्याहत' का 'अदृष्टेष्टाविरोधक' के साथ साम्य है कई कारणोंसे व्यर्थ पड़ता है । प्रथम तो उसमें शास्त्रका लक्षण आगम-प्रमाणरूपसे नहीं दिया-यह नहीं और उसमें 'अनुल्लंघ्य' तथा 'आप्तोपज्ञ' विशेषणोंबतलाया कि ऐसे शास्त्रसे उत्पन्न हुआ ज्ञान भागम का भी समावेश हो सकता है; 'परमार्थाभिधायि' विशेषण 'कापथघटन' और 'सार्व' विशेषणोंके भावप्रमाण अथवा शाब्दप्रमाण कहलाता है; बल्कि का द्योतक है; और शाब्दप्रमाणको 'तत्त्वग्रा.हसामान्यतया आगमपदार्थके रूपमें निर्दिष्ट हुआ है, जिसे 'रत्नकरण्डमें सम्यग्दर्शनका विषय बतलाया । तयोत्पन्न प्रतिपादन करनेसे यह स्पष्ट ध्वनित है कि गया है। दूसरे, शाब्दप्रमाणसे शास्त्रप्रमाण कोई भिन्न वह वाक्य 'तत्त्वोपदेशकृत्' माना गया है-इस तरह वस्तु भी नहीं है, जिसकी शाब्दप्रमाणके बाद पृथक् दोनों पद्योंमें बहुत कुछ साम्य पाया जाता है । ऐसी हालतमें समर्थनमें उद्धरणके सिवाय ग्रन्थ सन्दर्भके १ सिद्धर्षिकी टीकामें इस पद्यसे पहले यह प्रस्तावना-वाक्य साथ उसकी दूसरी कोई गति नहीं; उसका विषय दिया हुअा है-“तदेवं स्वार्थानुमानलक्षणं प्रतिपाद्य पुनरुक्त ठहरता है। पाँचवें, ग्रन्थकारने स्वयं अगले तद्वतां भ्रान्तताविप्रतिपत्तिं च निराकृत्य अधुना प्रतिपादित- पद्यमें वाक्यको उपचारसे 'परार्थानुमान' बतलाया परार्थानुमानलक्षण एवाल्पवक्तव्यत्वात् तावच्छान्द- है। यथालक्षणमाह"। स्व-निश्चयवदन्येषां निश्चयोत्पादनं बुधैः । २ स्व-परावभासी निर्बाध ज्ञानको हीन्यायावतारके प्रथम पद्यमें पराथै मानमाख्यातं वाक्यं तदुपचारतः ॥१०॥ प्रमाणका लक्षण बतलाया है, इसलिये प्रमाणके प्रत्येक १"शाब्दं च द्विधा भवति-लौकिक शास्त्रजं चेति । भेदमें उसकी व्याप्ति होनी चाहिये । तत्रेदं द्वयोरपि साधारणं लक्षणं प्रतिपादितम्"। For Personal & Private Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०४ अनेकान्त [ वर्ष ९ इन सब बातों अथवा कारणोंसे यह स्पष्ट है कि अनुसार यह कह ही नहीं सकते कि वह ग्रन्थका न्यायावतारमें 'आप्तोपज्ञ' नामक ९वें पद्यकी स्थिति अङ्ग नहीं-ग्रन्थकारके द्वारा योजित नहीं हुआ बहुत ही सन्दिग्ध है, वह मूल ग्रन्थका पद्य मालूम अथवा ग्रन्थकारसे कुछ अधिक समय बाद उसमें नहीं होता । उसे मूलग्रन्थकार-विरचित ग्रन्थका प्रविष्ट या प्रक्षिप्त हुआ है। चुनाँचे प्रो० साहबने वैसा आवश्यक अङ्ग माननेसे पूर्वोत्तर पद्योंके मध्यमें उसकी कुछ कहा भी नहीं और न उस पद्यके न्यायावतारमें स्थिति व्यर्थ पड़ जाती है, ग्रन्थकी प्रतिपादन-शैली उद्धृत होनेकी बातका स्पष्ट शब्दोंमें कोई युक्तिपुरस्सर भी उसे स्वीकार नहीं करती, और इसलिये वह विरोध ही प्रस्तुत किया है-वे उसपर एकदम अवश्य ही वहाँ एक उद्धृत पद्य जान पड़ता है, जिसे मौन हो रहे हैं । 'वाक्य'के स्वरूपका समर्थन करनेके लिये रत्नकरण्डपरसे 'उक्तञ्च' आदिके रूपमें उदधत किया गया है। अतः ऐसे प्रबल साहित्यिक उल्लेखोंकी मौजूदगीउद्धरणका यह कार्य यदि मूलग्रन्थकारके द्वारा नहीं में रत्नकरण्डको विक्रमकी ११वीं शताब्दीकी रचना. .. हुआ है तो वह अधिक समय बादका भी नहीं है: अथवा रत्नमालाकारके गुरुकी कृति नहीं बतलाया क्योंकि विक्रमकी १०वीं शताब्दीके विद्वान आचार्य जा सकता और न इस कल्पित समयके आधारपर सिद्धर्षिकी टीकामें यह मूलरूपसे परिगृहीत है, जिससे उसका आप्तमीमांसासे भिन्नकतत्व ही प्रतिपादित यह मालूम होता है कि उन्हें अपने समयमें न्याया किया जा सकता है । यदि प्रो० साहब साहित्यके वतारकी जो प्रतियाँ उपलब्ध थीं उनमें यह पा उल्लेखादिको कोई महत्व न देकर ग्रन्थके नामोल्लेखमूलका अङ्ग बना हुआ था। और जबतक सिद्धर्षिसे को ही उसका उल्लेख समझते हों तो वे प्राप्तमीमांसापूर्वकी किसी प्राचीन प्रतिमें उक्त पद्य अनुपलब्ध न को कुन्दकुन्दाचार्यसे पूर्वकी तो क्या, अकलङ्कके हो तबतक प्रो० साहब तो अपनी विचार-पद्धति के समयसे पूर्वकी अथवा कुछ अधिक पूर्वकी भी नहीं कह सकेंगे; क्योंकि अकलङ्कसे पूर्वके साहित्यमें उसका १ प्रो० साहबकी इस विचारपद्धतिका दर्शन उस पत्रपरसे नामोल्लेख नहीं मिल रहा है। ऐसी हालतमें प्रो० भले प्रकार होसकता है जिसे उन्होंने मेरे उस पत्रके साहबकी दूसरी आपत्तिका कोई महत्व नहीं रहता, उत्तरमें लिखा था जिसमें उनसे रत्नकरण्डके उन सात वह भी समुचित नहीं कही जा सकती और न उसके पद्यों की बाबत सयुक्तिक राय माँगी गई थी जिन्हें मैंने द्वारा उनका अभिमत ही सिद्ध किया जा सकता है। रत्नकरण्डकी प्रस्तावनामें सन्दिग्ध करार दिया था और (अगली किरणमें समाप्त) जिस पत्रको उन्होंने मेरे पत्र-सहित अपने पिछले लेख (अनेकान्त वर्ष ६ कि० १ पृ० १२) में प्रकाशित किया है। वीरसेवामन्दिरको सहायता श्रीमान् ला० घनश्यामदासजी जैन सङ्घी मुलतान वाले प्रोप्राइटर 'इन्द्राहोजरी मिल्स' जयपुरने, । पं० अजितकुमारजी शास्त्रीकी प्रेरणाको पाकर स्वर्गीय ला विहारीलालजीके दानमेंसे १२५) रु० वीरसेवामन्दिरको उसकी लायब्रेरीकी सहायतार्थ प्रदान किये हैं। इसके लिये उक्त लाला साहब और शास्त्रीजी दोनों ही धन्यवादके पात्र हैं। अधिष्ठाता For Personal & Private Use Only Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हमारे पूर्वज - पं. गोपालदासजी वरैया [ लेखक अयोध्याप्रसाद गोयलीय ] आर्यसमाजमें जो स्थान स्वामी श्रद्धानन्द, रायजादा हंसराज और मुस्लिम क़ौममें सर सैयद अहमद - का है वही स्थान जैनसमाजमें पं० गोपालदासजी वरैयाको प्राप्त है। जिस समय जैनसमाज अपने धर्मसे अनभिज्ञ मिध्यान्धकार में फंसा हुआ था, उसके चारों ओर शिक्षा - प्रसारका उज्ज्वल प्रकाश फैल रहा था, और उसकी चकाचौंध से चुन्धियाकर इधर-उधर ठोकरें खा रहा था, तभी उसके हाथमें धर्मज्ञानका दीपक देकर वरैयाजीने उसे यथार्थ मार्ग देखने का अवसर दिया । आज जो जैन समाजमें सर्टीफिकेट शुदा विद्वद्वर्ग नजर आ रहा है, उसमें अधिकांश उनके शिष्यों और प्रशिष्योंका हो समूह अधिक है । वरैयाजीका आविर्भाव होने से पूर्व भारतमें धर्मशिक्षा प्रसार और सम्प्रदाय संरक्षण की होड़ सी लगी हुई थी। आर्यसमाज समूचे भारतमें ही नहीं, अरब, ईरान में भी वैदिकधर्मका झण्डा फहरानेका मनसूबा डंके की चोट जाहिर कर रहा था; उसके गुरुकुल, महाविद्यालय, हाईस्कूल और कालेज पनवाड़ीकी दुकान की तरह तीव्रगति से खुलते जारहे थे । मुसलमानोंके भी देवबन्दमें धार्मिक और अलीगढ़में राज्यशिक्षा-प्रणालीके केन्द्र खुल चुके थे। ईसाइयोंकी तो होड़ ही क्या, हर शहर में मिशन-शिक्षा केन्द्रों का जालसा बिछ गया था । लाखों की संख्यामें धार्मिक ट्रेक्ट वितरित ही नहीं होरहे थे, अपितु वपित्समां दिया आरहा था । केवल अभागा जैनसमाज खिसियाना सा कर्मण्य बना अलग-अलग खड़ा था । शायद अकलङ्क और समन्तभद्रको आत्मा जैनसमाजकी इस दयनीय स्थितिसे द्रवीभूत होगई और उन्होंने अपना अलौकिकज्ञान और शास्त्रार्थकी प्रतिभा देकर फिर एकबार जैनधर्मकी दुन्दुभि बजानेको इस कृशकाय सलौने व्यक्तिको उत्साहित किया । बरैयाजीने जो अभुतपूर्व कार्य किया, भले ही हम काहिल शिष्योंद्वारा वह लिखा नहीं गया है; परन्तु उनके महत्वपूर्ण कार्य के साक्षी आज आचार्य, तीर्थ, शास्त्री और पंडित रूप में समाज में सर्वत्र देखने को मिलते हैं । हमारे यहां तीर्थङ्कका प्रामाणिक जीवन-चरित्र नहीं, श्राचार्योंके कार्य-कलापकी तालिका नहीं, जैनसंघके लोकोपयोगी कार्योंकी कोई सूची नहीं, जैन - जाओ, मन्त्रियों, सेनानायकोंके बल पराक्रम और शासन प्रणालीका कोई लेखा नहीं साहित्यिकों का कोई परिचय नहीं, और और हमारी आंखोंके सामने कल - परसों गुजरने वाले - दयाचन्द्र गोयलीय, बाबू देवकुमार, जुगमन्दरदास जज्र, वैरिस्टर चम्पतराय, ब्र० शीतलप्रसाद, बा० सूरजभान, अर्जुनलाल सेठी आदि विभूतियोंका जिक्र नहीं, और ये जो हमारे २-४ बड़े बूढ़े मौतकी चौखटपर खड़े हैं, इनसे भी हमने इनकी विपदाओं और अनुभवोंको नहीं सुना है। और शायद भविष्य में एक पीढ़ीमें जन्म लेकर मर जाने वालों तक के लिये उल्लेख करने का हमारे समाजको उत्साह नहीं होगा । मेरे होश सम्हालने - कार्य क्षेत्र में आने से पूर्व ही वरैयाजी स्वर्गस्थ हो गये, न मैं उनके दर्शनों का ही पुण्य प्राप्त कर सका, न उनके सम्बन्धमें ही विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सका । केवल एक लेख उनकी मृत्युउपरान्त शायद पं०मक्खनलालजी न्यायालङ्कारका For Personal & Private Use Only Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १०६ अनेकान्त [ वर्ष सरस्वतीमें उस समय पढ़ा था। उनके दर्शन न हुए भाड़ा दिये बिना पार करना. चुङ्गीवालोंको चकमा तो न सही, उनकी कार्यस्थली मौरेनाको रज ही किसी देना, स्टेशन बाबुओंको झांसा देना, कुलियों-तांगेतरह मस्तकपर लगाऊँ. उनके समवयस्क और सह- वालोंको बातोंमें राजी करना, थडेको भी विस्तर योगियोंसे उनके संस्मरण सुनकर कानोंको तृप्त करूँ बिछाकर सेकिण्ड बना लेना, धर्मशालाके चपरासिऐसी प्रबल इच्छा बनी रहती थी कि दिसम्बर १६४० योंसे भी भरपुर सविधा लेना और इनामकी जगह में परिषद्के कार्यकर्ताओंके साथ मौरेना जानेका अव- अंगूठा दिखा देने में जो जितना प्रवीण होता है, वही सर भी प्राप्त हो गया। वरैयाजीके साझीदार ला० प्रवासमें रखने के लिये उपयुक्त समझा जाता है । अयोध्याप्रसाद के तथा बा० नेमिचन्द वकील आदि वरैयाजी इस शिक्षामें कोरे थे। इन्हें शिक्षित और १०-१२ बन्धुओंसे रातभर वरैयाजीके सम्बन्धमें चतुर समझकर टिकिट लाने का कार्य दिया गया । ये कुरेद-कुरेद कर बातें जानने का प्रयत्न किया किन्तु टिकिटोंमें कुछ कतरब्योंत तो क्या करते उल्टा लगेज एक-दो घटनाके सिवा कुछ नहीं मालूम हो सका। तुलवाकर उसका भी भाड़ा दे आये। . आज उन्हीं स्मृतिको धुन्धली रेखाओंको कागजपर सेठ और रायबहादुर होकर उनका सामान तुल . ' खींचनेका प्रयास कर रहा हूं। जाए इससे अधिक और सेठ साहबका क्या अपमान जिन सज्जनोंको उनके सम्बन्धमें कुछ उल्लेख- होता ? धनियोंके यहां चापलूस और चुगलखोरोंकी नीय बातें मालूम हों, या पत्र सुरक्षित हों, वे हमारे क्या कमी ? उन्होंने वरैयाजीके बुड़बक होनेका ऐसा पास कृपा-पूर्वक भिजवाएँ । हम उनका उपयोगी सजीव वर्णन किया कि वेचारे शिकारपुरी न होते हुए अंश धन्यवादपूर्वक अनेकान्तमें प्रकाशित करेंगे। भी सेठ साहबकी नजरों में शिकारपुरी होकर रह गये। ऐसे