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________________ १२० अनेकान्त रहे हैं, पत्रोंके विशेषांक निकाल रहे हैं, स्मारक बनवा रहे हैं। मानों सारा भारत गांधीवादी होगया है । काश लोगोंने अपनी भूल समझी होती, और सचमुच हृदय परिवर्तन किया होता ! जो संतप्त होने का अभिनय कर रहे हैं काश सचमुच संतप्त हुए होते तो महात्माजीका मरण भी भारतके लिये वरदान हुआ होता ! ऐसे छद्मस्थ लोगोंके आँसू उस मगर के समान है जो धोखे में डालने को तो आँखों में आँसू भरे रखता है, पर अपनी करनीसे लहमेभरको भी बाज नहीं आता । सन् ३२ या ३३में महात्माजी जब पहली बार दिल्लीकी हरिजन कौलोनीमें ठहरे तो सन्ध्याकालीन प्रार्थनाके समय काफ़ी जन-समूह एकत्र हुआ। जिनमें विलायती वस्त्रोंसे सुसज्जित बनी-ठनी महिलाएँ और सूटबूट धारी युवक ही ज्यादातर थे । पाँव छूने के लिये अग्रसर होती हुई भीड़को देखकर महात्माजी तनिक ऊँचे स्वर में बोले - "तुम लोग मेरे पाँव छूनेके बजाय मेरे मुँहपर थूक देते तो अच्छा था । मैं जिन सिद्धान्तोंके प्रसारके लिये मारा-मारा फिर रहा हूँ, जिस स्वराज्य-संग्राम में मैं लिप्त हूँ, उसमें तो तुम लोग मेरी तनिक भी सहायता नहीं करते ? उल्टा जिन विदेशी वस्त्रोंकी मैं होली जलवाता फिर रहा हूँ, उन्हें ही पहनकर तुम मेरे सामने आते हो ? मेरी एक भी बात न मानकर केवल दर्शन करने में ही जीवनकी सार्थकता समझते हो ।" सचमुच उस नेतासे बड़ा अभागा दुनियामें और कौन हो सकता है, जिसका जय-जयकार तो सारा देश करे, उसे ईश्वर तुल्य पूजे किन्तु आदेशोंका पालन मुट्ठीभर ही करते हों । ऐसे ही छद्मस्थ अनुयायियोंके कारण नेता धोखा खाजाते हैं । स्वयं महात्माजी भी कई बार ऐसे धोखेके शिकार हुए। भारत में सर्वत्र इस तरह की श्रद्धा भक्ति श्रोत-प्रोत भीड़को देखकर उन्हें अपने अनुयायियोंकी इस बहुसंख्याका गलत अन्दाज होजाता था । वे समझ लेते थे, मेरे इशारेपर समूचा भारत तैयार बैठा है किन्तु युद्ध छेड़नेपर ३५ करोड़के देश में Jain Education International [ वर्ष ९. १ लाख से अधिक सैनिक कभी नहीं हुए । आश्चर्य तो यह देखकर होता है कि हमारी समाजमें जिन भले मानुसोंने ब्र० शीतलप्रसादका बहिष्कार इसलिये किया कि वे अन्तर्जातीय विवाह और दस्सा पूजनको जैनधर्मानुकूल समझते थे । वही आज अछूतों के मन्दिर प्रवेश तथा रोटी-बेटी व्यवहार और विधवा विवाह के प्रबल प्रसारक महात्माजीका बड़ी श्रद्धा-भक्तिसे कीर्तन कर रहे हैं। जिन लोगोंने ब्रह्मचारीजीको अपने सभामवसे न बोलने दिया, वही महात्माजीकी शोक सभा मन्दिरों में कर रहे हैं । जिन्होंने शिष्टता के नाते उन्हें ब्रह्मचारी तक लिखना छोड़ दिया, मन्दिरोंमें जानेसे रोक दिया, वही आज महात्माजीका स्मारक बनानेकी सोच रहे हैं, विश्ववन्द्य कहकर अपनी श्रद्धा-भक्ति प्रकट कर रहे हैं । जब हम चलें तो साया भी अपना न साथ दे । जब वे चलें ज़मींन चले ग्रस्माँ चले ॥ - जलील यदि सचमुच यह लोग महात्माजीके अनुयायी और श्रद्धालु हुए होते तो बात ही क्या थी । भूल किससे नहीं होती, बड़े-बड़े दोषी भी प्रायश्चित करने पर सङ्घ में मिला लिये जाते हैं। पर नहीं, इनके हृदय में उसी तरह हलाहल भरा हुआ है, देशकी प्रगति में ये बाधक रहे हैं और रहेंगे, सुधार कार्यों में सदैव विघ्न स्वरूप बने रहेंगे। इनका रुदन केवल दिखावा मात्र है । महात्माजी के अनुयायियोंके हाथमें आज शासन-सत्ता है इसीलिये इन्होंने अपना यह बहुरूपिया वेष बनाया है । शासन-सत्ता जिसके हाथमें हो, वह चाहे भारतीय हो या अभारतीय, पटवारी हो या दरोगा उसीके तलुवे सहलाने में लोग दक्ष होते हैं । २ जाली संस्थाएं कुछ धूर्तों का यह विश्वास है कि दुनिया मूर्खोसे भरी पड़ी है। इसमें हियेके अन्धे और गाँठके पूरे अधिक और विवेकबुद्धि वाले बहुत कम हैं। इसी लिये वे धूर्तता के जालमें लोगोंको फँसाते रहते हैं । हमारी समाज में भी कितनी जाली संस्थाएँ ऐसे लोगों ने कायमकी हुई हैं । कोई धर्मार्थ औषधालयके नाम For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.527253
Book TitleAnekant 1948 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1948
Total Pages40
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size3 MB
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