Book Title: Updeshpad Part 01
Author(s): Haribhadrasuri, 
Publisher: Lalan Niketan Madhada

View full book text
Previous | Next

Page 361
________________ ॥ १५० ॥ एवं संवेगपरा-नियउच्चरियं पुणो पुणो जाव, गरिहेइ ताव जायं-केवसनाणं जयपहाणं. ॥ ११ ॥ निदावसीइ बाहू-अज्जाए चंदणाइ सेज्जाओ पमि ओ बहिं अही पुण-तदिसिमागंतुमारखो. ॥ १५२ उविओ सेज्जाइ मिगावई सो जाव ताव पमिबुझा, किं मे बाहू चलिओ-जणे नयवइ हं नागो. ॥ १५३ ॥ संचरित्रो किय नायं-नाणाश्सएण सो य परिवाई, किं होज्जा श्यरो वा-सा नगव नण अन्नोत्ति. ॥ १२४॥ सम्मं मिबाउकडपरायणा सायणा मए विहिया अप्पन्नकेवलाए श्मोइ निदापमायाओ. ॥ १५५ ॥ श्य वेरग्गमुदग्गं-खणमेक मुवागया तो तीए, लोयालोपविलोमो-णणासो समुप्पामो. ॥ १६ ॥ निग्घाश्यकम्ममता कालेण सिवं अणंतममलं च, सिडिगइनामधेयं-परमं ठाणं गया दोवि. ॥१२७ ॥ क वगरना कुळमां जन्मेवी छे अने जगत्ना शिरोमणि नगवाने तने व्रत आप्यां छे, माटे तुं एवी छतां रात पामीने केम आवी ? ११७ त्यारे मृगावती ते प्रवर्तिनीना पगे पी खमाववा लागी के आ मारो अपराध माफ करो अने हु फरीथी एम नहि करीश. ११७ पड़ी ते मनमां चिंतबवा लागी के बधा लोकने नमवा योग्य एवी आ महानुनाव प्रवर्तिनीने में आज प्रमाद करीने शा माटे नाराज कर ? १५० एम संवेगमां चकी पोतानी नूबने वारंवार निंदवा बागी, एटलामां तेणीने जगत्मां सौ करता उत्तम केवळझान प्राप्त थयु. ११ एवामां निद्राना योगे चंदनवाळानो हाथ शय्यायी बाहेर की गयो अने ते तरफ सर्प आववा मांड्यो. १२२ तेयी ते हाथ मृगावतीए ऊपामीने शय्यामां राख्यो तेटले चंदनवाका जागी यकी पूजवा लागी के मारो हाथ केम चलायमान थयो ? त्यारे मृगावती बोली के हे जगवती, आणीमेर सर्प हता. १२३ ते हाय तरफ आवतो हतो. गुरुणीए पूछ' के ते ते केम जाए ? मृगावतीए कयुं के अतिशय ज्ञानथी. गुरुणी श्री उपदेशपद.

Loading...

Page Navigation
1 ... 359 360 361 362 363 364 365 366 367 368 369 370 371 372 373 374 375 376 377 378 379 380 381 382 383 384 385 386 387 388 389 390 391 392 393 394 395 396 397 398 399 400 401 402 403 404 405 406 407 408 409 410 411 412 413 414 415 416 417 418 419 420