ही छोटे छोटे संस्मरण और पत्र इतिहास-निर्मा- जहां सत्यका प्रवेश नहीं, यथार्थ बात सुननेका चलन णकी बहुमूल्य सामग्री बन जाते हैं। जैनसमाजके नहीं। धोखा, छल, फरेब, मायाचार ही जहां अन्य कार्यकर्ताओंके भी संस्मरण और पत्र भेजने के उन्नतिके साधन हों बिलफ और चकमा खाना ही लिये हम निमन्त्रण देते हैं। भले ही वह संस्मरण जहां अभीष्ट हो वहां वरैयाजी कितने दिन निभते ? और पत्र साधारणसे प्रतीत होते हों, फिर भी उन्हें किनाराकशी ही स्वाभिमानको रक्षाके लिये उन्होंने भिजवाइये। न जाने उसमें क्या कामकी बात आवश्यक समझी। निकल आये। यह मूर्खता करके वरैयाजी पछताये नहीं, यह - सामाजिक क्षेत्र में आनेसे पूर्व किसी समय वरैया अचौर्यव्रत्त उनके पश्चाणुव्रत्तोंमेंसे तीसरा आवश्यक जी एक रायबहादुर सेठ के यहां ३०) रु० मासिक- व्रत्त था। एकवार वे सपरिवार बम्बईसे आगरे पर कार्य करते थे। एकबार सेठ साहब आपको भी आये। घर आकर कई रोज़ बाद मार्ग-व्यय आदि तीर्थयात्रामें अपने साथ ले गये । शास्त्रप्रवचनके लिखा तो मालूम हुआ नौकरने उनके तीन वर्षके साथ-साथ गुमास्तेको उपयोगिताका भी विचार करके बालकका टिकट ही नहीं लिया। मालूम होनेपर बड़ी इन्हें साथ लिया गया था । वरैयाजी शास्त्र-प्रवचन आत्मग्लानि हुई और आपने तत्काल स्टेशनमास्टरके में तो पटु थे। किन्तु गुमास्तगीरीकी कलामें कोरे पास पहुंचकर क्षमा याचना करते हुए टिकिटका मूल्य थे। सफरमें रेल्वे टिकिटोंकी कतरव्योंत, लगेज, उनकी मेजपर रख दिया। स्टेशनमास्टरने समझाया * सम्भवतया यही नाम था, यदि भूलसे दूसरा कि २॥ वर्षसे अधिककी आयुपर टिकट लेनेका नियम नाम लिखा गया हो तो वे बन्धु क्षमा करेंगे। है तो पर कौन इस नियमका पालन करता है। हम तो + नाम मैंने जान बूझकर नहीं लिखा है। ४-५ वर्षके बालकको नजरन्दाज कर देते हैं। आपने For Personal Private Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३ ] आप टिकटका पैसा देने कोई हमारे पास आया हो, हमें ऐसा मूर्ख कभी नहीं मिला । आप बड़े भोले मालूम होते हैं. यह दाम आप उठा लीजिये, सब यूं ही चलता है ।" परन्तु वरैयाजी चालाक और धूर्त दुनियां के लिये सचमुच मूर्ख थे, वे दाम छोड़कर चले आये और बुद्धिपर जोर देनेपर भी अपनी इस मूर्खताका रहस्य न समझ पाये और जीवनभर ऐसी मूर्खता करते रहे। पण्डित गोपालदासजी वरैया -३ला० अयोध्याप्रसादजीके साझेमें मोरेनामें वरैयाजीकी आदतकी दुकान थी । लाला साहबका एक व्यक्तिसे लेन-देनका झगड़ा चल रहा था। आखिर व्यक्ति तङ्ग आकर बोला- "आपके साझी वरैयाजी जो निर्णय देगें, मुझे मंजूर होगा ।" लालाजीने सुना तो बांछें खिल गई । मनकी मुराद छप्पर फाड़कर आई । परन्तु निर्णय अपने विपक्ष में सुना तो उसी तरह निस्तब्ध रह गये जिस तरह ऋद्धिधारी मुनिके हाथों में गरमागरम खीर परोसकर रत्नोंकी वारिश देखने को बुढ़िया आतुरतापूर्वक आकाशकी ओर देखने लगी थी और वर्षा न होनेपर लुटी-सी खड़ी रह गई थी। लाला साहबको वरैयाजीका यह व्यवहार पसन्द न आया । " अपने होकर भी निर्णय शत्रु पक्ष में दिया, ऐसी तैसी इस न्यायप्रियताको । डायन भी अपना घर बख्श देती है, इनसे इतना भी न हुआ । हमें मालूम होता कि पण्डितजीके मन में यह कालौस है तो हम क्यों इन्हें पंच स्वीकार करते ? इससे तो अदालत ही ठीक थी, सौ फीसदी मुक़दमा जीतनेका वकीलने विश्वास दिलाया था। वाह साहब, अच्छी इन्होंने श्रपसदारी निभाई। माना कि हमारी ज्यादती १०७ थी, फिर भी क्या हुआ. आपसदारीके नाते भी तो हमारी टेक रखनी थी। जब पण्डितजीने हमारा रत्तीभर लिहाज नहीं किया तो अब इनसे क्या सामें निभाव होगा ? भई ऐसे तोते चश्मसे तो जुदा ही भले ।" इसी तरह के विचारोंसे प्रेरित होकर लाला साहबने पण्डितजीसे साझा बांट लिया, बोलचाल बन्द कर दी । वरैयाजीसे किसीने इस आशारहित निर्णय के सम्बन्धमें जिक्र किया तो बोले- " भाई इष्टमित्रोंकी खातिर मैं अपने धर्मको तो नहीं बेचूंगा । जब मुझमें न्यायीकी स्थापना दोनों पक्षोंने कर दी तो फिर मैं अन्यायीका रूप क्यों धारण करता ? मेरा धर्मं मुझे न छोड़े, चाहे सारा संसार मुझे छोड़ दे तो भी मुझे चिन्ता नहीं ।" लालाजीने मुझे स्वयं उक्त घटना सुनाई थी। फर्माते थे कि -थोड़े दिन तो मुझे पण्डितजीके इस व्यवहारपर रोष सा रहा । पर धीरे-धीरे मेरा मन मुझे ही धिक्कारने लगा और फिर उनकी इस न्यायप्रियता, सत्यवादिता, निष्पक्षता और नैतिकता के आगे मेरा सर झुक गया, श्रद्धा भक्तिसे हृदय भर गया और मैंने भूल स्वीकार करके उनसे क्षमा मांग ली । पंडितजी तो मुझसे रुष्ट थे ही नहीं, मुझे ही मान हो गया था, अतः उन्होंने मेरी कौलो भर ली और फिर जीवनके अन्त तक हमारा स्नेह-सम्बन्ध बना रहा । मुझे जिस तरह और जिस भाषामें उक्त संस्मरण सुनाये गये थे, न वे अब पूरी तरह स्मरण ही रहे हैं न उस तरह की भाषा ही व्यक्त कर सकता हूं, फिर भी आज जो बैठे बिठाये याद आई तो लिखने बैठ गया । डालमियानगर, (विहार) ४ मार्च १६४८ For Personal & Private Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यशोधरचरित्र सम्बन्धी जैन-साहित्य [ लेखक श्री अगरचंद नाहटा J कथा कहानी सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्य हैं। भारतवर्ष में उसकी उपयोगिता की ओर सब समयध्यान रहा है, फलत: हजारों ग्रन्थ कथा-कहानियों एवं जीवनचरितों के रूप में पाये जाते हैं । मनोरञ्जन, सत्-शिक्षा एवं धर्मप्रचारके उद्देश्य से इनका निर्माण हुआ है। भारत पुरातन काल से धर्मप्रधान देश होने से सबसे अधिक कथा - ग्रन्थ धार्मिक आदर्शोंके प्रचारके लिये ही रचे गये हैं । इनमें से कईयोंका सम्बन्ध तो वास्तविक घटनाओंके साथ है; पर कई कथाएं धार्मिक अनुष्ठानोंकी ओर जनताको आकर्षित करने के उद्देश्य से गढ़ ली गई प्रतीत होती हैं। किन किन धार्मिक कार्योंको करके किस २ व्यक्तिने क्या लाभ उठाया ? एवं किन-किन पापकार्यों द्वारा किनकिन जीवोंने श्रनिष्ट- फल प्राप्त किया, इन्हीं बातोंको जनताके हृदयपर अङ्कित करनेके लिये धार्मिक कथा साहित्यका निर्माण हुआ एवं रचयिता इस कार्यमें सफल हुए भी कहे जा सकते हैं। यद्यपि आज भी कहानीका प्रचार ही सर्वाधिक है पर अब उसका उद्देश्य एवं रूप बहुत कुछ परिवर्तित हो चुका है । वर्तमान लोक-मानसके झुकावपर विचार करने से अब प्राचीन शैली अधिक दिन रुचिकर नहीं रह सकेगी अतः हमारे धर्मप्रधान कथा-चरित ग्रन्थोंको भी नये ढंग से लिखकर प्रचारित करना आवश्यक हो गया है, अन्यथा उनकी उपयोगिता घटकर विनाश होना अवश्यम्भावी है । "भारतीय कथा - साहित्य में जैनकथा - साहित्य भी अपनी विशालता एवं विविधताकी दृष्टिसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है जिसका संक्षिप्त परिचय मैं अपने 'जैनकथा - साहित्य' शीर्षक लेख में कर चुका हूं अन यहां उसपर पुन: विचार नहीं किया जाता। कई * जैन सिद्धान्त भास्कर वर्ष १२, अङ्क १ जैनकथाएँ तो विश्वव्यापी हो गई हैं। यही उनकी जनप्रियताका ज्वलन्त उदाहरण है । जनरुचिका ध्यान रखते हुये जैन विद्वानोंने लोक-कथाओं को भी खूब अपनाया और उन कथाओंके सम्बन्धमें सैकड़ों प्रन्थोंका निर्माण किया जिसका परिचय भी मेरे "लोक कथाओं ÷ सम्बन्धी जैन साहित्य" एवं "विक्रमादित्य + सम्वन्धी जैन साहित्य' शीर्षक लेखों द्वारा पाठकोंको मिल चुका है। कई जैनकथाओं का प्रचार जैनसमाज तक ही सीमित है। पर दि० श्वे० दोनों सम्प्रदायों में वे समानरूपसे आहत हैं। ऐसी कथाश्रमेंसे श्रीपाल चरित्र सम्बन्धी साहित्यका परिचय भी अनेकान्त वर्ष २ । ३ अङ्क २।७ में कई वर्ष पूर्व प्रकाशित कर चुका हूं । प्रस्तुत लेखमें ऐसे ही एक अन्य चरित सम्बन्धी साहित्यका परिचय दिया जारहा है जिसका नाम है 'यशोधरचरित्र' । दि० एवं श्वे० दोनों विद्वानोंके रचित करीब ५० ग्रन्थ इसी चरित सम्बन्धी जानने में आये हैं। उनकी सूची पाठकों की जानकारी के लिये इस लेख में दी जारही है । यशोधर चरित्रकी प्राचीनता -- नृपति यशोधर कब हुए हैं। प्रमाणाभावसे समय बतलाया नहीं जासकता। कथा वस्तुपर विचार करनेपर जब देवीके आगे पशुबलिका अमानुषिक कार्य जोरों से चल रहा था तब उसके कुफलको बतलाने के प्रसङ्गसे इसकी रचना हुई ज्ञात होती है। प्राप्त यशोधर चरित्रों में सबसे प्राचीन राजर्षि प्रभञ्जन रचित ही प्रतीत होता है । वि० सं०८३५ में श्वे० उद्योतन सूरिके रचित कुवलयमाला कथामें इसका ÷ नागरी प्रचारिणी पत्रिका वर्ष ५२, अङ्क १ + विक्रमस्मृति ग्रन्थ एवं जैन सत्यप्रकाश वर्ष ६, अङ्क ४ For Personal & Private Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३ ] निम्नोक्त उल्लेख पाया जाता है सत्तण जो जसहरो, जसहर चरिए जणवए पयडो । कलिमल पभंजणो च्चिय, पभंजरणो श्रासि रायरिसी ॥ ४० ॥ इससे संवत् ८३५से पूर्व प्रभञ्जनका यशोधर चरित प्रसिद्ध ग्रन्थ माना जाता था यह सिद्ध होता है । फिर भी प्रभञ्जनका वास्तविक समय अभीतक अन्वेषणीय है । निश्चित समयके ज्ञात ग्रन्थकारोंमें श्वे० जैनाचार्य हरिभद्रसूरिजीके “समराइचकहा " प्रन्थमें कथा - नायकके पूर्वभवके प्रसङ्गमें यशोधरकी कथा पाई जाती है। हरिभद्रसूरिका समय वि.की ९वीं शती निश्चित है । प्रभञ्जनके यशोधरचरितकी प्रति अनेकान्तमें प्रकाशित मूडबिद्री-भण्डारकी सूची से वहाँके भण्डारमें प्राप्त होने की सूचना मिलती है। संस्कृत भाषा में ३६१ श्लोकस्य प्रस्तुत चरितकी प्रति ४ पत्रोंकी है। मूडबिद्री भण्डारके सचालकोंसे अनुरोध है कि इस चरितको शीघ्र हो प्रकाशित करें, जिससे इसमें वर्णित चरितमें पिछले प्रन्थकारोंने क्या २ परिवर्तन किये अर्थात् कथाके विकास के विषय में विचार करनेका सुन्दर साधन सामने आ सके। जबतक वह प्रकाशित न हो, हरिभद्रसूरि के समरादित्य-चरितके अन्तर्गत यशोधरचरितको ही प्रधानता देकर पिछले चरित्र-ग्रन्थोंकी आलोचना करनेकी ओर विद्वानोंका ध्यान आकर्षित किया जाता है । यशोधरचरित्र सम्बन्धी जैन- साहित्य इनके परवर्त्ती चरित-ग्रन्थोंमें अपभ्रंशके महाकवि पुष्पदन्तका ‘जसदृरचरिउ' एवं महाकवि हरिषेण एवं अमरकीर्ति के अनुपलब्ध अपभ्रंश ग्रन्थ हैं । प्रभञ्जनके साथ हरिषेणके यशोधरचरितका उल्लेख वासवसेन ने अपने यशोधरचरितमें किया है । यथा प्रभंजनादिभिः पूर्वं हरिषेण समन्वितैः । यदुक्त तत्कथं शक्यं मया बालेन भाषितुम् ॥ वासवसेनका समय मुझे ज्ञात नहीं है । उनके • उल्लिखित हरिषेण, धम्मपरिक्खा नामक अपभ्रश ग्रन्थके रचयिता होनेकी सम्भावना माननीय प्रेमीजीने (मुझे लिखित पत्रमें) की है। इसीलिये मैंने उसे अपभ्रंश भाषा में रचित होनेका निर्देश किया है । १०९ पूर्ण निर्णय तो हरिषेणके यशोधर चरितकी प्राप्तिपर ही निर्भर है । सम्भव है खोज करनेपर वह किसी दिगम्बर जैन ज्ञान- भण्डार में उपलब्ध जाय । विद्वानोंका ध्यान उसके अन्वेषणकी ओर भी आकर्षित किया जाता है । ११वीं शताब्दी के संस्कृत-यशोधरचरितोंमें सोमदेवसूरिका यशस्तिलक चम्पू विशेषरूपसे उल्लेखनीय है। संवत् १०१६ ( शाके ८८१) के चैत्र शुक्ला १३ को गङ्गधार में इसकी रचना हुई है । यशोधरकी छोटी-सी कथाका विकास कविने कितने सुन्दर ढङ्गसे किया है, इसपर भलीभाँति प्रकाश डालनेके लिये भी विद्वानोंसे अनुरोध है । संवत् १०८४ के लगभग सुप्रसिद्ध विद्वान् वादिराजने ' ४ सर्गात्मक २९६ श्लोकोंका यशोधरचरित बनाया है । तंजौर के श्री टी० एस० कुप्पू स्वामी शास्त्रीने इसे प्रकाशित किया था, जिसका हिन्दी में सार श्रीउदयलालजी काशलीवालने सन् १९२८ में जैन - साहित्य - प्रसारक कार्यालय, बम्बई से प्रकाशित किया था । ११वीं शताब्दी के परवर्ती वासवसेन, वादिचन्द्र, चन्दपवर्णी आदिका समय निश्चित नहीं हैं । ज्ञात समय के चरित्रों का प्रारम्भ १५वीं शताब्दी में आरम्भ होता है और १६ से १८वीं शताब्दी में बहुतसे यशोधर चरित्रोंकी संस्कृत, हिन्दी, गुजराती और राजस्थानी भाषाओं में रचना हुई है, जिनका परिचय आगे दी जाने वाली सूची से भलीभाँति मिल जायगा । सूची से यह भी स्पष्ट है कि इसका प्रचार कन्नड, गुजरात राजपूताने आदि में सर्वत्र था । यशोधरचरितकी प्रसिद्धिका कारण जैनधर्मका सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण आदर्श अहिंसा है। वास्तव में वह जैनधर्मकी आत्मा है । १ वादिराज के पार्श्वनाथचरित्रका रचना काल शक सं० ६४७ है। पार्श्वनाथचरित्रका उल्लेख उनके यशोधरचरित्रमें होनेसे उसका निर्माण पार्श्वनाथचरित्र के बाद ही हुश्रा सिद्ध होता है । अपने काकुस्थचरित्र का उल्लेख भी आपने इस ग्रन्थ में किया है पर वह प्राप्त नहीं है, इस लिए उसकी भी खोज होना श्रावश्यक है । For Personal & Private Use Only . Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११० अहिंसाकी जितनी सूक्ष्म व्याख्या एव आचरणकी तत्परता और कठोरता जैनधर्ममें पाई जाती है वैसी विश्व के किसी भी धर्मग्रन्थमें पाई नहीं जाती। जैनधर्मकी हिंसा की मर्यादा मानवोंतक ही सीमित नहीं पर पशु-पक्षीके साथ पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल एवं वनस्पति जगतकी रक्षा से भी आगे बढ़ती है। किसी भी प्रारणका विनाश तो हिंसा है ही, यहाँ तो उनको मानसिक, वाचिक, कायिक एवं कृतकारित अनुमोदित रूपसे भी तनिक-सा कष्ट पहुँचाना भी हिंसाके अन्तर्गत माना गया है। इतना ही नहीं, किसी भी प्राणी के विनाश एवं कष्ट न देनेपर भी यदि हमारे अन्तर्जगत-भावनामें भी किसीके प्रति कालुष्य है और प्रमादवश स्वगुणोंपर कर्म - आवरण आता है तो उसे भी आत्मगुणका विनाश मानकर हिंसाकी सज्ञा दी गई है। श्रीमद् देवचन्दजीने श्रध्यात्मगीतामें कहा है कि अनेकान्त श्रात्मगुणनो हणतो, हिंसक भावे थाय । श्रात्मधर्मनो रक्षक, भाव हिंस कहाय ॥ श्रात्मगुणरक्षणा, तेह धर्म । स्वगुणविध्वंसना, तेह धर्म ॥ अहिंसाकी इतनी गम्भीर एवं मर्मस्पर्शी व्याख्या विश्व के किसी भी अन्य धर्ममें नहीं पाई जायगी । जैनधर्मके महान् उद्धारक भगवान महावीरने अहिंसा पालन के लिये मुनिधर्ममें कठिन से कठिन नियम बनाये, जिससे अधिक से अधिक अहिंसा की प्रतिष्ठा जीवन में हो सके । भगवान महावीरके समय यज्ञादिमें महान् नहिंसा व पशुहिंसा हो रही थी । धर्मके नाम पर होने वाली इस जीवहत्याको धर्मके ठेकेदार स्वर्गप्राप्तिका साधन बतलाते थे । इस घोर पाखण्डका भगवान महावीर एवं बुद्धने सख्त विरोध किया । जिसके फलस्वरूप हज़ारों ब्राह्मणोंने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया और यज्ञ होने प्रायः बन्दसे हो गये । यज्ञके बाद पशु-हिंसाकी प्रवृत्ति देवीपूजा में पाई जाती हैं, जो हजारों वर्षोंसे अनर्थ मचा रही है । यज्ञ बन्द हो गये, पर इसने तो अभोतक पिंड नहीं छोड़ा । [ वर्ष ९ मेरी राय में इसके बने रहनेका कारण यह है कि यज्ञमें पशु-हिंसा करना बड़ा खर्चीला अनुष्ठान था उसे तो राजा-महाराजा व सम्भ्रान्त लोग ही करवाते थे । अतः उसकी व्यापकता इतनी नहीं हुई, इसी से थोड़े व्यक्तियोंके हृदय परिवर्तन द्वारा वह बन्द हो गया; पर देवीपूजामें एक-आध बकरे आदिकी बलि साधारण बात थी और इसलिये वह घर-घर में प्रचारित हो गई । ऐहिक स्वार्थ ही इसमें मुख्य था । अतः इसको बन्द करनेके लिये सारी जनताका हृदय परिवर्तन होना आवश्यक था । धर्म प्रचार सभ्य समाजमें ही अधिक प्रबल हो सका, अतः उन्हीं के घरोंसे तो बलि बन्द हुई पर ग्रामीण जनता तथा साधारण बुद्धि वाले लोगों में यह चलती ही रही । इसको बन्द करानेके लिये बहुत बड़े आन्दोलनकी... आवश्यकता थी । जैनाचार्योंने समय-समयपर इसे हटानेके लिये विविध प्रयत्न किये, उन्हीं में से एक प्रयत्न यशोधरकी कथाका निर्माण भी कहा जा सकता है । यशोधरचरित्रमें प्रधान घटना यही है कि यशोधरने अनिच्छासे माता के दबाव के कारण देवी के आगे साक्षात् मुर्गेका नहीं पर टेके मुर्गेका वध किया, उसके फलस्वरूप उसे व उसकी माताको अनेक बार मयूर, कुत्ता, सेही, सर्प, मच्छ, मगर, बकरा, भैंसा आदि पशु-योनियोंमें उत्पन्न होना पड़ा एवं इन सब भवोंमें उनको निर्दयता-पूर्वक मारा गया । इस कथा के प्रचारका उद्देश्य यह था कि जब अनिच्छा से आटे के मुर्गेको देवीके बलि देनेपर इतने दुःख उठाने पड़े तो जान-बूझकर हर्षसे जो साक्षात् होगा ? अतः बलि प्रथा दुर्गतिदाता होनेसे सर्वथा जीव हत्या करते हैं उनको नरकमें भी कहाँ ठिकाना परिहार्य है । पशु बलिको दुर्गतिदायी सिद्ध करने में सहायक इस कथाको जैन विद्वानों द्वारा अधिक अपनाना स्वाभाविक एवं उचित ही था । वास्तवमें इस कथासे हजारों आत्माओं को पशु-बलिसे छुटकारा दिलाने व दूर रखने में सहायता मिली होगी। For Personal & Private Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] धार्मिक कथाओं में मुख्यत: तीन प्रकारकी भावना काम कर रही प्रतीत होती है । कई कथायें वास्तविक चरित्रको उपस्थित करने को, कई धार्मिक अनुष्ठानों को अपनानेसे अनेक प्रकार के सुख प्राप्त करनेके प्रलोभन एवं रोचक ढङ्गसे उपस्थित करनेको, कई बुरे कामोंसे नरकादिके दुःख पानेको बताने वाली भयानक कथाओंको रचना हुई है । यशोधरचरित तीसरे प्रकार की कथा है। वर्तमान शिक्षासे वैज्ञानिक विचारधाराका विकास अधिक हो चुका है। अतः बहुतसे नवशिक्षितोंको इन कथाओं में अतिरञ्जितपना एवं अस्वाभाविकता नजर आयेगी, पर कथाकारों का उद्देश्य पवित्र था । उन्होंने अपने अनुकूल वातावरण उपस्थित करने व लोकरुचिको प्रभावित करनेके लिये ही मूलकथामें इधर-उधर की बातें जोड़ भी दी हों तो वे क्षम्य ही समझी जानी चाहिएँ। ऐसी कई कथाओं को पढ़ते हुए जिस रूपमें वे वर्णित हैं, कर्म - सिद्धान्तसे, उनकी कई बातें मेल नहीं खातीं भी प्रतीत होती हैं; पर इस विषयपर विशेष विचार आणि कारी विद्वान ही कर सकते हैं । यशोधरचरित्र सम्बन्धी जैन साहित्य मैं स्वयं इस बातका अनुभव करता हूँ कि प्रस्तुत लेखमें यशोधरके कथानकको लेकर विभिन्न ग्रन्थकारोंने उसमें क्या-क्या परिवर्तन एवं परिवर्द्धन किया है, उसपर तुलनात्मक दृष्टिसे विवेचन किया जाना आवश्यक था । इसी प्रकार इसी ढङ्गकी अन्य भी जो कथायें प्राप्त हैं उनका पारस्परिक प्रभाव भी स्पष्ट किया जाता तो लेख बहुत उपयोगी होजाता, पर अभी उसके लिये मुझे समय एवं साधन प्राप्त नहीं हैं । अतः इस कार्यको किसी योग्य व्यक्तिके लिये छोड़कर यशोधर चरित्रोंकी सूची देकर ही लेखको समाप्त किया जारहा है । आशा है मेरे अधूरे कार्यको कोई विद्वान् शीघ्र ही पूर्ण करनेका प्रयत्न करेंगे । यशोधरचरित्र सम्बन्धी दिगम्बर साहित्य संस्कृत १ यशोधरचरित्र – प्रभंजन ( वि० ८३५ पूर्व) मूडबिद्री भण्डार पत्र ४ श्लोक ३६ । १११ ( प्रभंजनका उल्लेख दि० श्वे० दोनों विद्वानों' ने किया है । अतः ये किस सम्प्रदाय के थे ? ठीक नहीं कहा जासकता ) । २ यशस्तिलक चम्पू' – सोमदेवसूरि (शक सं०८८१ चै० शु० १३ गङ्गधार में) रचित ३ यशोधरचरित -श्लो० २९६ (४ सर्ग) वादिराज (सं० १९८२) कृत । ४ यशोधरचरित्र - पद्मनाभ कायस्थ (सं० १४६१ के लगभग) निर्मित । [ इसकी एक प्रति बीकानेर में कुँ मोतीचन्दजी खजाँचीके संग्रह में है ग्रन्थप्रशस्ति महत्वकी है, उसकी प्रतिलिपि हमारे संग्रह में है पर वह अभी पास में नहीं होनेसे विशेष प्रकाश नहीं डाला जा सका ] । ५ यशोधरचरित - वादिचन्द्रकृत अङ्कलेश्वर सं० १६५७ ६ यशोधरचरित्र - वासवसेन कृत ७ यशोधरचरित्र - पद्यनन्दिकृत ८ यशोधरचरित - सकलकीर्तिकृत ९ यशोधरचरित - ( ८ सर्ग) सोमकीर्ति (सं० १५३६ पो० ० ५ मेवाड़के गोढल्या में) रचित । [ इसकी प्रति बीकानेर के अनूप संस्कृतलाइब्रेरीमें ३३ पत्रोंकी है ] । १० यशोधरचरित - जानकी ( मूडबिद्री भं० पत्र १६ श्लोक ३८०) कृत । ११ यशोधरचरित - कल्याणकीर्ति सं० १४८८ (श्लोक १८५०) रचित | [अनेकान्त वर्ष १ में उल्लेख हैं ] १२ यशोधरचरित - ज्ञानकीर्ति सं० १६५९ (प्र० १४०० ) । वादिभूषण शि० १३ यशोधरचरित - ब्र० नेमिदत्त (सं० १५७५) १४ यशोधर चरित - पूर्णदेव १५ यशोधरचरित - मल्लिसेन For Personal & Private Use Only १६ यशोधरचरित - श्रुतसागर (संभवतः टीका हो) १७ यशोधरचरित - सर्वसेन १८ यशोधरचरित - चारूकीति १ इसपर श्रीदेवरचित पंजिका एवं श्रुतसागरकी टीका प्राप्त हैं। Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११२ १९ यशोधरचरित—दयासुन्दर कायस्थ (संभवतः पद्मनाम हों) । २० यशोधरचरित—देवेन्द्र (संभवत: पीछे उल्लिखित श्वे० रासका कर्ता हो ? ) २१ यशोधरचरित -सोमसेन अनेकान्त अपभ्रंश १ जसहरचरिउ – A पुष्पदंत शाके ८९४ (अपूर्ण प्रति हमारे संग्रह में उपलब्ध) B गंधर्व पूरित ३ प्रकरण । २ जसहरचरिउ - हरिषेण (अनुपलब्ध) । ३ जसहर चरिउ – श्रमर कीर्ति (अनुपलब्ध) | हिन्दी १ यशोधरचरित्र - गौरवदास सं० १५८१ फफौंद २ यशोधरचरित्र - गरीबदास सं० १६०० अजमेर ( प्रति हमारे संग्रह में है ) । ३ यशोधर चरित्र - खुशालचन्द्र काला सं० १७९१ सांगानेर | ४ यशोधरचरित्र - परिहानन्द ५ यशोधरचरित्र - भूरजी अग्रवाल । ६ यशोधर चरित्र - मनमोद अग्रवाल ७ यशोधरचरित्र - पन्नालाल चौधरी (२०वीं श०) Amrata नंदराम (१९०४ के लगभग) ९ यशोधरचरित्र वचनिका - लक्ष्मीदास | गुजराती १ यशोधररास - ब्र० जिनदास (सं० १५२० लगभग) २ यशोधररास– सोमकीर्ति (सं० १६००, पंचायती मन्दिर, देहली) । कन्नड १ यशोधर चरित्र - चन्दप्प [ चन्दन] वर्णी (श्लोक ३५००) । आधुनिक हिन्दी में वादिराज के चरित्रका हिन्दी सार उदयलाल काशलीवाल लिखित जैन साहित्य प्रसारक कार्यालय, बम्बई से प्रकाशित होनेका उल्लेख पूर्व किया जाचुका है। माननीय प्रेमीजीकी सूचना - नुसार सहारनपुर के जैनीलालजीने भी यशोधरचरित्र ( भाषा) छपवाया था, सुर अब नहीं मिलता। दि० [ वर्ष ९ जैन पुस्तकालय सूरत से गुजराती में १९ पेजका १८ प्रकरणात्मक यशोधरचरित प्रकाशित है ।. श्वेताम्बर साहित्य— संस्कृत १ यशोधरचरित्र - देवसूरि [प्र० ३५० ] ( सम्भव है दि० श्रीदेवकी पंजिका हो) । यशोधरचरित्र - माणिक्यसूरि २ ३ ४ ५ यशोधर चरित्र - हेमकुंजर (सं० १६०७ पूर्व ) यशोधरचरित्र - पद्मसागर (उ. जैन सा. सं. इं.) यशोधरचरित्र - ज्ञानदास लोंका (सं० १६२३) ६ यशोधरचरित्र - क्षमाकल्याण (सं० १९३९ जैसलमेर ) गुजराती-राजस्थानी यशोधररास - (सं० १५७३) देवगिरि यशोधररास - ज्ञान (सम्भव है उपर्युक्त ज्ञानदास वाला ही हो) । ३ यशोधररास - मनोहरदास ( विजयगच्छ ) (सं० १८७६ श्रा० ० ६ दशपुर) ४ यशोधर रास - नयसुन्दर ११८ पो० व० १ १२ १ गु० ) । यशोधररास – जयनिधान (सं० १६४३ ) ५ ६ यशोधररास - देवेन्द्र (सं० १६३८). ७ यशोधररास - उदयरत्न (सं० १७६७ पो० शु० ५ पाटण) (माणिक्यसूरिके चरित्रके आधारपर ) यशोधररास - जिनहर्ष (सं० १७४७ वै० व०८ पाटण) 1 ८ ९ यशोधरराम - विमलकीर्ति (सं० १६६५ विजय दशमी अमृतसर) | अन्य ग्रन्थान्तर्गत समराइञ्चकहा - प्रा० हरिभद्रसूरि (८वीं) समराइच्च कहा-संक्षेप, प्रद्युम्नसूरि (सं० १३२४) समराइच्चकहा- क्षमाकल्याण, सुमति वर्द्धन उपदेशप्रासाद - विजयलक्ष्मीसूरि (१९वीं श० ) जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास में हरिभद्रसूरिजी स्वतन्त्र यशोधरचरित्रका भी उल्लेख है पर वह सम्भव कम ही है । -१ २ ३ ४ For Personal & Private Use Only Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] शङ्का-समाधान ११३ ___ आधुनिक हिन्दीमें विद्याकुमार सेठी व राजमल है। इस सूचीके निर्माणमें निम्नोक्त ग्रन्थोंकी सहायता लोढा लिखित जैनसाहित्यसीरीज नम्बर १५ के लीगई है:रूपमें अजमेरसे प्रकाशित है। १ जैनरत्न कोष H. D. वेलणकर । उपर्युक्त सूचीमें ज्ञात यशोधरचरित्रोंका नाम २ जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास एवं जैनगुर्जर निर्देश किया गया है। उनमेंसे कई संदिग्ध प्रतीत कविओ भाग २, ३ होते हैं पर उनके निर्णयके लिये सब ग्रन्थोंकी जाँच होना आवश्यक है और वह सम्भव कम है । अतः । . ३ अनेकान्तमें प्रकाशित दि० भण्डारोंकी सूचियाँ । जितनी भी जानकारी थी यहाँ उपस्थित करदी गई ४ प्रेमीजी सम्पादित “दि० जैनग्रंथ और ग्रंथकार" तत्व चर्चा शंका-समाधान [इस स्तम्भके नीचे ऐसे सभी शङ्काकार और समाधानकार महानुभावोंको निमत्रित किया जाता है, जो अपनी शङ्कायें भेजकर समाधान चाहते हैं अथवा शङ्काओं सहित समाधानोंको भी भेजनेके लिये प्रस्तुत हैं या किसी सैद्धान्तिक विषयपर ऊहापोह पूर्वक विचार करनेके लिये तैयार हैं । अनेकान्त इन सबका स्वागत करेगा। -सम्पादक ८ शङ्का-अरिहंत और अरहत इन दोनों पदों अरहंत या अर्हन्त ऐसी भी पदवी प्राप्त होती है, क्यों में कौन पद शुद्ध है और कौन अशुद्ध ? कि जन्मकल्याणादि अवसरोंपर इन्द्रादिकों द्वारा वे ___८ समाधान-दोनों पद शुद्ध हैं । आर्ष-ग्रथोंमें पूजे जाते हैं । अतः अरिहंत और अरहंत दोनों शुद्ध दोनों पदोंका व्युत्पत्तिपूर्वक अर्थ दिया गया है और हैं। फिर भी णामोकारमन्त्रके स्मरणमें अरिहंत' शब्द दोनोंको शुद्ध स्वीकार किया गया है। श्रीषट्खण्डा. का उच्चारण ही अधिक उपयुक्त है, क्योंकि षट्खण्डागमकी धवला टीकाकी पहली पुस्तकमें आचार्य गममें मूल पाठ यही उपलब्ध होता है और सर्वप्रथम वीरसेनस्वामीने देवतानमस्कारसूत्र (णमोकारमत्र) व्याख्या भी इसी पाठकी पाई जाती है । इसके सिवाय का अर्थ देते हुए अरिहंत और अरहंत दोनोंका जिन, जिनेन्द्र, वीतराग जैसे शब्दोंका भी यही पाठ व्युत्पत्ति-अर्थ दिया है और लिखा है कि अरिका सीधा बोधक है। भद्रबाहुकृत आवश्यक नियुक्तिमें अर्थ मोहशत्रु है उसको जो हनन (नाश) करते हैं भी दोनों शब्दोंका व्युत्पत्ति अर्थ देते हुए प्रथमतः उन्हें 'अरिहंत' कहते हैं । अथवा अरि नाम ज्ञाना- 'अरिहंत' शब्दकी ही व्याख्या की गई है । यथावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय इन अठविहं पि य कम्मं अरिभूयं होइ सव्वजीवाणं । चार घातिकमों का है उनको जो हनन (नाश) करते त कम्भमरिं हंता अरिहंता तेण वुच्चति ॥६२०॥ हैं उन्हें अरिहंत कहते हैं। उक्त कोंके नाश होजाने- अरिहंति वंदण-णमंसणाई अरिहंति पयसक्कार । पर शेष अघाति कर्म भी भ्रष्ट (सड़े) बीजके समान सिद्धिगमणं च अरिहा अरहंता तेण वुच्चंति ॥२१॥ निःशक्तिक होजाते हैं और इस तरह समस्त कर्मरूप ९ शङ्का-कहा जाता है कि भगवान आदिनाथ अरिको नाश करनेसे 'अरिहंत' ऐसी संज्ञा प्राप्त होती से मरीचि (भरतपुत्र)ने जब यह सुना कि उसे अन्तिम है। और अतिशय पूजाके अयोग्य होनेसे उन्हें तीर्थकर होना है तो उसको अभिमान आगया, जिस Jain Education Interational For Personal & Private Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११४ अनेकान्त से वह स्वच्छन्द प्रवृत्ति करके नाना कुयोनियोंमें है ? उसका मूल स्थान बतलायें ? गया। क्या उसके इस अभिमानका उल्लेख प्राचीन शास्त्रों में आया है ? ९ समाधान - हाँ, आया है । जिनसेनाचार्य कृत आदिपुराण के अतिरिक्त भद्रबाहुकृत आवश्यक नियुक्ति में भी मरीचिके अभिमानका उल्लेख मिलता है और वह निम्न प्रकार है तव्वयणं सोऊणं तिवई फोडिऊण तिक्खुत्तो । अब्भहियजायहरिसो तत्थ मरीई इमं भणई ||४३०|| इ वासुदेवु पढमो मूत्राइ विदेहि चक्कवट्टित्तं । चरमो तित्थयराण होऊ अलं इत्ति मज्झ ॥४३१॥ १० शङ्का – पूजा और अर्चामें क्या भेद है ? क्या दोनों एक हैं ? १० समाधान - यद्यपि सामान्यतः दोनोंमें कोई भेद नहीं है, पर्याय शब्दोंके रूपमें दोनोंका प्रयोग रूढ़ है तथापि दोनोंमें कुछ सूक्ष्म भेद जरूर है । इस भेदको श्रीवीरसेनस्वामीने षट्खण्डागमके 'बन्धस्वामित्व' नामके दूसरे खण्डकी धवला टीका पुस्तक ठमें इस प्रकार बतलाया है- "चरु-बलि-पुष्प-फल- गन्ध-धूव-दीवादीहि सगभत्तिपयासो अचण णाम । एदाहि सह इंदधय-कप्परुक्ख-महामह सव्त्रदोभट्टादिमहिमाविहाणं पूजा णाम । " पृ० ६२ । अर्थात् चरु, बलि (अक्षत), पुष्प, फल, गन्ध, धूप और दीप इत्यादि से अपनी भक्ति प्रकाशित करना अर्चना (अर्चा) है और इन पदार्थोंके साथ ऐन्द्रध्वज कल्पवृक्ष, महामह, सर्वतोभद्र आदि महिमा (धर्मप्रभावना) का करना पूजा है । तात्पर्य यह कि फलादि द्रव्योंको चढ़ा (स्वाहापूर्वक समर्पण कर सक्षेप में लघु भक्तिको प्रकट करना अर्चा है और उक्त द्रव्यों सहित समारोह पूर्वक विशाल भक्तिको प्रकट करना पूजा है । यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि इन्द्रध्वज आदि पूजामहोत्सवका विधान वीरसेन स्वामी से बहुत पहले से विहित हैं और जैन शासनकी प्रभावना में उनका महत्वपूर्ण स्थान है । ११ शङ्का - निम्न पद्य किस ग्रन्थका मूल पद्य [ वर्ष ९ सुखमाल्दादनाकारं विज्ञानं मेयबोधनम् । शक्तिः क्रियानुमेया स्याद्यूनः कान्तासमागमे ॥ ११ समाधान — उक्त पद्य अनेक ग्रन्थोंसे उधृत पाया जाता है । आचार्य विद्यानन्दने अष्टसहस्री ( पृ० ७८) में इसे 'इतिवचनात् ' शब्दोंके साथ दिया है । आचार्य अभयदेवने सन्मतिसूत्र - टीका ( पृ० ४७८) में इस पद्यको उद्धृत करते हुए लिखा है“नच सौगतमतमेतत् न जैनमतमिति वक्तव्यम्, 'सहभाविनो गुणाः क्रमभाविनः पर्यायाः' [ ] इति जैनैरभिधानात् । तथा च सहभावित्व गुणानां प्रतिपादयता दृष्टान्तार्थमुक्तम् – " . इसके बाद उक्त पद्य दिया है। सिद्धिविनिश्चय टीकाकार बड़े अनन्तवीर्यने इसी पद्यका निम्न प्रकार उल्लेख किया है— "कथमन्यथा न्यायविनिश्वये 'सहभुवो गुणाः' इत्यस्य 'सुखमाल्हादनाकारं ' इति निदर्शनं स्यात् । " – ( टी०लि० पृ० ७६ ।) अभयदेव और अनन्तवीर्यके 'इन उल्लेखोंसे प्रतीत होता है कि गुणोंके सहभावीपना प्रतिपादन करने के लिये दृष्टान्तके तौरपर उसे अकलङ्कदेवने न्यायविनिश्चयमें कहा है । परन्तु न्यायविनिश्चय मूल में यह पद्य उपलब्ध नहीं होता। हो सकता है उसकी स्वोपज्ञवृत्ति में उसे कहा हो। मूलमें तो सिर्फ १११वीं कारिकामें इतना ही कहा है कि 'गुण पर्ययवद्द्रव्यं ते सहक्रमवृत्तय:' । यदि वस्तुतः यह पद्य न्यायविनिश्चयवृत्ति में कहा है तो यह प्रश्न उठता है कि वहाँ वृत्तिकार ने उसे उद्धृत किया है या स्वयं रचकर उपस्थित किया है ? यदि उद्धृत किया है तो मालूम होता है कि वह अकलङ्क देवसे भी प्राचीन है । और यदि स्वयं रचा है तो उसे उनके न्यायविनिश्चयकी स्वोपज्ञवृत्तिका समझना चाहिए । वादिराजसूर न्यायविनिश्चयविवरण (प० २४० पूर्वा) में 'यथोक्तं स्याद्वादमहार्णवे' शब्दों के उल्लेख- पूर्वक उक्त पो प्रस्तुत किया है, जिससे वह 'स्याद्वादमहार्णव' नामक किसी जैन दार्शनिक ग्रन्थका जाना जाता है । यह For Personal & Private Use Only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३ ] ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं है और इससे यह नहीं कहा जा सकता कि इसके रचयिता कौन आचार्य हैं। हो सकता है कि अकलङ्कदेवने भो इसी स्याद्वादमहार्णवपरसे उक्त पद्य उदाहरण के बतौर न्यायविनिश्चयकी स्वोपज्ञवृत्तिमें, जो आज अनुपलब्ध है, उल्लेखित किया हो और इससे प्रकट है कि यह पद्य काफी प्रसिद्ध और पुराना है । १२ शङ्का - आधुनिक कितने ही विद्वान यह कहते हुए पाये जाते हैं कि प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिल भट्ट अपने मीमांसा श्लोकवार्त्तिककी निम्न कारिकाको समन्तभद्रस्वामीकी श्राप्तमीमांसागत 'घटमौलिसुवर्णार्थी' आदि कारिकाके आधारपर रचा है और इसलिये समन्तभद्रस्वामी कुमारिलभट्टसे बहुत पूर्ववर्ती विद्वान् हैं। क्या उनके इस कथन को पुष्ट करने वाला कोई प्राचीन पुष्ट प्रमाण भी है ? कुमारिलकी कारिकाएँ ये हैं शङ्का समाधान वर्द्धमानकभंगेन रुचकः क्रियते यदा । तदा पूर्वार्थिनः शोकः प्रीतिश्चाप्युत्तरार्थिनः || मार्थिनस्तु माध्यस्थ्यं तस्माद्वस्तु त्रयात्मकम् । १२ समाधान - उक्त विद्वानोंके कथनको पुष्ट करने वाला प्राचीन प्रमाण भी मिलता है । ई० सन् स्मृतिकी रेखाए - बहुधा लोगों के जीवन में ऐसे अवसर आते हैं कि दिनभर भूखे-प्यासे रहनेसे पेट अन्तड़ियोंसे लग जाता है, जीभ तालूसे जालगी है, श्रेोठोंपर पपड़ियाँ जम गई हैं और चलते-चलते पाँव मूसल होगये हैं । न पास में एक धेला है जो चने चाबकर ही ठण्डा पानी पिया जाय, न मंजिले मकसूद ही नजर आती है। पास में पैसे न होने की वजह मुफलिसी ही नहीं 1 १०२५ के प्रख्यात विद्वान् श्रचार्य वादिराजसूरिने अपने न्यायविनिश्चयविवरण ( लि० प० २४५) में एक असन्दिग्ध और स्पष्ट उल्लेख किया है और जो निम्न प्रकार है “उक्त स्वामिसमन्तभद्रस्तदुपजीविना भट्ट नापि — घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पाद स्थितिष्वयम् । शोक- प्रमोद - माध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥ वद्ध मानकभंगेन रुचकः क्रियते यदा । तदा पूर्वार्थिनः शोकः प्रीतिश्चाप्युत्तरार्थिनः ॥ मार्थिनस्तु माध्यस्थ्यं तस्माद्वस्तु त्रयात्मकम् । इति च ॥” इस उल्लेख में वादिराजने जो 'तदुपजीविना ' पदका प्रयोग किया है उससे स्पष्ट है कि आजसे नौ सौ वर्ष पूर्व भी कुमारिलको समन्तभद्रस्वामीका उक्त विषय में अनुगामी अथवा अनुसर्ता माना जाता था । जो विद्वान् समन्तभद्रस्वामीको कुमारिल और उसके समालोचक धर्मकीर्तिके उत्तरवर्ती बतलाते हैं उन्हें वादिराजका यह उल्लेख अभूतपूर्व र प्रामाणिक समाधान उपस्थित करता है । वीरसेवामन्दिर २७ फरवरी १६४८ भिक्षुक मनोवृत्ति (ले० अयोध्या प्रसाद गोयलीय) ११५ For Personal & Private Use Only - दरबारीलाल कोठिया होती, आकस्मिक घटनाएँ भी होती हैं। कभी जेब कट जाती है, कभी घर से लेकर न चले और साथियों ने रास्तेसे ही पकड़ लिया और समझा कि अभी वापिस आये जाते हैं, मगर रास्तेमें कार फेल होगई या ताँया पलट गया पैदल चलनेके सिवा कोई चारा नहीं । कभी रेल्वे टिकिट के लिये १-२ पैसेकी कमी रह गई है । परदेशमे किससे माँगे, कोई जान पहचानका 1 Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११६ 1 भी तो दिखाई नहीं देता, कि इस मुसीबत से निजात मिले। और दिखाई दिया भी तो माँगनेकी हिम्मत न हुई; श्रोठ काँपंकर रह गये। घर में बच्चा बीमार पड़ा है, उसी रोज वेतन मिलने वाला है, मगर घर में डाक्टरको बुलाने के लिये रुपये फीस को तो कुजा, आफिस जानेके लिये इक्केके लिये दो पैसे भी नहीं हैं । और मनमें यह सोच ही रहे हैं कि चलो बच्चेको ही हस्पताल गोदमें लेचला जाये, ऐसे ही नाजुक मौकेपर कोई साहब आते हैं । शक्लोशबाहत - से अच्छे खासे जीविकार और भले मालूम देते हैं । हाथमें ४-५ रुपयेकी रेजगारी भी लिये हुए हैं । कुम्भ-स्नानको जाना है, एक-दो रुपयेकी जो कमी रह गई है, उसे पूरी करने चले आये हैं और इनकी धज देखिये—नाज मुहतसे छोड़ रक्खा है, सिर्फ फल- दूधपर गुज़र फर्माते हैं, ऐसे संयमीकी सहायता करना आवश्यक है । भांजी भातमें २०००) रु० की कसर रह गई है, ऐसे कारे सवाबमें मदद करना अखलाक़ी फर्ज़ है । अफीम खानेको पैसे नहीं रहे हैं, अफीम न मिली तो विचारा जम्हायाँ लेते-लेते मर जायगा, इन्सानी जान बचाना निहायत जरूरी है । ऐसे दुखद प्रसङ्गों पर बड़ी विचित्र परिस्थिति होती है । नासकर उस अवसरपर जबकि आप खुद सही मायनों में इम्दाद के मुस्तहक़ हैं, मगर अपनी वजहदारी की वजहसे आप किसीपर भी यह राज जाहिर नहीं करना चाहते और तभी कोई आपके जाने पहचाने साहब- किसी जल्सेके लिये, चौबेको भरपेट लाडू खिलाने के लिये, किसी साधुके मन्दिर का कुत्रा बनवाने की हठ करनेके लिये, चिड़ीमार के चंगुल से तोते छुड़ाने के लिये, मुहल्ले में साँग करनेके लिये, कलकत्ते बम्बई में चलने वाली मजदूर हड़तालके लिये, देवीका परसाद बाँटनेके लिये, क़साईके हाथ से लङ्गड़ी गाय छुड़ाने के लिये - चन्दा माँगने आजाते हैं । तब कैसी दयनीय परिस्थिति होजाती है, ना करने की हिम्मत नहीं; देने को कानी कौड़ी नहीं । कभी दिल चाहता है दीवार से टकराकर अपना सर फोड़लें, कभी जी चाहता है इन माँगनेवालोंपर टूट अनेकान्त [ वर्ष ९. पड़ें और जो ये लाये हैं, उसे छीनकर अपना काम चलाएँ। मगर कुछ नहीं बनता और एक निरीह खुदग़रज, अहङ्कारी, रूक्षस्वभावी न जाने क्या-क्या लोगोंकी नज़रोंमें बनकर रहजाते हैं । कुछ आप बीती अर्ज करता हूं: २ सन् ३२की दिवाली आई और चली गई, न हमारे घर में चराग़ न मिठाई आई । इस बात से हमारे चेहरेपर शिकन आई न दिलमें कोई मलाल, बल्कि हक़ीक़ी मायनों में हमें अपनी इस बेबसीपर नाज़ था । क्योंकि यह मुसीबत देवकी तरकसे नहीं हमने खुद ही बुलाई थी । दीवालीसे दो-तीन रोज बाद माँने कहा- बेटा ! मुझे तुझसे कहना याद नहीं रहा, एक आदमी १०-१२ चक्कर लगा चुका है, न नाम बताता है न काम, न तेरे मिलने के वक्तपर आता है, यूं कई चक्कर काट चुका ।" माँ अपनी बात पूरी भी न कर पाई थी कि बोली - "देख, वही शायद फिर आवाज दे रहा है ।" बाहर आकर उनका परिचय पूछूं कि वे स्वयं ही बोले - "आप ही गोयलीयजी हैं।" "जी, मुझ खाकसारको गोयलीय कहते हैं ।" "वाह, साहब आप भी खूब हैं; पचासों चक्कर लगा डाले तब आप मिले हैं।" मैं हैरान कि नामाखाँ झाड़ पिलाने वाले यह साहब आखिर हैं कौन ? पुलिस वाले यह हो नहीं सकते, उनकी इतनी हिम्मत भी नहीं कि इस तरह पेश आएँ, कोई कर्ज माँगने वाला भी नहीं हो सकता क्योंकि यहाँ यह आलम रहा है कि घरमें भूका पड़ रहे दस फाके होजाएँ । तुलसी भैया बन्धुके कभी न माँगन जाएँ ॥ जब बाबा तुलसीभैया बन्धुसे माँगना वर्जित कर गये हैं, तब ग़ैरोंसे उधार माँगनेकी तो मैं बेवकूकी करता ही क्यों ? फिर भी मैंने बड़ी आजिज़ोसे न मिलने का अफसोस जाहिर करते हुए उनसे ग़रीब For Personal & Private Use Only Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] भिक्षुक मनोवृत्ति ११७ खानेपर तशरीफ आवरीका सबब पूछा तो मालूम आदि बाँटते हुए एक ऐसे गाँवमें गये जहाँ वर्षासे हुआ कि मेरे साथ जो जेलमें एक वालिण्टियर बहुत हानि नहीं हुई थी और बादमें मालूम हुआ कि यह १-२ माह रहे थे, ये उनके भाई हैं। उनकी तन्दुरुस्ती ब्राह्मणोंका गाँव था । वहाँ गाँव वालोंकी सलाहसे ठीक न होनेकी वजहसे वे शिमले जाना चाहते हैं। तय हुआ कि पूरे गाँव भरके लिये कमसे कम एक लिहाजा मुझे उनके पहाड़ी अखसजातके माकूल सप्ताहके भोजनका प्रबन्ध फौरन कर देना चाहिये इन्तजामात कर देने चाहिये। और जबतक स्थिति पूर्व जैसी न होजाय बराबर मैं तो सुनकर सन्न रह गया। पहले तो यही साप्ताहिक सहायता आती रहनी चाहिये। जन-लेखा बड़ी मुश्किलसे समझमें आया कि ये आखिर जिक्र का हिसाब लगाया गया तो ८० मन गेहूं की हत किन साहबका कर रहे हैं। यह जान पहचान ठीक बैठता था। गाड़ी यहाँ आकर अटकी कि ८० मन इसी तरह की थी जैसे कोई कहार देहलीसे डोली गेहूँ दिल्लीसे क्योंकर लाया जाय ? कारके आने-जाने खरीदकर ले जाएँ और लोगोंसे कहें कि पं० नेहरू को ही बमुश्किल नहर विभागसे आज्ञा मिली है। रिश्तेमें साढू होते हैं । और कुरेदकर पूछनेपर इस खतरेमें ट्रक या लॉरी तो किसी हालतमें भी बताएँ कि जिस शहरसे पण्डितजी कमला नेहरूका नहीं आसकती । हम लोगोंको चिन्तामें पडे देख गाँव वाले बोले 'मुझे उसकी इस दीदादिलेरी, बेतकल्लुफ़ी, "दिल्लीसे गेहूँ लानेकी क्या जरूरत है। हमारे यहाँ भीखके टूक और बाजारमें डकार वाली शानपर सबके पास गेहूँ भरा पड़ा है, दाम देकर चाहे ताव तो बहुत आया, मगर घरपर आया जानकर जितना खरीद लो।" बल खाकर रह गया और निहायत आजिजीसे हमारी हैरानीकी हद न रही, हमने कहा-अरे मज़बूरी जाहिर की, न चाहते हुए भी मुफ़लिसीकी भई जब तुम्हारे पास गल्ला भरा पड़ा है तब तुम रेखा खींची। मगर उसको यकीन न आया। "लोग नाहक हमसे लेना चाहते हो? बड़े खुदग़रज़ हैं, खुद गुलछरें उड़ाते हैं, मगर दूसरों वे बोले-"वाह साहब, आप जब इतनी दूर को छटपटाते देखकर भी नहीं सिहरते।" इसी तरहके चलकर देने आये हैं तब हम क्यों न लें, आप भी भाव व्यक्त करते हुए वे चले गये और मैं अपनी अपने मन में क्या कहेंगे कि ब्राह्मण होकर दान लेनेसे इस बेबसीपर नादिम गढ़ा-सा रह गया कि एक वो दुत्कार किया ।" हमने अपनी हँसी और आवेशको हैं जो स्वास्थ्य सुधारने पहाड़ जारहे हैं और एक हम रोककर कहा-“भई हम इस वक्त खैरात करने नहीं है कि दम उखाड़ने वाली खाँसीके लिये मुलैठी-सत आये. अपने भाइयोंकी मदद करने आये हैं। नहीं जुटा पारहे हैं। मुसीबतमें इन्सान ही इन्सानके काम आता है। हम दे रहे हैं इसीसे दाता नहीं और जो ज़रूरतमन्द ले कुछ घटनाए विरोधी भी सुनिये रहे हैं, वह माँगते नहीं। यह तो सब मिलकर १९३३ या ३४ की बात है। जमनामें बाढ़ मुसीबतमें एक दूसरेका हाथ बटा रहे हैं। इसीलिये आजानेसे निकटवर्ती गाँव बड़ी विपदामें आगये थे। गाँवमें जो सचमुच इमदादके योग्य हो उसे बुलादो, उन्हें भोजन, वस्त्र, दवा आदिकी अविलम्ब श्राव- जो हमसे उसकी सहायता बन सकेगी करेंगे।" श्यकता थी । दिल्ली वाले प्राणपणसे सहायता पहुँचा गाँव वालोंने जिस बुढ़ियाका नाम बताया, उसने रहे थे । हमारे इलाकेसे भी हजारों रुपये एकत्र हुए। मिन्नतें करनेपर भी कुछ नहीं लिया। तब वे गाँव हम एक कारमें आवश्यक सामान रखकर नहरके वाले स्वयं ही बोले-आप नाहक परेशान होते हैं । रास्तेमें पड़ने वाले गांवमें गये। वहाँ दवाएँ, वस्त्र इमदाद लेगा तो सारा गाँव लेगा, वर्ना कोई न लेगा। - ३ For Personal & Private Use Only Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११८ अनेकान्त [वर्ष ९ अगर आप हमें न देकर सिर्फ १-२ को देकर चले अपनी दानशीलताकी खाज मिटाई गई । कारमें सब जायेंगे तो सारा गाँव इन्हें हलका समझेगा, ताना साथी मुँह लटकाये दिल्ली वापिस जारहे थे, हम बड़े मारेगा, इसी डरसे यह लोग नहीं लेते हैं न लेंगे। या ये किसान, शायद इसी समस्याको सब बड़ा जी खराब हुआ, जिन्हें सचमुच सहायताको सुलझा रहे थे। जरूरत थी, उन्हें भी सहायता न दी जासकी । लाचार कारमें बैठकर नहरकी पटरी-पटरी दिल्लीकी डालमियाँनगरमें सहारनपुरके चौ० कुलवन्तओर वापिस जारहे थे कि नहरके किनारे कुछ राय जैन रहते थे । ५०-५५ वर्षकी आयु होगी। लोग औरतों बच्चों समेत दिखाई दिये तो कार जीशऊर, खुशपोश और बड़ी वजह क़तहकं बुजुर्ग रुकवा ली। पूछनेपर मालूम हुआ कि गाँवमें पानी थे। घरके आसदा थे. मगर व्यापारमें घाटा आजाने आजानेसे यह लोग यहाँ आगये हैं और ज्यादातर से यहाँ सर्विस करके दिन गुजार रहे थे। मामली किसान जाट हैं। वेतन और मामूली पोस्ट पर काम करते थे। मेरे पास हमने जब इमदाद देनेकी बात उठाई तो वे अक्सर आया करते और बड़ी तजरुवेकी बातें लोग बातको टाल गये, दुबारा कहा तो ऐसे चुप सुनाया करते थे। निहायत खुश अखलाक बामज़ाक, होगये जैसे कुछ सुना ही नहीं। फिर तनिक जोर नेकचलन और कायदा करीनेके इन्सान थे। उनकी देकर कहा तो बोले-आपकी मेहरबानी, हमें किसी सुहबतमें जितना भी वक्त सर्फ हुआ, पुरलुत्फ रहा । चीजकी दरकार नहीं, भगवानका दिया सब हर इन्सानको घरेलू परेशानियाँ और नौकरी सम्बन्धी असुविधाएँ होती हैं, मगर २-३ सालके ___ उस गाँवकी भिक्षुक मनोवृत्ति देखकर हम जो अर्सेमें एकबार भी ज़बानपर न लाये । मिल क्षेत्रों में गाँव वालोंके प्रति अपनी राय कायम कर चुके थे। जहाँ बिल लोगोंको न्या जहाँ बैठे बिठाये, लोगोंको उत्पात सूझते रहते हैं। वह उड़ती नज़र आई तो हमने अपनी दानवीरताके इंक्रीमेण्ट, (वार्षिक तरक्की) बोनस (नौकरीके अतिबड़प्पनके स्वरमें तनिक मधुरता घोलते हुए कहा- रिक्त वार्षिक भत्ता) डेजिगनेशन (पद) और ऑफि"सोचकी कोई बात नहीं, तुम्हारा जब सब उजड़ ससकी शिकायतें, किन्कलाब, मुर्दावाद और हाथगया है, तो यह सामान लेनेमें उज्र किस बातका ? हाथके नारोंसे अच्छे अच्छोंके आसन और मन यह तो लाये ही आप लोगोंके लिये हैं।" हिलजाते हैं । तब भी उनके चेहरेपर न शिकन ___ हमारी बात उन्हें अच्छी नहीं लगी, शिष्टाचारके दिखाई दी, न ज़बानपर हर्फेशिकायत.।। नाते उन्होंने कहा तो शायद कुछ नहीं, फिर भी उनका इकलौता लड़का रुड़की कॉलेज में इञ्जीउनके मनोभाव हमसे छिपे नहीं रहे। उन्होंने मौन नियरिङ्ग पढ़ रहा था। शायद ८०) रु. मासिक रहकर ही हमपर प्रकट कर दिया कि जो स्वयं भेजने पड़ते थे । मैं जानता था यह उनके बूतेके अन्नदाता हैं, वे हाथ क्या पसारेंगे? फिर भी हमारे बाहर है, उन्हें बमुश्किल इतना कुल वेतन मिलता मन रखनेको उनमेंसे एक बूढ़ा बोला-“लाला- था। अत: मैं समझता था कि या तो धीरे-धीरे बचे हम सब बड़े मौजमें हैं, अगर कुछ देनेकी समाई है खुचे जेवर सर्फ होरहे हैं या सरपर ऋण चढ़ रहा तो उस टीलेपर हमारे गाँवका फ़कीर पड़ा है, उसे है । पूछनेकी हिम्मत भी न होती थी, पूछू भी जो देना चाहो दे आओ । हम सब अपनी-अपनी किस मुंहसे ? गुजर-बसर कर लेंगे । उसकी इमदाद हमारे आखिर एक रोज़ जी कड़ा करके मैंने रास्तेमें बसकी नहीं।" ___ उनसे साहू साहबसे छात्रवृत्ति लेनेके लिये कह ही आखिर उस फकीरको ही पाटा-वस्त्र देकर दिया। सुनकर शुक्रिया अदा करके मन्दिरजी चले Jain Education Interational For Personal & Private Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] सम्पादकीय गये। दूसरे रोज घरपर तशरीफ लाये और फर्माया- बतौर इनाम मिलेगा। "गोयलीयजी, आप मेरे बड़े शुभचिन्तक हैं, यह मैं मैंने समझा वार भरपूर बैठा और चौधरी साहब जानता हूं। आपने मेरा दिल दुखानेको नहीं बल्कि अब सीधे खड़े नहीं रह सकते । मगर नहीं, उन्होंने नेकनीयतीसे ही मुझे यह सलाह दी है। आपकी वार भी बड़ी खूबीसे काटा और मुझे पटखना भी बात टालनेकी हिम्मत न होनेकी वजहसे, मैं उस ऐसा दिया कि चोट भी न लगे और हमलावरकी वक्त स्वीकारता देकर चला गया। मगर फिर घर तारीफ करनेको जी भी चाहे। जाकर सोचा तो, बात मनमें बैठी नहीं। एक साल फर्माया-गोयलीयजी, आपका फर्माना वजा रह गया जैसे भी होगा निकल जायगा। इस बुढ़ापे. है, मगर बेअदबी मुश्राफ, यह होनहार लड़कोंको में क्यों जरासी बातपर खानदानको दाग़ लगाया ? वजीफेके तौरपर मिलता है तो गरीब-अमीर सब भला लड़का ही अपने मनमें क्या सोचेगा, भई लड़कोंको बिना माँगे क्यों नहीं मिलता, सिर्फ गरीब गोयलीयजी मैं छात्रवृत्ति लेकर अपने बच्चेका दिल लड़कोंको ही क्यों मिलता है।" छोटा हरगिज़ नहीं करूँगा।" ___ मेरे पास इसका जवाब नहीं था, क्योंकि मैं __ चौधरी साहब इतना स्वाभिमानका उत्तर देगें, जानता था कि असहाय विद्यार्थी भी उच्चसे उच्च अगर मुझे यह आगाह भी होता तो मैं यह जिक्र शिक्षा प्राप्त कर सकें, आर्थिक अभावके कारण उनका तक न छेड़ता। मगर अब तो तीर कमानसे निकल विकास न रुक जाय, इसी सद्भावनासे प्रेरित होकर चुका था, निशानेपर न लगे तो तीरन्दाजकी खूबी श्रीमान साह साहबने छात्रवृत्ति जारी की हैं। क्या ? मैं तनिक अधिकारपूर्वक बोला-चौधरी चौधरी साहब आज संसारमें नहीं है, मगर साहब, आपका साहबजादा फस्टक्लास फट आया है, । उनकी वजहदारी याद आती रहती है। जो ऐसे होनहारको तो वजीफा लेनेका पूरा हक है । इसमें सङ्कोच और एहसानकी क्या बात है ? यह तो उसे १८ फरवरी १९४८ सम्पादकीय १ मगरमच्छके आंसू गोलियां चलवाते रहे । स्वराज्य-सैनिकोंको गिरफ्तार ___ महात्माजीके निधनसे सारा भारत शोकमग्न हो कराते रहे, अदालतोंमें झूठी गवाहियाँ देकर सजा गया है। भारतीयों को ही नहीं विदेशियोंके हृदयको दिलाते रहे । खद्दर पहनना तो दरकिनार विलायती भी काफी आघात पहुँचा है। उनके धार्मिक और कपडा पहनते रहे-बेचते रहे। पतितोद्धार तो कजा राजनैतिक सिद्धान्तोंसे मतभेद रखने वाले भी व्यथित अपने सजातियोंको भी मन्दिर-प्रवेशसे रोकते रहे। हुए हैं । महात्माजीका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि हिन्दू-मुस्लिम राज्यकी क्या चली अपने समाजको विरोधी भी उनके लोकोत्तर गुणोंके कायल थे। कुरुक्षेत्रका मैदान बनाये रहे-आज महात्माजीके __ ऐसे लोग भी जो जीवनभर महात्माजीके प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पण कर रहे हैं, तार भेज रहे हैं, सिद्धान्तोंका विरोध करते रहे, उनके चलाये स्वराज्य- शोक-सभाओंमें भाषण देरहे हैं, लेख लिख रहे हैं, संग्राममें विपक्षीकी ओरसे लड़ते रहे। निहत्थोंपर जिन्हें स्वयं लिखना नहीं आता, वे दूसरोंसे लिखवा For Personal & Private Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२० अनेकान्त रहे हैं, पत्रोंके विशेषांक निकाल रहे हैं, स्मारक बनवा रहे हैं। मानों सारा भारत गांधीवादी होगया है । काश लोगोंने अपनी भूल समझी होती, और सचमुच हृदय परिवर्तन किया होता ! जो संतप्त होने का अभिनय कर रहे हैं काश सचमुच संतप्त हुए होते तो महात्माजीका मरण भी भारतके लिये वरदान हुआ होता ! ऐसे छद्मस्थ लोगोंके आँसू उस मगर के समान है जो धोखे में डालने को तो आँखों में आँसू भरे रखता है, पर अपनी करनीसे लहमेभरको भी बाज नहीं आता । सन् ३२ या ३३में महात्माजी जब पहली बार दिल्लीकी हरिजन कौलोनीमें ठहरे तो सन्ध्याकालीन प्रार्थनाके समय काफ़ी जन-समूह एकत्र हुआ। जिनमें विलायती वस्त्रोंसे सुसज्जित बनी-ठनी महिलाएँ और सूटबूट धारी युवक ही ज्यादातर थे । पाँव छूने के लिये अग्रसर होती हुई भीड़को देखकर महात्माजी तनिक ऊँचे स्वर में बोले - "तुम लोग मेरे पाँव छूनेके बजाय मेरे मुँहपर थूक देते तो अच्छा था । मैं जिन सिद्धान्तोंके प्रसारके लिये मारा-मारा फिर रहा हूँ, जिस स्वराज्य-संग्राम में मैं लिप्त हूँ, उसमें तो तुम लोग मेरी तनिक भी सहायता नहीं करते ? उल्टा जिन विदेशी वस्त्रोंकी मैं होली जलवाता फिर रहा हूँ, उन्हें ही पहनकर तुम मेरे सामने आते हो ? मेरी एक भी बात न मानकर केवल दर्शन करने में ही जीवनकी सार्थकता समझते हो ।" सचमुच उस नेतासे बड़ा अभागा दुनियामें और कौन हो सकता है, जिसका जय-जयकार तो सारा देश करे, उसे ईश्वर तुल्य पूजे किन्तु आदेशोंका पालन मुट्ठीभर ही करते हों । ऐसे ही छद्मस्थ अनुयायियोंके कारण नेता धोखा खाजाते हैं । स्वयं महात्माजी भी कई बार ऐसे धोखेके शिकार हुए। भारत में सर्वत्र इस तरह की श्रद्धा भक्ति श्रोत-प्रोत भीड़को देखकर उन्हें अपने अनुयायियोंकी इस बहुसंख्याका गलत अन्दाज होजाता था । वे समझ लेते थे, मेरे इशारेपर समूचा भारत तैयार बैठा है किन्तु युद्ध छेड़नेपर ३५ करोड़के देश में [ वर्ष ९. १ लाख से अधिक सैनिक कभी नहीं हुए । आश्चर्य तो यह देखकर होता है कि हमारी समाजमें जिन भले मानुसोंने ब्र० शीतलप्रसादका बहिष्कार इसलिये किया कि वे अन्तर्जातीय विवाह और दस्सा पूजनको जैनधर्मानुकूल समझते थे । वही आज अछूतों के मन्दिर प्रवेश तथा रोटी-बेटी व्यवहार और विधवा विवाह के प्रबल प्रसारक महात्माजीका बड़ी श्रद्धा-भक्तिसे कीर्तन कर रहे हैं। जिन लोगोंने ब्रह्मचारीजीको अपने सभामवसे न बोलने दिया, वही महात्माजीकी शोक सभा मन्दिरों में कर रहे हैं । जिन्होंने शिष्टता के नाते उन्हें ब्रह्मचारी तक लिखना छोड़ दिया, मन्दिरोंमें जानेसे रोक दिया, वही आज महात्माजीका स्मारक बनानेकी सोच रहे हैं, विश्ववन्द्य कहकर अपनी श्रद्धा-भक्ति प्रकट कर रहे हैं । जब हम चलें तो साया भी अपना न साथ दे । जब वे चलें ज़मींन चले ग्रस्माँ चले ॥ - जलील यदि सचमुच यह लोग महात्माजीके अनुयायी और श्रद्धालु हुए होते तो बात ही क्या थी । भूल किससे नहीं होती, बड़े-बड़े दोषी भी प्रायश्चित करने पर सङ्घ में मिला लिये जाते हैं। पर नहीं, इनके हृदय में उसी तरह हलाहल भरा हुआ है, देशकी प्रगति में ये बाधक रहे हैं और रहेंगे, सुधार कार्यों में सदैव विघ्न स्वरूप बने रहेंगे। इनका रुदन केवल दिखावा मात्र है । महात्माजी के अनुयायियोंके हाथमें आज शासन-सत्ता है इसीलिये इन्होंने अपना यह बहुरूपिया वेष बनाया है । शासन-सत्ता जिसके हाथमें हो, वह चाहे भारतीय हो या अभारतीय, पटवारी हो या दरोगा उसीके तलुवे सहलाने में लोग दक्ष होते हैं । २ जाली संस्थाएं कुछ धूर्तों का यह विश्वास है कि दुनिया मूर्खोसे भरी पड़ी है। इसमें हियेके अन्धे और गाँठके पूरे अधिक और विवेकबुद्धि वाले बहुत कम हैं। इसी लिये वे धूर्तता के जालमें लोगोंको फँसाते रहते हैं । हमारी समाज में भी कितनी जाली संस्थाएँ ऐसे लोगों ने कायमकी हुई हैं । कोई धर्मार्थ औषधालयके नाम For Personal & Private Use Only . Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] सम्पादकीय १२१ पर, कोई अहिंसा प्रचारक सङ्घके नामपर, मनमानी काम लेनेका दुःस्साहस कर रहे हैं। इतना भी होता लूट मचा रहे हैं। पत्रोंमें विज्ञापन देते हैं, उपदेशकी तो गनीमत थी, शायद तूफानोंमें पड़कर लहरोंके का जामा पहनकर गाँव-गाँवमें घूमते हैं। चन्दा सहारे वह कभी न कभी पार होजाती । परन्तु यहाँ इकट्ठा करते हैं और गुलछरें उड़ाते हैं। समाजका तो आलम ही जुदा है। हर नाविक बना हुआ अपनी खून चूसने वाली ऐसी जाली संस्थाओंका सामूहिक अक्लकी पन्तल फाड़ रहा है। एक-दूसरेके मार्गका रूपसे भण्डाफोड़ होना चाहिये । इनके संचालकोंके विपरीत अनुसरण कर रहा है । नाव भँवरमें पड़कर काले कारनामोंका सचित्र उल्लेख होना चाहिये। मौतके चक्कर काट रही है और उसके सितमजरीफ ताकि समाज इन धूर्तोंके चङ्गलसे बच सके । नाविक एक दूसरेको धकेलने और अपनी मनमानी अनेकान्त ऐसे लेखोंका स्वागत करेगा। करनेपर तुले हुए हैं। और नावमें बैठे हुए निरीह ३ हमारा नेता अबोध माली सर पीटकर चिल्ला रहे हैं खेलना जब उनको तूफानों से आता ही न था । । हमारे नेता एक नहीं अनेक हैं, जितने नावमें फिर यह किश्तीके हमारे नाखुदा' क्यों होगये ? बैठने वाले नहीं उससे अधिक खेवट मौजूद हैं। कैसी दयनीय स्थिति है उस समाजकी, जिसके अगर यह खेवट एक मत होकर हमारी इस जीर्णशीर्ण नौकाको पार लगानेका प्रयत्न करते तो हमें __ भूतपूर्व बल पराक्रमको याद करके मृत्यु उसके पास आनेसे झिझकती है, परन्तु उसके मार्गदर्शक बने हुए अपने भाग्यपर गर्व होता, हम बाआवाज बुलन्द . 2 उसे स्वयं मौतके मुँहमें ले जारहे हैं । गन्तव्य स्थान कहते कि जहाँ इतर नौकाओंको एक-दो मल्लाह नहीं तक सम्यक् मार्गप्रदर्शन कोई नहीं कर रहा है। मिल पा रहे हैं, वहाँ हमारी सुरक्षाको इतने नाविक रविशसिद्दीकीके शब्दोंमेंमौजूद हैं । परन्तु खेद है कि स्थिति इसके विपरीत खिज्र ही खिज्र नज़र आते हैं हरसू' हमको । है। इतर नौकाओंके मनुष्योंमें बाकायदा जिन्होंने . ___ कारवाँ' बेख़बरे राहेगुज़र आज भी है । मार्गकी दुर्गम कठिनाइयोंका अनुभव प्राप्त किया है। एक मार्ग प्रदर्शक हो तो उसकी बात समझमें आए जिन्हें मार्गमें पड़ने वाली चट्टानों, लहरों और भँवरों और गिरते-पड़ते लक्षकी ओर भी बढ़ा जाए । परन्तु का ज्ञान है.और जो आँधी, पानी, तूफानोंके आनेका जहाँ न लक्षका पता है, न मार्गका पता है, वहाँ .... इरादा सप्ताह पूर्व भाँप लेते हैं बक़ौल इक़बाल सिवा दम घुट-घुटकर मरनेके और चारा भी क्या है ? जो है पमें पिन्हा' चश्मेबीना देख लेती है । ___ हम सच्चे मार्गप्रदर्शककी खोजमें इधर-उधर ज़मानेकी तबीयतका तकाज़ा देख लेती है ॥ भटकते हैं, परन्तु सफलता नहीं मिलती:उन्हीं सुदक्ष और अनुभवी मनुष्योंके हाथमें पतवार चलता हूं थोड़ी दूर हरइक तेज़रौ के साथ । देकर अपना खेवट चुना है और जिन्हें दक्षता प्राप्त नहीं पहचानता नहीं हूं अभी राहबरको मैं ॥ हई है. वे चुपचाप नावमें बैठे तुफानसेि टक्कर लेनेके . हमारी स्थिति उक्त शेरके अनसार होती तो भी अनुभव भी प्राप्त कर रहे हैं और पार भी होरहे हैं। १ खेवट-मल्लाह । २ पथप्रदर्शक। ३ चारों ओर । परन्तु अपने यहाँ बात ही जुदा है। किनारेपर ४ यात्रीदल । ५ भटकी राहमें। . लगे वृक्षोंसे जो भी तना, शाख, डाली, टहनी तोड़ ६ मिर्ज़ा ग़ालिब फरमाते हैं-मैं हर तेज़रौ (शीघ्र चलने म सका, उसने उसीको चप्पू बनाकर नाव खेनेका । वालेके साथ) चलता हूँ पर जब मुझे मालूम होता है कि अमोघ उपाय समझ लिया । जिन्हें टहनी न मिली, यह तो स्वयं भटक रहा है या लुटेरा है तो ठहर जाता हूं वह धोतियोंको ही पानीमें डालकर उससे पतवारका इस मेरे भटकनेका कारण यही है कि मैं अभी तक अपने १ पर्दैमें छुपा हुआ, अप्रकट । २ दूरन्देश दृष्टि । असली पथप्रदर्शक (राहबर) को नहीं पहचान पाया हूँ। For Personal & Private Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२२ अनेकान्त गनीमत थी, भटकते-भटकते कभी तो सच्चे मार्ग दर्शकका पता पाते । परन्तु यहाँ तो कोई नेता है ही नहीं, नेताओंके वेषमें भेड़िये, बावले, अबोध और अकर्मण्य हमारे चारों ओर घूम रहे हैं। और अपनी जुदा-जुदा डफली बजा रहे हैं, उस डफलीकी तानपर मस्त होकर कौन कुए में गिरेगा और कौन खाईमें इसकी इन्हें न चिन्ता है और न सोचनेका समय है । जैन समाज के तीनों सम्प्रदायोंमें अखिल भारतीय संस्था तीन भी होतीं तो भी ठीक थीं। परन्तु २ दर्जनसे तो अब भी कम नहीं और कई संस्थाओं के बीजारोपण होरहे हैं । और तारीफ यह है कि इनके अधिकारियों को अपने निजी कार्योंसे लहमेभरकी फुरसत नहीं । कार्यालय मामूली क्लर्क चलाते हैं और इनकी ओर से बहुत साधारण टकेपन्थी एक-एक दो-दो उपदेशक गाँव-गाँवमें घूमते हैं । वे कहाँ जाते हैं और क्या-क्या अनाप-शनाप कह आते और उसका क्या फल होता है, यह जानने तकका अवकाश किसीके पास नहीं है। इन अखिल भारतीय सभाओं के अधिवेशन होते हैं । वह अधिवेशन क्यों होरहा है और क्या उपयोगी योजनाएँ समाजके लिये रखनी हैं, इसपर कार्यकारिणी कभी विचार तक नहीं करती । विचार करनेको समय ही नहीं, बमुश्किल बड़े दिन या ईस्टरकी छुट्टियोंमें केवल अधिवेशनमें सम्मिलित होनेको समय निकल पाता है । परिणाम यह होता है कि विषय निर्वाचन में बैठे हुए महानुभाव वहींकी वहीं परस्पर विरोधी उलूल-जुलूल प्रस्ताव गढ़ते रहते हैं, घण्टों बहस होती रहती है और अन्त में कुछका कुछ पास होजाता है। न कोई यह सोचता है कि इस प्रस्तावका क्या प्रतिफल होगा, न कोई उसे श्रमली रूप देने की योजनापर ही विचार करता है । जिनके पास संस्थाएँ हैं, वे कुछ कर नहीं पारहे हैं, जिनके पास नहीं हैं वे किसी न किसी बहाने अपनी नई संस्था खोलने जारहे हैं। पानकी दुकान खोलनेमें शायद असुविधा हो, परन्तु संस्था खोलनेमें कोई परेशानी नहीं । समाजसे चन्दा मिल ही जाता है, बस अपने दो-चार आदमियोंको आजीविका [ वर्ष ९ भी मिल गई और स्वयं नेता भी बन गये । नेता बनना बुरा नहीं यदि त्याग और तपस्या के साथ-साथ कुछ कर गुज़रनेकी चाह हो । परन्तु केवल आजीविका के लिये अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूर्ण करनेके लिये और अपनेको अर्थ चिन्तासे निराकुल करनेके लिये नेता बननेका प्रयत्न दुखिया समाजको पीठ में छुरा भोंकना है। ४ अल्पसंख्यकोंके सुधार स्वर्गीय रायबहादुर साहु जुगमन्दरदासजी नजीबासन् १९२८ की दशलाक्षणी के दिन थे । मैं और बादमें धार्मिक और सामाजिक चर्चाएँ कर रहे थे । प्रसङ्ग छिड़ गया । रायबहादुर साहब एक ही सुलझे सुधारों को लेकर जैनसमाजकी तू-तू, मैं-मैं का भी बोले :- " गोयलीयजी, समाजकी शक्ति इन व्यर्थ के हुए आदमी थे, वे सहसा गम्भीर हो उठे और कार्यों में नष्ट होती देखकर मुझे बड़ा दुख होता है । व्यर्थकी उथल-पथल मची हुई है ।" इन छोटे-छोटे सुधारोंको लेकर हमारी समाज में सुधारोंके विपक्षमें रायजनी करते सुनकर मैं कुछ कहना ही चाहता था कि वे बोले – “घबराओ पक्षपाती हूं, परन्तु मैं समाज में उन्हीं आन्दोलनों का नहीं, मैं सुधारोंका विरोधी नहीं आपसे अधिक समर्थक हूं जो जैनसमाज से सम्बन्ध रखते हैं और जैनेतर बहुसंख्यकों पर आश्रित नहीं हैं। मैं कब कहता हूँ कि शास्त्रोद्धारका आन्दोलन बन्द कर दिया जाय, यह आन्दोलन तो इतने वेग से चलाया जाय कि एक भी शास्त्र अमुद्रित न रहने पाए, दस्सापूजनाधिकार अन्तर्जातीयविवाहका आन्दोलन वर-विक्रय, वेश्यानृत्य, नुक्ता प्रथाको अविलम्ब बन्द् आप खूब कीजिये । बाल और वृद्ध विवाह रोकिये, कराइये । यह सब आन्दोलन केवल अपनी समाजसे सम्बन्ध रखते हैं अतः इन्हें सहर्ष चलाइये और सफलता प्राप्त कीजिये ।” "मेरा आशय तो यह है कि वे आन्दोलन जो हमारे इतर भिन्न धर्मियों, पड़ोसियों और सजं तियोंसे सम्बन्ध रखते हैं उन्हें न छेड़ा जाय । क्योंकि यदि For Personal & Private Use Only Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किरण ३] निरीक्षण और सम्मति १२३ उन कार्योंको वे पसन्द न करेंगे तो हमें कभी सफलता कार्योंमें उनको सहयोग देना चाहिये, परन्तु ऐसे नहीं मिल सकती, उल्टा हमारी स्थिति बड़ी दयनीय कार्योंको लेकर अपनी समाजमें वितण्डावाद नहीं होजायगी । उदाहरणके लिये आप लीजिये- बढ़ाना चाहिये।" दस्साओंको हम मन्दिरोंमें पूजा-प्रक्षालका तो रायबहादुर साहबकी उक्त भविष्यवाणी आज अधिकार सहर्ष दे सकते हैं क्योंकि मन्दिर अपने साक्षात् हो उठी है । जो पण्डे, पुजारी मन्दिरोंमें निजी है. उनपर जैनेतर बन्धओंका कोई अधिकार अछूतोको नहीं जाने देते थे, कुत्ते-बिल्लीसे भी अधिक नहीं। हमारे इस कार्यसे उनका बनता बिगड़ता भी घृणा उनसे करते थे; जिनकी मूर्खतासे १०-१२ करोड़ नहीं है। किन्तु यदि हम उनसे शादी व्यवहार करने विधर्मी बन चुके थे। आज वही बहुसंख्यक जनता द्वारा चुने गये शासनाधिकारियों द्वारा बनाये गये लगें तो हमारे सजातीय किन्तु भिन्न भाइयोंके कान अवश्य खड़े होजाएँगे। यदि वह स्वयं इसे नहीं अछूत मन्दिर-प्रवेश और समान सिद्धान्तके सामने सर टेकते नजर आरहे हैं। अपनाएँगे तो हमें ऐसा करते देख हमारे साथ विवाह अब कानूनन हरिजनोंसे धार्मिक और सामातथा सामाजिक-सम्बन्ध विच्छेद कर देंगे । और जिक क्षेत्रोंमें समान व्यवहार होगा, वे मन्दिरोंमें कोई भी इतने बड़े समुदायसे वहिष्कृत होकर बेरोक-टोक जा सकेंगे। उनसे जो रोटी-बेटी व्यवहार पानीमें मगरसे असहयोग रखकर-जीवित नहीं करेंगे उनसे घृणा करने वाले दण्डनीय होंगे। वे रह सकता। अछूतोद्धार आदि आन्दोलन भी इसी भोजन ग्रह खोल सकेंगे । तब बताइये पृथ्वीपर तरहके हैं । आप लाख प्रयत्न इनके उद्धारका अब उनसे दामन बचाकर चलना कैसे सम्भव , कीजिये, यदि बहुसंख्यक समाज इन्हें नहीं अपनाता तो आप भी उनकी दृष्टिमें अछूत बनकर रह - जैन जो बहु-संख्यक समाजके विरोधके भयसे जाएँगे । और जिस रोज हमारे बहुसंख्यक सजातीय पतितोद्धार कार्य करते हुए हिचकते थे। अब उपयुक्त भाई और इतर समाज इनको लेना चाहेंगे, तब अवसर आया है कि वे उन्हें जिनधर्ममें दीक्षित आपको भी अनुकरण करना पड़ेगा। जिन कार्योंमें करके जैनसङ्घकी संख्या बढ़ाएँ। बहुसंख्यक समुदायका हित-अहित सन्निहित है; वे डालमियाँनगर (विहार) उन्हींके करनेके लिये छोड़ देने चाहियें, उपर्युक्त ८ मार्च १९४८ -गोयलीय निरीक्षण और सम्मति हालमें जैनसमाजके ख्यातिप्राप्त और स्याद्वादमहाविद्यालय काशीके प्रधानाध्यापक पं० कैलाशचन्दजी सिद्धान्तशास्त्री वीरसेवामन्दिरमें पधारे थे। आपने यहाँके कार्योंका निरीक्षण कर जो वीरसेवामन्दिरपर अपने उद्गार प्रकट किये हैं और निरीक्षणबुकमें सम्मति लिखी है। उसे यहाँ दिया जा रहा है: . आज मुझे वर्षों के बाद वीरसेवामन्दिरको देखनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। माननीय मुख्तारमा० ७१ वर्षकी उम्रमें भी जवानोंकी सी लगन लिए हुए कार्यमें जुदे हैं। उनके दोनों सहयोगी विद्वान् न्यायाचार्य पं० दरबारीलालजी कोठिया व पं० परमानन्दजी भी अपने-अपने कार्यमें संलग्न हैं। इस मन्दिरसे दिगम्बर जैन-साहित्य और इतिहासकी जो ठोस सेवा होरही है वह चिरस्मरणीय है । मेरी यही भावना है कि मुख्तारसा० सुदीर्घ काल तक जीवित रह कर हमारे साहित्यकी सेवा करते रहें। कैलाशचन्द्र शास्त्री १०-२-४८ स्याद्वाद दि० जैन महाविद्यालय, काशी For Personal & Private Use Only Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२४ अनेकान्त [वर्ष ९ साहित्य परिचय और समालोचन १ राजुल [कान्य समझे जग हमको क्यों कायर, ऐसी भी क्या हम क्षीण हुई। लेखक, श्रीबालचन्द्र जैन विशारद काशी। प्राप्ति नारी ऐसी क्या हीन हुई ! स्थान, साहित्यसाधनासमिति जैनविद्यालय भदैनी 'उत्सर्ग' अध्यायमें राजुल जब गिरनार पर्वतपर काशी। मूल्य शा)। नेमिकुमारके पास जाकर अपने आपको उनके चरणोंयह पद्यकाव्यग्रन्थ हालमें प्रकट हुआ है । यह में समर्पण कर देती हैं तब कविने नेमिकुमारके द्वारा लेखककी अपनी दूसरी रचना है। इसके पहले वे उनके समर्पणको स्वीकार करते हुए उनके मुखसे 'आत्मसमर्पण' पाठकोंको भेंट कर चुके हैं, जिसका कितना सैद्धान्तिक उत्तर दिलाया हैपरिचय पिछली किरणमें प्रकट होचुका है । इसमें कविने राजुल और नेमिकुमारका पौराणिक "श्राश्रो हम दोनों ही जगके दुखके कारणकी खोज करें बन्धन जगके हम काटेंगे बस यही भावना रोज करें । ऐतिहासिक चरित्र आधुनिक रोचक ढङ्गसे चित्रित । रत्नत्रय अपना परम साध्य तप औ' संयमको अपनाएँ, किया है। इसमें दर्शन, स्मरण, विराग, विरह और निश्चय ही बन्धन-मुक्त बने स्वातन्त्र्य-गीत फिर हम गाएँ॥" उत्सर्ग ये पाँच अध्याय हैं। प्रथम अध्याय कविने कल्पनाके आधारपर रचा है और शेष चार अध्याय कहनेका तात्पर्य यह कि यह काव्य कई दृष्टियोंसे पुराणवर्णित कथानुसार निर्मित किये हैं। कविसे यह अच्छा बना है। विदुषीरत्न पं० ब्र० चन्दाबाईजीकी काव्य उत्कृष्ट कोटिका बन पड़ा है। काव्यमें जैसी महत्वकी विद्वत्तापूर्ण प्रस्तावनाने तो स्वर्ण कलशका कुछ कोमलता, सरलता, शिक्षा, नीति, सुधार काम किया है। इस उदीयमान कविसे समाजको कवित्वकला आदि गुण अपेक्षित हैं वे प्रायः सब इस बहुत कुछ आशा है । हम उनकी इस रचनाका 'राजुल में विद्यमान हैं। इसके कुछ नमूने देखिये- स्वागत करते हैं। 'स्मरण' अध्यायमें कवि राजुल-मुखसे कहलाता है- २ मुक्तिमन्दिर [पद्यमय रचना] जीवन सनासा लगता था यदि नेमि न आए जीवन, लेखक पण्डित लालबहादुर शास्त्री। प्राप्तिस्थान जीनेका क्या उपयोग !अरे उत्साह न आए जीवनमें। ' नलिनी सरस्वती मन्दिर, भदैनी बनारस । मूल्य ।)। यहाँ नीतिकी कितनी सुन्दर पु 'विरह' अध्यायमें राजुल विरहीकी अवस्थाको यह क्षमा, निरभिमानता, सरलता, सत्य, निर्लोप्राप्त करती हुई भी अपने नारीत्वके अभिमानको भता, सयम, तप, त्याग, अपरिग्रहता और ब्रह्मचर्य नहीं भूलती। कवि राजुलके मुखसे वहाँ कहलाता है- इन दश मानव-धर्मोका, प्रत्येकका पाँच-पाँच सुन्दर बन बनमें मैं सँग सँग फिरती गिरिमें भी मैं सँग सँग तपती. एवं सरल पद्योंमें, कथनकरने वाली नवीन शैलीकी बना संगिनी जीवनकी फिर भी मुझको कायर माना । एक उत्तम रचना है। यह सामान्य जनतामें काफी तुमने कब मुझको पहिचाना। संख्यामें प्रचार-योग्य है और लोकरुचिके अनुकूल है। ऐसी सरल रचना करनेके लिये लेखक समाजके नारी ऐसी क्या हीन हुई! तनकी कोमलता ही लेकर नरके सम्मुख वह दीन हुई ! धन्यवादपात्र हैं। जो पुरुष करे कर हम न सकें ! जीवन-पथमें क्या बढ़ न सकें ! -दरबारीलाल जैन, कोठिया For Personal & Private Use Only Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | भारतीय ज्ञानपीठ काशीके प्रकाशन र १. महाबन्ध–(महधवल सिद्धान्तशास्त्र) प्रथम भाग । हिन्दी टोका सहित मूल्य १२)। २. करलक्खण-(सामुद्रिक शास्त्र) हिन्दी अनुवाद सहित । हस्तरेखा विज्ञानका नवीन ग्रन्थ । सम्पादक-प्रो० प्रफुल्लचन्द्र मोदी एम० ए०, अमरावती । मूल्य १)। ३. मदनपराजय- कवि नागदेव विरचित (मूल संस्कृत) भाषानुवाद तथा विस्तृत प्रस्तावना सहित । जिनदेवके कामके पराजयका सरस रूपक । सम्पादक और अनुवादक-पं० राजकुमारजी सा० । मू०5) ४. जैनशासन-जैनधर्मका परिचय तथा विवेचन करने वाली सुन्दर रचना। हिन्दू विश्वविद्यालयके जैन रिलीजनके एफ० ए० के पाठ्यक्रममें निर्धारित । मुखपृष्ठपर महावीरस्वामीका तिरङ्गा चित्र । मूल्य ४ ५. हिन्दी जैन-साहित्यका संक्षिप्त इतिहास-हिन्दी जैन-साहित्यका इतिहास तथा परिचय । मूल्य २॥)। ६. आधुनिक जैन-कवि-वर्तमान कवियोंका कलात्मक परिचय और सुन्दर रचनाएँ । मूल्य ३)। ७. मुक्ति-दूत-अञ्जना-पवनञ्जयका पुण्यचरित्र (पौराणिक रौमांस) मू०४) ८. दो हज़ार वर्षकी पुरानी कहानियां-(६४ जैन कहानियाँ) व्याख्यान तथा प्रवचनोंमें उदाहरण योग्य । मूल्य ३)। ९. पथचिह्न-(हिन्दी-साहित्यकी अनुपम पुस्तक) स्मृति रेखाएँ और निबन्ध । मूल्य २)। १०. पाश्चात्य तक शास्त्र-(पहला भाग) एफ० ए० के लॉजिकके पाठ्यक्रमकी पुस्तक । लेखक-भिक्षु जगदीशजी काश्यप, एफ० ए०, पालि-अध्यापक, हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी । पृष्ठ ३८४ । मूल्य ४|| ११. कुन्दकुन्दाचायके तीन रत्नमूल्य २)। १२. कन्नडप्रान्तीय ताडपत्र ग्रन्थसूची-(हिन्दी) मूडबिद्रीके जैनमठ, जैनभवन, सिद्धान्तवसदि तथा अन्य ग्रन्थ भण्डार कारकल और अलिपूरके अलभ्य ताडपत्रीय ग्रन्थोंके सविवरण परिचय । प्रत्येक मन्दिरमें तथा शास्त्र-भण्डारमें विराजमान करने योग्य । मूल्य १०)। वीरसेवामन्दिरके सब प्रकाशन भी यहांपर मिलते हैं प्रचारार्थ पुस्तक मँगाने वालोंको विशेष सुविधाएँ भारतीय ज्ञानपीठ काशी, दुर्गाकुण्ड रोड, बनारस । PRESE PANAMPREHTRANNARoggRIPense TRENAHAPAR For Personal & Private Use Only Jain Education Interational Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Regd. No. A-731 वीरसेवामन्दिरके नये प्रकाशन 1 अनित्यभावना-मुख्तार श्रीजुगलकिशोरजी 6 न्याय-दीपिका (महत्वका नया संस्करण) के हिन्दी पद्यानुवाद और भावार्थ-सहित / इष्टवियोगादिके न्यायाचार्य पं० दरबारीलालजी कोठिया द्वारा सम्पादित कारण कैसा ही शोकसन्तप्त हृदय क्यों न हो, इसको एक और अनुवादित न्यायदीपिकाका यह विशिष्ट संस्करण बार पढ़ लेनेसे बड़ी ही शान्तताको प्राप्त हो जाता है। अपनी खास विशेषता रखता है / अबतक प्रकाशित इसके पाठसे उदासीनता तथा खेद दूर होकर चित्तमें सस्करणोंमें जो अशुद्धियाँ चली आरही थीं उनके प्राचीन प्रसन्नता और सरसता आजाती है / सर्वत्र प्रचारके प्रतियोंपरसे संशोधनको लिये हुए यह संस्करण मूलग्रन्थ योग्य है। मूल्य / ) और उसके हिन्दी अनुवादके साथ प्राक्कथन, सम्पादकीय, ___2 आचार्य प्रभाचन्द्रका तत्त्वार्थसूत्र–नया 101 पृष्ठकी विस्तृत प्रस्तावना, विषयसूची, और कोई 8 प्राप्त संक्षिप्त सूत्रग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगलकिशोरजीकी परिशिष्टोंसे संकलित है, साथमें सम्पादक-द्वारा नवनिर्मित सानुवाद व्याख्या-सहित / मूल्य / ) 'प्रकाशाख्य' नामका एक संस्कृत टिप्पण भी लगा हुआ है, जो ग्रंथगत कठिन शब्दों तथा विषयोंका खुलासा करता 3 सत्साधु-स्मरण-मङ्गलपाठ-मुख्तार श्री हा विद्यार्थियों तथा कितने ही विद्वानोंके कामकी चीज जुगलकिशोरजीकी अनेक प्राचीन पद्योंको लेकर नई योजना, है। लगभग 400 पृष्ठोंके इस सजिल्द वृहत्संस्करणका सुन्दर हृदयग्राही अनुवादादि-सहित / इसमें श्रीवीर लागत मूल्य 5) रु०है। कागजकी कमीके कारण थोड़ी वर्तमान और उनके बादके, जिनसेनाचार्य पर्यन्त, 21 ही प्रतियाँ छपी हैं और थोड़ी ही अवशिष्ट रह गई हैं। महान् प्राचार्यों के अनेकों प्राचार्यों तथा विद्वानों द्वारा किये गये महत्वके 136 पुण्य स्मरणोंका संग्रह है और अतः इच्छुकोंको शीघ्र ही मँगा लेना चाहिये। शुरूमें 1 लोकमंगल-कामना, 2 नित्यकी आत्म-प्रार्थना, 7 विवाह-समुद्देश्य-लेखक पं० जुगलकिशोर 3 साधुवेषनिदर्शन-जिनस्तुति, 4 परमसाधुमुखमद्रा और मुख्तार, हालमें पकाशित चतुर्थ संस्करण / 5 सत्साधुवन्दन नामके पाँच प्रकरण हैं। पुस्तक पढ़ते यह पुस्तक हिन्दी-साहित्यमें अपने ढंगकी एक ही समय बड़े ही सुन्दर पवित्र विचार उत्पन्न होते हैं और चीज है। इसमें विवाह-जैसे महत्वपूर्ण विषयका बड़ा ही साथ ही प्राचार्योंका कितना ही इतिहास सामने आजाता मार्मिक और तात्त्विक विवेचन किया गया है, अनेक है / नित्य पाठ करने योग्य है। मू०॥) विरोधी विधि-विधानों एवं विचार-पूवृत्तियोंसे उत्पन्न हुई 4 अध्यात्म-कमल-मार्तण्ड-यह पञ्चाध्यायी विवाहकी कठिन और जटिल समस्योंको बड़ी युक्तिके तथा लाटी संहिता श्रादि ग्रन्थोंके कर्ता कविवर राजमल्ल साथ दृष्टिके स्पष्टीकरण-द्वारा सुलझाया गया है और इस की अपूर्व रचना है। इसमें अध्यात्मसमुद्रको कूजेमें बन्द तरह उनमें दृष्टिविरोधका परिहार किया गया है। विवाह किया गया है। साथमें न्यायाचार्य पं० दरबारीलालजी क्यों किया जाता है ? धर्मसे, समाजसे और गृहस्थाश्रमकोठिया और परिडत परमानन्दजी शास्त्रीका सुन्दर से उसका क्या सम्बन्ध है ? वह कब किया जाना चाहिये ? अनुवाद, विस्तृत विषयसूची तथा मुख्तार श्रीजुगलकिशोर / उसके लिए वर्ण और जातिका क्या नियम होसकता है? जीकी लगभग 80 पेजकी महत्वपूर्ण प्रस्तावना है। विवाह न करनेसे क्या कुछ हानि-लाभ होता है ? बड़ा ही उपयोगी ग्रन्थ है। मू० 11) इत्यादि बातों का इस पुस्तकमें बड़ा ही युक्ति-पुरस्सर एवं हृदयग्राही वर्णन है। बढ़िया पार्ट पेपरपर छपी है। 5 उमास्वामि-श्रावकाचार-परीक्षा-मुख्तार विवाह के अवसरपर वितरण करने योग्य है। मू० ) श्रीजुगलकिशोरजीकी ग्रन्थपरीक्षाओंका प्रथम अंश, ग्रन्थ-परीक्षाअोंके इतिहासको लिये हुए 14 पेजकी नई प्रकाशन विभाग- . प्रस्तावना-सहित / मू०।) वीरसेवामन्दिर, सरसावा (सहारनपुर) --e- eeeeee es प्रकाशक ----10 परमानन्द जैन शास्त्री भारतीय ज्ञानपीठ काशीके लिये आशाराम खत्री द्वारा राँयल प्रेस सहारनपुरमें मुद्रित,